लाला लाजपतराय - विनोद तिवारी Lala Lajpatrai - Hindi book by - Vinod Tiwari
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महान व्यक्तित्व >> लाला लाजपतराय

लाला लाजपतराय

विनोद तिवारी

प्रकाशक : मनोज पब्लिकेशन प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :97
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 3988
आईएसबीएन: 81-8133-593-7

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राजनीति,शिक्षा,हिंदू संगठन,समाज-सुधार आदि अनेक क्षेत्रों में कार्य करने वाले स्वतंत्रता सेनानी की समर्पम भरी तेजस्वी गाथा...

Lala lajpatray (manoj)

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

लाला लाजपतराय नाम है एक ऐसे स्वतंत्रता सेनानी का जिसने अपने तेजस्वी भाषणों से भारत की जनता में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने का जोश फूंका, जिसके माथे पर लगी एक- एक लाठी अंग्रेजी हुकूमत के ताबूत का कील बनी, जिसे इतिहास पंजाब केसरी के नाम से जानता है।

प्रकाशकीय

लाजपत राय के जीवन को आर्यसमाज के सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यों ने अत्यधिक प्रभावित किया। हिंदू समाज में व्याप्त बुराइयों पर स्वामी दयानंद ने डटकर प्रहार किया था। आर्यसमाज के इस आंदोलन की पंजाब में उस समय लहर थी। पंजाब में देश को गुलामी से मुक्त करने के लिए नौजवानों की रगों में जोश मार रहा था।
लाजपत राय ने इटली के क्रांतिकारी ‘मैजिनी’ के जीवनवृत्त को जब पढ़ा तो मैजिनी को उन्होंने अपने जीवन का आदर्श ही बना लिया-बाद में उन्होंने मैजिनी की उत्कृष्ट रचना, ‘ड्यूटीज ऑफ मैन’ का उर्दू में अनुवाद भी किया।

लाला लाजपत राय की लेखिनी और वाणी दोनों में जोश भरा था। अंग्रेज लालाजी से डरे हुए थे। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की 50 वीं वर्षगांठ की तैयारियां हो रही थीं। हैरान-परेशान अंग्रेज अफसरों ने बिना किसी सबूत के लालाजी को गिरफ्तार कर लिया। जनाक्रोश के चलते बाद में उन्हें लालाजी को छोड़ना पड़ा।
साइमन कमीशन के नारों के बीच आंदोलनकारियों को तितर-बितर करने के लिए अंग्रेज अफसरों ने लाठी चार्ज का हुक्म दे दिया। लाठियों की मार इतनी गहरी थी कि लालाजी का इस घटना के 18 वें दिन प्राणांत हो गया। लेकिन लाठियों से ज्यादा अंग्रेजों के निर्दयतापूर्वक किए गए दमन से आहत लालाजी की यह बात सच साबित हुई-‘‘मेरे शरीर पर आज पड़ा प्रत्येक प्रहार ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत पर आखिरी कील साबित होगा।"
लालाजी जी को श्रद्धांजलि देते हुए महात्मा गांधी ने कहा था-"भारत के आकाश पर जब तक सूर्य का प्रकाश रहेगा, लालाजी जैसे व्यक्तियों की मृत्यु नहीं होगी। वे अमर रहेंगे।"
लालाजी आज भी भारतीय इतिहास के पन्नों पर अमर हैं।

किशोर लाजपत की आर्यसमाज के संस्थापक स्वामी दयानंद एवं उनके कार्यों के प्रति अनन्य निष्ठा थी। स्वामी दयानंद जी के देहावसान के बाद उन्होंने आर्यसमाज के कार्यों को पूरा करने के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया। हिंदू धर्म में व्याप्त कुरीतियों के खिलाफ संघर्ष, प्राचीन और आधुनिक शिक्षा पद्धति में समन्वय हिंदी भाषा की श्रेष्ठता संघर्ष स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए आर-पार की लड़ाई आर्यसमाज से मिले संस्कारों के ही परिणाम थे।

इटली के क्रांतिकारी मैजिनी को लाजपतराय अपना आदर्श मानते थे। किसी पुस्तक में उन्होंने जब मैजिनी का भाषण पढ़ा तो उससे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने मैजिनी की जीवनी पढ़नी चाही। वह भारत में उपलब्ध नहीं थी। उन्होंने उसे इंग्लैण्ड से मंगवाया। मैजिनी द्वारा लिखी गई अभूतपूर्व पुस्तक ‘ड्यूटीज ऑफ मैन’ का लाला लाजपतराय ने उर्दू में अनुवाद किया। इस पांडुलिपि को उन्होंने लाहौर के एक पत्रकार को पढ़ने के लिए दिया। उसने उसमें थोड़ा बहुत संसोधन किया और अपने नाम से छपवा लिया।
लाला लाजपतराय के व्यक्तित्व के बारे में तत्कालीन मशहूर अंग्रेज लेखक विन्सन ने लिखा था-"लाजपतराय के सादगी और उदारता भरे जीवन की जितनी प्रशंसा की जाए कम है। उन्होंने अशिक्षित गरीबों और असहायों की बड़ी सेवा की थी-इस क्षेत्र में अंग्रेजी सरकार बिल्कुल ध्यान नहीं देती थी।"

देशवासियों के नाम संदेश

"मैंने जो मार्ग चुना है, वह गलत नहीं है। हमारी कामयाबी एकदम निश्चित है। मुझे जेल से जल्द छोड़ दिया जाएगा और बाहर आकर मैं फिर से अपने कार्य को आगे बढ़ाऊंगा, ऐसा मेरा विश्वास है। यदि ऐसा न हुआ तो मैं उसके पास जाऊंगा, जिसने हमें इस दुनिया में भेजा था। मुझे उसके पास जाने में किसी भी प्रकार की कोई आपत्ति नहीं होगी।"


लाला लाजपत राय



पंजाब के फिरोजपुर जिले में एक गांव था-जगरांव। जगरांव में मुंशी राधा किशन का परिवार रहता था। राधा किशन जाति के वैश्य थे। उनके परिवार में उनकी पत्नी के सिवाय और कोई नहीं था। विवाह के कुछ समय पश्चात उनकी पत्नी गर्भवती हुईं। मुंशी जी इसे ईश्वर की असीम कृपा मान रहे थे। पति-पत्नी दोनों इस बच्चे को लेकर बड़े खुश थे, क्योंकि यह उनका पहला बच्चा था।


जन्म


सन् 1865 में पंजाब पूरी तरह से अंग्रेजों के कब्जे में था। चारों ओर अंग्रेजों का बोलबाला था, कोई उनके खिलाफ आवाज उठाने की जुर्रत नहीं कर पाता था। जो उनके खिलाफ आवाज उठाता, अंग्रेज सख्ती से उसका दमन कर देते थे। अंग्रेजों का दमन चक्र दिनों-दिन बढ़ता जा रहा था। ऐसे में 28 फरवरी सन् 1865 को मुंशी जी की पत्नी ने एक बालक को जन्म दिया। बालक ने अपनी किलकारियों से चारों ओर खुशियां ही खुशियां बिखेर दीं।

बालक के जन्म की खबर पूरे गांव में फैल गई। बालक के मुखमंडल को देखकर गांव के लोग खुशी से फूले नहीं समा रहे थे।
माता-पिता बड़े लाड़-प्यार से अपने बालक का लालन-पालन करते रहे। वे प्यार से अपने बच्चे को लाजपत राय कहकर बुलाते थे। लाजपत राय के पिता जी वैश्य थे, किंतु उनकी माती जी सिक्ख परिवार से थीं। दोनों के धार्मिक विचार भिन्न-भिन्न थे। वे एक साधारण, महिला थीं। वे एक हिन्दू नारी की तरह अपने पति की सेवा करती थीं।



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