गौरैया - राजेन्द्र मोहन भटनागर Gauraiya - Hindi book by - Rajendra Mohan Bhatnagar
लोगों की राय

कहानी संग्रह >> गौरैया

गौरैया

राजेन्द्र मोहन भटनागर

प्रकाशक : आत्माराम एण्ड सन्स प्रकाशित वर्ष : 1998
पृष्ठ :143
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4013
आईएसबीएन :81-7043-344-4

Like this Hindi book 9 पाठकों को प्रिय

197 पाठक हैं

राजेन्द्र मोहन भटनागर की कुछ चुनी हुई कहानियों का संग्रह

Gaurya

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रायः कहानी सच होती हुई भी सच नहीं मानी जाती है। हालाँकि दावा यह किया जाता है कि वे ज़िंदगी की बंद धड़कनों से लेकर दम भर रही धड़कनों का सच्चा कच्चा चिट्ठा हैं। फिर भी, उनके साथ सौतेला व्यवहार ही किया जाता है। स्वयं उनका रचनाकार यह घोषित करते हुए पाया गया है कि कहानियों के पात्र, कथानक, संवाद आदि का संबंध किसी व्यक्ति, स्थान कथा, आदि से नहीं है। यानी कि उसकी वे कहानियाँ ज़िंदगी का सच नहीं हैं, जबकि उनमें ज़िंदगी है। कहानी का यह झूठ उसके रचनाकार और पाठक को एक-दूसरे से जोड़ता है। लेकिन मेरी इन कहानियों के साथ ऐसा कतई नहीं है। वे कहानियाँ उसी तरह हैं जिस तरह जिंदगी और उसके जीने का ‘मिथ’।

निःसंदेह यह कहानियाँ सरोकार की मोहताज नहीं हैं, बल्कि सरोकार इन कहानियों से बने हैं। इसी तरह यदि इन कहानियों की प्रतिबद्धता किसी के प्रति है तो अपने ही प्रति है इन कहानियों का चुनाव इसी दृष्टि से श्रीमती शशि भटनागर ने किया है और डॉ. रंजना अग्रवाल ने उनकी जाँच-पड़ताल कर सही का ठप्पा लगाया है।

उन लोगों ने इन कहानियों का चयन मेरी प्रकाशित, प्रसारित और अप्रकाशित कहानियों में से यह सोचकर किया है कि ज़िंदगी का सच या उसके सच की तलाश का सिलसिला इन कहानियों का अपना सच सिद्ध हो और इन कहानियों के अधूरे किरदार, कथानक-संवाद आदि पूरे होने की संभावना से अपने पाठकों को बाँधे रहें पर पूरे कदापि नहीं हों।

सड़क-छाप ज़िंदगी कूड़े के ढेर से ज्यादा कोई अर्थ नहीं रखती और कूड़े का ढेर दरअसल कोई कहानी नहीं बुनता। उलटे वह बनी हुई कहानियों की बैठे-ठाले बखिया उधेड़ता रहता है। यथार्थतः घृणा द्वेष अपराध प्रवृत्ति आतंक जलालत, बूचड़खाना आदि उसी की देन हैं। वे कबाड़ी के काम का भी नहीं है क्योंकि उसे कूड़े में से भी अर्थ ढूँढ़ने वालों ने नकार दिया है। ज़िंदगी के माने से बेदखल हुआ इन कहानियों का किरदार-कथानक ‘कुछ कर पाने’ की संभावना से अपने पाठकों को जोड़ पाएगा, यह दावा करना सफेद झूठ के अलावा और कुछ नहीं है।

फिर तो यह सोचना लाजिमी है इन कहानियों के छपास की ज़रूरत क्यों ? इसका उत्तर मैं उसी तरह नहीं दे सकता जैसे वकील पराजित होने वाले प्रकरण को अपने किरदार से जोड़ लेता है, या डॉक्टर यह जानते हुए कि मरीज दम तोड़ने वाला है, फिर भी उसके इलाज का ज़िम्मा उठा लेता है। पर क्यों ? शायद इसीलिए भाग्य और स्त्री के चरित्र का कुछ पता नहीं कि कब क्या फलित हो जाने दे ! आशा की इस धूमिल किरण के साथ कुरुक्षेत्र में उतरने वालों की मानसिकता इन कहानियों को अपने पाठकों तक ले जाती है।

इस बेमानी बात का मैं नहीं कह सकता कि कोई विश्वास करे क्योंकि आज झूठ बोलने वाले भी झूठ को सच नहीं बोलते। जोकि आज ज़हर को भी अमृत के नाम लेबिल से बाजार में उतरना पड़ता है। अनेक बार आत्महत्या के लिए खरीदकर लाए हुए ज़हर को पीने वाला इस मिन्नत से पीता पाया गया है कि वह नकली होकर उसके रहे-सहे किरदार की थू-थू न करवा दे। जोकि आज मरने के लिए संकल्पशील नकारा व्यक्तित्व को बाज़ार से खरीदी हुई वस्तु-ज़िंदगी पर से इस कदर विश्वास उठ गया है कि वह अपने मरने के मौलिक अधिकार का भी विश्वास के साथ इस्तेमाल नहीं कर पाता। फिर अन्य रिश्तों को लेकर कहानियों से बनने वाले रिश्तों के दम-खम के बारे में कोई दावा करना मात्र फेंकने के और क्या हो सकता है ?

क्या ये कहानियाँ ज़िंदगी से इस कदर गुरेज रखती हैं, यह निर्णय मैं अपने पाठकों पर छोड़ता हूँ। खारिज़ की कहानियों यानी ‘वेस्ट मेटीरियल’ से कुछ बना पाने का जलालत-भरा हौसला हर ‘ऐरा-गैरा नत्थू-खैरा’ के वश की बात नहीं है। इस सच से यदि आप इनकार-दरकार नहीं होते हैं तो मेरी सलाह है कि इन कहानियों को बिला वजह पढ़े जाने का जोखिम उठा सकते हैं। पता नहीं जोखिम उठाने का यह सनकी माद्दा कब, किस व्यक्ति की तकदीर का ताला खोल दे ? इसका उत्तर तो अलादीन का चिराग ही दे सकता है।
बहरहाल अब मुझे नहीं कहना है, मी लॉर्ड, जो कहा-अनकहा आपकी नज़र किया है, वह बिना रीढ़ की हड्डी का पुतला कम-से-कम मेरा बनाया हुआ नहीं है। मैंने तो सिर्फ हुजूर की खिदमत में दम तोड़ते किसानों को सही या गलत जैसा इस छोटी बुद्धि से बन सका, पेश किया है। दैट्स ऑल, मी लॉर्ड।

इसके बाद जब साहब अदालत को कल तक के लिए मुल्तवी करके उठ खड़े हुए। एवमस्तु।

31.बी, पंचवटी, उदयपुर-313001
राजस्थान

आपका
राजेंद्र मोहन भटनागर

गीला आँचल


‘मे आई कम इन ?’
‘कम इन।’
कुछ देर मैं खड़ी रही। वह फाइलों पर गर्दन झुकाए काम करते रहे। कभी लाल पैंसिल उठाते, कभी नीली और कभी पैन, फिर कुछ लिखते या किसी पंक्ति को ‘अंडर लाइन’ कर देते। ऐश-ट्रे पर रखा पाइप आज भी पहले की तरह जल रहा था। जब से डॉक्टरों ने उन्हें सिगरेट न पीने का मशविरा दिया था तब से उन्होंने सिगरेट को धूपबत्ती की तरह से जलाना शुरू कर दिया था। कहते थे कि सिगरेट उनके खून में बस चुकी है। वह बिना सिगरेट के जिंदा नहीं रह सकते। कोशिश कर रहा हूँ यदि उसकी ‘गंध’ से काम चला सकूँ।’
‘तुम लेखक हो।’
‘तो क्या हुआ ?’
‘दूसरों को बदलने का हौसला रखते हो और स्वयं एक मामूली-सी आदत से पिंड नहीं छुड़ा सकते।’
‘कभी-कभी ऐसा होता है।’
‘कि आदमी अपनी जिंदगी की भी परवाह नहीं करता।’
‘हाँ, बिलकुल ऐसा होता है।’
‘पर क्यों ?’

‘क्यों ? जरूरी तो नहीं कि हर क्यों का कोई उत्तर हो ही। फिर इधर मैंने कुछ सोचा ही नहीं। मौत तो आएगी ही। वह डॉक्टर के रहते हुए भी आएगी और लाख परहेज करने पर भी आएगी। वह अभी आ सकती है। कल आ सकती है और न आए तो वर्षों नहीं आए। वह डॉक्टरों के हाथ में तो है नहीं। डॉक्टर जिसे कुछ दिनों का मेहमान घोषित करते हैं, वह कभी-कभी वर्षों जी जाता है। इसलिए अंजू, मैं जीने के लिए मौत से डर कर नहीं चल सकता। जब तक जीऊँगा तब तक मौत को चिढ़ाते हुए, समझी कुछ।’

डॉक्टर विमल मल्होत्रा ने उससे कहा था कि वे कुछ माह के मेहमान हैं, बच नहीं सकते। तब मैंने सोचा था कि शायद वे भी इस सत्य को जान गए हैं। तभी बारंबार मौत से न डरने की बात दोहराते हैं। आखिर लेखक लोग ‘मूडी’ जो ठहरे। एक बार किसी बात की जिद चढ़ जाए फिर क्या वह उनके दिलो-दिमाग से उतरने की है।
फाइलों को एक तरफ सामने से हटाकर अब उन्होंने मेरी ओर देखा और बिना चेहरे पर सकता लाए, पूछा-‘अंजू, तुम यहाँ !’’
मेरे सामने वही प्रबोध ओझा थे। उनका वही सदा से गंभीर रहने वाला चेहरा। चेहरे पर तेज व बड़ी आँखें। आँखों में तेजस्विता का आलोक जो कुछ कमजोर हो जाने पर भी पूर्व जैसा था। कनपटी के बाल काफी सफेद हो आए थे। सफेदी की एक लट आगे माथे पर भी लहरा रही थी। पहले वे ऐनक नहीं लगाते थे। ऐनक लगाने से क्या आदमी इतना बदल जाता है ?
‘‘हाँ, यहाँ।’ मैंने कहा।
‘कैसे ?-ठीक से तो हो न।’
उनके लहजे में वही पूर्व जैसी आत्मीयता। बात करने का वही पुराना ढंग। उनको कोई आश्चर्य नहीं। न कोई शिकायत। मैं तो कमरे में घुसते ही काँप गई थी। कितनी बार सोचा था कि वहाँ से भाग जाऊँ। पर पाँव जैसे जड़ हो गए थे, उनमें जैसे भागने की शक्ति नहीं रही थी। डर लग रहा था कि कहीं लौटने पर पुकार बैठे, तब मैं पकड़ी जाऊँगी। मन में यह पक्का निश्चय कर लिया था कि अब जो होएगा, उसका सामना करूँगी।
‘आज इंटरव्यू जो है।’ मैंने भी अपरिचित भाव से चेहरे को कठोर बनाकर कहा।
‘अच्छा तो तुम यहाँ ‘इंटरव्यू’ देने आई हो।’ उन्होंने घंटी बजाकर मुझसे कहा-‘‘बैठो !’ चपरासी के आने पर उससे पूछा-‘‘बाहर और कोई है ?

‘जी, चार और हैं। आपका पहला नंबर था। इसलिए क्लर्क बाबू ने इनको आपके पास जाने को बोला।’
‘ठीक है। तुम बाहर ही बैठो। एक के बाद एक को भेजते रहना।’
तब तक मैं उस कक्षा का मुआयना कर चुकी थी। आलीशान कक्ष था, वातानुकूलित एकदम अल्ट्रा माडर्न ढंग का। ‘द एशिया कारपोरेट कम्पनी’ के जनरल मैंनेजर का वह कक्ष था। प्रबोध साहित्य छोड़कर यहाँ कैसे आ पहुँचा इतनी ऊँची ‘पोस्ट पर ? साहित्य तो उसका जीवन था। जिसके लिए वह दुनिया की हर चीज छोड़ सकता था, लेकिन उसे नहीं।
‘इसी शहर में रहती हो ?’ उसने प्रश्न किया।
‘हाँ, इसी शहर में।’
‘कब से ?’
‘जब से भागी थी।’ भागने के बाद तब से पहली बार मैंने इस शब्द का प्रयोग किया था और वह बहुत अटपटा-सा लगा था। चालीस के पास सरकती औरत से भागने की बात सुनकर कैसे लगेगा ? बेहूदा तथा हास्यास्पद।
‘हुँ-’ उन्होंने कहा। कुछ देर तक पेपरवेट घुमाते रहे। कुछ सोचते हुए बोले-‘स्टैनो जानती हो ?’

‘जी।’
‘टाइप भी ?’
‘जी हाँ।’ इस बार मैंने कुछ जोर से कहा था।
‘भूली नहीं।’
‘अतीत कोई भूल जाता है, प्रमोद।’ अचानक यह मुझे क्या हु्आ ? मैं भूल गई कि यहाँ मैं नौकरी के लिए आई हूँ।’
लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। व्यंग्यपूर्ण मुस्कराया भी नहीं। वह उससे अक्सर कहती थी-‘प्रमोद, तुम्हारे चेहरे को पढ़कर तुम्हारे बारे में कोई कुछ भी अंदाज नहीं लगा सकता। जिस पर न खुशी का रंग पता चलता है, और न रंज का। कभी-कभी तो मुझे डर लगने लगता है, तुमसे।’
‘मैं कोई भूत हूँ।’ वह सामान्य स्वर में कहता।
‘ये मैंने कब कहा ?’ मैं उसके बंद गले के कोट के बटन लगाती या खोलती हुई प्रायः कहती थी।
उसने मेरे कहे का कभी बुरा नहीं माना। मैं यह भी तो नहीं कह सकती।
वह कह रहे थे-‘नौकरी करना जरूरी है ?’
‘जी।’
‘वो तो अच्छा वेतन पाते होंगे।’
‘जी।’
‘फिर क्या मजबूरी है ? या मात्र शौक।’

मैंने उनके इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दिया। देती भी क्या ?
‘स्पीड क्या है ?’ उन्होंने अगला प्रश्न जड़ दिया।
‘हिन्दी की तीस-पैंतीस और अंग्रेजी की पचास के लगभग । स्टैनो की...’
तभी उसने बात काटकर पुनः कहा-‘तुम्हारे ‘वो’ को ऐतराज तो न होगा। आखिर तुम मेरी ‘स्टैनो होओगी।’
‘जी, नहीं।’ मैंने दृढ़ता से कहा। दरअसल मैंने इस पर कभी सोचा ही नहीं था।
सोचती कैसे ? मुझे क्या मालूम था कि ‘इंटरव्यू’ लेने वाला प्रबोध ओझा होगा ? मालूम होता तो क्या मैं एप्लाई कर सकती थी ? आना तो दूर था।
‘तुम्हें भी नहीं होगा ?’
‘जी, नहीं। मुझे भी नहीं होगा।’
‘मुझे डाउट है।’
‘ठीक है। लेकिन मुझे नौकरी चाहिए, प्रबोध।’ जाने फिर वही प्रबोध कहाँ से उतर आया, होंठों पर ?
‘कभी तुमने नौकरी की है ?’ उसका अगला प्रश्न था।

जी, में तो आया चिल्लाकर कह दूँ कि की है। अनेक उपन्यास-कहानियों को ‘डिक्टेट’ करा है और टाइप किया है। उन्हें तुम नहीं पहचानते क्या ? लेकिन मैंने सिर्फ इतना ही कहा-‘जी, नहीं।’
‘टाइप स्टैनो को सीखे कितना अर्सा हो गया है ?’
‘तकरीबन सात-आठ...कुछ याद करते हुए-‘नहीं, दस बारह साल।’
‘दस-बारह साल ! तब भी तुम्हें विश्वास है कि तुम्हारी स्पीड वही होगी !’
‘मैं टेस्ट दे सकती हूँ।’
‘मेरा मतलब यह नहीं था। आई बिलीव यू मैडम।’
‘अंजू !’ मैंने टोकते हुए कहा। 
‘प्लीज एक्सक्यूज़ मी। मैं भूल ही गया था।’
‘आदमी को वक्त सब भुला देता है। आज मुझे कुछ भी याद नहीं। सिर्फ नौकरी याद है और वह मुझे मिलनी चाहिए, प्रबोध। कैसी भी ? प्लीज मेरी मदद कीजिए।’ यह कहते-कहते मैं अपने यथार्थ से काँप उठी थी। वास्तव में यदि मुझे नौकरी नहीं मिली तो क्या होगा ?
‘मैं कोशिश करूँगा।’

‘प्रबोध, यह बदला लेने का समय नहीं। बदला ही लेना चाहते हो तो वह फिर ले लेना।’ मेरे सामने इंटरव्यू की लंबी फेहरिस्त घूम गई थी। और यह बात समझ में अच्छी तरह आ गई थी कि विदआउट जैक देयर इज नो एंट्री। सब जगह रिकमंडेशंस चाहिए जो मेरे पास नहीं थी। और फिर किसे पागल कुत्ते ने काटा है जो नव-नवेली हसीनाओं को छोड़कर मुझ अधेड़ को अपनी ‘स्टैनो’ बनाना पंसद करेगा ! अब तो खूबसूरती की एक यादगार मात्र शेष रह गई थी वह।

मैं लौट आई। दिन गुजरते गए। एक बार पुनः प्रबोध से मिलने की कोशिश की भी लेकिन बेकार गई। वह बड़ी नेवी ब्लू कार में जा रहा था। साथ में उसके एक सुंदर लड़की थी। चपरासी ने बतलाया था कि वह साहेब की नई स्टैनो है।
‘नई स्टैनो...’ मेरे सामने धरती घूम गई। लगा कि मैं गिर पड़ूँगी। जैसे-तैसे अपने को सँभाला और लौट आई।

प्रबोध ने जो किया, वह गलत नहीं था। आखिर उसने उसके साथ क्या कम किया था ! मरते हुए को अस्पताल में छोड़कर उस डॉक्टर के साथ भाग खड़ी हुई थी। वह आज नहीं, सप्ताह या माह में मर जाएगा, फिर क्या होगा उसके इस सुनहरे जीवन का ! प्रबोध के घर वाले तो उसे घर में पाँव भी नहीं रखने देंगे ! अपने घर किस मुँह से लौटेगी ? माँ-बाप हैं कहाँ ? तभी भाई की भौजाई के सामने क्या चलती थी जो बाद में चलती होगी। सब उसे दुतकारेंगे।

प्रबोध के पास क्या रखा है ? साहित्य उसके साथ चला जाएगा। सरकारी नौकरी में वे है नहीं ! रकम उसके पास कहाँ रखी है ? वह तो साहित्य के नशे में जैसे-तैसे जीता है। प्रबोध ने उस रात उससे कहा था-‘अंजू, तुम मुझे लेकर आजकल परेशान रहने लगी हो।’ कुछ देर चुप रहने के बाद पुनः कहा-‘मैं कुछ दिनों का मेहमान हूँ। तुम्हारे लिए मेरे पास कुछ भी नहीं है।’
‘मुझे कुछ नहीं चाहिए, प्रबोध। कुछ भी तो नहीं।’

‘जीवन साहित्य नहीं है, अंजू। मैं इतनी लंबी साधना के बाद यह समझ पाया हूँ। जो उसे साहित्य मानकर चलते हैं, वे मेरी तरह धोखा खाते हैं। क्या मिला है उनको, जो मुझे मिलता ?’
‘आप ऐसा क्यों सोचते हो ? आप जल्दी ठीक हो जाओगे। तब सब ठीक होगा।’ मैंने झूठा आश्वासन देते हुए कहा था।
लेकिन उन्होंने जैसे कुछ सुना ही नहीं, वह अपनी ही रट लगाते रहे। कहते रहे-‘मेरे पास कुछ भी नहीं है। अधिकांश पुस्तकों का ‘कॉपीराइट’ तो बेचना पड़ा है और जिनको रख सका, उनसे मुझे ही क्या मिला, जो तुम्हें वे निहाल कर देंगे। वे व्यापारी हैं, साहित्यकार नहीं। व्यापार में संवेदना, सहानुभूति, संवेगों आदि का कहाँ स्थान होता है, जो वे दें। मैंने कभी उनसे यह अपेक्षा नहीं रखी। लेकिन आज सोचता हूँ, मेरे पीछे तुम्हारा क्या होगा ! तुम्हारी अभी उम्र ही क्या है ?’
‘बेकार बातें आप बहुत सोचते रहते हैं। कहा नहीं, आपको कुछ नहीं होगा।’

‘तुम्हारा न अपना कोई घर रहा है और न मेरे घर के द्वार तुम्हारे लिए खुले हैं। मेरे बाद तुम्हारी ओर कौन देखेगा ! कोई भी तो नहीं, अंजू, भी नहीं। मैंने इतने चरित्रों को लिखा। उनको पढ़कर कितने लोग रोए ! उनके कैसे-कैसे पत्र आए ! लेकिन मैंने कभी नहीं सोचा था कि मुझे भी कभी उनमें से एक चरित्र बनना पड़ सकता है। अब बहुत देर हो चुकी है, अंजू। नहीं तो मैं प्रकाशकों की माँग पर लिख देता तो लाख रुपया इकट्ठा कर जाता। उसका ब्याज तुम्हारे लिए काफी रहता। मुझे फिर कोई चिंता नहीं रहती। लेकिन वो भी नहीं हो सका।’
‘सब ठीक होगा।’ कहते हुए मैं खड़ी हुई और लाइट ऑफ कर दी।

‘सुनो !’ अँधेरे में चमकती हुई उनकी आँखें आज भी मेरे सामने ऐसी हैं जैसे वह मेरे सामने ही हों। वह कह रहे थे-‘अंजू, एक बात गले में अटकी हुई है। कई दिनों से सोच रहा हूँ कि तुमसे कह डालूँ साहस नहीं जुटा पा रहा था। तुमने अँधेरा कर अच्छा ही किया। आज वो सब कह डालूँगा।’
‘कहिए ।’ मैंने बैठते हुए कहा।
‘पास आओ।’ पलंग पर मेरे लिए जगह बनाते हुए उन्होंने कहा-‘यहाँ।’
‘लीजिए।’ मैंने उनके पास बैठते हुए कहा।
‘वायदा करो, नाराज नहीं होआगी।’
‘आपसे नाराज होऊँगी क्या ! आजकल आप कैसी बातें करने लगे हो। जो मन में है, कह डालो। बिना संकोच के कहो। तुम्हें मेरी सौगंध।’ उस वक्त मेरा हृदय उनके प्रति सहानुभूति से भर उठा था। मुझे अपने पिताजी का अहसास था, अपनी माँ का पता था कि वे संसार छोड़ने से पहले कैसे हो उठे थे। कैसी-कैसी बातें करते थे। उनको मेरी कितनी चिंता थी। काश ! वे अपने सामने मेरी शादी कर जाते। उनके ये अरमान पूरे न हो सके थे।

‘अंजू, पति-पत्नी मित्र भी होते हैं न ।’ उन्होंने बहुत धीमे कहना शुरू किया।
‘हाँ।’ मैंने बिना सोच-समझे हुंकारा भरा।
‘तुम मेरे लिए सब-कुछ कर सकती हो न।’
‘क्यों नहीं कर सकती। क्या संदेह है कुछ !’ मैं थोड़ा-सा खीज उठी थी।
‘मैं जानता हूं, अंजू। तू मुझसे ज्यादा साहसी है और मेरे लिए सब-कुछ कर सकती है। इसीलिए तो तुझसे कहना चाहता हूँ।’
‘कहो न। पहेलियाँ क्यों बुझा रहे हो।’ इस बार मेरा स्वर पहले से तेज था।
‘वही तो कहता हूँ। जिंदगी कुछ भी नहीं है। जितने दिन जीओ, मजे से जीओ। मातम किसी के लिए नहीं। जो मातम मनाकर जिंदगी काट देते हैं, वे बेवकूफ हैं। उन्हें जीना नहीं आता। और जो वक्त चूक जाते हैं, उन्हें सिवाय पश्चाताप के कुछ नहीं मिलता।’ वह मेरे काफी नजदीक खिसक आए थे।
मेरे मन में उनकी बातों से तिलस्म फैलने लगा था। मैंने सम्मोहित-सी होकर सिर्फ इतना ही कहा-‘फिर ?’
‘वो डॉक्टर है न, विमल मल्होत्रा।’

‘है।’
‘तुम पर दिल हार बैठा है।’
‘प्रबोध !...’ मैं उस पर बरस पड़ी थी। जाने क्या-क्या कहा था, तब !
उसने सिर्फ इतना ही कहा था-‘वो मुझे काफी मालदार समझता है। नाम जो है। मान जो है। इस वक्त तुमने उसकी बात मान ली तो वह तुम्हारा साहस मानकर तुम्हें अपना लेगा। मेरे बाद तुम रहम की पात्र बन जाओगी। तब वह तुम्हारी तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखेगा। गिरते हुए को इस संसार ने कब और किसको थामा है, जो तुम्हारे लिए इसके सिद्धांत कायदे बदल जाएँगे।’
‘नहीं, प्रबोध, नहीं। ईश्वर के लिए ऐसा मत कहो।’

‘हमारे देश के तलाक कायदे बहुत पेचीदे हैं। लेकिन मेरे मरने पर तुम्हारे रास्ते में कोई बाधा नहीं रह जाएगी तब तक...।’
‘बस...बस....प्रबोध, बहुत हो गई साहित्यिक सहानुभूति की हद। आखिर तुम लोगों ने औरत को क्या समझा है ? क्या वह कपड़े की गुड़िया है। जी चाहे जैसा उसे नचाओ।’ तब मैं बिफर पड़ी थी उसके चरणों में। और मैंने उस कमीने विचार को दिमाग से निकाल दिया था, जिसके सम्मोहन में मन बँधता जा रहा था दिन-प्रतिदिन।
हम भारतीय की यही तो कमजोरी है कि हम हर मोड़ पर एक-दूसरे के सामने आदर्श का मुखौटा लगाये खड़े हो जाते हैं, परंपराओं और नीति की बातों में बहकने लगते हैं। यह सच था कि मैं डाक्टर विमल के साथ काफी दूर का सफर तय कर चुकी थी। सिर्फ उसकी मौत का इंतजार कर रही थी। लेकिन मैंने उसका अंतिम समय जानते हुए भी सच को उसके सामने नहीं आने दिया।

अगले दिन से उसकी तबीयत तेजी से खराब होने लगी थी। फिर विमल भी आ गया। उस वक्त रात के ग्यारह बज चुके थे। मैंने पूछा था-‘इतनी रात गए...खैर तो है।’
‘हाँ, अंजू इतनी रात गए आना ही पड़ा।’ उसने बिना मेरे से पूछे मेरे पास पलंग पर बैठते हुए कहा-‘मुझे एक ‘प्राइवेट कन्सर्न’ में डॉक्टर का ‘जॉब’ मिल गया है। ये देखो, उनका ‘अपायंटमेंट लेटर’।’
‘चलो, अच्छी बात है। कब ‘ज्वॉइन कर रहे हो ?’
‘जब तुम कह दो।’
‘मैं..।’
‘हाँ तुम। अंजू तुम। मैं तुमसे बहुत-बहुत प्यार करता हूँ। यदि तुम्हारे पति इस लाइलाज बीमारी के शिकार न हुए होते तो मैं अपने में यह मोह-बंधन कभी न फूलने-फलने देता। तुम्हारी उम्र मुरझाने की नहीं है, अंजू।’
‘लेकिन..।’
‘लेकिन-वेकिन क्या। तुम कोई भी बहाना करके मेरे साथ चल सकती हो।’
‘विमल, तुम जानते हो कि क्या कह रहे हो !’ गहरी साँस लेकर मैंने कहा-‘क्या यह समय उनको छोड़कर जाने का है ?’
‘उनके पास रहकर भी क्या कर लोगी, तुम। जो करना है, डॉक्टर करेंगे।’
‘लेकिन मेरा...’ 

प्रथम पृष्ठ

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book