पंचतंत्र की रोचक कहानियां - अनिल कुमार Panchtantra Ki Rochak Kahaniyan - Hindi book by - Anil Kumar
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पंचतंत्र की रोचक कहानियां

अनिल कुमार

प्रकाशक : मनोज पब्लिकेशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :40
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3947
आईएसबीएन :81-8133-360-8

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नैतिकता एवं लोक-व्यवहार का ज्ञान बढ़ाने वाली कहानियां....

Panchtantra Ki Rochak Kahaniyan Vishnu Sharma

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

नकल करना बुरा है

एक पहाड़ की ऊंची चोटी पर एक बाज रहता था। पहाड़ की तराई में बरगद के पेड़ पर एक कौआ अपना घोंसला बनाकर रहता था। वह बड़ा चालाक और धूर्त था। उसकी कोशिश सदा यही रहती थी कि बिना मेहनत किए खाने को मिल जाए। पेड़ के आसपास खोह में खरगोश रहते थे। जब भी खरगोश बाहर आते तो बाज ऊंची उड़ान भरते और एकाध खरगोश को उठाकर ले जाते।
एक दिन कौए ने सोचा, ‘वैसे तो ये चालाक खरगोश मेरे हाथ आएंगे नहीं, अगर इनका नर्म मांस खाना है तो मुझे भी बाज की तरह करना होगा। एकाएक झपट्टा मारकर पकड़ लूंगा।’
दूसरे दिन कौए ने भी एक खरगोश को दबोचने की बात सोचकर ऊंची उड़ान भरी। फिर उसने खरगोश को पकड़ने के लिए बाज की तरह जोर से झपट्टा मारा। अब भला कौआ बाज का क्या मुकाबला करता। खरगोश ने उसे देख लिया और झट वहां से भागकर चट्टान के पीछे छिप गया। कौआ अपनी हीं झोंक में उस चट्टान से जा टकराया। नतीजा, उसकी चोंच और गरदन टूट गईं और उसने वहीं तड़प कर दम तोड़ दिया।
शिक्षा—नकल करने के लिए भी अकल चाहिए।

मुफ्तखोर मेहमान


एक राजा के शयनकक्ष में मंदरीसर्पिणी नाम की जूं ने डेरा डाल रखा था। रोज रात को जब राजा जाता तो वह चुपके से बाहर निकलती और राजा का खून चूसकर फिर अपने स्थान पर जा छिपती।
संयोग से एक दिन अग्निमुख नाम का एक खटमल भी राजा के शयनकक्ष में आ पहुंचा। जूं ने जब उसे देखा तो वहां से चले जाने को कहा। उसने अपने अधिकार-क्षेत्र में किसी अन्य का दखल सहन नहीं था।
लेकिन खटमल भी कम चतुर न था, बोलो, ‘‘देखो, मेहमान से इसी तरह बर्ताव नहीं किया जाता, मैं आज रात तुम्हारा मेहमान हूं।’’
जूं अततः खटमल की चिकनी-चुपड़ी बातों में आ गई और उसे शरण देते हुए बोली,
‘‘ठीक है, तुम यहां रातभर रुक सकते हो, लेकिन राजा को काटोगे तो नहीं उसका खून चूसने के लिए।’’
खटमल बोला, ‘‘लेकिन मैं तुम्हारा मेहमान है, मुझे कुछ तो दोगी खाने के लिए। और राजा के खून से बढ़िया भोजन और क्या हो सकता है।’’

‘‘ठीक है।’’ जूं बोली, ‘‘तुम चुपचाप राजा का खून चूस लेना, उसे पीड़ा का आभास नहीं होना चाहिए।’’
‘‘जैसा तुम कहोगी, बिलकुल वैसा ही होगा।’’ कहकर खटमल शयनकक्ष में राजा के आने की प्रतीक्षा करने लगा।
रात ढलने पर राजा वहां आया और बिस्तर पर पड़कर सो गया। उसे देख खटमल सबकुछ भूलकर राजा को काटने लगा, खून चूसने के लिए।
ऐसा स्वादिष्ट खून उसने पहली बार चखा था, इसलिए वह राजा को जोर-जोर से काटकर उसका खून चूसने लगा। इससे राजा के शरीर में तेज खुजली होने लगी और उसकी नींद उचट गई। उसने क्रोध में भरकर अपने सेवकों से खटमल को ढूंढकर मारने को कहा।

यह सुनकर चतुर खटमल तो पंलग के पाए के नीचे छिप गया लेकिन चादर के कोने पर बैठी जूं राजा के सेवकों की नजर में आ गई। उन्होंने उसे पकड़ा और मार डाला।
शिक्षा—अजनबियों पर कभी विश्वास न करो।

भेड़िया आया...भेड़िया आया


एक लड़का रोज जंगल में भेड़ें चराने के लिए जाता था। वह बड़ा शैतान था।
अपनी शैतानियों द्वारा दूसरों को परेशान करने में उसे बड़ा मजा आता था। मगर जंगल में अकेला होने के कारण वह उकता जाता था। यहां किसे और कैसे परेशान करे, यही सोचता रहता था। जंगल से लगते कुछ किसानों के खेत थे। वे सुबह-सुबह आकर अपने खेतों में काम करने में जुट जाते थे।
एक दिन उसने किसानों के साथ शैतानी करने की सूझी।
वह सोचने लगा कि ऐसा क्या किया जाए कि सारे किसान परेशान हो जाएं।
अचानक उसके दिमाग में एक खुराफात आ ही गई।

वह जोर-जोर से चिल्लाने लगा, ‘‘बचाओ, बचाओ ! भेड़िया आया...भेड़िया आया !’’
किसानों ने लड़के की आवाज सुनी तो वे अपना-अपना काम छोड़कर लड़के की मदद के लिए दौड़ पड़े। जो भी हाथ लगा, साथ ले आए। कोई फावड़ा ले आया, कोई दरांती, तो कोई हंसिया। मगर जब वे लड़के के पास पहुंचे तो, उन्हें कहीं भेड़िया दिखाई नहीं दिया।
किसानों ने लड़के से पूछा, ‘‘कहाँ है भेड़िया ?’’
उनका सवाल सुनकर लड़का हंस पड़ा और बोला—‘‘मैं तो मजाक कर रहा था भेड़िया आया ही नहीं था। जाओ....तुम लोग जाओ।’’
किसान लड़के को डांट-फटकार कर लौट आए।
उनके जाने के बाद वह अपने आपसे बोला—‘वाह ! कैसा बेवकूफ बनाया। मजा आ गया।’
कुछ दिनों बाद लड़के ने फिर ऐसा ही किया। आसपास के किसान फिर मदद के लिए दौड़ आए। लड़का फिर हंसकर बोला, ‘‘मैं मजाक कर रहा था। आप लोगों के पास कोई और काम नहीं है जो मामूली – सी चीख-पुकार सुनकर दौड़े चले आते हो।’’

किसानों को बड़ा गुस्सा आया एक बार फिर उन्होंने उसे डांट-फटकार लगाई।
मगर ढीठ लड़का हंसता रहा।
लेकिन अब किसानों ने दृढ़ निश्चय कर लिया कि इस लड़के की मदद को कभी नहीं आएंगे।
कुछ समय बाद एक दिन सचमुच ही भेड़िया आ पहुंचा। लड़का दौड़कर एक पेड़ पर चढ़ गया और मदद के लिए चिल्लाने लगा। इस बार उसकी मदद के लिए कोई नहीं आया।
सभी ने यही सोचा कि वह बदमाश लड़का पहले की तरह मजाक कर रहा है।
भेड़िये ने कई भेड़ों को मार डाला। इससे लड़के को अपने किए पर दुख हुआ।
शिक्षा—झूठ बोलने वालों पर कोई विश्वास नहीं करता।

गुफा की आवाज


एक बूढ़ा शेर जंगल में मारा-मारा फिर रहा था। कई दिनों से उसे खाना नसीब नहीं हुआ था। दरअसल बुढ़ापे के कारण वह शिकार नहीं कर पाता था। छोटे-छोटे जानवर भी उसे चकमा देकर भाग जाते थे। वह भटकते-भटकते काफी थक गया तो एक स्थान पर रुककर सोचने लगा कि क्या करूं ? किधर जाऊं ? कैसे बुजाऊं इस पेट की आग ? काश ! मैं भी दूसरे शाकाहारी जानवरों की भांति घास-पात, फल-फूल खा लेने वाला होता तो आज मुझे इस प्रकार भूखों न मरना पड़ता।
अचानक उसकी नजर एक गुफा पर पड़ी। उसने सोचा कि इस गुफा में अवश्य ही कोई जंगली जानवर रहता होगा। मैं इस गुफा के अन्दर बैठ जाता हूं, जैसे ही वह जानवर आएगा, मैं उसे खाकर अपना पेट भर लूंगा। शेर उस गुफा के अंदर जाकर बैठ गया और अपने शिकार की प्रतीक्षा करने लगा।
वह गुफा एक गीदड़ की थी। गीदड़ ने गुफा के करीब आते ही गुफा में शेर के पंजों के निशान देखे तो वह फौरन खतरा भांप गया। परंतु सामने संकट देखकर उसने अपना संयम नहीं खोया बल्कि उसकी बुद्धि तेजी से काम करने लगी कि इस शत्रु से कैसे बचा जाए ?

और फिर उसकी बुद्धि में नई बात आ ही गई, वह गुफा के द्वार पर खड़ा होकर बोला--‘‘ओ गुफा ! गुफा ।’’
जब अंदर से गुफा ने कोई उत्तर न दिया, तो गीदड़ एक बार फिर बोला—‘‘सुन री गुफा ! तेरी मेरी यह संधि है कि मैं बाहर से आऊंगा तो तेरा नाम लेकर तुझे बुलाऊंगा, जिस दिन तुम मेरी बात का उत्तर नहीं दोगी मैं तुझे छोड़कर किसी दूसरी गुफा में रहने चला जाऊंगा।’’
जवाब न मिलता देख गीदड़-बार-बार अपनी बात दोहराने लगा।
अन्दर बैठे शेर ने गीदड़ के मुंह से यह बात सुनी, तो वह यह समझ बैठा कि गुफा गीदड़ के आने पर जरूर बोलती होगी। अतः अपनी आवाज को भरसक मधुर बनाकर वह बोला—‘‘अरे आओ—आओ गीदड़ भाई। स्वागत है।’’
‘‘अरे शेर मामा ! तुम हो। बुढ़ापे में तुम्हारी बुद्धि इतना भी नहीं सोच पा रही कि गुफाएं कभी नहीं बोलतीं।
कहकर वह तेजी से पलटकर भागा। शेर ने उसे पकड़ने के लिए गुफा से बाहर अवश्य आया किंतु तब तक वह गीदड़ नौ दो ग्याह हो चुका था।
शिक्षा—संकट के समय में भी बुद्धि का दामन नहीं छोड़ना चाहिए।

गोलू-मोलू और भालू


गोलू-मोलू और पक्के दोस्त थे। गोलू जहां दुबला-पतला था, वहीं मोलू मोटा गोल-मटोल। दोनों एक-दूसरे पर जान देने का दम भरते थे, लेकिन उनकी जोड़ी देखकर लोगों की हंसी छूट जाती। एक बार उन्हें किसी दूसरे गांव में रहने वाले मित्र का निमंत्रण मिला। उसने उन्हें अपनी बहन के विवाह के अवसर पर बुलाया था।
उनके मित्र का गांव कोई बहुत दूर तो नहीं था लेकिन वहां तक पहुंचने के लिए जंगल से होकर गुजरना पड़ता था। और उस जंगल में जंगली जानवरों की भरमार थी।
दोनों चल दिए...जब वे जंगल से होकर गुजर रहे थे तो उन्हें सामने से एक भालू आता दिखा। उसे देखकर दोनों भय से थर-थर कांपने लगे। तभी दुबला-पतला गोलू तेजी से दौड़कर एक पेड़ पर जा चढ़ा, लेकिन मोटा होने के कारण मोलू उतना तेज नहीं दौड़ सकता था। उधर भालू भी निकट आ चुका था, फिर भी मोलू ने साहस नहीं खोया। उसने सुन रखा था कि भालू मृत शरीर को नहीं खाते। वह तुरंत जमीन पर लेट गये और सांस रोक ली। ऐसा अभिनय किया कि मानो शरीर में प्राण हैं ही नहीं। भालू घुरघुराता हुआ मोलू के पास आया, उसके चेहरे व शरीर को सूंघा और उसे मृत समझकर आगे बढ़ गया।

जब भालू काफी दूर निकल गया तो गोलू पेड़ से उतरकर मोलू के निकट आया और बोला, ‘‘मित्र, मैंने देखा था....भालू तुमसे कुछ कह रहा था। क्या कहा उसने ?’’
मोलू ने गुस्से में भरकर जवाब दिया, ‘‘मुझे मित्र कहकर न बुलाओ...और ऐसा ही कुछ भालू ने भी मुझसे कहा। उसने कहा, गोलू पर विश्वास न करना, वह तुम्हारा मित्र नहीं है।’’
सुनकर गोलू शर्मिन्दा हो गया। उसे अभ्यास हो गया था कि उससे कितनी भारी भूल हो गई थी। उसकी मित्रता भी सदैव के लिए समाप्त हो गई।
शिक्षा—सच्चा मित्र वही है जो संकट के काम आए।

नाग और चीटियां


एक घने जंगल में एक बड़ा-सा नाग रहता था। चिड़ियों के अंडे, मेढ़क तथा छिपकलियों जैसे छोटे-छोटे जीव-जंतुओं को खाकर अपना पेट भरता था। रातभर वह अपने भोजन की तलाश में रहता और दिन निकलने पर अपने बिल में जाकर सो रहता। धीरे-धीरे वह मोटा होता गया, हालत यह हो गई कि वह इतना मोटा हो गया कि बिल के अंदर-बाहर आना-जाना भी दूभर हो गया।

आखिरकार, उसने बिल को छोड़कर एक विशाल पेड़ के नीचे रहने की सोची। लेकिन वहीं पेड़ की जड़ में चींटियों की बांबी थी और उनके साथ का रहना नाग के लिए असंभव था। सो, वह नाग उन चींटियों की बांबी के निकट जाकर बोला, ‘‘मैं सर्पराज नाग हूं, इस जंगल का राजा। मैं तुम चींटियों को आदेश देता हूं कि यह जगह छोड़कर चले जाओ।’’
वहां और भी जानवर थे, जो उस भयानक सांप को देखकर डर गए और जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे। लेकिन चींटियों ने नाग की इस धमकी पर कोई ध्यान न दिया।

वे पहले की तरह अपने काम-काज में जुटी रहीं। नाग ने यह देखा तो उसके क्रोध का पारावार न रहा।
वह गुस्से में भरकर बांबी के निकट जा पहुंचा। यह देखा हजार-हजार चींटियाँ उस बांबी से निकल पड़ी और नाग से लिपटकर उसके शरीर पर काटने लगीं। उनके कंटीले डंकों से परेशान नाग बिलबिलाने लगा। उसकी पीड़ा असहनीय हो चली थी और शरीर पर घाव होने लगे थे। नाग ने चींटियों को हटाने की बहुत कोशिश की लेकिन असफल रहा। कुछ ही देर में उसने वहीं तड़प-तड़प कर जान दे दी।
शिक्षा—बुद्धि से काम लेने पर शक्तिशाली शत्रु को भी परास्त किया जा सकता है।




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