घहराती घटाएँ - महाश्वेता देवी Ghahrati Ghatayein - Hindi book by - Mahashweta Devi
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घहराती घटाएँ

महाश्वेता देवी

प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2002
पृष्ठ :299
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4009
आईएसबीएन :81-7119-280-7

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विख्यात बांग्ला कथाकार महाश्वेता देवी की आठ लंबी कहानियाँ अथवा उपन्यासिकाएँ इस पुस्तक में संकलित हैं।...

Ghaharati Ghatayen

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

विख्यात बांग्ला कथाकार महाश्वेता देवी की आठ लंबी कहानियाँ अथवा उपन्यासिकाएँ इस पुस्तक में संकलित हैं।
उनकी श्रेष्ठतम रचनाओं में इनकी गणना की जा सकती है। इनमें ‘रुदाली’ नामक उपन्यासिका भी शामिल है जिस पर इसी नाम से एक बेहद सार्थक फिल्म बनाई जा चुकी है।

इन उपन्यासिकाओं में बिहार के आदिवासी इलाकों के जीवन का रोमाचंक वर्णन है और आदिवासियों के सामाजिक, सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक जीवन के खरे चित्र बेलौस भाषा में दिखाये गये हैं। उनके शोषण-उत्पीड़न, उनकी आशा-आकांक्षा, उनका भोलापन और उनकी जिजीविषा को भीतर तक देखा-दिखाया गया है।
मानव-जीवन के इस सबसे प्रताड़ित, पिछड़े और दयनीय, फिर भी स्वाभिमानी और तेजस्वी पक्ष को प्रस्तुत करने में महाश्वेता देवी की लेखनी का कमाल इन रचनाओं को अभूतपूर्व ताजगी और कचोट से भर देता है।

 

जगमोहन की मृत्यु

 

कहानी का नाम जगमोहन की मृत्यु होने पर भी जगमोहन, सोमरा गंजू, और बुलाकी-तीनों ही मृत्यु के असंभव अथवा सदैव संभव परिणामों पर पहुँचे थे। घटना सतहत्तर के अक्टूबर में हुई। कहानी का एक अलौकिक छोर भी है। वह इस समय बुरुड़िहा गाँव के हनुमान मिक्ष के कब्जे में हैं। यथार्थतः उस अक्टूबर के देवी पक्ष में बुरुडिहा के समीप जो अविश्वसनीय घटनाएँ हुईं, उनसे उस अंचल में हनुमान मिश्र की श्रेष्ठता और ईश्वर की इच्छा को स्थायी प्रतिष्ठा मिल गयी। भारत और भारतवासियों के मन से छुआछूत मिटाने और छोटी जाति पर होने वाले अत्याचारों को कानून द्वारा बन्द करवाने को जो कमर कसे हैं, उन्हें शिक्षा देने के लिए ही यह घटना हुई थी-ऐसा मिश्र के समर्थन कहते हैं। उसी प्रकरण पर जगमोहन की अमर कहानी पुस्तिका पटना में छपी और गोमो डाल्टनगंज लाइन के स्टेशनों पर कहीं-कहीं बिकी भी। जगमोहन मन्दिरों में स्वभावतः सबसे अधिक बिकी।

यह लाइन किताबों की बिक्री की लाइन नहीं है। इधर के गाँव प्रागैतिहासिक हैं। यहाँ के निवासी भारत सरकार के सरदर्द के प्रमुख कारण हैं, उराँव, मुंडा हो इत्यादि की कोई लिखित भाषा या लिपि नहीं हैं। वे दिन के अन्त में चीनाघास के दानों की तलाश में हजारों बरस से फिरते आये हैं। जगमोहन की किताब वे भूखे नंगे नहीं पढ़ेंगे। इसलिए किताब भुरकुंडा, खलाड़ी पत्रातू इत्यादि नये बने धनी औद्योगिक अंचलों में बिकती। यह सारे आदिवासी भारत सरकार को अनजाने ही तरह-तरह के कष्ट देते हैं। विकास कार्यलय की उपेक्षा कर यह अविकसित रहते हैं। सरकार को छुआछूत पसन्द नहीं है, यह बात जानते हुए भी ये लोग ऊँची जाति वालों से डरते हैं। देश की धन संपदा में इनका अधिकार रहे, यही सरकार की घोषित इच्छा है। फिर भी मैंगनीज़, बॉक्साइट, माइका लोहा, ताँबा सीमेंट कोयला सब ग़ैर-आदिवासी लोगों के हाथों में देकर ये अनाहार से सूखा शरीर लिये दूर से कल-कारख़ाने की शोभा देखते हैं। सबसे गन्दी बात है कि अकाल के दिनों में देशी और विदेशी फ़ोटोग्राफ़रों के आने पर यह कैसे तसवीर खींचने देते हैं और आदमी के कैरिकेचर की तरह इनसारी शक्लों की तसवीरें बाहर प्रचारित होकर भारत की छवि नष्ट करती हैं। असल में यह दोगले खच्चर हैं। पिछली सरकार में आपात काल की डाँट से इनके जीवन में अकाल और सूखे का मामला लाद दिया गया था।

वर्तमान सरकार ढीली होने से यह निरन्तर अपनी गरीबी बताने की सुविधा ले रहे हैं आश्चर्य क्या है, इन जातों के लोप होने से सरकार जीवित रहेगी ? भारत के बाहर की दुनिया के खाद्य निर्यात का मामला बदमाशी नहीं लगता ? जो हो, आजकल बुरुडिहा अंचल में जगमोहन का विदेही प्रभाव अत्यन्त संक्रामक है। किताब में सब लिखा है। इस अठहत्तर में कर्पूरी ठाकुर की जॉव रिजर्वेशन की सदेच्छा भी घूमकर अपने ही ऊपर चोट करने के बाद जगमोहन की किताब में जुड़ गयी है। जगमोहन की घटना से ही प्रमाणित हो गया कि छोटे लोग सदा छोटे ही रहेंगे। ऐब्सट्रैक्ट अमूर्त ईश्वर समूर्त काशी विश्नाथ हनुमान जी रामजी सबकी वही इच्छा है। इसके बाद भी कर्पूरी ठाकुर उछल कूद करने गये और हिन्दू देवता वर्ग के हाथों दुरुस्त हुए। किताब लाखों-लाख बिकी और बुरुडिहा अंचल की सवर्ण हिन्दू स्त्रियाँ उसे साईं बाबा और सन्तोषी माँ की तसवीरों के साथ रखकर उसकी पूजा करने लगीं। इस तरह जगमोहन की मृत्यु क्रमशः बहु उद्देश्यी साबित हुई, किन्तु वह बाद में विचार करने की बात है। जगमोहन का मामला राष्ट्र के जीवन में कितनी बड़ी घटना है, पिछली सरकार को लौटा लाने के पक्ष में कितना बड़ा दिग्दर्शक है, उसे कलक्ता के आदमी नहीं समझेंगे, क्योंकि वे कलकत्ता को और अपने को पूरा भारतवर्ष मानते हैं। उन्हें यह खबर भी नहीं है कि जगमोहन के मामले में सरकार के ऊपर के स्तर के व्यक्तियों में बहुतों ने नये मार्ग का प्रकाश देख लिया है और सरकारी सहायता से शीघ्र ही जगमोहन की कहानी चित्ररूप पा सकती है। सेकुलर इंडिया-धर्म निरपेक्ष भारत-के माने हैं कि इंडिया उच्चवर्ग शासित है, इस सत्य को सब जानते हैं; जबान से नहीं कहते, काम में कर दिखाते हैं। सिनेमा से दिखा देने पर आइडिया सर्वसाधारण की स्वीकृति पा जायेगा, क्योंकि बिना फिल्म देखे भारत की जनता कुछ सीखना नहीं चाहती।

देशप्रेम, शराबी पति के प्रति पत्नी का अनुगत भाव और प्रतीक्षा की आवश्यकता, पुलिस की भलमनसाहत, गरीबों के लिए अमीरों के हृदय की पीड़ा है-यह सब देश में है और रहेगा। किन्तु धर्मेन्द्र या हेमामालिनी या लता मंगेश्वर की सहायता के बिना भारतीय लोग भारतीयता की ए-बी-सी-डी भी नहीं सीख सकते। सुना जाता है कि इस चित्र में स्वयं तैलंग स्वामी और काठियाबाबा जगमोहन हाथी के शरीर में मिलेंगे और उसकी देह से निकलेंगे। जगमोहन मात्र चौपाया, बड़ा भारी, स्तनपायी नहीं है। यह उक्त महापुरुषों का गजरूप है, यह इसी से प्रमाणित हो जायेगा। भूखा सोमरा, महावत बुलाकी इत्यादि के चरित्रों में सर्वभारतीय स्टार कास्ट रहेगा। जग मोहन के चरित्र के लिए अभिनेता मिलते ही चित्र शुरू हो गया। लेकिन हाथी के चरित्र में अभिनय करने के लिए किसी भारतीय के तैयार न होने पर अमरीका में फीलर भेजा जायेगा। जो हो, भविष्य की बात अपनी जगह रहे, जगमोहन की कहानी का उसके मूल में लौटना आवश्यक है।

सतहत्तर के अक्टूबर में, दूसरे अक्टूबरों की तरह, पलामू का जंगल सरस बाँस के झाड़ और कभी-कभी बरगद के पेड़ों से सुशोभित था। बाँस कहते ही बंगाली मुहावरे का बांस घुसेड़ना, समझते हैं। लेकिन बाँस और बरगद, दोनों पेड़ों के पत्ते और कोमल डालें, हाथी के प्रिय खाद्य होते हैं-यह सबको नहीं मालूम है। जो सोचते हैं कि यह जानना जरूरी नहीं है, उनको जान रखना अच्छा है। वे लोग जो कुछ जानते हैं, उससे भारत की श्रेष्ठ जाति और राजनीति में झगड़ा है, किन्तु उसके धनबाद कागुंडा राज या आचार्य भावे का गो-हत्या के विरुद्ध अनशन प्रभावी नहीं होता। जगमोहन जातीय एक बड़ा मैमल-स्तनपायी जन्तु-उनकी तुलना में बहुत क्षमता-शाली है और भारत में फिर से आपातकाल स्थापित होने में सहायक है। हाथी का बाँस के पेड़ और बरगद के पत्तों के प्रति प्रेम भारत में फिर से पिछला राज लाने का वातावरण के सृजन में सहायक हुआ था इसका कारण था, काशीवासी चरणदास महन्त का कंजूस स्वभाव। उससे ही यह सब हो गया और एक नूतन, इमजेंसी उज्ज्वल एशिया से मुक्ति के सूर्य से आलोकित भारत-भूमि का उदय हुआ।

चरणदास बहुतेरे महन्तों में एक था। बनारस में उनकी हवेलियों-पर-हवेलियाँ थीं। इसके सिवा बस टैक्सियाँ, दास दासी, भैंसे देहात में जमीन और चार हाथी थे। हाथी उसकी हैसियत की निशानी थे। लेकिन हाथियों की खुराक के प्रति उसके मन में आश्चर्यजनक वैराग्य था। बनारस के समीप गाँव के मकान (पक्का चौमंजिला) में स्थापित लक्ष्मी जनार्दन ही हाथी के कारण थे-या उनका कारण ही हाथी थे। होली, जन्माष्टमी और दशहरा में लक्ष्मी और जनार्दन हाथी की पीठ पर सवार होकर गाँव और शहर जाते और प्याला लेते। उसके लिए मादा हाथी मोती थी। महन्त के हाथियों की खुराक उनकी प्रजा ही देती। बाकी तीन नर हाथियों की महन्त को एक बार ही जरूरत पड़ती। रथयात्रा पर जगन्नाथ दर्शन के लिए, अठारोनला से हाथी पर सवार होकर शहर में घुसते।

 जगमोहन, गणेश और घनश्याम इन तीन हाथियों पर महन्त और उनके हाली मवाली बैठते। इसके सिवा साल भर हाथी उनकेकिसी काम न आते। ह्यू ज फोर कुटेड पैकिडर्म- विशाल मोटी खाल का चौपाया देखकर उनका महन्तगीरी का सा फायदे का कारोबार बेकार लगता। उनका खाना वे कभी न देते, फिर भी हाथी की खुराक सोचते ही उनका कलेजा काँप जाता। गाय भैंस तो थीं नहीं जो खिलाने पर दूध देतीं। टैक्सीया बाँस भी नहीं, जो पेट्रोल भरने से पैसे ला दें। पाले हुए लड़के-लड़कियाँ नहीं जो खिलाने-पिलाने पर सोने के समय देह सुख दें। बिना फ़ायदे के कारोबार को हाथी पालना कहा जाता है। यह तो सचमुच का हाथी पालना है। हाय ! वे दिन नहीं रहे कि आपातकाल में आराम के साथ हाथी से देहाती भंगी प्रजा के घर रौंद डालें, उनके छप्पर से फूस निकालकर हाथी खा ले, कोठे का धान खाये। फिर महन्त बनने की मुसीबत है कि चार हाथी रखने ही पड़ेगे। इसीलिए हाथी के मर जाने पर सोनपुर के मेरे से फिर भी हाथी खरीदना पड़ता। न रखने से बदनामी होती। चरणदास बहुत ही मॉर्डन महन्त था। लेकिन पुरखों से चली आ रही प्रथा को अस्वीकार नहीं कर सकता था।

लेकिन हाथी हवा खाकर तो जिन्दा रह नहीं सकता। चरणदास के दादा नियमित रूप से हाथी को सिघाड़े के आटे की जलेबी खिलाते थे। चरण दास जिन्दगी भर हाथियों को जलेवियाँ खिला सके, इसके लिए वे हवेली-पर-हवेली बनवा कर गये। चरणदास ने उनकी इच्छा पूरी नहीं की, क्योंकि उच्च वर्ग के रोब के सिवा काशी माहात्म्य नाम में अब कुछ नहीं है। वह है इसीलिए निम्न वर्ग के मंत्री के विश्वविद्यालय में आने पर वे तमाशा बन कर जाते हैं। लेकिन दूसरी ओर सब डाँवाडोल है। जलेबियाँ आजकल ऊँचे दामों पर बिकती हैं।
हाथियों के खाने का हिसाब महन्त ने बड़ी होशियारी से ठीक किया है। वे दो हाथी बनारस में रखते हैं। दो बेटों की शादियाँ हो गयी हैं। महन्त के समधी उनका खाना जुटाते हैं। इस शर्त पर ही शादी हुई थी। वह दो गणेश और घनश्याम बच्चा हाथी है। अभी भी खींच कर नहीं खाते।

जगमोहन बूढ़ा हाथी है। उसका महावत बुलाकी भी बुड्ढा है। बुलाकी हर बरस जगमोहन को लेकर बनारस से पुरी जाता है। बरस भर उसे यहाँ जंगल मिलता, वहाँ हाथी चरा कर बाँश के पत्ते और मुलायम डालें और बरगद के पत्ते खिलाता पुरी से दूसरे हाथी बनारस लौट जाते। जगमोहन नहीं लौटता। मेदिनीपुर के रास्ते में चलते-चलते वह फिर पलामू या चाईबासा के जंगल में खो जाता। चरणदास जिस तरह जग मोहन को खाना नहीं देते थे, उसी तरह बुलाकी को भी वेतन नहीं देते थे। बुलाकी जगमोहन को गाँव के जमींदारों के ब्याह में बारात में किराये पर देता, राँची शहर में बच्चों को पैसेलेकर सवारी कराता। उससे जो भी मिलता वह उसका होता। चरणदास का खयाल था कि बहुत मिलता था। बुलाकी जानता था कि कुछ भी नहीं मिलता। जगमोहन और बुलाकी-दोनों ही की उम्र सत्तावन थी। अठारह बरस की उम्र में बुलाकी जगमोहन का महावत रखा गया था। वेतन निश्चित हुआ तो रुपये, खुराकी और बरस में तीन बार कपड़ा लत्ता। वेतन कम है, कहने से नहीं चलता। 1939 के वर्ष के कलकत्ते में दो रुपये के मन भर चावल मिलते थे बनारस में दो रुपये की बड़ी क़ीमत थी।

लेकिन फिर बुलाकी का वेतन दिया जाना बन्द होने लगा। बुलाकी भी माँग न पाता और चरणदास भी नहीं देते। हाथी लेकर उन दिनों शहर में जाना होता और बुलाकी को भी उसमें हिस्सा मिलता। जगमोहन का पौरुष प्रसिद्ध था और आसपास के ग्रामीण रईस लोग मादा हाथी खरीदने पर गर्भाधान के लिए जगमोहन को ले जाते। उससे चरणदास को बहुत कुछ मिलता, क्योंकि रईस लोग हाथी के बच्चे को अच्छे दामों पर बेचते। जगमोहन मेहनत कर मरता और रईस लोग बच्चे बेचते। चरणदास को रुपये मिलते। बुलाकी को बख्शीश और कपड़े मिलते। जगमोहन को जाड़ा रोकने के लिए कंबल मिलता।

पेकिडर्मों बड़े पशुओं को परिवार लेकर रहना अच्छा लगता है। हाथी बहुत ही घरेलू जानवर होता है। जगमोहन की मुसीबत थी कि हाथी होकर उसे हथिनियों का गर्भाधान करना पड़ता था। लेकिन हथिनी की गर्भावस्था, उसका बच्चा पैदा होने पर उसकी देखभाल करना-यह सारे स्वाभाविक काम वह नहीं कर पाता। मनुष्य की जरूरत में उसके हस्तित्व का पूरा उपयोग नहीं हो पाता। बुलाकी उसका दर्द समझता और छुटकी-उटकी नौकरानी या सस्ती रंडी के सिवा उसकी स्वाभाविक यौनाकांक्षा की स्थायी व्यवस्था जैसे नहीं हुई, उसके कारण वह जहमोहन के साथ एक आश्चर्यजनक बन्धन में बँध गया। वह बीच-बीच में किस्से कहकर जगमोहन को सान्त्वना देता रहता।

जैसे, ‘पता है, तुझे तकलीफ है। बता क्या करूँ ? तू भी मालिक का नौकर, मैं भी। बता तुझसे क्या कहूँ ? मालिक क्या खुद नामरद ! बचपन से एकरंडी के साथ लटर-पटर किया कि रात का काम कर सके लेकिन उसकी गर्मी से कभी बेटा नहीं पैदा हुआ। एक के बाद एक तीन शादियाँ कर लीं। कुछ भी पैदा नहीं हुआ। तब साधू-सन्त डागदर-इलाज खूब किया। अरे गर्मी में जब जीउ नहीं, तो हकीम क्या करेगा ? उससे वनारस में बड़ी हँसी हुई। तब मालिक ने भाई से कहा-घर की लाज है, तू भिड़ना। भाई भी भिड़ गया। बस। आठ बरस में तीन बहुओं के सात बेटा-बेटी पैदा हुए। जगमोहन तू मरद है। मैं मरद हूँ। लेकिन उस नामरद ने हम दोनों को खरीद लिया था। तेरा दुख मैं समझता हूँ। यह समझ ले, और दुख मत कर।

सच्ची कहानी को वह किस्सा कहता। जहमोहन इस कहानी में कितना समझता, कौन जाने ! पर बुलाकी उसका आत्मीय था। चरणदास के काम से एक अवास्तिवक संसार में जी रहा था, इसलिए जगमोहन बुलाकी की ज़रा देर की गैरहाज़िरी से वास्तिवकता खो जाने पर बहुत डरता। बुलाकी के रंडी के घर जाकर बीच-बीच में डुबकी लगा जाने पर वह खाना छोड़ देता। चरणदास कहता, उसे छोड़कर कभी न जाना।’ और सुना जाता था कि एक बार हाथी पर चढ़कर बुलाकी किसी चवन्निया रंडी के यहाँ गया था। हुआ क्या कि उस दिन बनारस की सस्ती रंडियों ने अपना सारा काम भूलकर जगमोहन की सूँड़ में गेंदे की माला पहनायी और ढोलक बजाकर गोकुलवारे साँवरिया नामक भक्तिगीत गाया। बुलाकी को उन्होंने उस दिन संग कामी पुरुष के रूप में न देख भगवान प्रतिनिधि के रूप में देखा और रंडियों की मालिकन बूढ़ी गुलाबी सहसा, बुलाकी कहाँ है ? यह तो बाबा विश्वनाथ है कहकर भावावेश में बेहोश हो गयी।

इस घटना का बनारस में व्यापक प्रचार हुआ और ऊँची रंडियों, गानेवाली बाई जी-सबके यहाँ बुलाकी ने जगमोहन को घुमाकर बहुतेरी वेश्याओं का उद्धार किया। उद्धार का पुण्यकर्म स्थायी नहीं हुआ, जिसका कारण बहुत गंभीर था। स्थायी होने पर इन स्त्रियों को शरीर बेचने का काम छोड़ना पड़ता। छोड़ देतीं तो वे खाती क्या ? ख़रीदार आदमी भी कहाँ जाते ? इस घटना के फलस्वरूप बुलाकी के जीवन में भी फोर्स्ड ऐब्स्जिनेंस हो गया, क्योंकि रंडियों की नज़रों में वह सदा के लिए भगवान का प्रतिनिधि हो गया। भगवान के प्रतिनिधि के साथ सुरापान, कलेजी के भोजन और शयन रमण के लिए वे राजी न होतीं, नहीं-नहीं, देवता कहकर प्रणाम ठोकती रहतीं। चरणदास की छुटकी दासियाण भी इस चर्चा के फैलने से भागने लगीं और बुलाकी फूलकर स्वाभाविक इच्छा पूर्ति का जब तब का सुख भी बैठा। दो-हज़ारी हाथी लेकर चार आनेवाली रंडी के घर जाने का पहले कभी न सोचा यह सुदूरगामी फल मिला।

इसका परिणाम हुआ कि बुलाकी और जगमोहन दोनों पोटेंट मेल- मर्दाने मर्द और भी दुर्बोध्य व्याख्या और असाध्य मेल के बंधन में बँध गये। रइसों की हथिनियों के गर्भाधान कराने के काम में जगमोहन जब मतवाला होता तो बुलाकी अपनी अक्ल लगाकर उन सारे अंचलों में अपनी आदिम प्रवृत्ति का निवारण कर आता। इसके नतीजे से जगमोहन और बुलाकी के आत्मज और आत्मजाओं का सिरजन होता रहा। लेकिन सन् सैंतालीस के वर्ष के बाद रइसों की हालत गिर गयी। हाथियों का पालना कम हो गया, जगमोहन और बुलाकी ने अचानक देखा कि वे बेकार हो गये हैं। इसी समय चरणदास ने जगमोहन और बुलाकी को चलता फिरता चिड़ियाघर बनाकर बनारस छुड़ा दिया। वे निकल जरूर पड़े, लेकिन चरण दास के दास के ही रूप में। लिबरेटेड बुलाकी ने लिबरेटेड जगमोहन की पीठ पर बैठ बनारस त्याग किया। साधारण मानव और यांत्रिक संसार में परित्युक्त पैकिडर्म की वह यात्रा एक किंवदन्ती बन गयी। सेवा के समय वह न होता। बुलाकी को वेतन नहीं मिलता था, जगमोहन को खाना नहीं मिलता था। लेकिन कुछ दिये बिना ही उनको सदा के लिए दास बनाकर चरणदास ने उन्हें फिर भगा भी दिया। आषाढ़ में पुरीधान में तीन दिन सर्विस देगा और बाकी तीन सौ बासठ दिन अपना इन्तज़ाम अपने आप करें। चरणदास  इस व्यवस्था में बुलाकी या जगमोहन ने कोई गलत बात नहीं देखी। इस हिसाब को मान लिया और खिसक गये।

बरस-भर में तमाम जगह घूमते-फिरते। कम से जंगल कटे, राह घाट बने, बस मोटरें चलीं। पैकिडर्म और मनुष्यों के विचरण क्षेत्र भी सीमित हुए। अब बुलाकी और जगमोहन पलामू-चाइबासा बेल्ट ही अधिक पसन्द करते थे। अल्पाहार से जगमोहन प्रायः कंकाल हो गया। हमेशा के अनाहार से बुलाकी मनुष्य कैरिकेचर बनकर रह गया था। किन्तु जंगल-जंगल घूमने से जगमोहन ने अपना मार्ग खोज लिया था। उसके मस्तिष्क का कोई अंश जंगल को अपना निजी घर समझकर मानो अब पहचान रहा था। जंगली हाथी देखकर उसे डर लगता। वह नग्नप्रायः आदिवासियों की उपेक्षा करता। फिर भी अरण्य में उसे मिलता। बुलाकी को भी चैन आता। जंगल के गाँवों में जाने पर जगमोहन को भी खाना मिलता, वह भी घाटो, बथुआ का साग, भेली आदि खाकर जी रहा था। आदिवासियों से बरस-भर उसे यही स्वीकृति मिली है।
जगमोहन पहले राँची या खलारी या हटिया में बच्चों को ‘जॉय राइड’ करने देता। अब उसे शहर या आदमी पसन्द नहीं हैं। बुलाकी यह समझता है। बहुत दिनो तक अल्पाहार और अनियमित आहार से जगमोहन टूट गया। अपना शरीर ढोने में भी उसे कष्ट होता। बुलाकी को बहुत डर लगता। जगमोहन के मर जाने पर वह किसके सहारे रहेगा ?

जलाशय देखते ही वह जगमोहन को स्नान कराता था। पैसा मिलने पर उसे नमक केला और धान खिलाता। लेकिन उससे भी जगमोहन की आँखों से उस तरह देखना न जाता। उसकी आँखों बहुत ही मानवीय वेदना से भरी और करुणापूर्ण थीं। वैसी ही जजर से जगमोहन उससे कहता, अब मेरीछुट्टी कर दे,भैया। बुलाकी नज़र फेर लेता। जगमोहन ही इस असंभव अवास्तविक संसार में उसके लिए एकमात्र वास्तविकता था। अवास्तविक संसार ! जिस संसार में बुलाकी  वेतन पाये बिना भी चरणदास का गुलाम बना घूमता-घूमता बुड्ढा और क्षीण हो गया। उसे अनाहार से शीर्ण हाथी के साथ से अधिक कुछ नहीं मिलता। आदमी, मामूली आदमी सा स्वाभाविक जीवन हो गया था। वह संसार क्या अवास्तविक ही है। वास्तविकता एकमात्र जगमोहन और जगमोहन की बीमार साँसें हैं। जगमोहन के मर जाने पर बुलाकी क्या करेगा ?

पलामू और चाईबासा के बहुत ही गरीब इलाके में भी धनी रईस हैं। महाजन जमींदार बनिये कलाल हैं। बुलाकी ने उनसे बात की थी। पर जगमोहन को लेकर उनके पास रहने के प्रस्ताव पर कोई तैयार न हुआ। जगमोहन जो कुछ खाता उन बास और बरगद के पत्तों पर उनको कुछ खर्च न करना था। फिर भी वे तैयार न हुए। आज बरगद के पत्तों खायेगा, कल अगर पके धान खा जाये तो ! ‘नहीं जी, ऐसन बेईमानी ऊ नहीं जानता’ कहने पर भी कोई फ़ायदा न होता।

किसी गाँव में दो दिन रहने पर तीसरे दिन चले जाने पड़ता। ऊ थोड़ा आराम माँगता कहने पर भी फ़ायदा न होता। कोई भी न सुनता। बुलाकी जानता था कि और ज्यादा न चलने पर जगमोहन जीवित रहेगा। लेकिन फिर भी चलना पड़ता। गाँव, प्रान्तर धूल जंगल गाँव। हाथी चढ़ेगा ? दस-दस पैसा ! बात प्रायः बेकार हो जाती। गरीब आदि वासियों का आधुनिक और गतिमान भारत में जीवित रहने का संघर्ष आवारा पैकिडर्म मोटी चमड़ी के पशु के संग्राम के समान ही भयानक और हिंस्र है। हर क्षण वे समाप्त हो जाने के भय में जी रहे हैं। फालतू दस पैसे या हाथी की सवारी की चाह उनमें न होती। क्यों नहीं रहती, वह एक बातचीत से समझ में आ जाता है। बातचीत बुलाकी और किसी आदिवासी में हुई थी। आदिवासी गाँव का बुजुर्ग भी हो सकता था, पहान या कोई भी। आदिवासियों के आदमियों और औरतों के नाम सामान्यतः जम्मदिन के अनुसार होते हैं। परिणामस्वरूप आदमियों के नाम एतोया, सोमाई या सोमना या सोमरा मंगला, बुधना बिरसा सुकिया या सुकचर या सुकदेव सनीचर, इत्यादि में सीमित रहते हैं। लड़कियों के अवसर पर वह इतवारी, सूमी या सोमनी, मुंगली, बुधनी, बिशी, सुकनी या सुकचरी सनीचरी। जन्मदिन के हिसाब से नाम रखना सामान्य नियम है।


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