चार दिन की जवानी तेरी - मृणाल पाण्डे Char Din Ki Jawani Teri - Hindi book by - Mrinal Pandey
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चार दिन की जवानी तेरी

मृणाल पाण्डे

प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2002
पृष्ठ :108
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4010
आईएसबीएन :81-7119-718-3

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तेजी से सिकुड़ती इस दुनिया में पिछड़ा भारत ‘नयेपन’ के ओले सह रहा है। नयापन का दायरा तकनीक, पद्धति, वस्तु से लेकर विचार तक फैला है। ...

Char din Ki Jawani

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

तेजी से सिकुड़ती इस दुनिया में पिछड़ा भारत ‘नयेपन’ के ओले सह रहा है। नयापन का दायरा तकनीक, पद्धति, वस्तु से लेकर विचार तक फैला है। नये वाद के आगमन के साथ पुराने वादों के अंत की घोषणाओं में कथा के अंत की घोषणा शामिल है। साहित्य अकबकाया दीखता है।

लेकिन इस संकलन की कहानियाँ अपनी जमीन में जड़ों को पसारती, तने को ठसके से खड़ा रखे हुए दीखती हैं क्योंकि उसे भरोसा है अपनी कथा में सिक्त पूर्वी तर्ज का। उनमें पहाड़ का दरकता जीवन अपने रूढ़ विश्वासों और गतिशीलता, दोनों के साथ दीखता है। कहानियों में जीवन की स्थितियाँ और चरित्र दोनों महत्व पाते हैं। इनमें हिर्दा मेयो जैसा अनूठा चरित्र भी है। उसकी हँसी में ऐसा रुदन छिपा है जो सीधे पहाड़ की दरकती छाती से फूटता रहता है फिर भी अपनी अस्मिता पहाड़ में ही तलाशता है। मंत्र से बवासीर ठीक कर लेने का भ्रम पालने वाले हरुचा के साथ विदेश में जा बसे मुन्नू चा जैसे चरित्र भी हैं। विकास के नाम पर पहाड़ की संजीवनी सोख लेने वाली शक्तियाँ हैं। प्रकृति के आदिम प्रजनन कृषि पर पड़ती परायी छाया की दारुण कथा ‘बीज’ में है। जहाँ हिर्दा मेयो में पहाड़ का धीरज है वहीं उसके मँझले बेटे में पहाड़ का गुस्सा भी है।

इन कहानियों में आत्मविश्वास से भरा खुलापन है जो परंपरा की मिट्टी पर प्रयोग करते चलता है।
कथा-रस से भरपूर इन कहानियों में विवरण की भव्यता के साथ-साथ चरित्र-चित्रण की विरल कुशलता भी लक्षित होती है। भाषा में लचीलापन के साथ कविता-सा खुशबू भी है। परंपरा के संग चलती प्रयोगशीलता भी है। देसज मिट्टी से फूटी आधुनिकता प्रयोग के लिए परायों का मुँह नहीं जोहती बल्कि स्वयं नया रूप रचती है।
यह मृणाल पाण्डे का चौथा संकलन है जो नया तो है ही, प्रौढ़ भी है। इसलिए इसकी रचनात्मकता की प्रतिध्वनियाँ भविष्य में भी सुनी जायेंगी।

प्रस्तावना

बृहत्कथा के लेखक गुणाढ्य : अप्रतिम प्रतिभा के धनी, संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान, राजदरबार के उज्जवल रत्न। राजदरबार भी कैसा, जहाँ जनभाषा प्राकृत या पैशाची की परछाईं नहीं पड़ने दी जाती थी। देवभाषा राजभाषा के महिमामण्डित वलय से घिरी वह विशिष्ट सभा जनसामान्य की पहुँच या सुनवाई के कतई परे थी। दिक्कत आई यह, कि स्वयं देवानां प्रिय महाराजाधिराज अपनी मेधावी राजमहिषियों के बीच बैठने पर देवभाषा संस्कृत में तनिक कच्चे प्रमाणित हुऐ। सुना अंतःपुर में इस पर बड़ी हँसाई हुई। एक तो खिंचाई, वह भी औरतों के हाथों ? सभा हिल उठी। तुरंत मुनादी पिटवाई गई। कम से कम समय में महाराज को जो कोई भी संस्कृत सिखा दे, उसे भारी राजपुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। ‘‘एक वर्ष लगेगा कम से कम।’’ महाराज के मुँहबोले गुणाढ्य का मत था। ‘‘मैं मात्र छः मास में दिखा दूँगा।’’ एक नए-नकोर शिक्षक ने सगर्व दावा किया।

‘‘ऐसा क्या ? चलो, कर दिखाओ। वर्षभर से कम लगा, तो मैं स्वयं संस्कृत बोलना छोड़ दूँगा।’’ गर्वीले गुणाढ्य ने प्रतिचुनौती दी।
गुणाढ्य हारे। बोलती बन्द हुई।
संस्कृत बोलना बंद हुआ, तो राजदरबार के द्वार भी बंद हो गए। आत्मनिर्वासित, मूक गुणाढ्य पण्डित, नगर के बाहर पिशाचों की एक जंगली बस्ती में जा बसे। नंगे-काले-सूखे शरीर वाले वनोपज जीवी पिशाचों के सान्निध्य ने शनैः-शनैः दरबारी ऐंठ पिघला दी। गुणाढ्य का मौन टूटा। अब वे पैशाची बोलने लगे।
   लेखक तो लेखक। भाषा लौटी, तो फिर एक बार मन अकुलाने लगा, क्यों न पैशाची में ही कथा लेखन शुरू किया जाए ?
समस्या आई ? जंगली इलाके में कहाँ से जुटे मसि कागद ? तब पिशाचों ने कहा कि फिक्र न करें पंडिज्जी। उन्होंने प्रस्तुत किया अपना खून और दिया अपना चर्म भी। लम्बी अवधि के श्रम के बाद, मानव की खाल पर खून से लिखी दुर्लभ कहानियों का एक बृहदाकार ग्रंथ, ‘बृहत्कथा’, बनकर तैयार हुआ।

     गुणाढ्य के दरबारी संस्कारों ने जोर मारा, क्यों न पहली बार प्रति का विमोचन विद्वज्जनशिरोमणि, कलाप्रेमी महाराजाधिराज के करकमलों से राजदरबार में ही करवाया जाए ? इच्छा व्यक्त होनी थी, कि पिशाचों की एक आज्ञाकारी टोली, सर पर पंडिज्जी का ग्रंथ उठाए जा पहुँची राजद्वार पर। भीतर सूचना गई तो राजसी नाक-भौहें चढीं। यह हिम्मत। छीः छीः, एक तो चमडे़ का गंधाता रक्तरंजित ग्रंथ, वह भी पैशाची भाषा में।
      भीतर भी नहीं घुस पाए अभागे पिशाच, राजद्वार से ही वापस खदेड़ दिए गए।
      दोबारा मोहभंग हुआ गुणाढ्य का। कहा चिता जलाओ, झोंक दूँगा इस अभागे अनादृत ग्रंथ को उसमें। आज्ञाकारी अपढ़ पिशाचों ने चिता तो बाल दी, पर विनम्रता से मनुहार की, ‘‘भैया, जिस ग्रंथ को इतने मनोयोग से लिखा हमारी भाषा में, तनी हमें भी सुना दिया जाए, चाहे जो करो इसके बाद।’’ 
यही हुआ।

धू-धू चिता जली, बडे़ पत्थर के ढोंके पर पिशाचों के बीच बैठे कथावाचक गुणाढ्य। वे बाँचते जाएँ, पन्ने झोकते जाएँ आग में। देखते-देखते एक बृहत्कथासरित्सागर ज्यों बाँध तोड़कर उमड़ पडा़। आहार-निद्रा-भय-मैथुन सब बिसर गया। अनूठे कथाकार का भी और उसके विचित्र श्रोताओं का भी। धीमे-धीमे श्रोताओं में पशु, पक्षी भी तो आ जुटे थे। तन्मय एकाग्र हो, सचराचर वनप्रांतर सुनने लगा, युगों पुरानी युगों नई वे कहानियाँ। हजारों आँखों से कभी एक साथ अजस्न अश्रुधारा बहती, ते कभी गूँज उठता हजारों गलों का मुक्त हास्य।

     होते-होते भूखे-प्यासे शरीर सूख चले। मनुष्यों के भी और पशु-पक्षियों के भी। उधर महाराज की पाकशाला में हड़कम्प मचा। महाराज बहुत कुपित थे कि सुस्वादु मांस की जगह उन्हें हड्डियों का बेस्वाद शोरबा क्यों परोसा जा रहा है? बताया गया कि सुदूर वनप्रांतर में एक विचित्र यज्ञ चल रहा है। एक अधपगला-सा मनुष्य लाखों मनुष्यों—पशु-पक्षियों से धिरा एक ग्रंथ से कुछ वाचन कर रहा है। फिर उसे आग में झोंक रहा है, और मंत्रमुग्ध से वे सब श्रोत्रा खाना-पीना-सोना भूलकर बस सुने जा रहे हैं, सुने जा रहे हैं। जब पशु-पक्षी आहार ग्रहण न करेंगे, तो सुस्वादु आहार बनेंगे कैसे भला !
राजाज्ञा हुई महाराज स्वयं जाकर यह विचित्र दृश्य देखेंगे। घोडे़ कसे गए। रथ जुते। पूरा राजदरबार जा पहुँचा वनप्रांतर के बीच। जहाँ एक अद्भुत कथावाचन पर्व चल रहा था। वह अविस्मरणीय दृश्य नेत्रों में भरते महाराज अचानक बोल उठे, ‘‘अरे, यह तो अपना गुणाढ्य पंडित ही हैं न।’’ लपक कर जा पहुँचे पास। रूठे स्वजन को गले लगाया और शेष ग्रंथ अग्नि को समर्पित हो, इससे पहले उसे समेटकर बोले, ‘‘बस, अब नहीं। अब लौट चलो घर।’’

     कथा सभा बर्खास्त हुई। सभी लौट गए अपने-अपने घर। लोकश्रुति के अनुसार पंडित गुणाढ्य राजसभा में पुनर्स्थापित हुए। और उनके उस खण्डशः प्राप्त ग्रंथ का जनभाषा पैशाची से देवभाषा में अनुवाद किया गया।
    अलबेले लेखक समेत अपने अनूदित रूप में ग्रंथ विद्वत्समाज में अमरत्व को प्राप्त हुआ।
    कहानी गढ़ने वाले के बारे में किसी कहानी कहने वाले की कही बरसों पहले की कहानी, बरसों पहले सुनी।
     दूसरी कहानी है ईरान के बादशाह खुसरों अनौशेरवान की। बादशाह आलम को किसी ने हिन्द से लाकर एक कहानी दी, जिसमें बताया गया था, कि हिन्दोस्तान के उत्तर में जो ऊँचे-ऊँचे पर्वत है, उनके बीच उगे कुछ दुर्लभ पौधे अपने में जीवानाम्बु, अमृत छुपाए हुए हैं। जीवन के उस अमृत की खोज में बादशाह आलम ने अपने विश्वस्त कोषाध्यक्ष, मुख्यमंत्री और कलाकार बुर्जो को भेजा।

      (सुधी पाठक कल्पना करें कि क्या दिन रहे होंगे वे भी, जब एक कलाकार उपरोक्त तीनों कोटियों में एक साथ मौजूद हो सकता था।) बहरहाल, कथा पर लौटें।
      हाँ, तो बुर्जो महोदय भारत पधारे। यहाँ आकर अपने ही जैसे ज्ञानी, कलाकार, और कहना न होगा मस्त सरफिरे कुछ भारतीय सन्त, साधुओं के साथ वे जा निकले हिमालय की ओर। बडी़ छानबीन के बाद इस जत्थे को अमरत्व बूटी तो हाथ न आई, अलबत्ता मिले एक अन्य अलबेले सन्त, जिन्होंने कहा कि, बच्चा लोग, जिस संस्कृत कथा को पढ़ के बादशाह ने तुझे यहाँ दौडा़या वह तो एक दुर्लभ ग्रंथ का छोटा-सा अंश है। और बच्चा, वह अमृत-तत्व जिसका वह अंश जिक्र करता है, वह और कुछ नहीं, वही दुर्लभ कथाओं का सम्पूर्ण ग्रंथ पंचतंत्र है। बुर्जो जी धन्य हुए। साधु से मिल कथा-ग्रंथ सिर पर धारण किए वे स्वदेश लौटे। गुणग्राहक बादशाह ने बात समझी। बुर्जो सम्मानित हुए और अन्ततः पहलवी भाषा में, ‘‘कलीलाह वा दिमनाह’’ (करटक तथा दमनक) नाम से उस अमृत ग्रंथ को अनूदित कर, ईरान समेत पूरे मध्य-पूर्व को पंचतंत्र की कथाओं का कालातीत खजाना थमाकर, अल्लाह को प्यारे हुए।

     एक कथाकार के लिए, अपने समय के सन्दर्भ में, अपने लेखन के बारे में, सिर्फ ऐसी कथाओं की ही मार्फत, सिर्फ आनुषंगिक तौर पर ही, बात करना संभव होता है। कथा हो या कथा-लेखन की प्रक्रिया, मानव जीवन की तरह दोनों ही कभी भी न तो पूरी तरह परिभाषित किए जा सकते हैं, और न ही मानवीय कल्पना का अपमान करते हुए उनके निष्कर्ष चन्द सूक्तियों या फतवों में समेटे-सिमटाए जा सकते हैं। शायद इसीलिए लातिन अमरीकी लेखक गाब्रियेल गार्शिया मारखेज की कहानी गढ़ने के परमानन्द की तुलना जो वायुमण्डल में तिरने से की है (‘‘टैलिंग ए स्टोरी.....में बिद ह्यूमन कण्डिशन दैट मोस्ट रिजे़म्बल्स लेविटेशन !’’)

     लम्बे रास्ते की साथी कथाऐं मन में रखकर बरसों तक सुनने-सुनाने, पढ़ने, फिर-फिर पढ़ने के लिए होती हैं। इस दौरान हर अच्छी कथा में नए-नए पहलू पंखुडियों की तरह स्वयमेव खुलते चले जाते हैं। कई ऐसे भी पहलू होते हैं, जो लेखक खुद भी नहीं जानता। इसी से लोकश्रुति के अनुसार ‘एक चादर मैली सी’ पढ़कर शायद मण्टो ने राजिंदर सिंह बेदी से, कुछ ऐसा कहा था कि हाय कम्बख्त तू नहीं जानता कि तूने क्या लिख डाला है। और मानस के रचयिता कह गए कि ‘‘सत्य कहउँ लिखि कागद कोरे’’, और ऐसा ही कुछ व्यास ने उस आदि कथावाचक संजय के बारे में गणेश से भी कहा, ‘‘अहं वेद्मि, शुको वेत्ति, संजयो वेत्ति बा न वा ’’ ‘‘इस कथा का मर्म कुछ मैं जानता हूँ, कुछ शुकदेव मुनिमहाराज, संजय बेचारा जानता है कि नहीं मैं नहीं जानता।’’

     लेखक का भाषा से, कथाओं से, अपने पात्रों से अचानक साक्षात्कार, बेवजह टकराव, नए परिवेश से समझौता, उसकी चश्मदीद गवाहियाँ और उसके जीवनका इस पूरे परिदृश्य से रिश्ता, यह सब ऐसी बातें हैं, जिनको किसी पंडिताऊ टीकावाद या दर्शन की भारी-भरकम व्याख्या के लौह-बंधनो में जकड़ना लेखक समेत कथाओं की जड़ों को कल्पना के रहस्यलोक से उखाड़ कर खलास करना होता है। कथा की आंशिक व्याख्या, बहुत हुआ तो, बस अन्य उतनी ही महान् कथाओं से, या सघन काव्य-बिम्बों की श्रृंखला बगल में खड़ी कर दर्शक को दिखाई भर जा सकती है। आगे का काम दर्शक की कल्पना करेगी।

       यह सच है, कि टी.वी. के सीरियलों और एक बड़बोले नागर समुदाय से उपजी नारेबाज किस्म की कहानियों के एक विराट् भटकटैया जंगल ने हिन्दी साहित्य को, पाठकों की कल्पना को घेरना शुरू कर दिया है। पर मानव कल्पना की इस दुनिया को उजड़ने से शब्द ही अंततः बचा भी सकते हैं। बचाते भी हैं। इसीलिए पचास या पाँच सौ संस्करणों, चैनलों के बावजूद, न तो पत्रकारिता और न ही टी.वी., कथासाहित्य का विकल्प बन पाये हैं। न अपने यहाँ, न बाहर। अलबत्ता खबरों को वे भी ‘स्टोरी’ कहने लगे हैं।

 अन्ततः कथा साहित्य कालातीत प्रश्नों के कोचने से, ठोस इतिहास से जा टकराए कथाकार की चुनी-चुनाई अनुभूतियों, उससे उपजे आशिंक ज्ञान और आशिंक समाधानों के आईनों की ही एक लंबी लयबद्ध श्रृंखला होती है, और एक अच्छा कथाकार पाठक को उपभोक्ता नहीं साझीदार बनाता चलता है। जाहिर है उपभोक्ता बने जाते पाठकों में ऐसे जुड़ना कभी-कभी अलकस या आतंक जगाएगा। जगा भी रहा है। लेकिन फिर भी अच्छी कथाएँ छप रही हैं, पढ़ी जा रही हैं, और यह सोच जगह पाने लगा है कि बनी-बनाई सरल भाषा से, या मात्र लोकसाहित्य के दोहराव से साहित्य नहीं रचा जा सकता। आज के कथा लेखक को अपनी भाषा और अपना साहित्य लोककथा के ठीक समान्तर रचना होगा, उसकी अधकचरी नकल से नहीं।

       कुल मिलाकर कथाएँ या साहित्य अंततः करते क्या हैं ? कहा जा सकता है कि वे वही करते हैं जो फुर्सती दोपहर में बड़ी-बूढ़ियाँ करती हैं—पुराने धागों या दानों या सूत की अनेक, बेतरतीबी से गड्डमड्ड ढ़ेरियाँ सामने फैलाकर, उन्हें लगातार छाँटना-बुदबुदाना, कभी क्रोध, कभी प्यार, कभी सिर्फ हल्के विस्मय के साथ। शायद इसीलिए दुनियाभर में किस्सागोई की परम्परा पकी उम्र की बूढ़ियों से सहज जुड़ती जाती है। दाने बीनती फटकती, गुत्थियाँ सुलझाती वे बूढ़ियाँ भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी कथा-दर-कथा लगातार प्रश्न उठाती चली गई हैं, ऐसे प्रश्न, जो कभी एक मनुष्य (नचिकेता) ने मृत्यु से और कभी स्वंय धर्म ने यक्ष का रूप धर कर एक मनुष्य (युधिष्ठिर) से पूछे थे। यह चिरंतन प्रश्न और समस्याएँ एक नितांत छोटे और भंगुर मानव जीवन में भी समाधान के लिए सभी के आगे कभी-न-कभी आ खड़े होते हैं, वे सन्त हो या दुर्जन, मूर्ख हों या पंडित, ठग हों अथवा मस्त फकीर। इसीलिए कथाकार अक्सर सवालों का जवाब सवालों से ही देते हैं।
    एक लंबी जिन्दगी की अर्थहीन कहानी। इसके लिए कौन मुझे प्रेरित कर रहा है, कौन कर रहा है मेरी सहायता और किसका है यह आर्शीवाद ! घास के एक तिनके की जिंदगी भी निष्प्रयोजन नहीं होती। मुझे इतनी लंबी आयु देने के पीछे क्या हो सकता है परमात्मा का उद्देश्य !

  [उड़िया कथाकार फकीरमोहन सेनापति की आत्मकथा से, पृ॰ 5]

लड़कियाँ


जिस दिन हम लोग माँ के साथ नानी के घर रवाना हुए, बाबू ने एक सुराही फोड़ी थी पता नहीं जान-बूझकर या अनजाने में। पचाक। तमाम पानी-ही-पानी कमरे में फैल गया था। माँ ने धोती ऊपर कर पैर रखते हुए, दूसरे कमरे से कान लगाये सुन रही सरू की माँ से कहा था कि जरा पोंछा ले आये, तमाम पानी-ही-पानी हो गया है और उनके पीछे पैर-वैर रपट कर किसी की हड्डी-पसली चटक गयी तो एक और मुसीबत।

     माँ को वैसे भी हर चीज के अंत में मुसीबत ही नजर आती थी। हम लोग घर में होते तो मुसीबत, स्कूल में होते तो मुसीबत, बीमार होते तो मुसीबत, भले-चंगे उछलते-कूदते होते तो मुसीबत-पोंछा लगाती सरू की माँ ने सिर तनिक टेढ़ा करके माँ से पूछा था कि इस फेरे तो तीनेके महीने रहोगी-ही-रहोगी, न ! माँ ने, जैसा कि इन दिनों उसकी आदत हो गयी थी, जाँघों पर हाथ रख कर वजन तौला और काँख कर बैठते हुए कहा कि हाँ, उससे पहले वे लोग आने देंगे थोड़े ही ना, ‘‘जा बाहर खेल’’ यह अंतिम आदेश मेरे लिए था, जो हमेशा की तरह हर गलत मौकों पर हैरतअंगेज ढंग से किसी कोने में हाजिर पायी जाती थी।

        कमरे से टूटी सुराही का एक टुकड़ा चूसने के लिए सफाई से उड़ा कर ले जाते मैंने सुना कि माँ, सरू की माँ, या जाले लगी छत से कह रही थी कि इस बार लड़का हो जाता तो उन्हें छुट्टी होती, बार-बार की मुसीबत....सरू की माँ हमेशा की तरह सिर हिला-हिला कर जरूर कहा होगा, ‘‘क्यों नहीं, क्यों नहीं।’’
          ट्रेन में मैंने लड़-झगड़ कर खिड़की के पास की सीट हथिया ली थी और फिर दूसरों को जीभ बिराई--ईऽऽ, माँ की नजर अपनी ओर घूमती पा कर मैंने हिल-हिल कर जपा, ‘‘इ से इमली, ई से ईख !’’ पर माँ का ध्यान इस वक्त मुझ पर नहीं टिका। उस पर इस वक्त कई मुसीबतें थीं—बिखरा जाता सामान, डगमगाती सुराही, थकान, हम तीनों, एक स्टेशन पर खूब मिर्ची के समोसे खरीदे तभी एक औरत ने बगल कि खिड़की से अपने बच्चे को सू-सू करायी। मारे घिन के मुझसे समोसा नहीं खाया गया, मैंने माँ को दिया। उबले आलू का एक टुकड़ा सीट पर पड़ा था। उसे मसल कर जू-जू कीड़ा बना कर कुछ देर छोटी बहन को डराया। वह चीखी। माँ ने चिकोटी काटी, मैं रोयी। बड़ी बहन ने तब उकता कर कहा, ‘‘क्या मुसीबत है !’’ बड़ी बहन ज्यादा प्यार करती है। सिर्फ वही। बाकी सब गंदे हैं।

     स्टेशन पर मामा लेने आए। मैं मामी की बगल में बैठी। मामी पान चबाती थीं तो उनके कान की लवों पर माणिक के बुंदे ऊपर-नीचे होते थे। ड्राइवर जितनी बार जीप का हार्न बजाता, हम तीनो बहनें मिल कर चीखतीं-पोंऽऽऽ। ड्राइवर, हँसा। घर पहुँच कर उसने मुझे और छोटी बहन को गोदी में लेकर जीप से उतरा। उससे चाय और बीड़ी की महक आती थी, उसकी मूँछें बड़ी-बड़ी थीं, और उसकी वर्दी का गरम कपड़ा चुभता था। नींद आती थी। उतारने में सुराही फिर लुढ़क गयी, पानी फैल गया, मुझे बाबू का याद आई। और मैंने छोटी बहन की चप्पल को ऐसे दबाया कि वह गिरते-गिरते बची। ‘‘मुसीबत की जड़ !’’ माँ ने दाँत भीच कर ऐसे कहा कि कोई और न सुने और मुझे हाथ से पकड़ कर औरों को ऐसे दिखाया, जैसे मुझे सँभाला हो, पर सचमुच में इतनी जोर से भींचा कि कंधा दुख गया। मुझे बाबू की याद आई। नानी के घर आने में हमेशा यही होता है। बाबू तो साथ आते नहीं, और यहाँ आते ही माँ भी मौसियों, मामियों, नानी और पुरानी नौकरानियों के बीच एकदम ही गुडुप। दिन में उसके पास भी जाना चाहें तो कोई-न-कोई टोक देता है, ‘‘यहाँ तो बेचारी को आराम करने दो।’’माँ भी कैसा बेचारी वाला चेहरा बना लेती है, जैसे वहाँ हम लोग उसे काट खाते हों ! धत् ! नानी के घर में घुसने से चिढ़ होने लगी, मैं झाड़ियों के पास जानबूझ कर ठिठकी। झबरा कुत्ता आया, उसने मुझे सूँघा, तभी भीतर से किसी ने मेरा नाम लेकर कहा, वह फिर कहाँ रह गयी ! मैं और कुत्ता साथ-साथ घर में घुसे।

         नानी, मामा के लड़के को गोद में लिए बैठी थीं। उन्होंने कुत्ते को दुत्कारा। वे जानवरों को छूत मानती थीं। कुत्ता पूँछ नीची कर निकल गया। उसे दुत्कारे जाने की आदत थी। मुझसे कहा गया कि पैर छुओ, ऐसे नहीं, ऐऽ सेऽ। अरे, लड़की का जनम है और जिंदगी भर झुकना है तो सीऽख ही लो। नानी ने मेरी पीठ पर हाथ फेर कर कहा कि उहुंक, ये नहीं बढ़ी लंबाई में तनिक भी। आठ की कौन कहेगा इसे ? मैंने मामा के लड़के को चिकोटी भर ली। वह बेवकूफ-सा तब भी मेरे पीछे घूमता रहा। गोरा-गोरा, प्यारा-सा। वह उम्र के लिहाज से लंबा जा रहा था। पाँच का था, सात का लगता था। ‘‘कहानी सुनायेगी रात को ?’’ उसने मुझसे पूछा। ‘‘नहीं,’’ मैंने कहा और झूठ-मूठ अखबार पढ़ने लगी।

        ‘‘क्या मुसीबत है !’’ माँ कह रही थी और पड़ोसन नानी कह रही थी कि ‘‘लली की माँ, इस बार तो लली को लड़का ही होगा, चेहरा देखो, कैसा पीला पड़ गया है लली का, लड़कियों की बेर कैसी सुरख गुलाब लगती थी।’’ ‘‘क्याऽ पता, इस बार भी।’’ माँ ने कहा, और बेचारीवाला चेहरा बना कर नाखून खोटने लगीं। ‘‘वहाँ रोटी-पानी को कोई है तेरे कर्ता के !’’ पड़ोसन नानी पूछ रही थी। मुझे बाबू  की बहुत याद आयी। बाबू से कितनी साफ खुशबू आती थी ना ! उनकी गोद गुलगुली थी। माँ इधर ज्यादे देर गोद में नहीं लेटने देती, कहती है--‘‘उफ् हाँटे-माँटे (??) एक कर डाले, साड़ी मुसड़ दी सो अलग, अब उठ भी, ढेरों काम पड़ा है मेरा। ऊपर से ये मुसीबत औऽऽर। उठ।’’ नानी ऊपर को हाथ जोड़ कर कहती है, ‘‘हे देवी, मेरी लाज रखना, इस बार ये मायके से बेटा लेकर जाये।’’ फिर वे आँखें पोछती हैं।

मैंने कनखियों से बहनों को देखा, वे सो गयी थीं। जहाँ हम सोये थे, वहाँ काठ की दीवार से बड़े से कमरे के बीच में दो हिस्से किए गए थे। जहाँ मेरा तखत था, उसके ठीक ऊपर, एक बड़ी दीवाल घड़ी टिक-टिक कर रही थी, घंटे बजने से पहले उसमें एक गहरी सुरसुरी आवाज आती थी, जैसे छोटी बहन पुक्का फाड़ कर रोने से पहले ऊपर साँस खींचती है। सब बत्तियाँ बंद हैं, कमरे में बस चाँद का उजाला है। तुलसा बाई माँ के तलवों में तेल ठोंक रही है, और कह रही है, ‘‘इस बार लड़का होगा तो स्टेनलेस स्टील की जरीवाली साड़ी लूगी, हाँऽ।’’

चाँदनी में माँ का चेहरा नहीं दीखता, बस ढोल जैसा पेट दीखता है। माँ की साड़ी खिसक गयी है। तुलसा कोई दुखती रग छूती है तो माँ हल्के से गुँगुआती है। घर लौटती गायों की तरह ।‘‘अबकी लड़का हो जाता, तो छुट्टी होती।’’ वह फिर तुलसा से भी कहती है। और ये भी कहती है कि अब तू जा, तेरे बच्चे बैठे होंगे—तेल की कटोरी चारपाई के खूब नीचे खिसका दीजो, वरना सुबह बच्चे के पैरों से ठोकर लगी तो तमाम तेल-ही-तेल....खराब बात। माँ आधी छोड़ देती है तो देर तक कमरे में बात तैरती रहती है। घड़ी कि टिक-टिक की तरह । अच्छी बात हमेशा पूरी कहते हैं बड़े लोग, खराब बात आधी ही—ऐसा क्यों ? क्याऽ औरत का भाग्य....चुप्पी। अरे तीन लड़कियाँऽऽ चुप्पी। बाहर एक तारा खूब तेज चमक रहा हैं। क्या ध्रुवतारा होगा ! बाबू कहते हैं, मन लगा कर पढ़ोगी तो तुम भी, जो चाहो बन सकती हो, ध्रुवतारे की तरह। लड़का तो नहीं बन सकती पर ? मैं ढिठाई से कहती हूँ, तो बाबू पता नही क्यों धमका देते हैं कि बड़ों के मुँह  लगती है । बड़े लोगों का कुछ भी नहीं समझ में आता। बड़ी बहन कहती है, बड़े लोगों का कभी भरोसा नहीं करना चाहिए, अपनी बात सब खोद-खोद कर    पूछ लेते हैं, खुद कुछ नहीं बताते।
                                                                                                                                                                                                                                                     कोई हमें कुछ नहीं बताता। यहाँ खासकर रात को जब हम सो जाते हैं तब यहाँ बड़ों की दुनियाँ खुलती है, जैसे बंद पिटारा । मैं जाग कर सुनना चाहती हूँ, पर हर बार बीच में मुझे जाने क्यों नींद आ जाती है। ये आवाज किसकी है ? खाँसी दबाते कौन रो रहा है ? छोटी मौसी ? ‘‘कुत्ते जित्ती इज्जत मेरी नहीं उस घर में।’’ वह माँ के बगल में कह रही है। कहाँ ? हैं ? कहाँ ? मैं पूछना चाहती हूँ। माँ कह रही है कि जी तो उन सबका कलपता है पर उसे निभाना तो है ही। मेरी आँखें बंद होती हैं।
          ‘‘निभाना क्या होता है माँ !’’ मैं सुबह पूछती हूँ। सब लोग नाश्ता कर रहे हैं। मैं कहती हूँ कि वो वाला निभाना जो छोटी मौसी को चाहिए। मुझे एक तमाचा पड़ता है, फिर दूसरा; फिर मामी बचाती हैं, छोड़िए भी बच्चा है। ‘‘बच्चा—वच्चा नहीं, पुरखिन है,’’ माँ का पेट गुस्से से थिरकता है, ‘‘चोरी से बड़ों की बातें सुनती है ! जाने क्या होगा इसका !’’
          ‘‘तू भी....’ बाहर हौदी के पास बैठी बड़ी बहन बीने फूलों को औंधाती कहती है, ‘‘सौ बार कहा नहीं, कि चबर-चबर सवाल मत पूछ। पीट-पीट के मार डालेंगे वो लोग तुझे एक दिन, अगर बहुत पूछेगी तो।’’ मैं रोते-रोते कहती हूँ, ‘‘खूब पूछूँगी, खूब पूछूँगी।’’ ‘‘तो जा के मर फिर।’’ बड़ी बहन कहती


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