कायर - राजेन्द्र शर्मा Kayar - Hindi book by - Rajendra Sharma
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स्त्री-पुरुष संबंध >> कायर

कायर

राजेन्द्र शर्मा

प्रकाशक : आत्माराम एण्ड सन्स प्रकाशित वर्ष : 1996
पृष्ठ :176
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4055
आईएसबीएन :81-7043-304-5

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कायर की मूल समस्या स्त्री-पुरुष सम्बन्ध के परिप्रेक्ष्य में भारतीय नारी की वेदना है।

Krishna Aur Hasta Hua Dharm

प्रस्तुत है पुस्तक के कुछ अंश

‘‘उपन्यासकार स्वर्गीय श्री इलाचन्द्र जोशी ने ‘लज्जा’ लिखकर अप्रकृत और आत्मक्षुद्रतापूर्ण एवं कायर चरित्र की सर्जना की है; श्री राजेन्द्र शर्मा का उपन्यास ‘कायर’ उसी परम्परा की रचना है और पात्रों का व्यवहार कहीं असंतुलित, कहीं अस्वाभाविक और कहीं प्रयोग बनकर रह गया है’’ प्रोफेसर डॉ. प्रेम भटनागर ने अपने शोध-प्रबन्ध में ‘कायर’ के विषय में आगे लिखा है कि इसके सभी पात्र जीवन में आई परिस्थितियों एवं घटनाओं पर चिन्तन एवं मनन करते हुए दर्शाये गये हैं।

अभिव्यक्ति का संयम, पात्रों का शील और काव्यमय भाषा ‘कायर’ की कुछ ऐसी विशेषताएँ हैं, जिन्हें पाठक बहुत समय तक याद रखेगा। कायर की मूल समस्या स्त्री-पुरुष सम्बन्ध के परिप्रेक्ष्य में भारतीय नारी की वेदना है। डॉ. शिवनारायण सक्सेना के शोध-प्रबन्ध ‘हिन्दी उपन्यासों में गाँधी-दर्शन’ में ‘कायर’ को सामाजिक अत्याचारों के विरुद्ध सृजनात्मक विद्रोह की कहानी कहा गया है। मानसिक अन्तर्द्वन्द्व के विश्लेषण में राजेन्द्रजी को विशेष सफलता मिली है। उनकी इस साहित्यिक उपलब्धि का मनोविश्लेषणात्मक उपन्यासों में विशेष स्थान है।

एक


‘‘सुमन चैटर्जी !’’
‘‘ओ ! सुमन की ‘आन्सरबुक’ है।’’ प्रोफेसर शशिनाथ पर जैसे कोई हल्का-सा नशे का असर हो गया। होठों पर एक मृदुल-सी रेखा दौड़ गई। कापी का पहला पृष्ठ उलटा। ‘‘कितना सुन्दर लिखती है सुमन !’’
‘‘रमा !’’ शशिनाथ ने पत्नी को पुकारा, ‘‘जरा यहाँ तो आओ; क्या कर रही हो ?’’
चूल्हे पर रोटी सेंकते हुए रमा कुछ मुस्कराई—‘‘क्या कोई आवश्यक बात आ गई; मेरी तो रोटी जल जायेगी।’’ पर वह दो पल के लिए उठ आई।

शशिनाथ ने मेज़ पर पड़ी एक और कापी उठाई। बोले, ‘‘यह तुम्हारा खत है। रोज प्रैक्टिस भी तो नहीं करतीं। मैं लिख देता हूँ, तो यों ही पड़ी रहती है कॉपी।’’ एक चाव से शशिनाथ ने कहा,—‘‘देखो, यह कैसा सुन्दर लिखती है !’’ तब रमा की दृष्टि अपने लिखे पृष्ठ पर पड़ी। समूचे पृष्ठ को वह एक पल में देख गई। ऊपर-ही-ऊपर उसकी दृष्टि पड़ी। मन-ही-मन उसने दोहराया—‘‘सी-ए-टी—कैट।’ और वह भी टेढ़े-मेढ़े अक्षर उसकी आँखों के सामने ठहर गए। हतप्रभ-सी रमा फिर रसोईघर में आ गई। मुस्कान लेकर गई थी उदासी के बोझ से दबी लौट आई। पत्थर-सी बैठी रोटी सेकती रही। मन में वही ख्याल बना रहा। कलेजे पर एक आग सुलग गई—चूल्हे की आग से प्रचण्ड; असन्तोष की ऊँची ज्वालाओं से युक्त। ‘मुझे अंग्रेजी नहीं आती कौन पढ़ाने वाला था !’ यह उस आग का धुआँ था। रमा सोचती रही, और जब घड़ी ने दस बजाए तो वह ‘नारी’ अपनी उदासी को भूल गई और पति के प्रति उसका निर्मल प्रेम मुखरित हो आया। ‘‘आज तो दस बज गए; क्या यूनिवर्सिटी नहीं जायेंगे आप ? या आज ‘लेट’ जायेंगे ?’’ उसने पूछा। रमा के मुँह से अंग्रेजी का एक शब्द सुनकर शशिनाथ प्रसन्न हुए। ‘‘हाँ, आज पहला ‘पीरियड’ नहीं है मेरा।’’ वह बोले।

शशिनाथ सब ‘आन्सर-बुक्स’ देख चुके थे। लिस्ट का ढाँचा बना रहे थे। वह भी तैयार हुई ‘‘ओः, सुमन ‘फर्स्ट’ है ?’’ शशिनाथ एक सोच में पड़ गए। उन्होंने सुमन की कापी फिर निकाली। एक बार फिर सब देख गए। दोबारा देखा। एक पृष्ठ पर कॉलम नहीं छोड़ा गया था। शशिनाथ को वहाँ प्रश्न की संख्या भी दिखाई न दी। इससे सुमन के पाँच अंक कम हो गए; फर्स्ट से सैकण्ड रह गई। पर शशिनाथ कुछ देर विक्षिप्त से रहे। खाना खाने बैठे तो कोने में खड़ी सुमन उनकी कायरता पर जैसे हँसी। चुलबुली-सी सुमन, गरदन तक घुँघराले केश, पतले लाल होठ, मोती-से-दाँतों में पेंसिल लगाकर हँस रही है।...शशिनाथ भर-पेट न खा सके।

रमा ने सुना—‘‘क्यों जी, सफेद पैण्ट नहीं निकाली ?’’ उसे कुछ खेद हुआ, क्योंकि शशिनाथ ने कहा था कि वह पैण्ट निकालना ‘चैक’ की, जो नई सिलवाई है। वह जल्दी ही हाथ धोकर आई और अलमारी से सफेद पैण्ट निकलकर उन्हें दे दी। पर रमा की कार्य पटुता की आज शशिनाथ ने कोई सराहना न की; यूनिवर्सिटी जाते समय रमा से कुछ हँसे-बोले नहीं। पति की ‘चुप’ से उसका विषाद बढ़ता ही गया। जितना वह सोचती कि ‘आज आखिर हो क्या गया,’ उतना ही विषाद से घिरती जाती। अपने भीतर झाँकती तो कहती, ‘‘मैंने कोई ग़लती की नहीं। पहले से कहते तो सफेद पैण्ट निकाल देती। पर ऐसी परेशानी की बात क्या हुई ? मुझे बुलाया था, तब इतने परेशान न थे। मैं जो अंग्रेजी नहीं जानती हूँ, इसी से उन्हें दुःख है।’’

रोटी तो रमा सेक ही चुकी थी। अपनी और देवर की रोटी उठाकर रख दी। उसने सोचा, ‘‘मेज़ पर पड़ी कापी उठा लाऊँ; जब तक देवर न आएँ तब तक कुछ लिखूँ ही’ मेज़ तक रमा गई, पर वह अधिक दुखी हो गई। पान ऐसा ही छोड़ गए थे शशिनाथ। एक गुलाबी-सी पुस्तक पर पान खुला पड़ा सूख रहा था। रमा क्षण-भर मेज़ के कोने पर हाथ टेके खड़ी रही। पान पर उसकी निगाह जम गई, तब उसे गुलाबी पुस्तक पर लिखे वह ‘बँगला की प्रथम पोथी’ के अक्षर बहुत छोटे-मोटे दिखाई दिए। सहसा उसका हाथ अपनी कापी की ओर बढ़ गया। दूसरे ही क्षण वह दवात कलम और कापी लेकर लौट आई। अनादृत पान सूखता जा रहा था। रमा एक चटाई पर बैठी-बैठी लिखने लगी तो उसमें उल्लास जाग उठा। बहुत सँभाल-सँभालकर उसने एक, दो तीन पृष्ठ लिख डाले।...और पीछे से आकर रवि ने कहा –‘‘भाभी, आज तो बड़ा ही सुन्दर लिखा है आपने ! बड़े भैया खुश होंगे देखकर,’’ तब रमा की तन्मयता की इतिश्री हुई। लज्जा से वह मुस्कराई। रविनाथ को देखकर उसने संतोष का एक श्वास लिया। तभी घण्टे ने सूचना दी कि बारह बजे हैं। चकित-सी रमा घण्टे की ओर देखती-देखती बोली—‘‘आज तो तुम्हें दुकान ने ही बाँध लिया। बड़ी देर कर देते हो तुम रोटी को ! क्या दुकान पर कहते हुए नहीं गए....?’’

‘‘कौन, भैया ?’’ रवि ने कहा, ‘‘नहीं तो, आज डाक देखने को भी नहीं रुके। सीधे ही साइकल पर निकल गए। ऐसा लगता था जैसे किसी बात का अफसोस है उन्हें।’’ कुछ ठहरकर रवि ने फिर पूछा—‘‘कोई बात हो गई थी क्या भाभी ?’’
‘‘बात ?’’ रमा सहम सी गई, ‘‘मुझसे क्या बात होती ?’’
‘‘वह तो मैं भी जानता हूँ, भाभी ! भैया ही जाने किस धुन में रहते हैं ?’’

‘‘मुझे तो बस एक ख़त दिखाया था; वह जो कापी लाए थे उनमें से कहने लगे, यह खत कितना सुन्दर है...’’
तब रवि की दृष्टि चटाई पर पड़ी रमा की कापी पर गई और बात साफ हो गई। ‘भैया को भी अंग्रेजी का न जाने क्या भूत सवार हुआ है, ‘‘बड़बड़ाता हुआ रवि हाथ मुँह धोने लगा। ‘‘कभी कहेंगे, मुझे बँगला फैशन पसन्द है। कभी कहते हैं कि बस, दो पुस्तकें अंग्रेजी की काफी होंगी। पता नहीं क्या सनक है दिमाग में। ज़माना हिन्दी का आ गया और उन्हें अंग्रेजी का भूत सवार है....’’

खाना खाते-खाते रवि ने एकाध बार भाभी का वह फोटो देखा, जिसमें रमा ने बँगला फैशन की वह धोती पहनी थी, पर दाल के स्वाद में उसकी विचार-धारा बदल गई। ‘‘भाभी ! बड़ी स्वादिष्ट दाल बनाई है आज।’’ रवि के पास दाल खत्म हो गई थी। रमा बोली—‘‘यों क्यों नहीं कहते कि दाल और दे दो। टेढ़ी बात कहेंगे हमेशा।’’
‘‘नहीं भाभी, तो क्या मैं झूठ कह रहा हूँ ? भैया क्या तुम्हारे खाने की तारीफ करते ही नहीं ?’’
रमा की आकृति पर एक बार फिर उदासी की छाया दिखाई दी। ‘‘खाने की तारीफ से क्या होता है, रवि ?’’...कहते-कहते वह भर आई।

पर रवि ने साहसी की तरह कहा—‘‘तुम्हारी तारीफ माताजी होतीं तो करतीं। भैया को अभी अक्ल नहीं आई है।’’
रमा हँसी नहीं। लज्जा से वह गरदन नहीं उठा सकीं। एक रेखा हल्की मुस्कान लिए उसके अधरों पर फैल गई। मुँह से निकला--‘‘हुँ !’’
‘‘टन ! टन !’’ दूसरा पीरियड शुरू हो गया। बी.ए. द्वितीय वर्ष की कक्षा के ‘सी’ सेक्शन में अभी कोई प्रोफेसर नहीं आया। प्रोफेसर शशिनाथ का घण्टा है। वह अभी ‘स्टाफ-रूम’ में भी नहीं आये। विद्यार्थी कक्षा के बाहर द्वार पर आँख लगाए खड़े थे। सहसा प्रोफेसर शशिनाथ ने प्रवेश किया। उनकी साइकिल पर कापियाँ बँधी देखकर तमाम कक्षा में सनसनी फैल गई।....

शशिनाथ के पीछे ही लड़कियाँ कक्षा में आईं। उनकी दृष्टि सुमन तक गई और अचानक चौंककर वह बंडल खोलने लगे। कुछ विद्यार्थी क्रमशः सुमन और शशिनाथ को दखने लगे। सुमन ने यह सब समझा और सोच में डूब गई।
‘प्रभा गंगोली फर्स्ट !’’
‘‘सु...मन...चटर्जी...सैकेण्ड...’’ शशिनाथ का गला रुँध-सा गया। उन्होंने जल्दी ही सुमन की कापी उसकी ओर बढ़ा दी।
‘‘राजाराम स्टैण्ड्स...थर्ड।’’ लड़कों में एक आश्चर्य की लहर दौड़ गई-जिसको प्रथम आना था, वह तीसरे नम्बर पर !
‘प्रभा से पाँच नम्बर कम !’ सुमन को यह समझते देर न लगी कि पाँच नम्बर काटे गए हैं....और वह भी जान-बूझकर !
‘‘चैटर्जी की ट्यूशन है, भाई !’’ लड़कों में फुसफुसी शुरू हुई। क्रोध से सुमन का चेहरा तमतमा उठा। प्रोफेसर शशिनाथ को भारी झेंप सवार हुई। लड़कों को जितना खामोश करते, उतना ही वे भड़कते। राजाराम बोला, ‘‘एक प्रश्न के अभी नम्बर नहीं दिये आपने !’’

सचमुच उनसे यह भूल हो गई थी। सारा पासा ही पलट गया ‘राजाराम फर्स्ट’’, शशिनाथ ने कहा, ‘मिस गंगोली सैकेण्ड और सुमन थर्ड।’’
मिस गंगोली इतनी क्षुब्ध न हुई जितना की सुमन को होना पड़ा। राजाराम की खुशी का ठिकाना न रहा। लड़कों ने कक्षा में एक हो हल्ला शुरू कर दिया। सुमन और शशिनाथ पर कटाक्ष-पर-कटाक्ष होने लगे। प्रोफेसर की किसी ने न सुनी। जल्दी से उन्होंने कापियाँ बाँट दीं और जब वह ‘कल अंग्रेजी टैक्स्ट लाइए’, कहकर कक्षा से बाहर जाने लगे तो लड़कों ने काफी गुल-गपाड़ा मचाया। प्रोफेसर शशिनाथ को अपने विभागीय कक्ष तक पहुँचना मुश्किल हो गया। रह-रहकर उनके कानों में ‘ट्यूशन है भाई’ की आवाज़ टकराने लगी।

रिसैस (विश्राम) के समय टिफिन-रूम में अंग्रेजी के सभी प्रोफेसर बैठे थे। पर शशिनाथ उनमें न थे। अध्यक्ष के कमरे में तब उन्होंने टोलीफोन सँभाला था :
‘‘मिस्टर नायारण चैटर्जी !’’
‘‘हाँ, हम ही बोलता है।’’
‘‘मैं शशिनाथ हूँ !’’ वह कुछ झिझके।
‘‘जी, प्रोफेसर साहब बोलिए।’’

बड़ी हिम्मत बांधकर शशिनाथ बोले—‘‘मैं अब सुमन को नहीं पढ़ा सकूँगा।’’
‘‘हैं...? क्या बात हो गया प्रोफेसर ! यह तो हो न सकता। आपने पूरा साल पढ़ाएगा। ऐसा बोला था। आप धोखा दे सकता नहीं, प्रोफेसर !...’’
शशिनाथ यह लम्बा उत्तर सुनकर झुँझला-से उठे। मन में आया कि टेलीफोन बन्द कर दें। पर फिर एक बेग से उन्होंने कहा—‘‘जी नहीं, मैं कुछ नहीं समझता।’’
तब नारायण चैटर्जी कुछ नम्र पड़ गए। शशिनाथ ने सुना—‘‘आखिर बात क्या हो गया प्रोफेसर ?’’
‘‘जी, कुछ नहीं, मैं बदनामी सहन नहीं कर सकता।’’

‘‘ओ:, समझा !’’ नारायण चैटर्जी हँसे, ‘‘आप अभी नया हैं यूनिवर्सिटी में। लड़का लोग ऐसा ही शैतान होता है। आप ठंडा दिमाग का है मिस्टर शशिनाथ !’’
‘‘तो आप कोई दूसरा प्रबन्ध कर सकते हैं ?’’
‘‘मैं तुम्हारा कोई बात मान सकता नहीं। अब तीन ही मास का बात रह गया है। आपको सुमन को पढ़ाना होगा।...’’
‘‘जी नहीं, मुझसे यह सब नहीं हो सकता। मुझे अफसोस है कि मैं अपने वायदे को पूरा न कर सकूँगा मैं मजबूर हूँ।...’’
एक क्षण के बाद नारायण बाबू ने धीमे स्वर में कहा—‘‘प्रोफेसर, सुमन को बोल देना तब।’’

‘‘सुमन को ?’’ आश्चर्य से शशिनाथ बोले, ‘‘पर वह तो शायद चली गई।’’
कोई उत्तर न आया। उधर से टेलीफोन बन्द कर दिया गया था। शशिनाथ बँधे-से रह गए। माथे पर के हल्के-हल्के स्वेद-कण उन्होंने रुमाल बांधकर पोंछ डाले।

टेनिस खेलने का कोई इरादा शशिनाथ ने किया नहीं था। पर जब यूनिवर्सिटी से चले तो सहज ही मैदान की ओर बढ़ गए। उनकी विचित्र ही दशा थी। मैदान में पहुँचते ही उनका माथा ठनका—‘अरे, मैं कहाँ आ गया ?’ पैर उनके भारी हो गए, पर लौटे नहीं। बात-की-बात में खेल जम गया। इतिहास के प्रोफेसर मिस्टर रस्तोगी बोले, ‘‘आज आपका पार्टनर’ नहीं आया, मिस्टर शर्मा ?’’

और उखड़े मन से शशिनाथ ने उत्तर दिया—‘‘न आया तो न सही।’’ खेल भी तब उखड़ता ही गया। शशिनाथ शिथिल पड़ गए। मन में सोचा उन्होंने—‘चलो खेलने न आई तो अच्छा ही हुआ।’ पर इस बात से वह डर रहे थे कि मिस्टर रस्तोगी कुछ और न पूछ बैठें। शशिनाथ का ध्यान उचटा देखकर उन्होंने कुछ देर अच्छा खेलने के लिए उकसाया। और सहसा फिर वह पूछ बैठे—‘‘आपकी यह ‘जरसी’ घर की ही बुनी है न ? मुझे बहुत पसन्द आई। ‘वाईफ’ ने बुनी है ?’’
विवश हो शशिनाथ को कहना ही पड़ा—‘‘हाँ’’ धीरे-से एक लम्बा श्वास उन्होंने छोड़ा—‘बेचारी रमा।’ पर रस्तोगी के लिए यह सुनना असम्भव था। जल्दी ही शशिनाथ पर ‘गेम’ हो गया।

एक सोच से गरदन झुकाए वह ‘फील्ड’ से बाहर निकले। सहसा उन्होंने सुना—‘‘आइए, प्रोफेसर साहब !’’
अपनी बग्घी में से सुमन पुकार रही थी। शशिनाथ ने उस ओर देखा और सन्न-से रह गए। नित्य की भाँति आज सुमन से बोलने का उन्हें साहस भी न हुआ था। सुमन भी उन्हें कुछ नाराज दिखी थी, खेलने भी नहीं आई थी। सुमन ने उन्हें बग्घी में ही साथ चलने के लिए पुकारा तो उन्होंने एक आन्तरिक हल्कापन अनुभव किया। साथ ही वह एक संकोच से घिर आए। उन्होंने बहुत चाहा कि पैदल ही चलूँ, अतः टाला भी। पर सुमन के वाग्जाल से उन्हें मुक्ति न मिल सकी; बग्घी में जा बैठे। तब सुमन का दूसरा आग्रह शुरू हुआ। गिड़गिड़ाहट के स्वर में उसने कहा, ‘‘तीन ही मास की तो बात है जी !’’
‘‘वह तो ठीक है, पर...’’ शशिनाथ ने समझाया, ‘‘मैं फोन पर तुम्हारे पिता को सब बोल चुका हूँ।’’

‘‘जी, उन्होंने ने ही तो मुझे अब भेजा है। आप घर होते चलिएगा, बुलाया है उन्होंने।’’
‘‘ट्यूशन तो अब मैं करूँगा नहीं। तुम कहती हो बुलाया है, तो मैं खाना खाने के बाद, कोई साढ़े आठ पौने नौ बजे तक आ सकूँगा।’’
सुमन ने यह स्वीकार कर लिया और जब प्रोफेसर शशिनाथ के मकान के आगे बग्घी रुकी तो सुमन ने कहा—‘‘प्रोफेसर साहब, यह अपनी जरसी एक दिन के लिए मुझे दे दीजिए। मैं ऐसी बुनाई डालूँगी।’ और गाड़ी से उतरते-उतरते शशिनाथ ने अपनी जरसी उतारकर दे दी।

कमरे में जब शशिनाथ ने प्रवेश किया तो रवि कोई पुस्तक पढ़ रहा था। रमा लिखने में संलग्न थी। दोनों की ही एकाग्रता दूर हुई। एकदम ही रवि ने कहा, ‘‘भैया, जल्दी से तुम खाना खा लो। भाभी आज उदास हैं। हमने सिनेमा की पक्की कर ली है।’’
‘‘मैं काहे को उदास होती,’’ कमरे में एक दबी-सी आवाज़ धीरे-धीरे दब गई। शशिनाथ बोले, ‘‘मैं तो आज चल नहीं सकता.....’’
‘‘क्यों भैया ? जब हम कहते हैं तब तुम्हें कोई न कोई काम ही निकल आता है,’’ रवि ने मुँह बनाया, ‘‘और हाँ भैया, तुम तो आज जरसी पहनकर गए थे ?’’

शशिनाथ ने फिर कहा—‘‘नहीं रवि, मुझे सुमन के पिताजी ने बुलाया है।..जरसी भी सुमन ने ही माँगी है, एक दिन के लिए।’’
रमा मानो किसी उद्वेग से भर आई, ‘‘बुलाया है तो हो आना, चलो खाना खाओ।’’ एक अजीब चिड़चिड़ापन उसमें आ गया था—‘‘यह बग्घी उसी की रुकी होगी अभी नीचे। हरदम सुमन की ही रटना लगी रहती है।’’ और जब शशिनाथ खा चुके तो रसोई में एक तरफ हाथ में अपने परांठे लेकर रमा बैठी और उसने वैसे ही खा लिया। शशिनाथ को यह देखने का अवसर बहुत बार मिला है कि जो सारे कुटुम्ब का प्रेम से भोजन बनाने वाली नारी है। वही इस दुःख में बैठकर भोजन करती है—रसोई में एक तरफ बैठकर, हाथ पर परांठे और शाक सँभालकर। उसे कुरसी-टेबल, आसन-चौकी की आवश्यकता नहीं। पर वह समझते हैं कि यह नारी का स्वभाव है, इसलिए कभी कहा नहीं कि चौकी ले लो। जाने लगे तो बोले—‘‘तुम दोनों चले जाओ रवि !’’ और वह ज़ीना उतर गए।     

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