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न जाने कहाँ कहाँ

आशापूर्णा देवी

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2012
पृष्ठ :138
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 405
आईएसबीएन :9788126340842

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ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित लेखिका श्रीमती आशापूर्णा देवी जी का एक और उपन्यास

 

14


पति को धकेलकर कंकना की एडवोकेट सहेली के घर ले आयी चैताली। अपने को चाहे कितनी स्मार्ट समझे, मार्केटिंग के अलावा हर जगह पति के साथ रहने से अपने को सुरक्षित पाती है। साथ ही साथ जब कभी पति को साथ चलने को कहती तभी चैताली एक कार के अभाव का रोना जरूर रो लेती। एक कार रहती तो चैताली किसी की परवाह करती क्या? जिन रास्तों को ठीक से जानती नहीं है वहाँ अकेली टैक्सी पर भी तो नहीं जा सकती है। ज़माना ख़राब नहीं है क्या? कंकना की सहेली घर पर नहीं है सुनकर दिव्य ने चैन की साँस ली।

बाबा... जान बची।

यद्यपि चैताली खिन्न हुई-एक देखनेवाली चीज़ के दर्शन-सुख से वंचित हो गयी।

परन्तु खुद कंकना क्या कम दर्शनीय थी? पहने थी सलवार कुर्ता अँगुलियों के बीच जलती सिगरेट।

चैताली ने मुग्ध दृष्टि से देखा। ज़रा दिव्य भी देख ले लड़कियाँ भी फ्रेंक और फ्री हो सकती हैं ! जब पीना ही है तब पुरुषों के मुँह पर धुआँ छोड़ते हुए ही पियेंगी।

कंकना ने किया भी वही। मुँह में भरा धुआँ बाहर फूंकते हुए बोली, “आ। मैं जानती थी तू आये बगैर नहीं रह सकेगी। अरे मिस्टर, आइए, आइए -क्या ख़बर है?"

दिव्य मुस्कराया, “ख़बर तो आप ही के पास है।"

“हा हा कह तो ठीक ही रहे हैं। ‘कबर' से निकलकर 'खबर' बन गयी हूँ इसमें क्या शक़ है। बैठिए। ओ हाँ, एक बात बता दूँ, अब गेस्ट को एण्टरटेन नहीं कर सकूँगी क्योंकि घर मेरा नहीं है।"

चैताली जल्दी से बोली, “अच्छा, ठीक है। यूँ ही कौन चाय के लिए मर रहा है।

कंकना मन ही मन बोली, 'मरती भी तो भी मिलती नहीं। घर की मालकिन इस मामले में बहत होशियार है। भण्डारगृह की चाभी अपने पर्स में डालकर ले जाती हैं।'

चैताली ने पहल करते हुए कहा, “कंकनादी, हमारे तीन कुल में तुम ही शायद पहली महिला हो जिसने ऐसा साहसपूर्ण कदम उठाया है।"

“शायद क्या, निश्चित कह। हमारे तीन कुल में किसी में प्रगति की छाप देखी है? इसी अपराध के कारण माँ मेरा मुँह नहीं देखती हैं। मौसी अर्थात् तेरी माँ ने भी तेरी छोटी बहन वैशाली को कड़े आदेश दिये हैं-ख़बरदार मुझसे मिलने की कोशिश न करे। यहीं, सामने से तो कॉलेज जाती है। ताज्जुब है, लड़कियों को पढ़ना-लिखना सिखलायेंगे, बाहर जाने देंगे, वैसे न चाहें तो भी मजबूर होकर जाने देंगे परन्त चाहेंगे कि उसके मनोभाव न बदलें"वही आदि काल के विचारों के साथ वह पलकर बड़ी हो जाये।” कंकना ने बुझती सिगरेट में जल्दी-जल्दी दो कश खींचे।

दिव्य बोला, “चैताली, अगर अकेली लौट सको तो जब तक मर्जी बैठो, मुझे जरा काम है।"

"बेकार की बात मत करो। तुम्हें इस वक़्त क्या काम है?" - “वाह ! क्या काम नहीं रह सकता है?

“नहीं ! नहीं रह सकता है। ऐसा कोई काम है ही नहीं जिसे मैं न जानती हूँ।

“अरे भई मैं यहाँ बैठे-बैठे छन्दपतन ही करूँ क्यों? तुम दोनों बैठकर जी भरकर बातें करो। इसी पार्क सर्कस में नीरू का घर है न ! यहाँ तक आया हूँ तो उसके यहाँ भी हो आता हूँ।" अकेले लौटना चैताली को बुरा लगता है। फिर लगता है कंकनादी के सामने उसकी पोजीशन नष्ट हो रही है। क्या उसका पति उसे ज़रा समय नहीं दे सकता

बोली, “अपने नीरू-फीरू की बात छोड़ो। मैं जब तक बैठी रहूँगी तुम भी तब तक रहोगे।"

कंकना ने दूसरी सिगरेट सुलगाते हुए कहा, “गुड बॉय के लिए यह सब तो है नहीं क्या करेंगे? चैताली में तो कोई कैपेसिटी ही नहीं है। इतने दिनों में भी आपको इन्सान न बना सकी। ठीक है। बुद्ध की तरह बैठे रहिए। फिर हमारे बीच ऐसी कोई सीक्रेट टॉक भी नहीं होगी जिसे आप सुन नहीं सकते हैं। चैताली को मैं अपनी सहेली वहिशिखा से सुनी केस हिस्ट्री सुनाऊँगी। बेरी इण्टरेस्टिंग। कैसे धीरे-धीरे मन बदलने लगता है और उसके बाद कैसे..."

अर्थात् अब कंकना बहन को कुछ 'शादी टूटने' की कहानियाँ सुनायेगी।

दिव्य मन-ही-मन बोला, 'तुम लोगों की निगाहों में तो इन सबके नायक 'विलेन' होंगे। मतलब चैताली को काफ़ी विषैला बना दिया जायेगा।'

परन्तु वह करे क्या?

उसके लिए तो इतना भी सम्भव नहीं कि कहे, “चलो, चलो। बहुत देर हो गयी है।"

क्यों? क्यों चैताली की किसी बात का विरोध नहीं कर पाता है दिव्य? दिव्य की हर बात का विरोध चैताली कर सकती है पर वह "दिव्य की समझ में यह बात आती ही नहीं है।

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