अकबर और बीरबल - अनिल कुमार Akbar Aur Birbal - Hindi book by - Anil Kumar
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अकबर और बीरबल

अनिल कुमार

प्रकाशक : मनोज पब्लिकेशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :40
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 3978
आईएसबीएन :81-8133-977-0

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शिक्षाप्रद और मजेदार किस्सों का मनोरंजक संकलन....

Akbar Birbal a hindi book by Anil Kumar - अकबर और बीरबल - अनिल कुमार

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


अकबर के नवरत्नों में से एक हैं-बीरबल। बीरबल मित्र हैं बादशाह अकबर के। वे अकबर की उलझनों को सुलझाते हैं।
ये किस्से बताते हैं कि जिंदगी में आई अनचाही मुसीबतों का सामना कैसे करना चाहिए। मुसीबतें ही बुद्धि को तराशती हैं और उसमें पैनापन लाती हैं।

बाहरी दुश्मनों को हराना आसान है लेकिन मुश्किल तब पैदा हो जाती है, जब शत्रु कोई और नहीं आपका अपना हो। बीरबल ने ऐसी परिस्थितियों को कई बार सुलझाया है। ऐसे लोगों की चालाकी बीरबल की बुद्धि के सामने उनके लिए मकड़जाल सिद्ध हुई।

बीरबल की पैनी बुद्धि हमेशा लोगों को मुसीबत से बचाती रही। उसकी वजह से अनेक लोगों की जान बची।
प्रस्तुत किस्से जहां आपका मनोरंजन करते हैं, वहीं जिंदगी को जीने की नई सोच भी देते हैं। इनसे सिद्ध होता है कि बुद्धिमान ही बलवान है और यह भी कि बुद्धि से श्रेष्ठ कोई अस्त्र नहीं है।

दो शब्द


बीरबल चतुराई के प्रतीक माने जाते हैं। वे सम्राट अकबर के दरबार के नवरत्नों में से एक हैं। सम्राट के प्रिय और मित्र हैं बीरबल। बीरबल को बार-बार फांसने की कोशिश करते हैं बादशाह, जबकि बीरबल मछली की तरह उनके कांटे से फिसल-फिसल जाते हैं। इसी फांसने और फिसलने से उपजे हैं कई किस्से। ये किस्से नमूने हैं इस बात के कि बुद्धिमान जब तक खुद फंसना न चाहें काबू में नहीं आते, और यह भी कि बुद्धि सर्वश्रेष्ठ है तथा यह उसी के पास होती है जिसके पास धैर्य हो, संयम हो और हो मौके पर सही जगह चोट मारने की समझ।

बीरबल ने बादशाह को कई बार ऐसी उलझनों से उबारा है, जहां उनकी बुद्धि ने जवाब दे दिया था। दरबारियों या फिर अन्य स्थानों से बीरबल की बुद्धि की परीक्षा लेने आए सयाने बनने वालों को हमेशा ही मुंह की खानी पड़ी।

ये किस्से पढ़ते और सुनाते समय, कुछ समय के लिए ही सही, जहां आपकी चिताओं तथा थकान को हंसी के तेज बहाव में बहा ले जाते हैं, वहीं आपकी उस प्रतिभा को भी जगाते हैं जिसे विकसित कर आपमें भी अपनी उलझनों को सुलझाने की वैसी ही शक्ति आ जाती है, जो बीरबल में थी। यह आपके व्यक्तित्व का ऐसा पहलू है, जिसे हासिल करने के बाद किसी भी प्रकार का तनाव दूर-दूर तक आपके पास नहीं फटकता।
हमें विश्वास है कि अकबर-बीरबल के बीच हुई यह नोक-झोंक आपका मनोरंजन करती हुई आपको प्रत्युत्तर मति बनाएगी अर्थात् शिक्षाप्रद मनोरंजन।

पंडित जी


शाम ढलने को थी। सभी आगंतुक धीरे-धीरे अपने घरों को लौटने लगे थे। तभी बीरबल ने देखा कि एक मोटा-सा आदमी शरमाता हुआ चुपचाप एक कोने में खड़ा है। बीरबल उसके निकट आता हुआ बोला, ‘लगता है तुम कुछ कहना चाहते हो। बेहिचक कह डालो जो कहना है। मुझे बताओ, तुम्हारी क्या समस्या है ?’’
वह मोटा व्यक्ति सकुचाता हुआ बोला, ‘‘मेरी समस्या यह है कि मैं पढ़ा-लिखा नहीं हूं। मैंने अपनी शिक्षा पर ध्यान नहीं दिया जिसका मुझे खेद हैं। मैं भी समाज में सिर उठा कर सम्मान से जीना चाहता हूँ। पर अब लगता है ऐसा कभी नहीं हो पाएगा।’’
‘‘नहीं कोई देर नहीं हुई, ऐसा जरूर होगा यदि तुम हिम्मत न हारो और परिश्रम करो। तुममें भी योग्यता है।’’ बीरबल ने कहा।

‘‘लेकिन ज्ञान पाने में तो सालों लग जाएंगे।’’ मोटे आदमी ने कहा, ‘‘मैं इतना इंतजार नहीं कर सकता। मैं तो जानना चाहता हूँ कि क्या कोई ऐसा तरीका है कि चुटकी बजाते ही प्रसिद्धि मिल जाए।’’
‘‘प्रसिद्धि पाने का ऐसा आसान रास्ता तो कोई नहीं है। ’’ बीरबल ने कहा, ‘‘यदि तुम वास्तव में योग्य और प्रसिद्ध कहलवाना चाहते हो, तो मेहनत तो करनी ही होगी। वह भी कुछ समय के लिए।’’
यह सुन्कर मोटा आदमी सोच में डूब गया।

‘‘नहीं, मुझमें इतना धैर्य नहीं है।’’ मोटे आदमी ने कहा, ‘‘मैं तुरंत ही प्रसिद्धि पाकर, ‘‘पंडित जी’ कहलवाना चाहता हूँ।’’
‘‘ठीक है।’’ बीरबल बोला, ‘‘इसके लिए तो एक ही उपाय है। कल तुम बाजार में जाकर खडे हो जाना। मेरे भेजे आदमी वहां होंगे, जो तुम्हें पंडित जी कहकर पुकारेंगे। वे बार-बार जोर–जोर से ऐसा कहेंगे। इससे दूसरे लोगों का ध्यान इस ओर जाएगा, वे भी तुम्हें पंडित जी कहना शुरू कर देंगे। ऐसा होना स्वाभाविक भी है। लेकिन हमारा नाटक तभी सरल होगा जब तक तुम गुस्सा दिखाते हुए उन पर पत्थर फेंकने लगोगे या हाथ में लाठी लेकर उनको दौड़ाना होगा तुम्हें लेकिन सतर्क रहना, गुस्से का सिर्फ दिखावा भर करना है तुम्हें। किसी को चोट नहीं पहुंचनी चाहिए।’’
उस समय तो वह मोटा आदमी कुछ समझ नहीं पाया और घर लौट गया।

अगली सुबह वह मोटा आदमी बीरबल के कहे अनुसार व्यस्त बाजार में जाकर खड़ा हो गया। तभी बीरबल के भेजे आदमी वहां आ पहुंचे और तेज स्वर में बार-बार कहने लगे-‘‘पंडितजी...पंडितजी.. पंडितजी।’’
मोटे आदमी ने यह सुन अपनी लाठी उठाई और भाग पड़ा उन आदमियों के पीछे। जैसे सच में ही पिटाई कर देगा। बीरबल के भेजे आदमी वहां से भाग निकले, लेकिन पंडितजी...पंडितजी...का राग अलापना उन्होंने नहीं छोड़ा।
कुछ ही देर बाद आवारा लड़कों का वहां घूमता समूह पंडितजी...पंडितजी..’’ चिल्लाता हुआ उस मोटे आदमी के पास आ धमका।
बड़ा मजेदार दृश्य उपस्थित हो गया था। मोटा आदमी लोगों के पीछे दौड़ रहा था और लोग ‘‘पंडितजी...पंडितजी ’ कहते हए नाच-चिल्ला रहे थे।
अब वह मोटा आदमी पंडितजी के नाम से प्रसिद्धि हो गया।

जब भी लोग उसे देखते तो पंडितजी कहकर ही संबोधित करते। अपनी ओर से तो लोग यह कहकर उसका मजाक उड़ाते थे कि वह उन पर पत्थर फेंकेगा या लाठी लेकर उनके पीछे दौड़ेगा। लेकिन उन्हें क्या पता था कि मोटा तो चाहता ही यही था। वह प्रसिद्धि तो होने ही लगा था।
इसी तरह महीनों बीत गए।
मोटा आदमी भी थक चुका था। वह यह भी समझ गया था कि लोग उसे सम्मानवश पंडितजी नहीं कहते, बल्कि ऐसा कहकर तो वे उसका उपहास करते हैं। लोग जान गए थे कि पंडित कहने से उसे गुस्सा आ जाता है। वह सोचता था कि शायद लोग मुझे पागल समझते हैं।

यह सोचकर वह इतना परेशान हो गया कि फिर से बीरबल के पास जा पहुंचा।
वह बोला, ‘‘मैं मात्र पंडितजी कहलाना नहीं चाहता। वैसे मुझे स्वयं को पंडित कहलवाना पसंद है और कुछ समय तक यह सुनना में मुझे अच्छा भी लगा। लेकिन अब मैं थक चुका हूँ। लोग मेरा सम्मान नहीं करते, वे तो मेरा मजाक उड़ाते हैं।’’
मोटे आदमी को वास्तविकता का आभास होने लगा था।

मोटे आदमी को यह कहता देख बीरबल हंसता हुआ बोला, ’’ मैंने तो तुमसे पहले ही कह दिया था कि तुम बहुत समय तक ऐसा नहीं कर पाओगे। लोग तुम्हें वह सब कैसे कह सकते हैं जो तुम हो ही नहीं। क्या तुम उन्हें मूर्ख समझते हो ? जाओ, अब कुछ समय किसी दूसरे शहर में जाकर बिताओ जब लौटो तो उन लोगों को नजरअंदाज कर देना जो तुम्हें पंडितजी कहकर पुकारें। एक अच्छे, सभ्य व्यक्ति की तरह आचरण करना। शीघ्र ही लोग समझ जाएंगे कि पंडितजी कहकर तुम्हारा उपहास करने में कुछ नहीं रखा और वे ऐसा कहना छोड़ देंगे।’’

मोटे आदमी ने बीरबल के निर्देश पर अमल किया।
जब वह कुछ माह बाद दूसरे शहर से लौटकर आया तो लोगों ने उसे पंडितजी कहकर परेशान करना चाहा लेकिन उसने कोई ध्यान न दिया।
अब वह मोटा आदमी खुश था कि लोग उसे उसके असली नाम से जानने लगे हैं। वह समझ गया था कि प्रसिद्धि पाने की सरल राह कोई नहीं है।

बादशाह की दूसरी शादी


बादशाह अकबर और उनकी बेगम का अक्सर छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा हो जाता था। एक दिन ऐसे ही दोनों आपस में झगड़ रहे थे तो बेगम बोली, ‘‘आपको सबूत देना होगा कि मुझे वास्तव में प्रेम करते हैं आप। इसके लिए जैसा मैं कहती हूं वैसा ही करिए। बीरबल को उसके ओहदे से हटाकर मेरे भाई शेरखान को रखें।’’
बादशाह ने अपनी बेगम को समझाने की बहुतेरी कोशिश करी कि बीरबल को ऐसे ही अकारण नहीं हटाया जा सकता। लेकिन बेगम ने एक न सुनी। तब अकबर बोले, ‘‘तुम खुद ही बीरबल से बात कर लो।’’
बादशाह की यह बात सुन बेगम के दिमाग में एक योजना जन्मी।

बेगम खुश होते हुए बोलीं, ‘‘मेरे पास एक तरीका है। कल हम दोनों यूं ही आपस में झगड़ने लगेंगे। तब आप बीरबल से कहेंगे कि यदि बेगम ने आपसे माफी नहीं मांगी तो उसे उसके पद से हटा दिया जाएगा। इस तरह आप पर कोई इल्जाम भी नहीं आएगा।’’
अगले दिन योजना के अनुसार बादशाह और उनकी बेगम आपस में झगड़ पड़े। इससे नाराज होकर नकली गुस्से से भरे अकबर दूसरे महल में जाकर रहने लगे।
बीरबल को भी इस झगड़े की खबर लगी।
जब बीरबल बादशाह से मिलने गया तो वह बोले, ‘‘बीरबल ! बेगम को मुझसे माफी मांगनी ही होगी। वरना तुम्हें अपनी कुर्सी से हाथ धोना होगा।’’

एकबारगी तो बीरबल यह समझ ही न पाया कि बेगम यदि माफी नहीं मांगती तो उसका क्या दोष है ?
बीरबल वहां से बाहर निकला और एक सैनिक को पास बुलाकर उसके कान में कुछ फुसफुसाया।
फिर वह बेगम से बात करने जा पहुंचा। उसने ऐसा आभास दिया कि जैसे उनके झगड़े के बारे में कुछ जानता ही नहीं।
कुछ देर बाद बीरबल की योजनानुसार वह सैनिक भीतर प्रविष्ट होता हुआ बोला, ‘‘हुजूर! बादशाह सलामत का कहना है कि सब कुछ आपकी योजनानुसार ही चल रहा है। बादशाह इस समय बेहद बेचैन हैं और चाहते हैं कि आप तुरंत उसे लेकर उनके पास पहुंचें।’’
सुनते ही बीरबल तुरंत जाने के लिए खड़ा हो गया।

तब बेगम ने पूछा, ‘‘बीरबल ! माजरा क्या है ? हमें भी तो कुछ पता चले।’’
‘‘माफी चाहूँगा बेगम साहिबा।’’ बीरबल बोला, ‘‘लेकिन मैं उस व्यक्ति के बारे में आपको बता नहीं सकता। कहकर वह चला गया।
अब तो बेगम बहुत ही बेचैन और परेशान हो गईं। उनके मन में बुरे-बुरे विचार आने लगे। उन्हें लगा कि जरूर कुछ गलत होने जा रहा है। उन्होंने सोचा, हो न हो जरूर वह कोई दूसरी औरत ही होगी। बादशाह शायद उससे शादी करने वाले हैं। या खुदा ! अपने भाई को वजीर बनाने की चाहत तो मेरा ही घर बरबाद करने पर तुली है।’
वह तुरंत बादशाह के पास पहुंची और घुंटनों के बल बैठकर रोने लगी। बादशाह बोले, ‘‘क्या बात है ? तुम इस तरह रो क्यों रही हो ?’’
आंखों में आंसू भरकर बेगम बोली, ‘‘मुझे माफ कर दें। मैं गलती पर थी। लेकिन दोबारा शादी न करें।’’
बादशाह यह सुनकर हैरान रह गए। वह बोले, ‘‘तुमसे किसने कहा कि मैं दूसरी शादी करने जा रहा हूं ?’’
तब बेगम ने वह सब दोहरा दिया जो बीरबल ने कहा था। यह सुनकर अकबर जोर से ठहाका लगाकर हंसते हुए बोले, ‘‘बीरबल ने तुम्हें बुद्धू बनाया है। चतुराई में उसे हराना असंभव है-यह तो अब तुम अच्छी तरह समझ ही गई होगी।’’
‘हां,’ कहती हुई बेगम मुस्करा दी।




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