अन्तर्मन से - यामिनी Antarman Se - Hindi book by - Yamini
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अन्तर्मन से

यामिनी

प्रकाशक : आत्माराम एण्ड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :88
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4043
आईएसबीएन :81-89363-04-2

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बीते जीवन की परतों की परतें खोलने वाले संस्मरण....

Antarman Se a hindi book by Yamini -अन्तर्मन से - यामिनी

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

बीते हुए जीवन की परतों की परतें खोलने वाला मनोरंजक किन्तु अपनी भावप्रवणता व संवेदनीयता में अक्षुण्ण गद्य साहित्य की एक सशक्त विद्या का नाम है ‘‘संस्मरण’’। ‘‘इसमें लेखक के जीवन की कतिपय अविस्मरणीय एवं उल्लेखनीय घटनाओं का ललित शैली में लेखा-जोखा होता है।’’ उसी विधा की श्रृंखला में मेरा यह लघु प्रयास है। आज प्रकाशित होकर वह सहृदय पाठकों के हाथ में है, वे ही इसके एकमात्र निर्णायक हैं।

मेरा निवेदन


व्यष्टि और समष्टि का समुचित संश्रय ही जीवन संचान का मुख्य आधार है। व्यक्ति ही समाज है। अपने मूल रूप में नितांत अकेला होते हुए भी व्यक्ति अकेला नहीं है। वह समाज की एक सशक्त इकाई है। इस पुस्तक के संस्मरण व्यक्तिगत होते हुए भी पूर्णरूपेण सार्वजनिक हैं। सुहृदय पाठकों को पढ़ते-पढ़ते कहीं ऐसा जरूर लगने लगेगा कि अरे ! यह तो उनके ही मन की बात है, उनके ही जीवन की घटना है। अवकाशप्राप्ति के बाद का खालीपन, जिसे टूटी-फूटी लेखनी से भरने का प्रयास किया है। जो कुछ कहा गया है, वह प्रायः मेरे जीवन का सत्य है, उस सबका यथावत् उल्लेख हुआ है। न उसमें कल्पना की इन्द्रधनुषी उड़ान है, न वायवी भावप्रवणता और न भाषा-शैली की साज-सज्जा, परिमार्जन और क्लिष्टता है। सीधी-सरल व्यावाहारिक भाषा में अतीत की स्मृतियाँ व्यक्त हुईं हैं।

लेखनी से जो कुछ प्रसूत हुआ है, एक स्वच्छ, निर्मल, श्वेत, धवल स्वतः-स्फूर्त निर्झरिणी की भाँति बहता चला गया है। जिसमें है एक अन्तर्मन की, एक आत्मा की पुकार। जिसमें है जीवन का संदेश और जीवन के लिए ठोस दर्शन। ढूँढ़ने वाले को प्रत्येक संस्मरण में सच्चे जीवन की सच्ची झलक और उसकी तह में समाहित, कहीं अन्दर संग्रथिक कोई सार्थक तत्त्व अवश्य मिलेगा, क्योंकि ये नितांत खोखली नहीं है। अन्तर्मन से निकली हुई एक सहज नैसर्गिक आवाज़ है।
चाहकर भी संस्मरणों के विषय में एक सुनिश्चित क्रम या व्यवस्थित तारतम्य नहीं बन पाया है। मन ने जब जो कुछ कहा, लिखा है। इसी कारण मुख्य शीर्षक ‘अन्तर्मन से....’ रखना समीचीन-सा जान पड़ा। पीछे जो हम छोड़ आए हैं, उसमें बहुत कुछ होता है। कभी-कभी साधारण-सी दिखने वाली घटनाएँ असाधारण तथ्यों का उद्घाटन करती जाती हैं। असाधारण होती हैं। आवश्यकता है केवल अपनी चिंताशक्ति की मथानी से सार्थक तत्त्व (मक्खन) निकालने और निर्थक तत्त्व (छाछ) फेंक देने की। पाठकों को यदि कुछ अच्छा लगे, तो यह स्वयं, उन्हीं का बड़प्पन है, मेरी लेखनी की क्षमता नहीं। यदि न अच्छा लगे, तो प्रयास क्षम्य है।

सरल, सामान्य, व्यावहारिक यथार्थ के बीच जीवन के शाश्वत संदेश बिना प्रयास ही दूध और पानी की तरह कुछ ऐसे घुल-मिल जाते हैं कि सुधी पाठक उनकी गहराइयों में पहुँचकर, कुछ पा सकेगा, ऐसी मेरी आशा है। ज्यों-ज्यों समीप आते जाएँगे, सौन्दर्य झलकता जाएगा, बढ़ता जाएगा। घनानन्द जी की ये पंक्तियाँ-

‘‘ज्यों-ज्यों निहारिए नेरे ह्वै
त्यों-त्यों खरी निखरे सुनिकाई है।’’

-डॉ.यामिनी


पुरुष और प्रकृति


प्रलय के जल-प्लावन की प्रचण्ड लहरों का आलोड़न-विलोड़न कितना भयावह ! किन्तु यह क्या ? उसके शान्त होते ही प्रकृति में कैसी शान्ति, कैसी शीतलता, कहीं ऊष्मा का नाम नहीं। ऊष्मा थी तो एक नारी-आकृति में जिसको पुरुष ने प्रथम बार देखा और आत्मविभोर हो गया। अपनी सुध-बुध खो बैठा। आकर्षण का क्षीण तन्तु कितनी सशक्तता से उसे अपनी ओर खींच रहा था। विस्मत, विमुग्ध ! पुरुष सोच रहा था कि क्या यह व्यामोह उस जीव-आकृति के बाह्य आवरण के प्रति था या प्रकृति के उग्र झंझावात या विकराल दानवी रूप के बाद एक तरलता की, एक सौम्यात की, एक अच्छेपन की अनुभूति जो उसे बाहर से अन्दर तक भिगो रही थी ? प्रश्न, प्रश्न ही रहा, उलझा ही रहा।

कहते हैं कि ईश्वर ने जब सृष्टि का निर्माण किया, असंख्य चीज़े बनाईं। नदी, पहाड़, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और अन्त में पुरुष-प्रकृति (नारी)। विधाता ने नारी का निर्माण किया। अन्त में जब उसकी तूलिका थमी, तब उसने अपने ही सृजन को अपनी सम्पूर्णता में निहारा तो आश्चर्यचकित रह गया ! क्या यह उसने ही बनाई है ? इतनी सुन्दर कृति ! लगता है यहीं सुन्दरता का अन्त है, यहीं चरम सीमा है। अब इससे सुन्दर कृति न बन सकेगी। और उस विधाता ने अपनी तूलिका को विराम दे दिया, तोड़ डाला।

यह सच है कि सृष्टि की सुन्दरतम कृति नारी है। उसमें समाहित यह सौन्दर्य वस्तुतः है क्या ? उसका बाह्य-सौन्दर्य, उसका नाक-नक्श या अलंकारों से सज्जित उसका लिपा-पुता चेहरा ? लेपन गया, सौन्दर्य भी गया, फीका पड़ गया। नारी क्षणिक सौन्दर्य की नहीं, शाश्वत सौन्दर्य की अधिष्ठात्री है। सच्चा सौन्दर्य स्थात्यित्व की अपेक्षा रखता है। वह शाश्वत व चिंरतन होता है। कभी फीका नहीं पड़ता।

सौन्दर्य सत्य और शिव को अपने में समाहित किए रहता है। सत्यं, शिवं, सुन्दरम् जो सत्य है, वही शिव है, जो शिव है, वही सुन्दर है। बिना सत्य और शिव के सौन्दर्य अस्तित्वहीन है, विकलांग है। एक पैर से खड़ी होने वाली वस्तु तो सदैव निराधार ही रहेगी, कभी भी लड़ख़ड़ा जाएगी। सौन्दर्य की सत्ता सत्यं एवं शिवं से मण्डित होकर आकृतिवान होती है।
नारी सुन्दरतम है क्योंकि उसके सौन्दर्य में सत्य और शिव लिपटा हुआ है। सत्य जो मन की सदवृत्तियों का द्योतक है, शिव जो सदा मंगलदायी है, कल्याणकारी है। मन ही सरलतम प्रकृति, कोमलतम प्रकृति, दया, ममता, वात्सल्य और सहज संवेदनीयता, यहीं तो है नारी का सौन्दर्य, जो अन्दर से बाहर प्रतिबिंबित होता है, प्रतिफलित होता है और उसे सर्वांगीण सौन्दर्य से आवेष्ठित कर देता है। जो सौन्दर्य अन्दर से झलकता है, उसे किसी प्रकार के अलंकरण और साज-सज्जा की अपेक्षा नहीं रहती। ‘‘हृदय में अनुकृति बाह्य उदार’’-प्रसाद।
नारी सौन्दर्य के चितेरे महाकवि बिहारी की नायिका के बारे में कहा है-

‘‘लिखन बैठी जाकी सबी, गहि-गहि गरब गरूर,
भये न केते जगत के चतुर चितेरे कूर’’

-बिहारी

बिहारी नायिका के सौन्दर्य-चित्रण के लिए बड़े-बड़े और गर्वीले कलाकारों को बुलाया गया, किन्तु क्षण-क्षण परिवर्तित होते हुए उसके रूप को कोई भी चित्रकार-चित्रत नहीं कर सका। सारे कलाकार विफल होकर लौट गए। सौन्दर्य को परिभाषित करने में संस्कृत-साहित्य की एक उक्ति ही, इस घटना के लिए समीचीन जान पड़ती है-


‘‘क्षणै-क्षणै यन्नवतामुपैति तदैव रूपं रमणीयताया’’


(जो क्षण-क्षण परिवर्तित हो, वही रमणी का रूप है।)
क्या किसी नारी का ऊपरी परिधान, उसकी साज-सज्जा, उसका बाह्य रूप-रंग एक क्षण में परिवर्तित होता है ? क्षण-क्षण परिवर्तित होने वाली तो अगाध गहराइयों में छिपी हुई अरूप और निराकार भावनाएँ हैं, जो सहस्त्रों भावों-अनुभावों के रूप में सदा गतिवान रहती हैं। मन के इन्हीं सुन्दर भावों से नारी लावण्यमयी बनती है, जिस असाधारण लावण्य को आज तक न कोई परिभाषित कर सका है और न कोई चित्रकार चित्रित कर सकता है।
नारी अपने प्रकृतिप्रदत्त सहज संवेदनीय गुणों से अभिभूत इस सृष्टि का फूल है, जो उसके अन्तर्मन में अक्षुण्ण रूप में लिखा हुआ है। काँटो की चुभन से दूर जो नीरस, सूखा और एक ठूँठ मात्र है। जिसका अन्तर्मन सुन्दर है, वह सदा सुन्दर है। आन्तरिक सौन्दर्य से मण्डित नारी अक्षुण्ण सौन्दर्य की अधिष्ठात्री है। नारी ! तुम कितनी सुन्दर हो !


पावस की फुहार


मन की चाहत। अनजाने ही उसे कैसे कोई समझ जाता है ! शायद सूक्ष्म संवेदनाओं की संवाहिकाएँ मूक धड़कनों की आहट से सक्रिय हो उठती हैं। वाह रे ! प्रकृति वाह रे ! ईश्वर ! तुम कितने महान् हो ! निरीह मानव की बिचारी पुकार को तुमने सुना और आग के गोले के समान तपती हुई धरती को एकाएक स्नेह-संचित बूँदों से शीतल बना दिया। गर्म हवाओं के झोंके शीतल बयार में परिणत हो गए। झुलसे हुए मन और शरीर आज शीतलता की अनुभूति किए हुए, उल्लसित-से घूम रहे हैं। बच्चे घरों से निकल पड़े। उछल-कूद कर वे ईश्वर के प्रति अपनी कृतज्ञता ही तो ज्ञापित कर रहें है। हे ईश्वर ! तुम मोम की तरह पिघलने वाले हो। फिर तुम्हारा ही बनाया हुआ मानव क्यों इतना दयनीय है ? वह किसी की आर्त पुकारों को क्यों नहीं सुन पाता ? क्या भौतिकता की, पार्थिवता की तह पर आप्लावित होती हुई कड़ी परते सुदृढ़ आच्छादन से उसे आवेष्ठित किए रहती हैं और वह अपने चारों तरफ के समुदाय और वातावरण से अछूता-सा, निरपेक्ष-सा अपने में खोया और सोया रहता है ? क्यों इस मानव का मन दयानिधि नहीं है ? वह क्यों इतना क्रूर है ? उसका भी दिल धड़कता है, फिर क्यों वह दूसरे के दिल की धड़कन से अनजान बना रहता है ?

आज वर्षा की बूँदों ने जाने कितने तपते हुए अस्तित्वों को शीतलता दी, उल्लास दिया। मन-मयूर जैसे नाच उठा। प्रातः की बेला में चिड़ियों का चहचहाना जैसे पुकार-पुकार कह रहा था कि ए मूढ मानव ! तू क्यों अज्ञान के अंधकार में डूबा हुआ, सोया पड़ा है। उठ। और प्रकृति के इस आनन्द का भरपूर आस्वादन कर। एक छोटी-सी गौरेया जो अपने क्षीण–काय लघु शरीर से इस देहधारी सशक्त मानव का शतांश भी नहीं है, फुदक-फुदक कर, चीं-चीं कर क्यों मानव को एक शाश्वत संदेश दे रही है कि ए मानव ! यही एक उपयुक्त समय है, जब तू जाग, स्वार्थ की लोलुपता, प्रसाद की निष्क्रियता से सक्रिय हो, कर्म पर जीवित और जगत को सुन्दर बना और प्रकृति का आनन्द ले। निमिष मात्र में एक डाल से दूसरी डाल पर बैठकर वह यही संदेश तो देती है कि गति का नाम ही जीवन है। चलता चल, चलता चल, ‘‘जो राह चुनी तूने उस राह पर राही चलता चल।’’ रुकना, थमना और हारना मृत्यु का प्रतीक है। गौरेया डाल-डाल पर जाकर अपनी मूक वाणी से इस अबोध मानव से कहती है कि ए अबोध मानव ! मृत्युलोक में कुछ भी शाश्वत नहीं है, कुछ भी स्थायी नहीं है, कुछ भी निश्चित नहीं है, फिर क्यों सब कुछ पाने की दौड़ में तू अपनी आँखें बन्द किए हुए है ? अन्धा होकर दौड़ रहा है ? गिरेगा। आँखें खोलकर दौड़,. गिरेगा नहीं।


बड़े भाग्य मानुष तन पावा


तुलसी

आज से पैंतीस-छत्तीस वर्ष पहले की, समय के लम्बे अन्तराल में धुँधली होती हुई वे स्मृतियाँ, अवचेतन मन में कहीं खो गयी थीं। अतीत की कड़ी चट्टानों के नीचे कहीं दब गयी थीं। फिर भी कितनी सशक्त रही होंगी कि जीवन से जुड़ी हुई वे यादें जो स्मृतियों के सघन वन में आज भी जुगनुओं की क्षीण-सी दीप्ति के समान रह-रहकर चमक जाती हैं। अतीत का परिप्रेक्ष्य, टूटती हुई, घुटती हुई घटनाओं की साँसें फिर-फिर जीवन्त हो उठती हैं और अपने जिन्दा रहने का, अपने अस्तित्व का एहसास दिला जाती हैं। मन दूर कहीं दूर अतीत के गलियारे में घूमने लगता है, दौड़ने लगता है, थम जाता है। कभी विश्रांति पाना चाहता है और कभी मुखर होने के लिए व्यक्त होने के लिए मचल-मचल उठता है।
यू.पी.का एक प्रसिद्ध पी.जी कॉलेज। सहशिक्षा। लड़के-लड़कियों का घूमता हुआ झुण्ड चारों ओर दिखाई देता है। उस कॉलेज में पहली महिला लेक्चरार की नियुक्ति।

गौरवमय, गरिमामय परिधान साड़ी में लिपटी हुई वह लड़की; किन्तु केशों की सज्जा ! वही दो चोटियाँ आगे पड़ी हुईं। काले, घने, लम्बे, आकर्षक बालों की दो चोटियाँ जो अनायस ही बार-बार यह अहसास दिलाने के लिए पर्याप्त थीं कि अभी पिछले दो ही वर्ष पहले वह भी इन विद्यार्थियों में से एक थी और आज वह उनको पढ़ाने के लिए एक व्याख्याता थी। एक अजीब-सी हलचल मन में, कैसे पढ़ा पाएगी इन छात्रों को ? मन में एक घबड़ाहट, एक डर। कदाचित उम्र की परिपक्वावस्था न थी। समय से पहले ही ईश्वर ने उसे यह सुअवसर दे दिया था। बालों में यत्र-तत्र दिखाई देने वाली हल्की सफेदी, चेहरे पर वयस की थोड़ी गम्भीरता। इस सबका तो नितान्त अभाव था उस लड़की में।

डिपार्टमेंट से क्लास तक आते-आते कोई विद्यार्थी दूर से कहता, ‘‘यह कोई नई मैडम आई हैं ’’ तो दूसरा कहता कि ‘‘नहीं। यह कोई एम.ए की स्टुडैन्ट होगी’’ ‘‘अरे यार ! देखते नहीं ! हाथ में रजिस्टर लिए हैं, इसलिए मैडम ही हैं।’’ यह सब सुनते हुए, आगे बढ़ते जाना, किन्तु मन डर से काँप उठता था। क्लास आ जाती थी। अटेन्डेंस लेते हुए आवाज में लड़खड़ाहट। किन्तु कुछ मिनट बाद ही जब पढ़ाना शुरू किया, बच्चों के चेहरे पर एक प्रफुल्लता, कुछ पा लेने का एक उल्लास, एक तृप्ति। और पढ़ाने के बाद उस लड़की के मन में एक अव्यक्त–सा आत्मसन्तोष, गर्व, की गौरव की अनुभूति। जितना डर रही थी, उतना ही अच्छा पढ़ाया और धीरे-धीरे यह स्थिति आ गयी कि कॉलेज के गिने-चुने अच्छे टीचरों में उसका भी नाम लिया जाने लगा। मन फिर अतीत की ओर दौड़ता है। वह पुराना जमाना, जब लड़कियों को उच्च शिक्षा देने का जैसे रिवाज-सा नहीं था, किन्तु एक पढ़े-लिखे शिक्षित परिवार में जन्म लेना भी एक सौभाग्य ही था कि शिक्षा की सुविधाएँ बचपन से ही मिलीं और उन सुविधाओं का पूरा-पूरा सदुपयोग जीवन में हुआ। फिर भी एक शाश्वत सत्य मेरे सामने है कि अपने ही कर्मों का फल मनुष्य को इस पृथ्वी पर मिलता है। कहीं अन्यत्र स्वर्ग-नरक नहीं है। जो कुछ है, सब यहीं पर है। ‘जो जस करई, सो तस फल चाखा।’

विद्यार्थी जीवन की वह यादें। दिन-भर पढ़ना, रात-भर पढ़ना। क्यों ? किसलिए ? इन सब प्रश्नों का तो तब कोई अस्तित्व ही नहीं था। विद्या एक तपस्या है, एक साधना है। उस छोटी-सी उम्र में अपने मन को साधित कर, एकाग्र कर। बस पढ़ते जाना। निष्ठा और ईमानदारी से निष्काम-भाव से। कामना थी तो केवल अच्छे परीक्षाफल की। परिक्षाफल के अतिरिक्त कोई और फल या उपलब्धि मिलेगी, ऐसी कोई सोच दिमाग में तब आती नहीं थी। शैशवकाल की सोच।
अध्यापन-काल के अनुभव में अपने विषय की पकड़ और गहरा अनोखा आत्मविश्वास और बहुत अच्छा पढ़ा पाने के बाद की आत्मतुष्टि का उद्गम स्रोत क्या था ? वह कहाँ से आया ? घूम-फिर कर बात वहीं आती है, कर्म के प्रति आस्था। निष्ठा और ईमानदारी से, निष्काम-भाव से किया गया परिश्रम।

इस नियति और प्रकृति के धरातल पर प्रत्येक प्रयास छोटा या ब़डा, अच्छा या बुरा प्रतिक्षण नैसर्गिक रूप में, दैविक प्रक्रिया के रूप में अंकित होता रहता है, दूरगामी परिणाम मानव को इसी जीवन में मिलते रहते हैं; किन्तु इन सबसे अनजान बना बिचारा मानव आज कितनी यातनाएँ सह रहा है ! विडम्बना यह है कि इन तथ्यों को भूला हुआ, वर्तमान की रंगीनियों में विचरण करता हुआ मानव, वर्तमान सुखों के भोग का लोलुप, विद्यार्थी न पढ़ना चाहता है, जो जहाँ है, वह काम नहीं करना चाहता। पुरुषार्थ और श्रम, कर्म और कर्तव्य से दूर रहकर, सब पा लेने की आशा तो केवल मृग-मरीचिका मात्र है, एक छलावा है ।

जो आज दिखाई दे रहा है, वह उसके विगत जीवन की ही तो प्रतिच्छाया है, प्रतिफल है। इसका दशांश भी यदि उसकी समझ में आ जाए तो जीवन स्वर्ग बन जाए। क्या कहीं स्वर्ग जैसी कोई चीज है जिसको किसी ने देखा है ? ‘जहाँ सब कुछ अच्छा है’ उसी को स्वर्ग कहते हैं। स्वर्ग केवल एक प्रतीक मात्र है, अनुभूति मात्र है, जिसका निर्माण केवल मानव के मन में है।
मानव एक ऐसी विलक्षण, एक ऐसी अप्रतिम और असाधारण, एक ऐसी दैदीप्यमान कृति ईश्वर ने बनाई है कि उसको बनाने के बाद से आज तक ईश्वर स्वयं ललचा रहा है कि काश ! कुछ समय के लिए वह भी मानव बन सकता। मानव जो अपने में पूर्ण है। सब कुछ कर पाने में समर्थ।( यथा ब्रह्माण्डे तथा पिण्डे) और ईश्वर तो पत्थर की मूर्तियों में, देवालयों में, देवत्व के ऊर्ध्वतम् शिखर पर अधिष्ठित, अपनी परिधियों में परिबद्ध, अतः अपूर्ण है । अवश परवश, असहाय, निरूपाय। मानव तो ऊँचाइयों के शिखर पर चढ़ते-चढ़ते दैवत्य प्राप्त कर सकता है, किन्तु ईश्वर मानवीय दुर्बलताओं से मण्डित होकर मानव नहीं बन सकता है। एक क्षण के लिए भी नहीं। जिस सुन्दर मानव-योनि को प्राप्त करने के लिए स्वयं देवता भी लालायित हैं उसे व्यर्थ ही खो देना क्या संगत है ?

जीवन को उसके समग्र रूप में, उसकी जटिलता, उसके उलझे हुएपन को ‘जीवन का एक कर्म-क्षेत्र’ कहकर करना, उस उलझन को सुलझाना कदाचित मेरी धृष्टता हो, किन्तु जीवन को अब तक मैंने जैसा जाना, देखा और समझा, उस आधार पर मेरी अनुभूतियाँ पुकार-पुकार कर यही कहती हैं कि ‘जीवन एक कर्म-क्षेत्र है।’


‘‘कर्म-प्रधान विश्व रचि राखा
जो जस करई, सो तस फल चाखा।’’

तुलसी

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