माधव कहीं नहीं हैं - हरीन्द्र दवे Madhav Kahin Nahin Hai - Hindi book by - Harindra Dave
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माधव कहीं नहीं हैं

हरीन्द्र दवे

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :173
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 406
आईएसबीएन :81-263-1048-0

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श्रीकृष्ण चरित्र की सांगोपांग झाँकी प्रस्तुत करने वाला उपन्यास...

Madhav kahin nahin hai

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

नारद के माध्यम से श्रीकृष्ण के चरित्र का वर्णन करने वाला एक अद्भुत और अनूठा उपन्यास है यह ‘माधव कहीं नहीं हैं’।
कृष्ण-दर्शन के लिए लालायित नारद पता लगाते हुए जब तक अमुक स्थान पर पहुँचते हैं तब तक कृष्ण वहाँ से निकल चुके होते हैं- किसी नयी घटना के योजक, प्रेरक या फिर स्वयं स्रष्टा बनकर। कृष्ण से उनकी अन्त तक भेंट नहीं हो पाती है। लेकिन हर किसी अमिलन में उन्हें ऐसा अनुभव होता है जैसे वह उन्हें पा चुके हैं। परम तत्त्व का कोई पार नहीं है लेकिन जितने अंश में पानेवाला स्वयं परम बन जाता है उतने ही अंश में वह परम तत्त्व का सांगोपांग अनुभव प्राप्त कर लेता है। नारद को कृष्ण का रूप कृष्ण से दूर रहकर क्या-कैसा दिखता गया। और उसे देखते हुए उनके अपने स्वरूप में भी क्या कुछ परिवर्तन होता गया-उपन्यास की कथा इसी रहस्य को खोलती है। इसी बहाने श्रीकृष्ण के जीवन की अनेक घटनाएँ इस कृति में अनायास ही समाविष्ट हो जाती हैं।

गुजराती के अग्रणी कथाकार श्री हरीन्द्र दवे ने जिस कलात्मक ढंग से इस कृति को रूपाकार प्रदान किया है, उससे यह बेहद रोचक और पाठक के मन को गहरे तक प्रभावित करने वाली बन गयी है। निस्संदेह रचनाकार की भाषा की विलक्षण, गहरी और संस्कार शील समझ से ही यह सब सम्भव हो सका है।
कहा जा सकता है कि इस उपन्यास से हिन्दी पाठक-जगत् सन्तुष्ट होगा ही, वह कथाशिल्प के एक नये आयाम से भी परिचित हो सकेगा।

प्रस्तुत है उपन्यास का नया संस्करण।

विरह में मिलन की शोध

भूमिका: संक्षिप्त रूप

मल्लानामशनिर्नृणां नरवर: स्त्रीणां स्मरो मूर्तिमान्,
गोपानां स्वजनोऽसतां क्षितिभुजां शास्ता स्वपित्रो: शिशु:।
मृत्युर्भोजपतेर्विराऽविदुषां तत्त्वं परं योगिनां,
वृष्णीनां परदेवतेति विदितो रंगं गत: साग्रज:।।

जब भगवान श्रीकृष्ण के बलराम के साथ रंगभूमि में प्रवेश किया तब वे पहलवानों को कठोर वज्र, पुरुषों को नवरत्न, स्त्रियों को साक्षात् कामदेव, ग्वालों को स्वजन, दुष्ट राजाओं को दण्ड देने वाले, वृद्धों को बालक, कंस को यम, अज्ञानियों को विराट्, वृष्णियों को इष्टदेव और योगियों को परमतत्त्व जैसे लगे।

भागवत श्रीकृष्ण के अनिर्वचनीय स्वरूप की भक्ति द्वारा सांगोपांग झाँकी प्रस्तुत करने वाला शास्त्र है। इसके उपर्युक्त पद में भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों से अपनी भावसृष्टि द्वारा अलग-अलग लोगों को श्रीकृष्ण कैसे दिखे इसका सरस वर्णन किया गया है। परमतत्त्व का कोई पार नहीं पा सकता। जितने अंश में पानेवाला स्वयं परम बनता है उतने अंश में ही वह परमतत्त्व का सांगोपांग अनुभव प्राप्त कर सकता है। इस हेतु भागवत के मत से विद्या की अपेक्षा भक्ति की अधिक जरूरत है। निर्व्याज भक्ति स्वयं ही एक ऐसा रसायन है कि उसके पास आयी मलीनता भी विमल बन जाती है।

भाई हरीन्द्र की ‘माधव कहीं नहीं हैं’ इस बात की कलात्मक पुष्टि करती नये ढंग की नवलकथा है। इसमें कृष्ण-चरित्र का वर्णन करते हुए महाभारत, भागवत्, हरिवंश आदि सभी ग्रन्थों का आधार लिया गया है। पर इन ग्रन्थों में कही गयी बात कहने में उन्हें रस नहीं है। वे तो बस इतना कहना चाहते हैं कि नारद को श्रीकृष्ण का स्वरूप श्रीकृष्ण से दूर रहकर भी दो सजीव पदार्थ मिलतें, तब मिलन के बाद उनका स्वरूप बदल जाता है। मिलन का अर्थ है आदान-प्रदान। फिर जहाँ भक्त और भगवान का मिलन हुआ हो वहाँ भक्त का स्वरूप उसके हृदय में बसे भगवान का रूप न बदले यह कैसे हो सकता है ? कंस के कारागार में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ है यह सुनते ही नारद का स्वरूप-परिवर्तन आरम्भ हो जाता है।

श्री हरीन्द्र ने जैसा कि वर्णन किया है, श्रीकृष्ण की खोज में निकले नारद के लिए उस मध्यरात्रि में कारागार के द्वार ही नहीं खुल जाते हैं, वरन् निराशा के दुर्ग में बन्द नारद के मनोद्वार भी खुल जाते हैं। सगी बहिन की सन्तानों को राजलिप्सा की खातिर भाई मार डालता है। एक नहीं सात-सात सन्तानों की हत्या करता है, और इसके उपरान्त भी जनसभा में से विरोध की एक आवाज भी न उठे ! ऐसी अधमाधम स्थिति में निराशा के तले बैठे समाज में सबसे पहली आवश्यकता निर्व्याज प्रेम/स्नेह की प्रथम लहर प्रस्फुटित होने की होती है। दुनिया बनी तभी से भाई-बहन का संबंध सबसे निर्दोष, सबसे निर्व्याज माना गया है। यह संबंध राजलिप्सा से इतना ज्यादा दूषित हो गया है कि कंस के हाथ से देवकी की आठवीं सन्तान हवा में उड़ जाती है। कंस को मृत्यु की घबराहट तो होती है, पर देवकी उसकी बहिन है इसकी स्मृति तक उसे नहीं आती। कलियुग का यह मध्याह्न है इस कारण स्नेह-संबंध घोर स्वार्थ संबंध में बदल जाता है। और इसी भाव से ‘माधव कहीं नहीं हैं’ में श्रीकृष्ण का बालचरित्र ऐसे निर्व्याज प्रेम के पारिजात पुष्प जैसा है।

भाई हरीन्द्र की प्रस्तुति के अनुसार, जिसे भक्त कवियों ने अमर बनाया है वह राधा, वैष्णवजनों की राधिका, कंस के किसी नौकर की मुद्रा नामक स्त्री है और उसका पति उसे जुआ में हार गया है। अपनी पत्नी को दाँव पर लगाते हुए उसे लज्जा का तनिक-सा स्पर्श भी नहीं होता। जिस कंस को अपनी छोटी बहिन की सात-सात संतानों को मार डालने में तनिक भी संकोच नहीं हुआ तो उसके नौकर को अपनी पत्नी का जुआ में दाँव पर लगाने में किस बात का संकोच होता ! कलियुग का मध्याह्न जो है। कलियुग का अर्थ है-शरीर-सुख को ही सब मानना और उसे बनाये रखने के लिए अपने भुजबल पर ही पूरा भरोसा करना। आसुरी सम्पत्ति का वर्णन करते हुए, वासुदेव ने जो कुछ कहा उसके मूर्तिमन्त कंस, जरासन्ध आदि हैं। असत्य, हिंसा जैसे आचरण सतयुग में नहीं होते थे ऐसा नहीं है, पर सतयुग में उनकी प्रतिष्ठा नहीं थी और वे सर्वोपरि नहीं माने जाते थे। कलियुग में प्रेम, दया, माया-ममता नहीं होते, ऐसा नहीं है; पर उनका उपहास किया जाता है। सत्य, न्याय आदि शक्तियाँ जब प्रतिष्ठान होने के लिए उठ खड़ी होती हैं तब सतयुग का आरम्भ होता है और वह प्रतिष्ठित होता है। जब सर्वोपरि होता है तब सतयुग का वह मध्याह्न होता है। पर जो कलियुग से घिरे होते हैं उन्हें ऐसा नहीं सूझता। वे तो, यानी ये आसुरी प्रकृतिवाले लोग, कहते हैं कि जगत् आश्रय-रहित है, और सत् के आधार पर नहीं है। यह सृष्टि ईश्वर के कारण नहीं, स्त्री-पुरुष का संयोग इसका कारण है, अत: इस सृष्टि का उद्देश्य दैहिक भोग भोगने के अलावा और क्या हो सकता है ! विषय-सुख भोगने में तत्पर रहना, यही एक मात्र आनन्द है-ऐसा वे मानते हैं। ‘आज मैंने इस पर कब्जा कर लिया है, अब मेरी वासना को तृप्ति मिल सकेगी। वह मेरा शत्रु आज मारा गया, दूसरों को कल मारूँगा। मैं ही बलवान हूँ, मैं ही सुखी हूँ, मैं ही ईश्वर हूँ-ऐसा वे मानते हैं।


असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्।
अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्। (गीता-16:8)


इस भ्रमजाल से मुक्त होने वाले को सबसे पहले शरीर से बाहर निकालना होगा। भाई हरीन्द्र ने नदी में बह गयी मुद्रा की देह को राधा का नया रूप दिया है और वह अद्भुत कवि कल्पना है मुद्रा जब जुआ में उसे बेच देनेवाले पति के घर का त्याग करके मथुरा के बाहर निकल जाती है तक प्रद्योत के यह पूछने पर कि कहाँ जा रही है, वह बहुत ही संकोच रूप से कहती है- ‘दुर्ग से बाहर, देह से बाहर’, और इस देह से बाहर निकलने के लिए वह यमुना की बाढ़ में कूद जाती है। बाढ़ से बच जाती है, तब वह मुद्रा नहीं होती, वह बन गयी है राधा। देह-सुख को सर्वस्व मानने वाले अविचार की बाढ़ में जो देह को त्याग देता है वह कृष्ण को पा जाता है। ऐसा संकेत हमें आरंभ में ही मिल जाता है।

कथा की संरचना इस प्रकार की गयी है कि नारद ‘श्रीकृष्ण का जन्म हुआ है, ऐसी सूचना मिलते उन्हें देख लेने को लालालित हैं, उनके दर्शन को प्रयास करते हैं, पर एकदम अन्त तक वे कृष्ण से मिल नहीं पाते। हर प्रसंग में जहाँ-जहाँ कृष्ण होते हैं, वहाँ-वहाँ वे जाते हैं। इस बार तो कृष्ण मिलेंगे ही ऐसी भरपूर आशा लिये वे जाते हैं, पर जब तक वहाँ पहुँचते हैं पता चलता है कि कृष्ण वहाँ से निकल चुके हैं। फिर वह कंसबध का प्रसंग हो, कालयवन के साथ युद्ध हो, जरासंघ का महाभारत में संधि या युद्ध का प्रसंग हो- हर प्रसंग में यही होता है कि अन्तत: मिलाप नहीं हो पाता, भले ही नारद अपनी वीणा में गोविन्द का नाम जपते हों और श्रीकृष्ण ‘देवर्षियों में मैं नारद हूँ’ कहते हों। ऐसा वर्णन करते समय कहीं-कहीं कृत्रिमता की छोंक भी अनुभव होती है। पाठक को ‘ऐसा होने वाला है’ इतना ही अनुभव नहीं होता, लेखक को भी, ‘ऐसा कुछ घटेगा ही’ ऐसा लगने लगता है। वह अधिकतर स्थलों पर, और उसमें भी आरंभ में तो सहज रस की कल्लोलिनी बह रही है। कृष्ण मथुरा गये, उसके बाद ब्रजवासियों की जो अवस्था हुई, नन्द, जसोदा और उनमें भी राधा-इन सबकी विरह-व्यथा का जो वर्णन किया गया है वह इस कथा का सर्वोत्कृष्ट भाग है।

भाई हरीन्द्र जी का तो संस्कारी भाषा ने सहज वरण किया है, और इन प्रकरणों में तो यह सिद्धि पाठक के मन को बहुत प्रभावित करती है। विरह का इतने थोड़े शब्दों में ऐसा वर्णन कितनों ने किया होगा ! ब्रज में नारद कृष्ण के मथुरागमन के बाद पहुँचते हैं और एक स्त्री से पूछते हैं कि नन्द का घर कहाँ है।

वह उत्तर देती है : ‘‘आपको नन्द जी का घर ढूँढ़ना नहीं पड़ेगा। यहाँ से चलते जाइए और आँसुओं की खारी नमी से गीली बनी यह पगडण्डी जिस आँगन में अटक जाय वही नन्द का घर समझ लेना !’’ कृष्ण को वसुदेव-सुत बन गये देखकर व्याकुल नन्द कहते हैं : देवर्षि ! कृष्ण और बलराम ने मुझे प्रणाम किया। जो दौड़कर मेरी गोदी में बैठने के आदी थे, जिनके पैरों की धूल से अटकर मेरे वस्त्रों का रंग बदल गया, उन लड़कों ने मेरी चरणरज ली ! नारद जी, हमारे वृन्दावन में बाप-बेटे के बीच ऐसा व्यवहार नहीं होता।’’

माता यशोदा के अन्तस्तल में इस विरह-व्यथा का सागर समा गया है, ऐसे अर्थ-भरे कितने भी वाक्य हम यहाँ ढूँढ़ सकते हैं। यशोदाजी कहती हैं- ‘‘नारद मथुरा से आ रहे हैं तो आते ही रानी देवकी के महल में किसी दासी की जरूरत तो नहीं !’’ यशोदा यह भी कहती हैं : ‘‘नारद, एक बार कृष्ण रोते-रोते मेरे पास आया और बोला-‘बलराम कहता है कि मैं जसोदा माँ का बेटा नही हूँ। बंजारों की एक टोली ब्रज में आयी थी तब माँ ने मुझे खरीद लिया था। बेर जितने बड़े-बड़े आँसू उसकी आँख से झर रहे थे। मुझसे कहे कि ‘माँ, बोल न मैं तेरा बेटा हूँ कि नहीं ?’’ और माता के लिए ही शक्य ऐसे अनर्गल विश्वास से वह आगे कहती हैं, ‘‘वह बेचारा लाचार होगा, भाले की नोक से राजा उग्रसेन ने उसे रोक रखा होगा, नहीं तो वह मेरे बिना एक रात भी रह सकता है कहीं ?’’

राधा के हृदयपटल का उद्घाटन तो पाठक के हृदय को भी मथ डाले ऐसा है। नारद को कृष्ण के स्मरणों की बातें बताते हुए वह बोल उठती है : ‘‘हाय रे, उस दिन आपने अपनी कोमल अँगुली पर गोवर्धन किसलिए उठा लिया था ! वह अँगुली हटा ली होती और पर्वत हमारे ऊपर गिरने दिया होता तो आज भाग्य में दु:ख के पहाड़ जैसी असह्य पीड़ा सहना तो न लिखा जाता !’’ और मथुरा से कृष्ण का सन्देश लेकर आये उद्धव से कहती है-‘‘मथुरा के लोग तो भूलकर भी वृन्दावन की ओर नहीं आते, आप क्या लेने आये हैं ?’’ उद्घव जब कहते हैं कि वे वसुदेव और देवकी के पुत्र श्रीकृष्ण का संदेश लेकर आये हैं तब वह जो सुनाती हैं, वह राधा ही सुना सकती है- ‘‘पहचान नहीं पा रही हूँ। हाँ, इस नाम के एक छोकरे को पहचानती थी, पर वह तो नन्द का बेटा था ! हमारे यहाँ के लोग माँ-बाप का नाम नहीं बदल डालते।’’ जो प्रगाढ़ प्रेम कर सकता है वही मार्मिक उलाहना भी दे सकता है। प्रेम की उत्कटता ही प्रेम की सचोटता है।

कृष्ण का जी तो वृन्दावन में है पर लोक-कल्याण के लिए झमेले में फँस गये हैं, उद्धव ऐसा आश्वासन देते हैं तब राधा कहती है, ‘‘उद्धव, आप तो मुझे पहचानते नहीं, कृष्ण तो पहचानते हैं। लीजिए, यह मेरी भेंट उन्हें दे दीजिएगा।’’ राधा ने हरे बाँस की एक बाँसुरी उद्धव के हाथ में दे दी-‘‘यहाँ आधी रात में वे बजाते थे तब डगमग पैरों से झाड़-झंखाड़ पार करते, साँप-बिन्छू या शेर-भेडिये का भय एक तरफ रखकर हम यमुनातट की ओर दौड़ जाती थीं। उससे कहिएगा कि हवा में लम्बी साँस न ले, उसे इस बाँसुरी में भरता रहे। उसके पोर-पोर में घुट कर उसके स्वर मेरे अन्त:करण तक पहुँचेंगे। इस बाँसुरी को सुनकर मथुरा में कोई जागे या न जागे, वृन्दावन से एक बावरी दौड़ी चली आएगी।’’

प्रेम का यह बावलापन, ‘ल्युनाटिक असाइलम’ का पागलपन नहीं हैं, वरन् परमप्रेमरूप, परमज्ञानरूप की झाँकी पा जाने के बाद की विह्वलता है। चैन होता है पर बेचैनी नहीं जाती। इसी से उद्धव जब राधा को ठण्डी-ठण्डी सीखें देता है कि ‘‘देवी, कृष्ण तो सर्वव्यापी हैं। उनका स्थूल संबंध आप मन में सँजोये क्यों बैठी हो, मन को उनके निर्गुण रूप से जोड़िए।’’ तब राधा कहती है : ‘‘उद्धव, आप मथुरावासियों के पास दस-बीस मन होते होंगे, हमारे पास तो एक ही मन था और वह माधव के साथ चला गया।’’ वैष्णव सम्प्रदाय में श्रीकृष्ण की अपेक्षा राधा-भाव को साधना के लिए अधिक महत्त्व दिया गया है, जैसे निरगुनिया सन्तों ने गोविन्द की अपेक्षा गुरु की महत्ता स्वीकारी है। माधव प्रत्यक्ष हों तब तो अधिकतर लोग माधव की भक्ति कर सकते हैं, पर माधव कहीं न हों तब इस भक्ति की दीपशिखा केवल राधा ही ग्रहण कर सकती है और नारद इससे दीक्षा प्राप्त करते हैं ऐसी सूचना देकर भाई हरीन्द्र ने पौराणिक सत्य को कलात्मक रूप प्रदान किया है। आदिग्रन्थ नारद-रचित ‘पंचरात्र’ माना जाता है।

विरह में या मिलन में अनुभव की यात्रा ‘माधव कहीं नहीं हैं’ की पहचान है। राधा से दीक्षित होकर कृष्ण की खोज में निकले नारद को अन्त तक कृष्ण नहीं मिलते, पर कृष्ण के विविध रूपों के दर्शन उन्हें मिलन-विहीन विरह में बराबर होते रहते हैं। जरासन्ध के संग्राम में वीरपुरुष के रूप में, सन्धिवार्ता में लोककल्याण के लिए तृण से भी छोटे होने को तत्पर, एक राजनीतिज्ञ के रूप में, धर्मराज को कर्तव्य का ज्ञान कराने वाले विवेकी पुरुष के रूप में, अनाथ के नाथ के रूप में, द्रौपदी-चीरहरण प्रसंग में और अन्त में मृत परीक्षित को जीवित करनवाले सत्यप्रतिज्ञ अवतारी पुरुष के रूप में।


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