24 कहानियाँ - सुभद्रा मालवी 24 Kahaniyan - Hindi book by - Subhadra Malviya
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24 कहानियाँ

सुभद्रा मालवी

प्रकाशक : सी.बी.टी. प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2003
पृष्ठ :144
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3968
आईएसबीएन :81-7011-795-x

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24 कहानियों का संकलन...

24 kahaniyan - A Hindi Book by Subhadra Malviya - 24 कहानियाँ - लेखिका - सुभद्रा मालवीय

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

नीली मोटर साइकिल

राजन के चाचा की चमकदार नीले रंग की मोटर साइकिल बेहद खूबसूरत थी। इतनी सुन्दर मोटर साइकिल राजन के पास-पड़ोस में किसी के भी पास नहीं थी। इसलिए राजन अपने दोस्तो के बीच अपने आपको सबसे अलग और बड़ा समझ रहा था। राजन के चाचा मुम्बई में आए थे और वह कुछ सप्ताह यहाँ रहने वाले थे।
जब राजन अगले दिन स्कूल पहुँचा तो उसकी क्लास के लडको ने उसे घेर लिया। वे सभी उससे उसके चाचा की मोटर साइकिल के बारे में पूछने लगे। राजन भी घमंड से मोटर साइकिल के बारे में बढा-चढाकर बताने लगा। क्लास में बैठा वह अपने पाँवों के सहारे अपनी कुर्सी को पीछे की तरफ झुलाते हुए कहने लगा कि हमारी मोटर साइकिल एक लीटर पेट्रोल में आठ किलोमीटर तक चलती है।

राजन के चाचा जब दोपहर को सो जाते तो हम सब मोटर साइकिल के चारो तरफ खड़े हो जाते। राजन कई बार चाचाजी का लाल रंग का हेल्मेट उठा लाता। हम सब बारी-बारी से हेल्मेट पहनकर मोटर साइकिल पर बाठ जाते। शाम को जब राजन अपने चाचा के साथ मोटर साइकिल पर सवार हो घूमने जाता तो हम सबको उससे ईर्ष्या होती, वह हमें अपना दुश्मन-सा दिखाई देता।

राजन अब घमंडी हो गया था और बनावटी ढंग से रहने लगा था। वह जब भी घर से बाहर निकलता तो घमंड से उसका सीना तना रहता, गर्दन ऊपर उठी रहती। मानो संसार में वही सबसे बडा हो। स्कूल की छुट्टी होने पर जब हम सभी दोस्त अपनी-अपनी साइकिलों पर घर लौटते, उस समय भी राजन अपनी साइकिल के हैंडल को इस तरह पकडे रहता, जैसे वह साइकिल नहीं, नीले रंग की मोटर साइकिल चला रहा हो।
एक सोमवार की सुबह जब पूरी क्लास के बच्चे आस्ट्रेलिया का नक्शा भर रहे थे, राजन मेरे कान में फुसफुसाया, ‘‘आजकल मैं मोटर साइकिल चलाना सीख रहा हूँ, यार!’’
‘‘ओह!’’ मैंने गहरी साँस ली। ‘‘तुम्हारे चाचा मोटर साइकिल तुम्हें दे देते हैं? मुझे तो जरा भी यकीन नही आता।’’
तो ठीक है! शर्त रख लेते हैं.मैं रविवार को तुम्हें मोटर साइकिल चला कर दिखा दूँगा।’’
राजन मोटर साइकिल के हर स्क्रू, नट-बोल्ट, पहिए, हवा मोटर सभी के बारे में जान गया है, यह तो ठीक है। पर क्या वह उसे भी चला सकता है, इस पर विश्वास करना मेरे लिए मुश्किल था।
सभी समझदार बडे लोगों की तरह राजन के चाचा भी सोचते थे कि चौदह वर्ष के बच्चे के हाथ में मोटर साइकिल देना ठीक नहीं है।

रविवार को दोपहर खाने के बाद मुझे राजन की गप्प याद आ गई। मैंने सोचा कि इस समय मैं राजन के घर जाकर उसकी गप्प के बारे में पूछता हूँ।उसके घर की खिडकी के नीचे पहुँचकर मैंने अपना अंगूठा और उँगली जोड कर सीटी बजाई। उसने सीटी की आवाज सुनकर खिडकी से सिर बाहर निकाला और मुझे रूकने का इशारा किया। कुछ देर इंतजार के बाद बह पीछे के गेट से बाहर आया। वह पीले रंग की जर्सी और लाल रंग का हेल्मेट पहने था।बाहर मोसम कुनकुनी धूप वाला था।
बिना आवाज के उसने मोटर साइकिल गेट से बाहर निकाली। सिर पर हेल्मेट का बोझ तो था ही इसलिए उसने अपना पूरा शरीर घुमाकर पीछे देखा और मोटर साइकिल को खींच सड़क पर ले आया। दो-तीन घर पार करने के बाद उसने चाबी लगा दी। फिर किक लगाई। मोटर साइकिल स्टार्ट हो जाने पर उसने सावधानी से पीछे देखा और मुझसे पीछे बैठने को कहा। मुझे उसके पीछे बैठने में डर लगा, पर मैं बैठ गया। फिर भी मुझे यकीन नहीं था कि वह मोटर साइकिल चला लेगा।

‘‘बैठ गए? चलूँ क्या?’’ राजन ने ऊँची आवाज में मुझसे पूछा।
‘‘हाँ, मैं बैठ गया। अब चलाओ।’’
राजन नें मोटर साइकिल चला दी। सडक इस समय लगभग खाली थी। स्टार्ट होने के बाद से मोटर साइकिल बडे आराम से चल रही थी। हम सडक के मोड तक पहुंच गए। फिर मोटर साइकिल को क्रिसेंट रोड की तरफ मोड दिया। मैं राजन के कंधे के ऊपर से लगातार सामने देख रहा था। मोटर साइकिल के मीटर में रफ्तार की सुई आगे बढती जा रही थी, 30-40 और फिर 60, ‘‘वाह!’’ मेरे मुंह से निकल पडा।

हम चौराहे पर पहुंच गए थे। वहाँ ट्रैफिक लाइट पीली हो रही थी, परंतु राजन की न तो गाडी रोकने की इच्छा थी ओर न ही स्पीड कम करने की। हम सडक पार कर ही रहे थे कि ट्रैफिक लाइट लाल हो गई। राजन को पीली बत्ती पर सड़क पार नही करनी चाहिए थी।हमें ट्रैफिक पुलिस वाले ने देख लिया और रूकने के लिए उसने तेज सीटी बजाई। परंतु राजन ने सीटी की कोई परवह नहीं की। पीछे मुडकर देखा भी नहीं, बल्कि उलने मोटर साइकिल की रफ्तार और बढा दी तथा अपनी इस शैतानी पर जोर से हँस पडा। क्रिसेंट रोड पार करके राजन ने गाडी को दाहिनी ओर मोड़ लिया। लेकिन एक सेकण्ड के अंतर में ही एक बूढी औरत सडक पार करते हुए सामने आ गई। राजन ने ब्रेक लगाया।अचानक पूरा ब्रेक लगने से मोटर साइकिल आगे तक घिसटती चली गई जिससे टकरा कर वह बूढी औऱत सडक पर गिर गई। उसके थैले में से प्याज आलू और टमाटर सडक पर इधर उधर बिखर गए।

राजन पर तो इस समय मानो मोटर साइकिल का नशा चढा हुआ था। उसने चीख को गले में ही रोक लिया और रफ्तार बढा दी।
‘‘अरे! राजन, रूको तो,’’ मैंने उसके कंधे को झिझोडते हुए कहा।
उसने मेरा हाथ अपने कंधे पर से झटके से हटा दिया। बोला, ‘‘बेवकूफ मत बनो, मै जेल नही जाना चाहता हूँ।’’
‘‘लेकिन वह औरत...?
‘‘कुछ नही हुआ उसे ज्यादा गहरी चोट नही लगी है उसे।’’

‘‘लेकिन हमे रूककर उसे देखना, उसकी मदद तो करना चाहिए थी। यह तो बहुत बेहूदी बात है कि हम धक्का मार कर किसी को गिरा दें और बिना उसकी ओर ध्यान दिए आगे बढ जाएँ। मैं वापस जाकर उसे देखूगा। मोटर साइकिल रोककर मुझे उतार दो,’’ मैंने गुस्से में कहा। मुझे राजन का व्वहार बहुत बुरा लग रहा था।
मैं उसे रोक रहा था, लेकिन वह मुझे अनसुना किए चुपचाप अपनी रफ्तार से चला जा रहा था। हम लगभग दो किलोमीटर और आगे निकल गए, तब राजन ने कहा, ‘‘ठीक है ! तुम जैसा ठीक समझते हो करो, लेकिन मै वहाँ नहीं जाऊगा।’’
‘‘तुम बह्त दुष्ट हो।’’ कहकर मैं मोटर साइकिल से उतर पडा। फिर मैंने बस के लिए सडक पार की। बस आई और मै चढ गया। जब कंडक्टर टिकट के लिए मेरे पास आया तब मुझे याद आया कि मेरी जेब में तो एक भी पैसा नही है। मैंने कहा, ‘‘माफ कीजिए, मैं पैसे लाना भूल गया हूँ। कल आपको जरूर दे दूगा, अभी तो मेरा क्रिसेट रोड तक जाना बहुत जरूरी है।’’

कंडक्टर ने मेरी बात ध्यान से सुने बिना ही कहा, ‘‘चलो नीचे उतरों, बिना पैसे लिए आ गए? फिर उसने बस की छत पर हाथ मारा, बस झटके से रूक गई। मैंने उससे बार बार कहा कि क्रिसेट रोड पर एक एक्सीडेंट हो गया है, मेरा वहाँ जाना जरूरी है परंतु उसने मेरी एक न सुनी।
वह चीखते हुए बोला, ‘‘चुप कर, चल नीचे उतर।’’
मै अपने आप को बहुत ही बेबस महसूस कर रहा था।अगर मै बस से न उतरा तो वह मुझे धक्का देकर उतार देता।
तभी एक बूढी महीला ने मुझे बचा लिया।उन्होंने कंडक्टर से कहा, ‘‘इसे नीचे मत उतारो, मैं इसका टिकट ले लेती हूँ।’’उन्होंने पर्स खोलकर कडक्टर को टिकट के पैसे दे दिए।
‘‘धन्यवाद अम्माजी!’’ मैने कहा। शर्म व अपमान से मेरे गाल गर्म और लाल हो गए थे। जब मै क्रिसेटं रोड पहुचा तो देखा, वहा सडक पर भीड लगी हुई थी। एक आदमी बूढी औरत के हाथ में पट्टी बांध कर उसे रिक्सा में बैठा रहा था।
भीड में लोग एक-दूसरे को बता रहे थे कि नीले रंग की मोटर साइकिल थी, जिस पर दो लडके बैठे थे। उन्होंने ही माता जी को टक्कर मारी है और तेजी से भाग गए हैं।

‘‘मैं उन्हें पकड लूगाँ, क्या किसी ने उनकी मोटर साइकिल का नमबर नोट किया है?’’ वहाँ खडे पुलिस इंस्पेक्टर ने भीड से पूछा।
सर मैं आपको बता सकता हूँ। उस मोटर साइकिल पर मैं ही पाछे बैठा हुआ था।’’ मैंने आगे बढ कर इंस्पेक्टर से कहा।
तभी मैंने मोटर साइकिल की आवाज सुनी। हाँ, वह नीली मोटर साइकिल ही थी। राजन वापस आरहा था। उसने मोटर साइकिल से उतर कर इंस्पेक्टर से कहा, ‘‘साहब माता जी को धक्का मेरी मोटर साइकिल से ही लगा है। वाकई गल्ति मेरी थी।’’
मैंने गहरी साँस ली और सडक के किनारे खडा हो गया।


पड़ोसी



भीड सडक पर आ गई थी। दंगाई चीख-चिल्ला रहे थे। दंगाइयों को जोभी सामान दिऱ जाता, वे उसे ठोकर मारते और ईधर उधर उछाल देते। दंगाइयों में से एक आदमी चिल्लाया, ‘‘आगो बढो! आज हम इन सबको खत्म कर डालेगे।’’

उनमे से बहुत ने शराब पी रखी थी। वे इधर उधर घूम रहे थे। उन्हें खुद भी पता नही था कि वह क्या कर रहे हैं।
लडकी ने ये आवाजें सुनीं तो डर गई। आवाजें उसके ही घर की तरफ बढ रही थी। वह जानती थी कि उसके दादा जी इतने बूढे है कि वह कुछ नहीं कर सकेगा। उनके अलावा घर में और कोई आदमी नहीं था।उसका घर अन्य घरों की तरह साधारण-सा एक मंजिल का बना था। बाहर बारामदा और छोटा सा लाँन था। लाँन में रंग-बिरंगे फलो की क्यारिया थीं। इन फूलो के बीज उसे पडोसी लडके टुटू ने दिये थे। हफ्ते भर में ही बीजों से छोटे-छोटे पौधे उग आए थे।
कमरे में अँधेरा था। लडकी ने डरकर आँखे बंद कर लीं। वह प्रार्थना करने लगी। डर के मारे वह प्रार्थना के शब्द भी भूल गई थी। उसने दादाजी को पुकारा, ‘‘दादाजी...दादाजी... अब क्या होगा?’’
बूढे दादाजी ने उसकी हथेली को अपने हाथों में भीच लिया। ‘‘डरो मत बिटिया रानी, डरो मत! भगवान हमारी रक्षी करेगे।’’

वह बुरी तरह घबरी रही थी। उसे रोना आ रहा था। दादाजी ने उसे प्यार से थपथपाया औऱ बोले, ‘‘बेटी, ये दंगा करने वाले न तो हमारे मोहल्ले के हैं, न हमारे शहर के। इस भीड को तो शराब पिलाकर बहकाया गया है। ये वे लोग हैं, जिनके पास न कोई रोजगार है और न पैसा। इनका गुस्सा तो अपनी सरकार और समाज पर होता है। परंतु कुछ लोग अपने फायदे के लिए इन्हें बहका देते है। तभी तो ये लूट पाट करते हैं, आग लगाते है और मार-काट करते है।आज ये हमारे साथ कर रहे हैं, कल किसी और के साथ करेंगे,’’कहेत हुए दादाजी ने लडकी को अपने पास खीच लिया। फिर मुँह पर उँगली रख धीरे से कहा, ‘‘श...श...बेटी, रोओ मत और चुप रहो! हो सकता है वे हमारे घर में अंधेरा देखकर आगे बढ जाएँ।
दंगाइयों की आवाजे और पास आ गई थीं। अब तो वे एकदम घर के सामने थे।
‘‘दादाजी क्या मै टुटू को बुला लूँ। शायद वह हमारी कुछ सहायता कर सके।’’
‘‘नही बिटिया, नहीं! इस समय तुम एकदम चुप रहो।’’
लडकी चुपचाप बैठ गई। उसने अपना चेहरा हाथों में छिपा लिया। वह अभी भी सिसक रही थी। और धीरे-धीरे भगवान से प्रार्थना कर कर रही थी, ‘‘हे भगवान, उनसे कहो वे हमे छोडकर आगे निकल जाएँ। हे भगवान, अगर ऐसा होगा तो मै आज के बाद, न तो कभी झूठ बोलूँगी और न किसी से झगडा करूँगी। अच्छी लडकी बन जाऊँगी। भगवानजी, दया करो। हमारी सहायता करो!’’
लडकी को अपनो पडोसी अठारह साल के टुटू की बहुत याद आ रही थी। टुटू उसका दोस्त था। उसी ने उसे बीज बोना और पौधों की देखभाल करना सिखाया था। उसका मन हो रहा था कि टुटू को बुला ले। परंतु वह कैसे बुला सकती थी। घर के सामने दंगाई खड़े थे।

दंगाइयों की भीड उसके दरवाजे तक आ गई थी।किसी ने लात मार कर बाहर का गेट तोड दिया। अब वे उसकी क्यारियों और फूलो रौदते हुए आगे बढ रहे थे। उनके हाथो में लाठियाँ, बल्लम और कुल्हाड थे।
वे दरवाजा बजा रहे थे और चीख-चिल्ला रहे थे, ‘‘खोलो, दरवाजा खोलो! नीच कायरो दरवाजा खोलो! नही तो हम दरवाजा तोड देगे!’’
लडकी दादाजी से चिपट गई और फुसफुसाकर बोली, ‘‘दादाजी, दादाजी, अब क्या होगा?’’
‘‘तुम कही छिप जाओ। जल्दी से छिप जाओ। पलंग के नीचे, दरवाजे के पीछे या कही भी...’’ बूढे ने दुखी होते हुए कहा।

‘‘दादाजी, इधर आइए, इधर!’’ लडकी ने बूढे का हाथ थाम लिया।‘‘हम दोनों इधर छिप जाते हैं।’’
अंधेरे कमरे में कुछ भी नही सूझ रहा था। लडकी ने दादाजी को अलमारी और दीवार के बीच वाली जगह में खडा कर दिया और खुद भी उनके आगे सिमटकर खडी हो गई। उन दोनो के दिल तेजी से धडक रहे थे। उसने भगवान से एक बार फिर प्रार्थना की, ‘‘हमारी सहायता करो भगवान, हम पर दया करो!’’ तभी उसके पीछे खडे दादाजी को खाँसी आ गई। कफ उनके गले में अटक गया। वे धीरे-धीरे खँखारने लगे।
‘‘नहीं दादाजी, नहीं! इस समय मत खँखारिए!’’
बूढे ने मुश्किल से खाँसी को गले में ही रोक लिया। इतनी देर में दंगाइयों ने घर का दरवाजा तोड डाला और बाहर की बैठक में घुस आए। वे मेज-कुर्सी पटक रहे थे। खिडकियों अलमारियों के शीशे तोड रहे थे और चिल्ला रहे थे, ‘‘कहाँ हो डरपोक! बाहर निकलो, जल्दी बाहर आओ!’’
तभी इन सब आवाजो से तेज एक आवाज आई, ‘‘साथियों तुम सब बाहर आ जाओ। मैं ढूढता हूँ कि घर के लोग आखिर छिपे कहाँ है?’’

लडकी ने दादाजी के कान में कहा, ‘‘दादाजी यह तो टुटू की आवाज है! ऐसा कैसे हो सकता है?’’ उसे आश्यर्य हो रहा था। वह सोच रही थी कि उसका पड़ोसी दोस्त टुटू दंगाइयों के साथ कैसे हो गया? उस दिन तो बड़े प्यार से कह रहा था, ‘‘फूलो की राजकुमारी! तुम्हारे डेलिया के फूल तो मेरे फूलों से भी बड़े हैं। मेरे पास कुछ स्नेपड्रेगन के पौधे हैं, तुम लोगी क्या?’’और आज वह दंगाइयों के साथ हमें मारने आ गया है। नही ऐसा नही हो सकता!
उसका मन यह सोचकर निराश होने लगा था कि अब उन्हें बचाने वाला कोई नहीं है।
‘‘इस कमरे में ढूँढता हूँ,’’टुटू की आवाज आई, ‘‘आखिर वे लोग छिप कहा गए?’’ उसने दरवाजे पर ठोकर मारी, दरवाजा फटाक्से खुल गया। टार्च की गोलाकार रोशनी दीवारों पर घूमने लगी। वह कमरे के बीचो-बीच आ खडा हुआ। बाकी दंगाई बाहर के कमरों में थे। तभी अलमाऱी के पीछे से दादाजी को खाँसी का झटका लगा। उन्होने हाथों से मुँह कस लिया। तभी टुटू ने आवाज की दिशा में टार्च घुमा दी।

लडकी बुरी तरह घबरा गई कि अब तो वे दोनों पकड में आ ही गए। फिर भी उसने घिघियाकर धीरे से पुकारा, ‘‘टुटू...टुटू...!’’
टुटू ने आगे बढ कर उसके मुँह पर हाथ रख दिया, जिससे उसकी आवाज बाहर न निकले। और चुप रहने का इशारा किया। टुटू ने आवाज करने के लिए कुर्सी को ठोकर मारी, कुर्सी धडाम से गिर पडी।
बाहर से किसी ने पूछा, ’’क्या हुआ? कोई मिला?’’
‘‘नही यहाँ तो कोई नही है।’’
‘‘शायद वे लोग छत पर होगे। चलो, ऊपर चलते है।’’ दो-चार लोगों की सीढियाँ चढने की आवाज आई।
अब टुटू ने लडकी से धीरे से कहा, ‘‘तुम पीछे की खिडकी से कूद कर तुम मेरे घर चली जाओ। मेरी माँ पिछवाडे तुम्हारा इंतजार कर रही है।’’
‘‘पर दादाजी...?’’

‘‘पहले तुम भागो। मै देखँता हूँ।’’ उसने उसे बाहों से पकड कर खिडकी से बाहर कुदा दिया। लडकी पतली गली के टुटू के घरकी ओर दौड़ पडी। टुटू के घर पहुँच कर उसने दरवाजा थपथपाया। दरवाजा तो खुला ही था। दरवाजे के पीछे टुटू की माँ खडी थी। माँ ने हाथ बढाकर लडकी को अंदर खीच लिया। फिर पूछू, ‘‘तुम्हारे दादाजी कहाँ हैं?’’
‘‘मुझे नही मालूम,शायद वह घर मे ही हैं,’’कह कर रो पडी।
टुटू की माँ ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए दिलासा दिया, ‘‘चुप हो जाओ बेटी, रोओ नहीं। टुटू उन्हें बचा लाएगा।
लडकी के घऱ में काफी देर तक तोड-फोड होती रही। फिर सब शांत हो गया। रात काफी हो रही थी। अंधेरे में हाथ को हाथ भी नही सूझ रहा था। काफी देर के इंतजार के बाद गली में आहट सुनाई दी। टुटू की माँ और लडकी दरवाजे की ओर दौडी। उन्हें टुटू की आवाज सुनाई दे रही थी।
टुटू कह रहा था, ‘‘बस दादाजी, हमघर तकआ हीपहुंचे हैं। ईश्वर को धन्यवाद दे कि आप दोनों हमारे साथ ठीक-ठाक हैं।
‘‘मेरे बेटे, यह सब तुम्हारे ही कारण हो सका। मै तुम्हारा किस तरह धन्यवाद करूँ, मेरे बच्चो! आज मै और मेरी पोती दोनों ही तुम्हारे कारण मौत के मुंह से बच निकले,’’कहते हुए दादाजी की आवाज भर्रा उठी।<

रेवती का संगीत-प्रेमी पौधा


रेवती संगीत की छात्रा थी। उसे वायलिन बजाना बहुत अच्छा लगता था। जब भी उसे समय मिलता वह वायलिन बजाती। रेवती के घर के बाहर सहन में बहुत से गमले रखे थे। गमलों में रंग-बिरंगे फूलों वाले पौधे थे। सहन मे सीमेंट का एक बेच था। रेवती इसी बेच पर बैठकर वायलिन बजाती थी। एक दिन जब रेवती वायलिन बजा रही थी, उसका ध्यान दीवार के पास रखे गमले पर गया। इस गमले का पौधा मुरझाया हुआ था और उसके पत्ते भी पीले पड गये थे।रेवती को अपनी कक्षा में पढा पाठ याद आया कि पौधो को हवा, पानी, व सूरज की रोशनी की जरूरत होती है।उसने गमाल बरामदे के बीच में रख दिया, ताकि उसे ये तीनों चीजें मिल सके।

वह रोज उस पौधे की देखभाल करने लगी। तभी उसे याद आया कि उसकी कालोनी में पुष्प प्रदर्शनी होने वाली है। उसने सोचा, ‘क्यों न मै भी इस पुष्प प्रदर्शनी में भाग लूँ। आज से ही मै अपने पौधो की देख भाल करूगी और फिर एक सबसे सुंदर पौधे को पुष्प प्रदर्शनी में ले जाऊँगी। उस दिन से रेवती पौधो की और भी अधिक देख भाल करने लगी। स्कूल से लौट कर वह उस बीमार पौधे को कुछ देर अवश्य देखती, मानो उससे हाल-चाल पूछ रही हो। फिर बेंच पर बैठ वायलिन बजाती।‘मोहनम्’ उसका प्रिय राग था जिसे बजाकर उसे बहुत खुशू होती। कुछ देर वायलिन बजाने के बाद वह अपनी पढाई करने चली जाती।

प्रतिदिन उसका यही कार्यक्रम बन गया था। वह बीमार पौधा अब काफी सुंदर और चिकने हरे-हरे पत्तों से भर गया था। उसको देखकर रेवती का मन प्रतियोगिता में भाग लेने मे पक्का हो जाता। एक शाम रेवती जब उस पौधे के पास आकर बैठी, उसने देखा पौधे की दो-तीन पत्तियाँ किसी कीड़े ने कुतर डाली हैं। रेवती एक-एक पत्ति को आगे से पीछे देखने लगी। तभी उसकी नजर एक छोटी सी छल्ली पर गई जो पौधे के तने से चिपकी हुई थी। रेवती ने एक सीक से उस कीड़े को हटाया और दूर फेंक दिया।फिर उसने थोडी सी कीटनाशक दवा पौधे पर छिड़क दी।
वायलिन बजाने का समय हो रहा था, रेवती बेंच पर बैठ वायलिन बजाने लगी। अपने प्रिय राग ‘मोहनम्’ को उसने बहुत धीमी लय मे शुरू किया। धीरे-धीरे राग अपनी गति पर था कि रेवती का ध्यान पौधे पर गया। यह क्या? पौधा उसकी ओर वायलिन की दिशा में झुक आया था और धीमे-धामे आ हिल रहा था। रेवती ने सोचा शायद यह उसका भ्रम है,क्योंकि तब तेज हवा भी नहीं थी

वह वायलिन रखकर पढने चली गई। अगले दिन जब वह पौधों को पानी देकर वायलिन बजाने बैठी तो उसका ध्यान पौधे पर गया। पौधा सीधा खडा था और उसकी पत्तियाँ नीचे झुकनी शुरू हो गई और फिर धीरे-धीरे पौधे का तना भी रेवती की तरफ झुक आया। रेवती बहुत ध्यान से देख रही थी। पौधा धीमे-धीमे झूम रहा था, जैसे वह संगीत का आन्नद ले रहा हो। रेवती को अश्चर्य हुआ। उसने सोचा, ‘यह जरूर मेरी वायलिन सुनता है।’
रेवती ने यह जाँचने के लिए कि क्या पौधा सचमुच वायलिन सुनता है, वायलिन पर एक तेज धुन बजानी शुरू कर दी। वह तेज धुन पौधे को पसंद नही आई। उसने झूमने बंद कर दिया और ऐसे सीधा खड़ा हो गया जैसे वह रेवती से नाराज हो। रेवती खुशी से झूम उठी। उसे विश्वास हो गया कि पौधा उसका संगीत सुनता है। उसने पौधे के पास जा कर उसे बहुत प्यार किया। रेवती को लगा कि उसे नया दोस्त मिल गया है, जो उसी की तरह राग ‘मोहनम्’ ही पसंद करता है।

रेवती को तो पूरा भरोसा होगया कि उसका पौधा संगीत-प्रेमी है। लेकिन इस बात पर कोई और विश्वास नही करेगा, इसलिए उसने यह बात किसी को नही बताई, अपनी माँ को भी नहीं।
अब रेवती रोज वायलिन पर उस पौधे को मोहनम् राग सुनाती। पौधा बहुत खुश था, इसलिए दिन-प्रतिदिन सुंदर और हष्ट-पुष्ट होता जा रहा था। और तो और, मौसम से पहले ही उस पर कलियाँ भी आ गई थीं जो एक-दो दिन में खिलकर फूल बन जाने वाली थी। रेवती इसलिए भी खुश थी कि दो-तीन दिन बाद प्रतियोगिता भी होने वाली थी।
अपने पौधे और उसकी खिलती कलियों की सुंदरता देखकर अब उसे इस बात का पक्का यकीन हो गया था कि प्रतियोंगिता में पहला पुरस्कार वही जीतेगी।

प्रतियोंगिता के दिन वह सुबह जव्दी उठ गई और झटपट अपने पौधे को देखने के लिए वरामदे में आई। परंतु यह क्या? वहाँ न तो उसका पौधा था न गमला। वह दौडकर रसोई घर में गई और बोली, ‘‘माँ-माँ, क्या आपने मेरे गमले को उठा कर कहीं रख दिया है?’’
‘‘नहीं तो, मैंने तो नही रखा,’’ माँ ने कहा।
‘‘फिर मेरा गमला कहाँ गया माँ, क्या कल कोई अपने घर आया था?
‘‘हाँ, कल एक-दो पडोसी आए थे और वे तुम्हारे पौधे की तारीफ भी कर रहे थे। उसके बाद से तो मैं उधर गई नहीं। मुझे नहीं मालूम पौधा कहाँ गया।!’’



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