अकबर बीरबल के लतीफे - धरमपाल बारिया Akbar Birbal Ke Latiphe - Hindi book by - Dharampal Bariya
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अकबर बीरबल के लतीफे

धरमपाल बारिया

प्रकाशक : मनोज पब्लिकेशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :176
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3975
आईएसबीएन :81-8133-437-x

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अटपटे-चटपटे हाजिरजवाबी के चुनिंदा लतीफों का बेमिसाल संकलन....

Akbar Birbal Ke Latiphey-1 a hindi book by Akbar Birbal Ke Latiphey - अकबर बीरबल के लतीफे - धरमपाल बारिया

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


बादशाह अकबर के अटपटे सवाल और हाजिरजवाब बीरबल के चटपटे जवाब...कहकहों की बरसात करने वाले जानदार लतीफों का अनूठा संग्रह

अकबर-भारतीय इतिहास का एक ऐसा मुगल बादशाह जो अपनी न्यायप्रियता व विनोदी स्वभाव के लिए प्रसिद्ध था।
बीरबल-बादशाह अकबर के दरबार के नौ रत्नों में से एक। कहते हैं, बीरबल बड़े हाजिरजवाब थे। उनके पास हर प्रश्न का उत्तर था। कई बार उनके उत्तर ऐसे होते थे कि बादशाह भी बगलें झांकने लगते। दरबार के दूसरे अधिकांश दरबारी बीरबल से जलते थे और उनका अहित करने, उन्हें बादशाह की नजरों से गिराने व उनका पद हथियाने के लिए निरंतर कुचालें चलते रहते थे, मगर बीरबल तो आखिर बीरबल थे। अपनी बुद्धि चातुर्य से वे उनकी हर चाल को न केवल विफल कर देते थे, बल्कि कई बार तो उन्हें ही बादशाह की नजरों से गिरा देते थे। कैसे करते थे वे ऐसा, इसकी ही झलकियां है इस पुस्तक में दिए गए लतीफों में। हंसाते गुदगुदाते, अटपटे-चटपटे इन लतीफों से आपका मनोरंजन ही नहीं होगा, अपितु आपकी बुद्धि भी पैनी होगी।
-प्रकाशक
बीरबल सवालों के तत्काल जवाब ही नहीं देते थे, बल्कि वे यह भी जानते थे कि सामने वाला कौन-सा सवाल किस ढंग से करेगा, सामने वाला किस मंशा से सवाल कर रहा है, इसका अनुमान लगाने में तो वे उस युग के कंप्यूटर ही थे ! क्या ऐसे कंप्यूटरी दिमाग का खिलाड़ी कभी हार सकता है, जिसे बिसात पर बिछे एक-एक मोहरे की हर चाल का पूर्व अनुमान हो ? ये बीरबल के कंप्यूटरी दिमाग का ही कमाल था कि वे एक छोटे से राजा के सलाहकार से सीधे हिन्द के सम्राट ‘अकबर’ के दरबार के नौ रत्नों में भी सबसे अनमोल रत्न बने। प्रस्तुत है बीरबल के चटपटे व मनोरंजक लतीफे !

सम्पादकीय

बीरबल बेहद बुद्धिमान थे। वह बादशाह अकबर के नौ रत्नों में से एक थे। जहाँ कहीं भी अकबर का जिक्र होता है, वहाँ बीरबल का नाम अपने आप होंठों पर आ जाता है। मुगल सम्राटों की सूची में अकबर का नाम सबसे अधिक चर्चित रहा है। बादशाह अकबर विद्वानों का सम्मान करते थे। उनके दरबार में नौ व्यक्ति ऐसे थे जिन्हें नवरत्न की उपाधि से विभूषित किया गया था। वे नौ व्यक्ति अपने-अपने क्षेत्र की कलाओं में माहिर थे। उन्हीं नौ रत्नों में से एक थे बीरबल। बीरबल अकबर के नौ रत्नों में सबसे अधिक अक्लमन्द और हाजिरजवाब थे। बीरबल में एक खात बात यह भी थी-अकबर के हर प्रश्न का तुरन्त उत्तर देना। जैसे उन्हें पता हो कि बादशाह कब किस तरह का सवाल करने वाले हैं। कहा जाता है कि अकबर को बीरबल जैसा रत्न अन्धेर नगरी से मिला था। यह तथ्य कितना सत्य है, यह नहीं कहा जा सकता हो सकता है, यह सत्य हो किन्तु पहली नजर में यह तथ्य मिथक की ही लगता सत्य है, यह नहीं कहा जा सकता। हो सकता है, जिसका नाम अब झूंसी है, इलाहाबाद से लगभग पांच-छः किलोमीटर दूर गंगा के किनारे पर बसी छोटी-सी रियासत थी जिसके राजा का नाम शायद कुछ और रहा हो, मगर प्रसिद्ध चौपट राजा के नाम से मिली।

बीरबल अन्धेर नगरी के चौपट राजा के मन्त्री थे. राजा अपनी अक्ल से कोई काम नहीं करता था, वह अपना सारा राज-काज बीरबल की राय से करता था। कहने का तात्पर्य यह है कि चौपट राजा केवल नाम का राजा था।
कहते हैं एक बार दिल्ली लौटते वक्त रास्ते में अकबर को इलाहाबाद में गंगा के किनारे पड़ाव डालना पड़ा।
अगले दिन अकबर ने अपने एक दूत के द्वारा झूंसी के राजा के पास पत्र के माध्यम से सन्देशा भिजवाया।
दूत द्वारा भेजे गए पत्र में अकबर ने केवल राजा से मिलने की इच्छा जाहिर की थी। परन्तु झूंसी का राजा अकबर का पत्र पढ़कर भयभीत हो उठा। वह सोचने लगा, शायद बादशाह अकबर उसके छोटे से राज्य को उससे छीन लेना चाहते हैं। अन्धेर नगरी के राजा ने तुरन्त बीरबल को अपने समक्ष बुलाया और अकबर का खत उसके सामने रख दिया।
बीरबल खत को पढ़कर अकबर का आशय समझ गए। उन्होंने हंसकर राजा से कहा- ‘‘महाराज ! मेरी राय में चिन्तित होने की कोई आवश्यकता नहीं है। बादशाह जिस वजह से आपसे मिलने के इच्छुक हैं, उस कार्य को मैं अभी कर देता हूं।’’ ‘‘ठीक है। जैसा तुम ठीक समझो, करो।’’ राजा ने हताश स्वर में कहा।

‘‘आप चलने की तैयारी करें, आपको सम्राट से मिलने तो जाना ही पड़ेगा। अपने पत्र में उन्होंने ऐसी ही इच्छा जाहिर की है।’’ ‘‘क्या हमारा चलना जरूरी है बीरबल ?’’ ‘‘हां महाराज ! सम्राट की आज्ञा की अवहेलना नहीं की जा सकती।’’ यह कहकर बीरबल वहां से चले गए और राजा अकबर के हुजूर में पेश होने की तैयारी करने लगे।
बीरबल उस प्रबन्ध में जुट गए जो उन्होंनें सोचा था । वह राजमहल से निकल कर मछुआरों की बस्ती में गए। वहां से कुछ किश्तियों पर पत्थर, चूना, ईंट आदि लदवाकर रवाना किया और कुछ मिस्त्रियों को भी गंगा के किनारे पहुंचने का आदेश दिया।
तत्पश्चात बीरबल राजमहल में लौट आए और राजा चौपट से कहा-‘‘महाराज ! हमारा अभी चलना उचित नहीं होगा। हम कुछ घंटों के बाद चलेंगे।’’ दिन के तीसरे पहर बीरबल और राजा चौपट अकबर से मिलने के लिए चल दिए। कुछ देर बाद वे इलाहाबाद पहुंच गए।

वहां तो उनका इंतजार हो रहा था। बीरबल ने जो सामान वहां भेजा था, उसे देखकर बादशाह अकबर इतने अधिक प्रभावित हुए थे कि वे झूंसी नरेश से मिलने के लिए बेचैन हो उठे। चौपट राजा और बीरबल को तुरन्त ही बादशाह अकबर के खास शिविर में पहुंचाया गया। अकबर ने उन्हें आदर से बैठाया और स्वयं भी आसन ग्रहण किया। तब झूंसी नरेश ने हाथ जोड़कर कहा-‘‘महाराज ! मुझ जैसे अदना व्यक्ति को आपने कैसे याद किया ? मैं तो किसी भी योग्य नहीं हूँ, फिर भी आपके आदेश का यथासम्भव पालन करूँगा। मेहरबानी करके मेरे छोटे से राज्य पर अपनी कृपादृष्टि बनाएँ रखें।’’ राजा की बातें सुनकर अकबर बादशाह मुस्कराने लगे और बोले-‘‘राजन ! आप जैसा सोच रहे हैं, वैसा हमारा कोई इरादा नहीं है। लेकिन...’’ अन्तिम शब्द कहते वक्त अकबर ने निगाहें घुमाकर बीरबल की ओर देखा और बोले-‘‘हमारी समझ में यह नहीं आया कि तुमने अपने आने से पहले चूना, ईंट, पत्थर इत्यादि क्यों भिजवाए ?’’ ‘‘महाराज ! इस विषय में मैं कुछ नहीं जानता। मैं राजा अवश्य हूं लेकिन मेरा सारा राज-काज मेरे महामन्त्री बीरबल देखते हैं।’’ ‘‘ओह !’’ अब अकबर बीरबल की ओर मुखातिब हुए-‘‘महामन्त्री बीरबल ! क्या हम जान सकते हैं कि तुमने आने से पूर्व ईंट, पत्थर, चूना इत्यादि क्यों भिजवाए ? ’’ ‘‘जहांपनाह ! मैं पहले ही समझ गया था कि आपने हमारे महाराज को किस उद्देश्य से बुलाया होगा। आपकी इच्छा त्रिवेणी के तट पर एक महल बनाने की है।’’ बीरबल ने अकबर के सामने हाथ जोड़कर कहा।

‘‘तुमने ठीक अनुमान लगाया बीरबल ! हमारी यही इच्छा है। हम त्रिवेणी के चट पर एक विशाल महल और किला बनाना चाहते हैं। किन्तु तुमने ऐसा अनुमान कैसे लगाया ?’’ ‘‘जहांपनाह ! यहां का मनोहरी वातावरण ही ऐसा है कि जो एक बार यहां आ जाता है, उसका वापस जाने का मन नहीं करता। अब आपके मन में भी ऐसा ही ख्याल आना स्वाभाविक था, इसलिए मैंने अनुमान लगा लिया कि हो न हो आप अवसर मिलने पर या समय निकालकर यहां बार-बार आना चाहेंगे। अब ऐसा तो हो नहीं सकता कि आप बार-बार यहां आकर शिविर में रहेंगे। ऐसी मनोरम जगह पर आप अवश्य ही एक किला बनवाना चाहेंगे।’’ ‘‘वाह ! बहुत खूब !’’ खुश होकर बादशाह अकबर ने कहा। वे बीरबल की हाजिरजवाबी से बेहद प्रसन्न हुए थे और मन ही मन में इन्होंने बीरबल को अपनी सेवा में रखने का निर्णय कर लिया था। अतः झूंसी नरेश से मुखातिब होकर वे बोले-‘‘महाराज ! हमें आपके राज्य अथवा राजसिंहासन से कोई सरोकार नहीं है, परन्तु बीरबल आज से हमारे साथ रहेंगे। इन्हें हम अपने साथ ले जाना चाहते हैं।’’ ‘‘ऐसा अनर्थ न कीजिए सम्राज ! मेरे पास जो कुछ भी है, सब बीरबल ही। इन्हीं के बल पर मैं राज्य करता हूं। कृपया बीरबल को मुझसे मत छीनिए।’’ झूंसी नरेश गिड़गिड़ाने लगा।
‘‘हमें तुम्हारी यह प्रार्थना स्वीकार नहीं है राजन ! यदि तुमने स्वेच्छा से बीरबल को हमारे हवाले नहीं किया तो हमें बल प्रयोग करना पड़ेगा। बीरबल जैसे बुद्धिमान और विवेकशील व्यक्ति को इस छोटे से राज्य में नहीं, दिल्ली में होना चाहिए।’’ अकबर ने आदेशात्मक स्वर में कहा।

झूंसी नरेश खामोश हो गया। एक कमजोर राजा शक्तिशाली सम्राट के सामने और कर भी क्या सकता था।
और इस प्रकार अकबर को बीरबल जैसा रत्न प्राप्त हुआ। अकबर और बीरबल के मध्य जो नोक-झोंक हुआ करती थी, आज के युग में उसी को नाम दिया गया है ‘अकबर-बीरबल के लतीफे’। मैं उनके उन्हीं गुदगुदाते खिलखिलाते लतीफों को आपके समक्ष सरल भाषा शैली में प्रस्तुत कर रहा हूं।

आशा है, इन्हें पढ़कर आपका भरपूर मनोरंजन होगा।
-धर्मपॉल बारिया

जल्दी बुलाकर लाओ

बादशाह अकबर एक सुबह उठते ही अपनी दाढ़ी खुजलाते हुए बोले, ‘‘अरे, कोई है ?’’ तुरन्त एक सेवक हाजिर हुआ। उसे देखते ही बादशाह बोले-‘‘जाओ, जल्दी बुलाकर लाओ, फौरन हाजिर करो।’’ सेवक की समझ में कुछ नहीं आया कि किसे बुलाकर लाए, किसे हाजिर करें ? बादशाह से पटलकर सवाल करने की तो उसकी हिम्मत ही नहीं थी।
उस सेवक ने यह बात दूसरे सेवक को बताई। दूसरे ने तीसरे को और तीसरे ने चौथे को। इस तरह सभी सेवक इस बात को जान गए और सभी उलझन में पड़ गए कि किसे बुलाकर लाए, किसे हाजिर करें।

बीरबल सुबह घूमने निकले थे। उन्होंने बादशाह के निजी सेवकों को भाग-दौड़ करते देखा तो समझ गए कि जरूर बादशाह ने कोई अनोखा काम बता दिया होगा, जो इनकी समझ से बाहर है। उन्होंने एक सेवक को बुलाकर पूछा, ‘‘क्या बात है ? यह भाग-दौड़ किसलिए हो रही है ?’’ सेवक ने बीरबल को सारी बात बताई, ‘‘महाराज हमारी रक्षा करें। हम समझ नहीं पा रहे हैं कि किसे बुलाना है। अगर जल्दी बुलाकर नहीं ले गए, तो हम पर आफत आ जाएगी।’’ बीरबल ने पूछा, ‘‘यह बताओ कि हुक्म देते समय बादशाह क्या कर रहे थे ?’’
बादशाह के निजी सेवक, जिसे हुक्म मिला था, उसे बीरबल के सामने हाजिर किया तो उसने बताय-‘‘जिस समय मुझे तलब किया उस समय तो बिस्तर पर बैठे अपनी दाढ़ी खुजला रहे थे।’’ बीरबल तुरन्त सारी बात समझ गए और उनके होंठों पर मुस्कान उभर आई। फिर उन्होंने उस सेवक से कहा-‘‘तुम हाजाम को ले जाओ।’’

सेवक हज्जाम को बुला लाया और उसे बादशाह के सामने हाजिर कर दिया। बादशाह सोचने लगे, ‘‘मैने इससे यह तो बताया ही नहीं था कि किसे बुलाकर लाना है। फिर यह हज्जाम को लेकर कैसे हाजिर हो गया ?’’ बादशाह ने सेवक से पूछा, ‘‘सच बताओ। हज्जाम को तुम अपने मन से ले आए हो या किसी ने उसे ले आने का सुझाव दिया था ?’’
सेवक घबरा गया, लेकिन बताए बिना भी तो छुटकारा नहीं था। बोला, ‘‘बीरबल ने सुझाव दिया था, जहांपनाह !’’ बादशाह बीरबल की बुद्धि पर खुश हो गया।

2

सबसे बड़ी चीज

एक दिन बीरबल दरबार में उपस्थित नहीं थे। ऐसे में बीरबल से जलने वाले सभी सभासद बीरबल के खिलाफ अकबर के कान भर रहे थे।
अकसर ऐसा ही होता था, जब भी बीरबल दरबार में उपस्थित नहीं होते थे, तभी दरबारियों को मौका मिल जाता था। आज भी ऐसा ही मौका था।

बादशाह के साले मुल्ला दो प्याजा की शह पाए कुछ सभासदों ने कहा-‘‘जहांपनाह ! आप वास्तव में बीरबल को आवश्यकता से अधिक मान देते हैं, हम लोगों से ज्यादा उन्हें चाहते हैं। आपने उन्हें बहुत सिर चढ़ा रखा है। जबकि जो काम वे करते हैं, वह हम भी कर सकते हैं। मगर आप हमें मौका ही नहीं देते।’’
बादशाह को बीरबल की बुराई अच्छी नहीं लगती थी, अतः उन्होंने उन चारों की परीक्षा ली-‘‘देखो, आज बीरबल तो यहाँ हैं नहीं और मुझे अपने एक सवाल का जवाब चाहिए। यदि तुम लोगों ने मेरे प्रश्न का सही-सही जवाब नहीं दिया तो मैं तुम चारों को फांसी पर चढ़वा दूंगा।’’ बादशाह की बात सुनकर वे चारों घबरा गए।

उनमें से एक ने हिम्मत करके कहा-‘‘प्रश्न बताइए बादशाह सलामत ?’’ ‘‘संसार में सबसे बड़ी चीज क्या है ? और अच्छी तरह सोच-समझ कर जवाब देना वरना मैं कह चुका हूं कि तुम लोगों को फांसी पर चढ़वा दिया जाएगा।’’ बादशाह अकबर ने कहा- ‘‘अटपटे जवाब हरगिज नहीं चलेंगे। जवाब एक हो और विलकुल सही हो।’’ ‘‘बादशाह सलामत ? हमें कुछ दिनों की मोहलत दी जाए।’’ उन्होंने सलाह करके कहा।
‘‘ठीक है, तुम लोगों को एक सप्ताह का समय देता हूं।’’ बादशाह ने कहा।

चारों दरबारी चले गए और दरबार से बाहर आकर सोचने लगे कि सबसे बड़ी चीज क्या हो सकती है ?
एक दरबारी बोला-‘‘मेरी राय में तो अल्लाह से बड़ा कोई नहीं।’’
‘‘अल्लाह कोई चीज नहीं है। कोई दूसरा उत्तर सोचो।’’ दूसरा बोला।
‘‘सबसे बड़ी चीज है भूख जो आदमी से कुछ भी करवा देती है।’’ तीसरे ने कहा।
‘‘नहीं...नहीं, भूख भी बरदाश्त की जा सकती है।’’
‘‘फिर क्या है सबसे बड़ी चीज ?’’ छः दिन बीत गए लेकिन उन्हें कोई उत्तर नहीं सूझा। हार कर वे चारों बीरबल के पास पहुँचे और उसे पूरी घटना कह सुनाई, साथ ही हाथ जोड़कर विनती की कि प्रश्न का उत्तर बता दें।
बीरबल ने मुस्कराकर कहा-‘‘मैं तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दूंगा, लेकिन मेरी एक शर्त है।’’ ‘‘हमें आपकी हजार शर्तें मंजूर हैं।’’ चारों ने एक स्वर में कहा-‘‘बस आप हमें इस प्रश्न का उत्तर बताकर हमारी जान बख्शी करवाएं। बताइए आपकी क्या शर्त है ?’’ ‘‘तुम में से दो अपने कन्धों पर मेरी चारपाई रखकर दरबार तक ले चलोगे। एक मेरा हुक्का पकड़ेगा, एक मेरे जूते लेकर चलेगा।’’ बीरबल ने अपनी शर्त बताते हुए कहा।

यह सुनते ही वे चारों सन्नाटे में आ गए। उन्हें लगा मानो बीरबल ने उनके गाल पर कसकर तमाचा मार दिया हो। मगर वे कुछ बोले नहीं। अगर मौत का खौफ न होता तो वे बीरबल को मुंहतोड़ जवाब देते, मगर इस समय मजबूर थे, अतः तुरन्त राजी हो गए।
दो ने अपने कन्धों पर बीरबल की चारपाई उठाई, तीसरे ने उनका हुक्का और चौथा जूते लेकर चल दिया। रास्ते में लोग आश्चर्य से उन्हें देख रहे थे। दरबार में बादशाह ने भी यह मंजर देखा और वह मौजूद दरबारियों ने भी। कोई कुछ न समझ सका। तभी बीरबल बोले-‘‘महाराज ? दुनिया में सबसे बड़ी चीज है-गरज। अपनी गरज से ये पालकी यहां तक उठाकर लाए हैं।’’ बादशाह मुस्कराकर रह गए। वे चारों सिर झुकाकर एक ओर खड़े हो गए।

3

हरा घोड़ा

एक दिन बादशाह अकबर घोड़े पर बैठकर शाही बाग में घूमने गए। साथ में बीरबल भी था। चारों ओर हरे-भरे वृक्ष और हरी-हरी घास देखकर अकबर को बहुत आनन्द आया। उन्हें लगा कि बगीचे में सैर करने के लिए तो घोड़ा भी हरे रंग का ही होना चाहिए।

उन्होंने बीरबल से कहा, ‘‘बीरबल मुझे हरे रंग का घोड़ा चाहिए। तुम मुझे सात दिन में हरे रंग का घोड़ा ला दो। यदि तुम हरे रंग का घोड़ा न ला सके तो हमें अपनी शक्ल मत दिखाना।’’ हरे रंग का घोड़ा तो होता ही नहीं है। अकबर और बीरबल दोनों को यह मालूम था। लेकिन अकबर को तो बीरबल की परीक्षा लेनी थी।
दरअसल, इस प्रकार के अटपटे सवाल करके वे चाहते थे कि बीरबल अपनी हार स्वीकार कर लें और कहें कि जहांपनाह मैं हार गया, मगर बीरबल भी अपने जैसे एक ही थे। बीरबल के हर सवाल का सटीक उत्तर देते थे कि बादशाह अकबर को मुंह की खानी पड़ती थी।

बीरबल हरे रंग के छोड़ की खोज के बहाने सात दिन तक इधर-उधर घूमते रहे। आठवें दिन वे दरबार में हाजिर हुए और बादशाह से बोले, ‘‘जहांपनाह ! मुझे हरे रंग का घोड़ा मिल गया है।’’ बादशाह को आश्चर्य हुआ। उन्होंने कहा, ‘‘जल्दी बताओ, कहां है हरा घोड़ा ?
बीरबर ने कहा, ‘‘जहांपनाह ! घोड़ा तो आपको मिल जाएगा, मैंने बड़ी मुश्किल से उसे खोजा है, मगर उसके मालिक ने दो शर्त रखी हैं।

बादशाह ने कहा, ‘‘क्या शर्ते हैं ?
‘‘पहली शर्त तो यह है कि घोड़ा लेने कि लिए आपको स्वयं जाना होगा।
‘‘यह तो बड़ी आसान शर्त है। दूसरी शर्त क्या है ?
‘‘घोड़ा खास रंग का है, इसलिए उसे लाने का दिन भी खास ही होगा। उसका मालिक कहता है कि सप्ताह के सात दिनों के अलावा किसी भी दिन आकर उसे ले जाओ।
अकबर बीरबल का मुंह देखते रह गए।
बीरबल ने हंसते हुए कहा, ‘‘जहांपनाह ! हरे रंग का घोड़ा लाना हो, तो उसकी शर्तें भी माननी ही पड़ेगी।
अकबर खिलखिला कर हंस पड़े। बीरबल की चतुराई से वह खुश हुए। समझ गए कि बीरबल को मूर्ख बनाना सरल नहीं है।

4

दाढ़ी पकड़ने की सजा

बादशाह अकवर एक दिन दरबार में पधारे और सिंहासन पर विराजमान होते ही उन्होंने दरबारियों से कहा, ‘‘आज एक शख्स ने मेरी दाढ़ी खींची है। कहिए, मैं उसे क्या सजा दूं।
यह सुनकर सभी दरबारी हैरान हुए और सोचने लगे कि किसने ऐसी गुस्ताखी की ? आखिर किसकी मौत आई है जो ऐसी जुर्रत कर बैठा। वे परस्पर कानाफूसी करने लगे।

थोड़ी देर के बाद एक दरबारी बोला, ‘‘जहांपनाह ! जिसने ऐसा दुस्साहस किया है, उसका सिर धड़ से उड़ा दिया जाए।
दूसरे दरबारी ने कहा, ‘‘मेरी राय है जहांपनाह कि ऐसी गुस्ताखी करने वाले को हाथी के पैरों तले कुचलवा दिया जाए।’’ किसी ने कहा उस पर कोड़े बरसाएं जाएं, किसी ने कहा कि उसे जिन्दा दीवार में चिनवा दिया जाए।
जितने दरबारी, उतनी तरह की बातें।
तरह-तरह की सजाएं सुझाई गईं।

उनकी बातें सुन कर बादशाह ऊब गए। अन्त में उन्होंने बीरबल से कहा, ‘‘बीरबल, तुम क्या कहते हो ? हमारी दाढ़ी खींचने वाले को हमें क्या सजा देनी चाहिए ?
बीरबल मंद-मंद मुस्कराए और बोले-‘‘जहांपनाह ! आप उसे प्यार से मिठाई खिलाइए। इस अपराध की यही सजा है।’’ बीरबल का उत्तर सुनकर सारे दरबारी चौंके और उस अंदाज में बीरबल का चेहरा देखने लगे, मानो वे पगला गए हों।
जबकि बीरबल के उत्तर से खुश होकर बादशाह ने कहा, ‘‘वाह-वाह ! बीरबल, तुम्हारी बात बिल्कुल सही है।
लेकिन यह तो बताओ कि मेरी दाढ़ी किसने खींची होगी ?’’ बीरबल ने कहा, ‘‘जहांपनाह ! छोटे शाहजादे के अलावा ऐसी हिम्मत कौन कर सकता है ? उसने तो प्यार से ही ऐसा किया होगा ! इसलिए उसे सजा में मिठाई खिलानी चाहिए।
बीरबल की बात सही थी। आज सुबह शाहजादा बादशाह की गोद में बैठा था. खेलते-खेलते उसने बादशाह की दाढ़ी खींची थी। चतुर बीरबल के जवाब से बादशाह खुश हुए।

अन्य सभी दरबारियों, जो इतना भी नहीं सोच पाए कि बाहर का कोई शख्स भला बादशाह की दाढ़ी कैसे खींच सकता है, के सिर शर्म से झुक गए।

खाने के बाद लेटना

किसी समय बीरबल ने अकबर को यह कहावत सुनाई थी कि खाकर लेट जा और मारकर भाग जा-यह सयानें लोगों की पहचान है। जो लोग ऐसा करते हैं, जिन्दगी में उन्हें किसी भी प्रकार का दुख नहीं उठाना पड़ता।
एक दिन अकबर के अचानक ही बीरबल की यह कहावत याद आ गई।
दोपहर का समय था। उन्होंने सोचा, बीरबल अवश्य ही खाना खाने के बाद लेटता होगा। आज हम उसकी इस बात को गलत सिद्ध कर देंगे।

उन्होंने एक नौकर को अपने पास बुलाकर पूरी बात समझाई और बीरबल के पास भेज दिया।
नौकर ने अकबर का आदेश बीरबल को सुना दिया।
बीरबल बुद्धिमान तो थे ही, उन्होंने समझ लिया कि बादशाह ने उसे क्यों तुरन्त आने के लिए कहा है। इसलिए बीरबल ने भोजन करके नौकर से कहा-‘‘ठहरो, मैं कपड़े बदलकर तुम्हारे साथ ही चल रहा हूं।
उस दिन बीरबल ने पहनने के लिए चुस्त पाजामा चुना। पाजामे को पहनने के लिए वह कुछ देर के लिए बिस्तर पर लेट गए। पाजामा पहनने के बहाने वे काफी देर बिस्तर पर लेटे रहे। फिर नौकर के साथ चल दिए।

जब बीरबल दरबार में पहुंचे तो अकबर ने कहा-‘‘कहो बीरबल, खाना खाने के बाद आज भी लेटे या नहीं ?’’ ‘‘बिल्कुल लेटा था जहांपनाह।’’ बीरबल की बात सुनकर अकबर ने क्रोधित स्वर में कहा-‘‘इसका मतलब, तुमने हमारे हुक्म की अवहेलना की है। हम तुम्हें हुक्म उदूली करने की सजा देंगे। जब हमने खाना खाकर तुरन्त बुलाया था, फिर तुम लेटे क्यों ।
‘‘बादशाह सलामत ! मैंने आपके हुक्म की अवहेलना कहां की है। मैं तो खाना खाने के बाद कपड़े पहनकर सीधा आपके पास ही आ रहा हूं। आप तो पैगाम ले जाने वाले से पूछ सकते हैं। अब ये अलग बात है कि ये चुस्त पाजामा पहनने के लिए ही मुझे लेटना पड़ा था।’’ बीरबल ने सहज भाव से उत्तर दिया।
अकबर बादशाह बीरबल की चतुरता को समझ गए और मुस्करा पड़े।

सबसे बड़ा हथियार

अकबर और बीरबल के बीच कभी-कभी ऐसी बातें भी हुआ करती थीं जिनकी परख करने में जान का खतरा रहता था। एक बार अकबर ने बीरबल से पूछा-‘‘बीरबल, संसार में सबसे बड़ा हथियार कौन-सा है ?’’ ‘‘बादशाह सलामत ! संसार में सबसे बड़ा हथियार है आत्मविश्वास।’’ बीरबल ने जवाब दिया।

अकबर ने बीरबल की इस बात को सुनकर अपने दिल में रख लिया और किसी समय इसकी परख करने का निश्चय किया।
दैवयोग से एक दिन एक हाथी पागल हो गया। ऐसे में हाथी को जंजीरों में जकड़ कर रखा जाता था।
अकबर ने बीरबल के आत्मविश्वास की परख करने के लिए उधर तो बीरबल को बुलवा भेजा और इधर हाथी के महावत को हुक्म दिया कि जैसे ही बीरबल को आता देखे, वैसे ही हाथी की जंजीर खोल दे।
बीरबल को इस बात का पता नहीं था। जब वे बादशाह अकबर से मिलने उनके दरबार की ओर जा रहे थे तो पागल हाथी को छोड़ा जा चुका था। बीरबल अपनी ही मस्ती में चले जा रहे थे कि उनकी नजर पागल हाथी पर पड़ी, जो चिंघाड़ता हुआ उनकी तरफ आ रहा था।

बीरबल हाजिर जवाब, बेहद बुद्धिमान, चतुर और आत्मविश्वासी थे। वे समझ गए कि बादशाह अकबर ने आत्मविश्वास और बुद्धि की परीक्षा के लिए ही पागल हाथी को छुड़वाया है।
दौड़ता हुआ हाथी सूंड को उठाए तेजी से बीरबल की ओर चला आ रहा था। बीरबल ऐसे स्थान पर खड़े थे कि वह इधर-उधर भागकर भी नहीं बच सकते थे। ठीक उसी वक्त बीरबल को एक कुत्ता दिखाई दिया। हाथी बहुत निकट आ गया था। इतना करीब कि वह बीरबल को अपनी सूंड में लपेट लेता। तभी बीरबल ने झटपट कुत्ते की पिछली दोनों टांगें पकड़ीं और पूरी ताकत से घुमाकर हाथी पर फेंका। बुरा तरह घबराकर चीखता हुआ कुत्ता जब हाथी से जाकर टकराया तो उसकी भयानक चीखें सुनकर हाथी भी घबरा गया और पलटकर भागा।

अकबर को बीरबल की इस बात की खबर मिल गई और उन्हें यह मानना पड़ा कि बीरबल ने जो कुछ कहा है, वह सच है।
आत्मविश्वास ही सबसे बड़ा हथियार है।


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