शिवप्रिया - शुभांगी भडभडे Shivpriya - Hindi book by - Shubhangi Bhadbhade
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शिवप्रिया

शुभांगी भडभडे

प्रकाशक : आत्माराम एण्ड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2003
पृष्ठ :223
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4035
आईएसबीएन :81-7043-557-9

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शिवशंकर को आद्य मानकर लिखा गया उपन्यास....

Shivpriya

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

शिवशंकर ! मृत्युदेवता ! ये सिद्धिदाता तथा मोक्षदाता भी हैं। ओम्कार से जिनका अस्तित्व है, नादब्रह्म से जिनकी उत्पत्ति हुई है—ऐसे शिवमंगल देवता हैं शिवशंकर ! उमा दक्षकन्या थी। मनोनुकूल पति प्राप्त करने के लिए उमा ने तपस्या की और तपस्या से पति प्राप्त हुआ और शिवशंकर की प्रथम पत्नी बनी। निर्धन शिवशंकर से विवाह करने के कारण पिता द्वारा यज्ञ में न बुलाने पर भी माया-ममतावश पिता के यज्ञ में चले जाने पर उसे अन्त में विवश होकर अग्निज्वालाओं का आश्रय लेकर सती हो जाना पड़ा। निर्धन-धनवान्, श्रेष्ठ-कनिष्ठ प्रेम विवाह के कारण उत्पन्न संघर्ष और रोष से उमा को जो मानसिक संघर्ष करना पड़ा उसकी परिणति अन्त में आत्माहुति देने में हुई। स्त्री के रूप में वह पति का अपमान सहन नहीं कर सकती है। उस पातिव्रत्य के लिए यह आत्माहूति है।

उमा के सती होने पर संजीवनी देकर उसको सजीव करना शिवशंकर के लिए आशक्य नहीं था। परन्तु कर्मानुसार मिलने वाली गति नियति होती है, यह मानकर वह अपनी कर्मगति को और उसके पश्चात् अदृष्ट शक्ति नियति को मानता है। उमा के बाद वह विवाह कर सकता था- एक नहीं, अनेक ! परन्तु वह विधुर के रूप में जीवन बिताता रहा। श्रेष्ठ-कनिष्ठ इस भेद में पत्नी का अन्त होने पर वह विनाशकारी प्रलयंकर रूप धारण कर संसार का अंत करने चल दिया। परन्तु यह क्रोध क्षणिक था।
गिरिजा पर्वतश्रेष्ठ हिमराज की कन्या। शिव को प्राप्त करने के लिए तप करती है। परन्तु शिव विवाह के लिए तैयार नहीं हैं। उसके मन में एक ही बात है, ‘‘अब मेरा मन प्रौढ़ हो गया है, मैं विधुर हूँ...’’ सुकुमारी गिरिजा की भावनाओं का मैं सम्मान कर पाऊँगा क्या ? परन्तु गिरिजा के आग्रह के कारण वह तैयार हो जाता है।

शिवशंकर अनन्य दाता हैं। तीनों लोकों में ऐसा दाता कोई नहीं है। वह अत्यन्त परिश्रमपूर्वक एक-एक अनुभूति प्राप्त करता है और उस अनुभूति से प्राप्त हुआ ज्ञान और सिद्धि। उन सिद्धियों का आदर कर वर्तमान काल के जन-मानस पर उनका महत्त्व प्रस्थापित करते समय शाश्वत मूल्यों की प्रतिष्ठापना है ‘शिवप्रिया’ ! और यह महापुरुष इस उपन्यास का नायक है।

शिवप्रिया के निमित्त से


शिवशंकर ! मृत्युदेवता ! ये सिद्धिदाता तथा मोक्षदाता भी हैं। ओम्कार से जिनका अस्तित्व है, नादब्रह्म से जिनकी उत्पत्ति हुई है—ऐसे शिवमंगल देवता हैं शिवशंकर ! हिमगौर, सुदृढ़ शरीरयष्टि वाला, सरल मन का, सात्त्विक, सहज प्राप्त होने वाला तथा मृत्युलोक में निवास करेवाला देवपुरुष ! ऐसे शिवशंकर के विषय में कुछ लिखने की बात मेरे मन में थी ही नहीं। मन में थी हिमगौरवर्ण की, सुडौल शरीरयष्टिवाली अनुपम लावण्यवती उमा ! उसी के नामान्तर हैं गिरिजा, हिमकन्या, दक्षकन्या, शिवपत्नी और शिवांगी भी !

स्त्री के जीवन-यापन करते समय उमा को मानसिक संघर्ष सहन करना पड़ा था। मनोनुकूल पति प्राप्ति करने के लिए उमा ने तपस्या की और तपस्या से पति प्राप्त हुआ—परंतु इसके लिए भी संघर्ष करना पड़ा। कारण यह था कि स्मशान में निवास करने वाला, भस्मविभूषित देह पर व्याघ्रचर्म धारण करने वाला, जटाजूट बाँधने वाला, गले में सर्प की माला पहनने वाला दामाद किसको प्रिय लगेगा ? गिरिजा के पिता गिरिराज हिमालय को वह जामाता प्रिय नहीं था। परन्तु गिरिजा का आग्रह था। इसलिए इनकार करना संभव नहीं था।

उमा दक्षकन्या थी। शिवशंकर की प्रथम पत्नी। उसको भी लोक में सर्वश्रेष्ठ मान्यता प्राप्त महाराज दक्ष महायज्ञ में इसलिए आमंत्रित नहीं करके क्योंकि उसने निर्धन शिवशंकर से विवाह किया था। फिर में जब निमंत्रण के बिना ही उमा माया-ममतावश पिता के यज्ञ में चली गई तो उसको अन्त में विवश होकर अग्नि-ज्वालाओं का आश्रय लेकर सती हो जाना पड़ा। निर्धन-धनवान्, श्रेष्ठ-कनिष्ठ प्रेम-विवाह के कारण उत्पन्न संघर्ष और रोष से उमा को जो मानसिक संघर्ष करना पड़ा उसकी परिणति अन्त में आत्माहुति देने में हुई। स्त्री के रूप में जीवन-यापन करते समय समृद्ध वैदिककाल में भी उमा को आत्माहुति देकर न्याय माँगना पड़ा !

वैदिक संस्कृति, तपश्चर्या से समृद्ध, कर्म से सम्पन्न तथा यज्ञ-याग से मानसिक शान्ति प्रदान करने वाली। इतना ही नहीं, वह सत्य, समता और न्याय का उद्घोष करने वाली, भेदाभेद न मानने वाली तथा वैचारिक प्रगल्ता वाली संस्कृति है। उस संस्कृति के प्रथम चरण में अपने सम्मान के लिए एक स्त्री को आहुति देनी पड़ी—इसी से प्रकट होता है कि वैदिक संस्कृति से लेकर आज की वैज्ञानिक संस्कृति तक जो अन्तर था वह कितनी शीघ्रता से नष्ट होता गया है। स्त्री आखिर स्त्री ही है ! उसके जीवन का स्थायी भाव दुःख और संघर्ष है। फिर कितना ही काल और कितने ही युग बीत जायें। स्त्री स्त्री के रूप में सभी कालों में समान है। उसमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। उसका पर्याय कहीं कभी न था, न पर्याय आज है !
स्त्री-शक्ति की चमचमाती प्रथम अभिव्यक्ति उमा के सती होने में है, श्रेष्ठता के विरुद्ध एवं अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करने में है एवं न्याय के लिए अपना बलिदान कर देने में है। स्त्री के रूप में वह पति का अपमान सहन नहीं कर सकती है। उसका पतिव्रत्य के लिए ही यह आत्माहुति है।

एक ओर धनी मदान्ध राजश्रेष्ठ पिता और दूसरी ओर स्वयमेव प्राप्त किया निर्धन पति। इन दोनों के मध्य फँसी हुई स्त्री को अन्त में अपने जीवन की इतिश्री करनी पड़ती है। युग बदल गए परन्तु स्त्री के इन संघर्षों का अन्त नहीं हुआ।
और इस तेजस्विनी की चमचमाती ज्वाला को मैं शब्दबद्ध करना चाहती थी ! उमा के रूप में ! पश्चात् गिरिजा के रूप में ! गिरिजा पर्वतश्रेष्ठ हिमराज की कन्या थी। उसका विवाह शिवशंकर से होता है। परन्तु तपस्या करके आग्रहपूर्वक शंकर को प्राप्त करने वाली गिरिजा को मिलता क्या है ? सुख, शान्ति और समाधान या अनासक्त आत्मग्न, विरागी पुरुष के साथ बसाये संसार में....संसार से निराले चूल्हे पर बसाये गए इस संसार में आत्मक्लेश ? सृष्टि के निर्माता के रूप में, शास्त्रज्ञ के रूप में वन्य वनस्पतियों से अनेक रसायनों के शोध निकालकर आखिर जो सिद्धि प्राप्त होती है वह क्या औरों को देने के लिए ? गिरिजा को क्या मिला ? कम-से-कम एक अपनी सन्तान ? मातृत्व का सम्मान ? पत्नीत्व का अभिमान या पति का गौरव ? वह विश्वजजनी कहलाई...विश्वन्द्या हो गई अपने कार्यों से और गुणों से ! ऐसी इस रूपमती गिरिजा की स्वानुभूत मुझको शब्दबद्ध करनी थी।

परन्तु जब मैं इन दोनों के सम्बन्ध में विचार करने लगी तब शिवशंकर मेरे मन में ऐसे बस गए कि वे जाएँ ही नहीं ! उन्होंने कहा, ‘‘सती के रूप में मेरी प्रथम पत्नी दगद्वन्द्या हो गई, स्त्री-शक्ति का प्रतीक हो गई। उसकी प्रतिभा और उसकी अस्मिता एक गौरव-गाथा बन गई। गिरिजा लावण्यवती, कार्यशील कार्यकर्त्री, स्त्री दुखों के लिए न्याय माँगने वाली और प्रगल्भ प्रतिभाशालिनी थी। जब-जब स्त्री पर अनाचार तथा बलात्कार होने लगे तब-तब यह शक्तिशालिनी उसके मन में जाग्रत हो गई और अन्याय के विरुद्ध न्याय की माँग करने लगी। परन्तु मैं...अनादि मैं...अन्नत मैं, सूक्ष्म मैं, स्थूल मैं, सर्वव्यापक मैं, सर्वसमावेशक मैं ! मैं सबका हूँ...सबके लिए हूँ। परन्तु मेरा कौन है ? मेरा आप्त स्वजन कौन है ? कौन हैं मेरे माता-पिता, जिन पर मैं प्रेम कर सकता हूँ...क्रोध कर सकता हूँ ? मेरे रक्त सम्बन्धित भाई-बहन कौन है ? समाज में मुझको मान-मान्यता, सम्मान और गौरव कहाँ है ? जन-मानस में विराजमान मेरी प्रतिमा क्या है ? मन में अनेक शल्य हैं....दुःख हैं....चरम कोटि के दुःख हैं। मैं इन दुःखों को संसार के सामने नहीं रखना चाहता हूँ...परन्तु पुरुष के रूप में मुझको जो दुःख हैं उनको क्षणभर में सुन लेने में क्या हानि है ?’’
और मैं शिवशंकर का कथ्य सुनती रही। सुनते-सुनते मैं उनकी व्यथा पर मोहित हो गई। गिरिजा की व्यथाएँ उस व्यथा के साथ-साथ आईं।

शिवशंकर स्वयंभू हैं। सृष्टि के उदय से पूर्व निराकार से पहले निराकार ब्रह्म की उत्पत्ति हुई। निराकार से साकार हुईं, साहसा प्रकट हुई तीन शक्तियाँ—सत्त्व-रज-तम। इन प्रवृत्तियों के— शक्तियों के तीन देवता साकार हुए— ब्रह्मा, विष्णु और महेश। उनके कार्य थे— उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय। ये तीन शक्तियाँ कार्यान्वित होने पर उनकी सिद्धि से उन्होंने जीव सृष्टि का निर्माण किया, विकास किया और कालान्तर में विलय किया। निर्माण के साथ ही विलय निश्चित हो गया। उदय के साथ अस्त ही की कल्पना साकार हुई।

वेद अपौरुषेय माने जाते हैं। इन देवाताओं में ही कोई इन वेदों का लेखक होगा। कारण यह है कि पृथ्वीतलवासी किसी ऋषि-मुनि ने उनको नहीं लिखा है। इन वेदों में ही निराकार ब्रह्म की प्रथम कल्पना है। प्रथम ब्रह्म, की प्रथम कल्पना है। प्रथम ब्रह्म, पश्चात् तीन शक्तियाँ और फिर अनन्त शक्तियाँ-यह क्रम है। वेद में, महाभारत में, भागवत में सर्वत्र यही उत्पत्ति-क्रम है। तीनों देवता जन्मतः सिद्धिप्राप्त, स्वयंभू तथा स्वयंपूर्ण होने से सृष्टि-निर्माण करना, उसका विकास करना और विलय करना कोई कठिन कार्य नहीं था। इस कार्यशक्ति का प्रभावशाली उपयोग उन्होंने किया इसलिए तीनों देवता अपने-अपने क्षेत्र में विश्ववन्द्य हो गए।

अपने इस उपन्यास में मैंने शिवपुराण का आधार लिया है। पुराण वेद के समान प्राचीन नहीं है। पुराण बाद के समय के हैं। फिर भी मैने वेदों का आधार न लेकर शिवपुराण का आधार लिया है। शिवपुराण से पहले प्रकट हुआ ओम्कार। ओम्कार के नाद से प्रणव-स्थिति। उससे प्रकट हुआ साकार रूप शिवशंकर का। वह कैसे प्रकट हुआ, कहाँ से आया, उसकी पूर्व स्थिति क्या थी। इसके न वेद जानते हैं न शिवपुराणकार। वेदों की भाँति पुराण यहाँ पर मौन हैं। शिवशंकर आद्य देवता माने जाने के कारण देवताओं की उत्पत्ति और सृष्टि की उत्पत्ति के प्रथम कार्य करने पड़ते थे। मृत्यु का कारण बहुत बाद का है। ब्रह्मा और विष्णु को उन-उन कार्यों की शक्ति देने के बाद मृत्यु की अनिवार्यता प्रतीत होने पर यह हुआ। शिवपुराणकार ने शिवशंकर को देवता मानने के कारण सिद्धियाँ जन्मतः ही उनको प्राप्त हो गईं।

मैंने अपने इस ‘शिवप्रिया’ उपन्यास में शिवपुराण की ही भाँति शिवशंकर को आद्य माना है परन्तु देवता अथवा स्वयंपूर्ण देवपुरुष नहीं माना है ! अपितु स्वयंभू का अर्थ ‘अपने परिश्रम से सिद्धि प्राप्त करने वाला स्वयंपूर्ण पुरुष किया है। ऐसे शिवशंकर को मैंने शिवपुराण की भाँति दैवी पुरुष न मानकर सिद्धि, अनुभूति, परिश्रम से परिपूर्ण महापुरुष माना है। जन्मतः उसके पास कुछ नहीं है, परन्तु परिश्रम से उसने सब कुछ प्राप्त किया है। ऐसा महापुरुष मेरे उपन्यास का नायक है। मैंने शिवपुराण के अनुसार ही शिवशंकर के बाद ही विष्णु और ब्रह्मदेव की उत्पत्ति मानी है।

शिवशंकर को देवता न मानकर मैंने आद्य पुरुष माना है, इसलिए सहज ही वह सृष्टि का निर्माता हो गया है। केवल नादब्रह्म का ही नहीं अपितु सभी ब्रह्मशक्तियों का वह आद्य निर्माता हो गया। सृजनात्मक कार्यकर्ता हो गया। विकासशील हो गया। वह पुरुष स्वयं की कार्य प्रणवता से, निष्ठा से, निरन्तरता से, स्वयं-प्रतिभा से एवं अस्मिता से सिद्ध पुरुष हो गया। अनुभूति से एवं आत्यन्तिक आत्मविश्वास से वह मन्त्र शक्ति और वाक्-सिद्धि का अधिकारी हो गया। स्वशक्ति का सम्पन्न और प्रगल्भ प्रत्यय ही सिद्धि है।

शिवशंकर अनन्य दाता हैं। तीनों लोकों में ऐसा दाता कोई नहीं है। वह अत्यन्त परिश्रमपूर्व एक-एक अनुश्रुति प्राप्त करता है और उस अनुभूति से प्राप्त हुआ ज्ञान एवं सिद्धि सहज दूसरे को दान करता है। इतना सहज दान करने वाला यह महापुरुष गम्भीर स्वभाव का है। वह सृष्टि के क्रम का, वातावरण का और निसर्ग का सतत अध्ययन करता है। वह तत्त्वज्ञ है, संशोधक है और शास्त्रज्ञ है। निरीक्षण, अध्ययन, अनुभूति और इन सब के लिए अव्यहात परिश्रम करने वाला शिवशंकर इस प्रकार स्वयं पूर्ण होता हुआ देव के पद का अधिकारी बना है।

शिवशंकर सृजनात्मक कार्यकर्ता है। शिवपुराण में ‘गोलोक’ का जो वर्णन है, उसमें शिवशंकर ने पशुधन-कृषिधन जमा किया है। रसायन, द्रव्य, ओषधि, वनस्पतियाँ और संजवीनी आदि के संशोधनों से उन्हें अनेक अनुभूतियाँ प्राप्त होंगी—उनका वर्णन पढ़ते समय मुझको यही प्रतीत हुआ। सतत चिन्तन करने वाला, निष्कर्ष निकालने वाला तथा पुनः-पुनः सिद्धान्त प्रस्तुत करने वाला वह महान् अध्येता है।

शिवशंकर है शमशान में रहने वाला, भस्मविभूषित देह पर व्याघ्राम्बर धारण करने वाला जटाजूट बाँधने वाला, सर्पमाला धारण करने वाला, तीन नेत्रों वाला मृत्युदेव...कठोर कार्यकर्ता— यह जो समाज में एक रूढ़ि प्रचलित है वह मुझको कदापि मान्य नहीं है। शिवशंकर आद्य पुरुष है, हिमकाय है, सुदृढ़ देहयष्टि का है, कठोर कार्य करने वाला है, विनाश करने वाला है परन्तु कठोर स्वभाव का नहीं है। उसका स्वभाव गम्भीर है, एकनिष्ठ है और काव्य-संवेदनशील है। वह निसर्ग की उत्पत्ति से लेकर मृत्यु तक समस्त जीवन-क्षणों का काव्य लिखने वाला— जीवन मृत्यु का महाकाव्य लिखने वाला— महाकवि है। वह शमशान में रहकर वैराग्य धारण करने वाला वैरागी पुरुष नहीं है, बल्कि वह तो शमशान में भी जीवन को प्रफुल्लित करने वाला गुणज्ञ रसिक है। वह संयमी है, दृढ़प्रतिज्ञ है, परन्तु उसको श्रृंगार वर्ज्य नहीं है। अनासक्त योगी पुरुष है— यह उसकी विशेषता मान भी लें तो भी वह श्रृंगार के एक भी उत्सव में अनुपस्थित नहीं रहता है। जैसे रुपहले मेघों की अनेक रंगों की किनारी हो वैसे ही शिवशंकर के चमचमाते व्यक्तित्व के अनेक विविधरंगी गुणों के मनोज्ञ किनारे हैं। लालित्य, सौन्दर्य और साहित्य को जीवन में उतारने वाला वह कलाप्रेमी है, कलानिपुण है और रसज्ञ है।

शिवशंकर के सम्बन्ध में विचार करते समय यह स्पष्ट हो जाता है कि नारी के प्रति स्वतंन्त्रता और समानता शिवशंकर ने ही दिखाई है। मनु ऋषि का आग्रह था कि स्त्री को स्वतंत्रता नहीं मिलनी चाहिए परन्तु स्त्री भी अपने कार्यों से, प्रतिभा से तथा स्वयं तेज से चमक सकती है, ऐसी स्त्री का सम्मान पुरुषों को भी करना चाहिए— इस बात का प्रमुख रूप से प्रतिपादन शिवशंकर ने ही किया है। स्त्री को उसका सम्मानपूर्ण स्थान दिलाने वाला तथा उसको अपने में सामाहित करके भी अपना स्वतन्त्र अस्तित्व प्रकट करने का अवसर देने वाला प्रथम पुरुष शिवशंकर ही है। अर्धनारीस्वर स्त्री-पुरुष की समान शक्ति का संयुक्त प्रतीक ही है। शिवशंकर कलाओं का निर्माता और आविष्कारक है। नृत्य, गायन, कला, साहित्य आदि की प्रथम निर्मित उसी की है। वह नटराज है, वह नादब्रह्म है और वह सर्वसमावेशक युगपुरुष है।

विष्णु का रूप और कार्य जगत्मान्य है। वह प्रतिष्ठा दिलाने वाला है। ब्रह्मदेव गूढ़-निर्गुण-निराकार तथा ब्रह्मज्ञान देने वाले महान् योगी पुरुष हैं। कमलदल पर स्थित ओस की बूँद की तरह संसार का निर्माण करके भी वे उससे दूर रहने वाले अनासक्त योगी पुरुष के रूप में जगत्मान्य हैं। परन्तु शिवशंकर ? वेष ऐसा कि साधारण जन को भी अशोभनीय लगे, कार्य अत्यन्त कठोर....अप्रिय अभक्ष्य भक्षण करने वाला— यह शिवशंकर के प्रति पूर्वापार भावना है।
‘शिवप्रिया’ में ठीक यही शिवशंकर की व्यथा है। कार्य कठोर है इसलिए लोग कठोर क्यों समझते हैं ? कार्यों से पुरुष कठोर होता है क्या ? इसके विपरीत ऐसा कार्य उसको करना पड़ता है, इस प्रतीति से वह और भी अधिक कोमल-कातर हो गया है।



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