सरहद पार से - महेन्द्र मित्तल Sarhad Par Se - Hindi book by - Mahendra Mittal
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सरहद पार से

महेन्द्र मित्तल

प्रकाशक : स्वास्तिक प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :192
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4069
आईएसबीएन :81-88090-18-2

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कश्मीर पृष्ठभूमि पर लिखा गया उपन्यास....

Rajani

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

महेन्द्र मित्तल के विभिन्न महत्वपूर्ण प्रकाशकों के यहाँ से अब तक आठ उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। ‘सरहद पार से’ इनका नवाँ उपन्यास है।

महेन्द्र मित्तल मूलतः साहित्यकार हैं। इन्होंने हिन्दी साहित्य में एम.ए. पी-एच.डी तक ही शिक्षा ग्रहण की है। हापुण नगर के एक सम्भ्रान्त वैश्य परिवार में 12 जून 1933 को जन्में महेन्द्र मित्तल की साहित्य के प्रति रुचि, किशोरावस्था से ही प्रारम्भ हो चुकी थी। सन् 1959 में पहला उपन्यास ‘भीगी पलकें’ एस. चाँद एण्ड कम्पनी, दिल्ली से प्रकाशित हुआ, जो वर्षों तक केरल, गुजरात और महाराष्ट्र में स्नातक स्तर की कक्षाओं में पढ़ाया जाता रहा।

अन्य विद्याओं में दो नाटक, दो कहानी संग्रह, एक शोध ग्रन्ध (पुरस्कृत), तीस से ऊपर विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों पर पुस्तकें, सौ से ऊपर बालसाहित्य की पुस्तकें, लोक कथाएँ और चित्र कथाएँ आदि प्रकाशित हो चुकी हैं। विविध पत्र, पत्रिकाओं में लेख भी प्रकाशित होते रहे हैं। सम्प्रति ‘उद्योग प्रभात’ (पा.) और ‘अन्धा युग’ (सा.) पत्रों का सम्पादन और प्रकाशन गत पन्द्रह वर्षों से कर रहे हैं। रचनाधर्मिता इनके जीवन का अंग बन चुकी है, जो इन्हें उस उम्र में सजग और सक्रिय बनाये रखती है।

प्रस्तुत उपन्यास ‘सरहद पार से’ महेन्द्र मित्तल की कश्मीर पृष्ठभूमि पर लिखा ऐसा उपन्यास है, जो कितने ही प्रश्न भारतीय जन मानस के सामने खड़ा करता है और उन्हें इन प्रश्नों के समाधान के लिए सचेत करता है।

दो शब्द

यह उपन्यास उन दो देशों की नफरत का परिणाम है, जो कभी एक हुआ करते थे। जिनके सपने एक थे, दुःख, दर्द और सुख एक थे।
पर समय और स्वार्थ के थपेड़ों से सब कुछ बिखर गया। दो भाई एक-दूसरे के दुश्मन बन गए। दो सभ्यताएँ और दो संस्कृतियाँ, दो ध्रुव बन गईं।
इस उपन्यास का नायक अपने दिल में बारूदी नफ़रत भरे सरहद पार से इस मुल्क में आता है। उसके दिलो-दिमाग में पाकिस्तानी हुक्मरानों ने जो ज़हर भरा है, वह उसी को फैलाने इस देश में आता है। किन्तु जब वह यहाँ कुछ समय गुजारता है, तो उसकी आँखें खुल जाती हैं। नफ़रत प्यार में बदलने लगती है। किन्तु अपने मुल्क के प्रति जो ज़ज़्बा और वफ़ादारी उसे विरासत में मिली है, वह उसे इस मुल्क में रुकने नहीं देती।
वह वापस लौटता है। उसे यह पता नहीं है कि वह यहाँ से प्यार का तोहफा ले जा रहा है या नफ़रत के ज़हर बुझे काँटे। किन्तु सरहद के करीब जब वह पहुँचता है तो कैक्टस के काँटों की ही जीत होती है और उसका पूरा जिस्म उन काँटों में उलझ कर रह जाता है।
‘सरहद पार से....’ उपन्यास, कश्मीर की उस पृष्ठभूमि पर आधारित है, जिसे लहूलुहान करने में हमारे अपनों का ही हाथ है, सरहद पार से आए आतंकवादियों का नहीं । कश्मीर में आज उनकी उपस्थिति के लिए हम खुद ज़िम्मेदार हैं, वे नहीं। समय रहते यदि हमने इस समस्या का समाधान किया होता, तो यह स्थिति कभी न आती, जो आज है।
इस उपन्यास के कथानक में जीवन के विविध रंग भरने में मेरे परम मित्र प्रेमचन्द्र आर्य का बहुत सहयोग रहा है। परन्तु उनका आभार मानकर मैं उनका अपमान करना नहीं चाहता।

एक

उस पहाड़ी ढलान पर वे तेजी से नीचे उतरने का प्रयास कर रहे थे। रात का घटाटोप अन्धकार और ठण्ड का भयंकर प्रकोप उन्हें आगे बढ़ने नहीं दे रहा था। सबसे अधिक परेशानी बर्फ में धँसते पैरों से थी। आगे बढ़ने का एक मात्र सहारा वह मद्धिम-सी रोशनी थी, जो उन्हें काफी पहले दिखाई दी थी। परन्तु रास्ते का सही ज्ञान न होने के कारण वे तेजी से उस ओर बढ़ भी नहीं सकते थे। टार्च दोनों की जेबों में थी, पर वे उसे जला नहीं सकते थे, क्योंकि खतरा बहुत था। उन्हें नहीं पता था कि इस वक़्त वे किस इलाके में हैं। सरहद के इस पार या उस पार। बर्फ की चमकीली सफेद चादर से झिलमिलाती, मोहरे में भीगी सफेद-सी हल्की रोशनी ही एकमात्र उन्हें रास्ता दिख रही थी। काफी देर से चलते रहने के कारण वे उस उजलाए से अन्धेरे के अभ्यस्त हो गए थे।
‘‘पता नहीं वह रोशनी कितनी दूर है।’’ परमिन्दर ने फुसफुसा कर रहीम से पूछा।

‘‘दूर कितनी भी हो, चलने के अलावा हमारे सामने चारा भी क्या है ?’’ रहीम ने धीरे से कहा।
‘‘टार्च जला कर देखूँ टाइम कितना हुआ है ?’’ परमिन्दर फिर बोला।
‘‘मरना चाहते हो ?’’ रहीम की आवाज़ में सख्ती थी—‘‘टाइम देखने से क्या फर्क पड़ जाएगा ? चुपचाप चलते रहो। रोशनी अब अधिक दूर नहीं है।’’
दोनों चुपचाप चलते रहे। भारी बूट बर्फ में अभी भी धँस-धँस जाते थे। वे उन्हें बाहर खींचते और आगे बढ़ जाते। करीब आधा घण्टा चलने के बाद वे उस रोशनी के पास पहुँचे। वह लकड़ी के फट्टों को जोड़कर बनाया गया एक चौकोर-सा घर था। रोशनी उन फट्टों की झिरियों में से बाहर आ रही थी।
कुछ देर दोनों चुपचाप उस झोपड़ीनुमा घर के बाहर खड़े रहे। वह ढलान पर टिका हुआ था। ठण्डी हवा के तीव्र झोंकों ने उनकी हालत पतली कर दी थी। वे बुरी तरह थक कर चूर हो गए थे। जेट फाइटर में आग लगते ही वे दोनों पैराशूट से नीचे कूदे थे। गनीमत रही कि वे एक-दूसरे से अधिक दूरी पर नहीं गिरे थे। पैराशूट समेटकर वे दोनों जल्दी ही उस जगह को छोड़कर आगे बढ़ गए थे। तब उन्हें पता नहीं था कि वे किस जगह पर हैं, और इस वक्त तक भी वे नहीं जान पाए थे कि वे कहाँ हैं।

दोनों ने एक बार एक-दूसरे की ओर देखा। तभी कोई भीतर खाँसा। दोनों सतर्क हो गए। उनके हाथ सधे हुए मिलिटरी जवानों की तरह एकदम से अपनी-अपनी पिस्टल पर जम गए।
‘‘दरवाजा खुला है। भीतर आ जाओ।’’ तभी एक भारी-भरकम आवाज़ भीतर से आई।
दोनों आवाज़ सुनकर चौंके। कुछ ठिठके, फिर लकड़ी का दरवाजा खोलकर भीतर प्रवेश कर गए। दोनों ने सतर्क निगाहों से चारों तरफ नज़र घुमाकर देखा। उनके सामने एक मोटी रजाई लपेटे एक बूढ़ा फूस के बने बिछौने पर बैठा था। उसकी दाढ़ी लम्बी और बुर्राक सफेद थी। सिर पर गरम कश्मीरी टोपी थी। चेहरे पर अनगिनत झुर्रियाँ थीं। रजाई के ऊपर गर्दन तक पश्मीने की सदरी झाँक रही थी, जो कई जगह से फट चुकी थी। वह उन्हें ही घूर कर देख रहा था। दीवट पर लटकी लालटेन की रोशनी में उसका चेहरा झुर्रियों के बावजूद भी लाल भभूका हो रहा था। पास ही जमीन पर रम की आधी बोतल और एक गिलास रखा था। एक कोने में स्टोव और कुछ बर्तन पड़े थे। एक पत्ते पर कुछ डिब्बे रखे थे। एक अलगनी पर कुछ मैले कपड़े टंगे थे।

‘‘बाहर बहुत ठण्ड है। दरवाजा बन्द कर दो।’’ बूढ़े ने बिना उठे ही कहा। परमिन्दर ने पलट कर दरवाजा बन्द कर दिया। रहीम बूढ़े की ओर देखता रहा।
‘‘यह कौन-सी जगह है बाबा ?’’ रहीम ने बूढ़े से यकायक पूछा।
‘‘यह इलाका गुलाम कश्मीर का है। पाकिस्तान के कब्जे वाला इलाका।’’
‘‘ओह !’’ रहीम के मुँह से निकला और उसका हाथ अपनी पिस्टल पर जम गया।
बूढ़ा मुस्कराया—‘‘पर तुम्हें घबराने की जरूरत नहीं है। मैं हिन्दुस्तानी हूँ। यह इलाका भी हिन्दुस्तान की मिल्कियत है।’’
परमिन्दर ने चैन की साँस ली। पिस्टल पर उसका हाथ ढीला पड़ गया। बूढ़े ने रजाई खोलकर थोड़ी जगह बनाई और बोला—‘‘मेरे पास एक ही रजाई है। उसी में आ जाओ और हाथ-पैर गरम कर लो। रम पिओगे ?’’
‘‘हम हिन्दुस्तानी हैं। रहीम ने धीरे से कहा।
‘‘मालूम है। तुम्हारी वर्दी बता रही है कि तुम दोनों इंडियन एयर फोर्स में फ्लाइट-लेफ्टीनेन्ट हो।’’
परमिन्दर जूते पहने-पहने बूढ़े की रजाई में घुस गया और रजाई पैरों पर डालते हुए बोला—‘‘आपको मिलिटरी की वर्दी की बहुत पहचान है बुजुर्गवार ?’’

‘‘हाँ ! मैं इण्डियन आर्टिलरी में मेजर रह चुका हूँ।’’ बूढ़ा बोला और रहीम की ओर देखकर उसने कहा—‘‘उधर दो गिलास पड़े हैं। जूठे नहीं हैं। ले आओ। एक-एक पैग रम का मारोगे तो शरीर में गर्मी आ जाएगी।’’
रहीम कोने से गिलास उठा लाया और परमिन्दर की बगल में चिपककर बैठ गया। परमिन्दर ने रजाई का पल्ला उसके घुटनों पर डाल दिया। बूढ़े ने रम की बोतल खोलकर तीनों गिलासों में डाला और अपना गिलास उठाते हुए बोला—‘‘चीयर्स !’’
‘‘चियर्स।’’ रहीम और परमिन्दर ने अपने-अपने गिलास उठाए और एक ही साँस में खाली कर गए।
शरीर को रम के जाते ही खिल उठना था। वही हुआ। दोनों ने अपने शरीर में गर्मी महसूस की। देखते-देखते बाकी रम भी खत्म हो गई। बूढ़े ने पीछे झुककर पुआल के नीचे से एक दूसरी बोतल निकाली। रहीम ने इस बार देखा कि दोनों बोतलों पर पाकिस्तानी मिलिटरी के लेबल लगे थे।
बूढ़े ने तीनों गिलास फिर भर लिए और उन्हें उठाने का इशारा करते हुए पूछा—‘‘इधर कैसे आना हुआ ?’’
‘‘हम रास्ता भटक गए है।’’ रहीम ने जवाब दिया।

‘‘कुछ देर पहले आकाश में एक जेट विमान में आग लग गई थी, तुम दोनों उसी में थे ?’’
‘‘हाँ !’’ इस बार उत्तर परमिन्दर ने दिया—‘‘मैं परमिन्दर सिंह सोढ़ी, और यह अब्दुल रहीम अंसारी, दोनों उसी में थे। पता नहीं कैसे उसमें आग लग गई। हमें पैराशूट से कूदना पड़ा।’’
‘‘उसमें वैसे ही आग नहीं लगी थी, उसे गिराया गया था।’’ बूढ़ा बोला—‘‘और अब वे पाकिस्तानी सोल्जर्स कुत्तों की तरह सूँघते हुए तुम्हें खोज रहे होंगे।’’
‘‘हम जानते हैं।’’ रहीम बोला—‘‘लेकिन इस अन्धेरे में हमारे सामने इसके सिवाय दूसरा रास्ता नहीं था, जिससे हम सरहद पार जा पाते। जिधर मुँह उठा हम उधर ही भाग निकले।’’
‘‘कोई बात नहीं। मैं तुम्हें सही सलामत सरहद के पार पहुँचा दूँगा।’’ बूढ़ा बोला—‘‘यह जगह पिंडरासु है। सरहद यहाँ से ज्यादा दूर नहीं है। तुम अपना गिलास खत्म करो। हम इसी वक्त यहाँ से निकलेंगे। इससे पहले कि वे तुम्हें ढूँढ़ निकालें, इंशा अल्ला खुदा ने चाहा तो तुम बिना किसी परेशानी के अपने इलाके में पहुँच जाओगे।’’
दोनों ने गिलास खाली किया और झटके से उठ खड़े हुए। बूढ़े ने रजाई हटाई और उठा। उसका लम्बा-चौड़ा जिस्म रहीम और परमिन्दर से ड्योढ़ा था। उसके जिस्म में चुस्ती-फुर्ती अपने से ज्यादा महसूस हुई।
‘‘बाबा साहेब ! आपको तो कोई खतरा नहीं है ?’’ परमिन्दर ने धीरे से पूछा।
‘‘कैसा खतरा ?’’
‘‘यही कि आप हम हिन्दुस्तानियों की मदद कर रहे हैं।’’ इस बार रहीम ने कहा।
‘तुम मुसलमान हो ?’ यकायक बूढ़े ने रहीम की ओर देखा।
‘‘जी !...जी हाँ।’’ रहीम सकपका गया।

‘‘मैं भी मुसलमान हूँ। अल्ला उसका ही निगहबाँ होता है, जो जरूरतमन्द लोगों की मदद करता है। अगर तुम मुसलमान न होते, तो भी मैं तुम्हारी मदद करता।’’ बूढ़ा बोला—‘‘फिर चाहे वे मेजर हिलाल को हलाल ही कर देते।’’
‘‘सॉरी सर !’’ मैंने तो ऐसे ही कहा। कहीं आप हमारी वजह से किसी मुसीबत में न फँस जाएँ।’’ परमिन्दर धीरे से बोला।
‘‘तुम मेरी फिक्र मत करो। आओ।’’ बूढ़े ने आगे बढ़कर दरवाजा खोला तो ठिठक गया। एक तेज प्रकाश उसके चेहरे पर पड़ा और कर्कश भरा स्वर वहाँ गूँजा।
‘‘मेजर हिलाल ! पीछे हटो। हमें उन दोनों हिन्दुस्तानी चूहों को गिरफ्तार करने दो।’’
‘‘नहीं !’’ मेजर हिलाल का सख्त स्वर उभरा।
तभी किसी स्टेनगन का बट मेजर हिलाल के चेहरे से टकराया। वह ‘उफ’ करके पीछे हटा।
‘‘खबरदार अपने तमंचे नीचे फेंक दो।’’ फिर वही कर्कश स्वर गूँजा—‘‘हिलने की जरा भी हरकत की तो गोलियों से भून दिए जाओगे।’’
रहीम और परमिन्दर ने अपनी पिस्टलें नीचे गिरा दी। तेज प्रकाश उनके चेहरे पर पड़ रहा था। उन्हें कुछ भी दिखाई नहीं पड़ रहा था।

तभी कितने ही सशस्त्र सैनिकों ने उनकी मुश्कें कस दीं। मेजर हिलाल को भी उनके साथ बाँध लिया गया।
एक फौजी चौकी पर उनकी जम कर धुनाई की गई। उनसे हिन्दुस्तानी फौज की स्थिति के बारे में पूछा जा रहा था। उस दौरान हिलाल उनके साथ नहीं था। उसे कहीं और ले जाया गया था। दोनों में से कोई भी मुँह खोलने को तैयार नहीं था। एक ऑफीसर चीख रहा था—‘‘इन साले हिन्दुस्तानी कुत्तों के चूतड़ों में मिर्चे भर दो, तब मुँह खोलेंगे ये।’’
उसके जाते ही कितने ही फौजी भेड़ियों की भाँति टूट पड़े थे। लांस नायक बरकत अली रहीम का जबड़ा अपने पंजे में दबाए उससे कह रहा था—‘‘तू मुसलमान होकर उन काफिरों के साथ मिलकर अपने ही भाइयों पर गोली चलाता है ?’’
‘‘मैं हिन्दुस्तानी हूँ, काफिर वहाँ कोई नहीं है’’ रहीम ने अपने चेहरे को झटका देकर कहा तो वह और भी ज्यादा बौखला गया।
‘‘मादरचोद ! मैं हिन्दुओं को काफिर बोला।’’ वह दहाड़ा।
‘ऐ....! गाली मत दे, वरना थोबड़ा तोड़ दूँगा तेरा।’’ रहीम गुस्से में भर कर चीखा।
‘‘अबे, क्या मेहमाननवाजी करूँ ?’’ वह चीखा और रहीम पर पिल पड़ा—‘‘मारो सालों को ! हड्डी-पसली तोड़ दो इनकी।’’
सभी फिर पिल पड़े और उन्हें तब तक मारते रहे जब तक कि वे बेहोश नहीं हो गए
काफी देर बाद जब उन्हें होश आया तो वो किसी चलती गाड़ी के बन्द फर्श पर पड़े थे। पर वहाँ वे अकेले नहीं थे। उनके साथ कितने ही मुर्दा जिस्म उस गाड़ी के फर्श पर और भी पड़े थे। वे गिनती में सात थे।
‘‘ये लाशें किनकी हो सकती हैं। पम्मी ?’’ रहीम ने धीरे से पूछा।
परमिन्दर कराहा और, मुश्किल से बोला—‘‘हिन्दुस्तानी सिपाहियों की हैं।’’
‘‘कैसे ?’’
‘‘और...आह...उफ...और कितनी लाशों को यहाँ पर ढोएँगे ये।’’ परमिन्दर ने कराहते हुए धीरे से कहा।

अभी तक वे अपने आपको डिब्बे में सहज नहीं कर पाए थे। डिब्बों में लाशों के साथ उन्हें बन्द करके पाकिस्तानी फौजों के सिपाहियों ने जैसा जघन्य कर्म किया था, उसे सोच-सोचकर वे ही परेशान हो रहे थे। सारा शरीर बुरी तरह से टूट रहा था।
‘‘आह...! पानी....!’’ तभी डिब्बे में कोई कराहा तो दोनों चौंक पड़े। गहरे अन्धकार के बीच उन्होंने आँखे फाड़-फाड़कर देखने का प्रयत्न किया।
‘‘यह कौन कराहा ?’’ रहीम ने पूछा—‘‘क्या तुम हो ?’’
‘‘नहीं लगता है। यहाँ सभी लाशें नहीं हैं।’’ परमिन्दर धीरे से बोला—‘‘इनमें कोई जीवित भी है।’’
‘‘देखो तो कौन है ?’’ रहीम की धीमी आवाज आई।
‘‘कैसे देखें ? हाथ तो बँधे हैं।’’
‘‘कोशिश करो हाथ खोलने की।’’
‘‘आह !...पानी....!’’ फिर कोई उस सन्नाटे में कराहा।

गाड़ी उसी रफ्तार में भागी चली जा रही थी। डिब्बे की टीन का फर्श बेहद ठण्डा हो रहा था। हाथ काम नहीं कर रहे थे। अँगुलियाँ सुन्न पड़ गई थीं। बहुत कोशिश करने के बाद भी वे अपने बन्धन ढीले नहीं कर पाए।
‘‘तुम किधर हो पम्मी ? मेरे पास सरक आओ। अगर हम अपनी पीठ से पीठ मिला सकें तो शायद एक दूसरे का बन्धन खोल सकें।’’
‘‘कोई फायदा नहीं होगा रहीमे !’’ परमिन्दर बोला—‘‘मैं सरक नहीं सकता। मेरे पास दो-दो मुर्दे जिस्म पड़े हैं. मेरा सारा जिस्म सुन्न हो गया है। लगता है कुछ देर बाद मैं भी लाश में तब्दील हो जाऊँगा।’’
‘‘हिम्मत से काम लो।’’ रहीम की आवाज आई—‘‘कोशिश करो।....इन लाशों के ऊपर से रेंगकर मेरी तरफ आ जाओ।’’
‘‘कोशिश करता हूँ।’’ परमिन्दर ने उठना चाहा, पर उसे लगा उसके हाथ-पैर काम नहीं कर रहे हैं। उसने फिर कोशिश की तो इस बार उसका जिस्म कुछ हिला। उसने दो-तीन बार ऐसा किया तो शरीर में थोड़ी सी गर्मी आ गई। इस बार उसने कोशिश की तो वह उस मुर्दे के जिस्म के ऊपर था। तभी वह चौंका और उसके मुँह से घबराहट भरा स्वर उभरा—‘‘नहीं।’’
‘‘क्या हुआ ?’’ दूसरी ओर से रहीम की आवाज आई।
‘‘रहीमे ! यह किसी मुर्दा औरत का जिस्म है।’’ परमिन्दर की काँपती-सी आवाज वहाँ उभरी।
‘‘क्या ?’’ क्या रहीम के चौंकने की आवाज आई।

‘‘हाँ। मैं सच कह रहा हूँ।’’ परमिन्दर की आवाज बड़ी भरी-भरी सी आ रही थी—‘‘इसकी छातियों का दबाव मैं अपने सीने पर महसूस कर रहा हूँ।’’
‘‘क्या उसका दिल धड़क रहा है ?’’
‘‘नहीं ! जिस्म एक दम ठण्डा है। यह मरी हुई है।’’
‘‘फिर अभी तक तू वहाँ क्या कर रहा है ? हटो वहाँ से।’’ रहीम का झुँझलाया हुआ-सा स्वर परमिन्दर के कानों में पड़ा।
तभी गाड़ी ने मोड़ काटा और परमिन्दर उसके जिस्म पर से लुढ़क कर रहीम के पास आ गिरा। भीषण सर्दी में भी उसका शरीर गरम हो उठा था और चेहरे पर पसीना चू उठा था।
‘‘आह !...पानी...! फिर कोई कराहा।
‘‘यह आवाज तो नजदीक से ही आ रही है।’’ रहीम बोला।
‘‘तुम ठीक कहते हो।’’ परमिन्दर बोला—‘‘मैं गाड़ी रुकवाने की कोशिश करता हूँ।’’

कहने के साथ ही परमिन्दर ने अपने दोनों पैरों को डिब्बे की गोल चादर पर मारना शुरू किया। लेकिन कई बार ठोकर मारने के बाद भी कोई फायदा नहीं हुआ। हारकर उसने अपने पैरों को समेट लिया। रहीम ने अपना जिस्म उसके जिस्म के साथ सटा दिया। गाड़ी उसी रफ्तार से चलती रही।
कई घण्टे बीत गए। गाड़ी नहीं रुकी। अँधेरे डिब्बे में इतना अँधेरा था कि पता ही नहीं चल पा रहा था कि दिन है कि रात है। काफी देर से कोई कराह भी नहीं सुनाई दी थी। वे दोनों भी बिना बोले पड़े थे। यकायक गाड़ी एक झटके के साथ रुकी और बाहर लोगों के बातें करने की आवाजें आने लगीं।
‘‘गफूरे क्या खिलाएगा आज ?’’ बाहर कोई बोल रहा था।
‘‘क्या खाएँगे साब ?’’ दूसरा भारी स्वर उन्हें सुनाई दिया। वह स्वर गफूरे का था—‘‘मुर्ग मुसल्लम, चिकन करी, ऑमलेट, रोटी तंदूरी, दाल तड़का, नान शाही, एग करी, जो कहें, अभी हाजिर कर देता हूँ।’’
‘‘एक प्लेट चिकन करी और तंदूरी रोटी जल्दी से लेकर आ।’’ पहला वाला स्वर फिर सुनाई दिया।
खाने का नाम सुनकर दोनों को जोरों की भूख का एहसास हुआ। सुबह से उन्होंने कुछ खाया नहीं था। ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी रास्ते पर चलते हुए पेट की आँतें ऐंठने लगी थीं।
‘‘यह क्या अकेले-अकेले खाएगा ?’’परमिन्दर ने पूछा।
‘‘तो क्या तेरे को खिलाएगा ?’’ रहीम ने जवाब दिया।
‘‘ड्राइवर को खाना दिया ?’’ पहली आवाज फिर सुनाई दी।
‘‘वह उधर खा रहा है। साब !’’ गफूरा बोला—‘‘आपके वास्ते रम या व्हिस्की, कुछ लाऊँ ?’’

‘‘एक हॉफ रम ले आओ। आज सर्दी बहुत है।’’ पहली आवाज फिर आई—‘‘रातभर का सफर है, कल दोपहर से पहले हेडक्वार्टर पहुँचना नहीं होगा।’’
रम और व्हिस्की का नाम सुनकर परमिन्दर बेकाबू हो गया। वह वहीं जोर-जोर से चिल्लाने लगा और पैरों को टीन की चादर में मारने लगा—‘‘अबे पाकिस्तानी ऊँट ! अपना पेट फाड़के थोड़ी-सी रम हमें भी दे। साले ! तेरे बच्चे जरूर तेरा फातिहा पढ़ेंगे।’’
‘‘चुप कर ! यहाँ तेरी कोई फरियाद नहीं सुनेगा।’’ रहीम उसे चुप कराने लगा।
लेकिन परमिन्दर चुप नहीं हुआ। वह जोर-जोर से चीखने लगा—‘‘अबे ! सुन रहा है या बहरा हो गया है ? मर तो नहीं गया हराम की औलाद !’’
खाने का आर्डर देकर बाहर बैठा पाकिस्तानी ऑफिसर परमिन्दर की गालियाँ सुनकर बौखला गया। वह उठ खड़ा हुआ। तभी गफूरे ने चौंककर डिब्बा बन्द गाड़ी की ओर देखा और ऑफिसर से पूछा—‘‘साब ! ये तो...ये तो मुर्दागाड़ी है। इसमें तो लाशें ढोई जाती हैं। फिर ये आवाज....?’’

इसमें हिन्दुस्तानी फौजियों की लाशें हैं गफूरे।’’ ऑफिसर बोला।
‘‘पर ये आवाज कैसी आ रही है साब ?’’ गफूरे की आवाज में घबराहट थी—‘‘क्या मुर्दे भी चीखते-चिल्लाते हैं ?’’
‘‘इण्डियन एयरफोर्स के दो पायलट भी इस मुर्दा गाड़ी में बन्द हैं गफूरे ! दोनों जीवित हैं अभी।’’
‘‘क्या ?’’ गफूरे की चौंकने जैसी आवाज आई—जिन्दे आदमियों को मुर्दों के साथ बन्द कर दिया ?’’
‘‘तो क्या हुआ ?’’ ऑफिसर लापरवाही से बोल रहा था—‘‘हमारे लिए जिन्दा भी मरों के समान हैं। जब तक मैं यह गाड़ी लेकर हेडक्वार्टर तक पहुंचूँगा, तब तक ये दोनों भी मर जाएँगे।’’
‘‘नहीं साब ! मर कैसे जाएँगे ?’’ गफूरा जल्दी से बोला-‘‘क्या आप इन्हें भूखा-प्यासा ही मार डालेंगे ?’’
‘‘इरादा तो यही है। ला, जल्दी कर। खाना लेकर आ।’’
‘‘लाता हूँ साब ! पर ये ज्यात्सी है साब ! भूखा किसी को नहीं मारना चाहिए।’’ गफूरे की आवाज आई। ‘‘अल्ला ताला किसी को भूखा नहीं मारता।’’

‘‘तू अपना काम कर। किसे मारना है और किसे जिन्दा रखना है, यह देखने का काम हमारा है।’’ ऑफिसर बोला।
‘‘कोई भला आदमी लगता है।’’ रहीम बोला।
‘‘हाँ ! पर उसके कहने से यह खूसट क्या हमें खाना देगा ?’’ परमिन्दर बोला।
दोनों खामोशी से बाहर की आवाजें सुनने लगे। भीतर गाड़ी में गहरा सन्नाटा था। तभी एक बार फिर कोई वहाँ कराहा—‘‘आह !....पानी !’’
‘‘ओह !....अभी जिन्दा है।’’ रहीम ने आवाज की ओर ध्यान लगाया—‘‘तूने कराहने की आवाज सुनी ?’’
‘‘पहले भी यह कराहा था।’’ परमिन्दर ने धीरे से कहा—‘‘लेकिन हम कर भी क्या सकते हैं ? हमारे पास तो पानी की एक बूँद तक नहीं है और हाऽथ भी बँधे हुए हैं।’’
‘‘एक बार फिर से कोशिश करो।’’ रहीम ने कहा—‘‘शायद उसका दिल पसीज जाए।’’
‘‘ठीक है मचाते हैं शोर।’’ परमिन्दर ने कहा और फिर दोनों जोर-जोर से बाहर बैठे ऑफिसर को भला-बुरा जो भी जी में आया कहने लगे।

बाहर बैठे ऑफिसर के कानों पर जूँ नहीं रेंगी। वह चुपचाप बैठे खाना ठूँसता रहा। वह सड़क के किनारे एक छोटा-सा ढाबा था। सड़क के एक ओर गहरी खाई थी और दूसरी ओर ऊँचा पहाड़। वहीं पर पहाड़ काटकर थोड़ी-सी जगह बनाई गई थी। एक-दो गाड़ियाँ वहाँ खड़ी हो सकती थीं। रहीम और परमिन्दर का शोर वहाँ तक आ रहा था। गफूरा बेचैन हो उठा। किन्तु वह कुछ कर नहीं सकता था। रात का अँधेरा पहाड़ और घाटी पर पसरा पड़ा था। ढाबे की लालटेन का धीमा प्रकाश ही वहाँ के अँधेरे को दूर करने का प्रयत्न कर रहा था। बर्फ की परतें सड़क पर नहीं के बराबर थीं।
गफूरा रोटी लेकर ऑफिसर के पास आया तो बोला—‘‘साब ! उनकी सुन तो लो। कहीं किसी को टट्टी-पेशाब न आ रहा हो।’’
‘‘आने दो। ज्यादा जोर से लगा होगा तो गाड़ी में ही कर लेंगे। क्या फर्क पड़ता है।’’
‘‘पर साब ! यह तो इन्सानियत और तहज़ीब के बिलकुल खिलाफ है।’’ गफूरा बोला—‘‘आखिर हिन्दुस्तानी सिपाही भी तो इन्सान हैं। हमें उनके साथ ऐसा बर्ताव नहीं करना चाहिए।’’
‘‘ओए, तू अपनी जुबान बन्द कर गफूरे !’’ ऑफिसर बोला—‘‘ज्यादा हिमायत मत ले इन हिन्दुस्तानी कुत्तों की। तू इन्हें जानता नहीं है। मौका पाते ही हमला बोल देते हैं। ये हरामजादे। तेरे को क्या पता, मैं तेरे को बताता हूँ। इस मुर्दागाड़ी में जो पायलट बन्द हैं, इन्होंने पिंडरासु के पहाड़ पर हमारे कई साथियों को मार डाला था।’’
‘‘अब साब ! लड़ाई में मरना-जीना तो लगा ही रहता है।’’ गफूरा बोला—‘‘कभी आपने उनके चार आदमी मार दिए, कभी उन्होंने आपके चार आदमी मार डाले। लेकिन साब ! इसका मतलब ये तो नहीं कि बन्दी फौजियों का खाना-पीना ही बन्द कर दिया जाये। कयामत के दिन ऊपर वाले को क्या जवाब देना पड़ेगा ?’’

‘‘यार गफूरे ! बात तो तू ठीक कह रहा है।’’ ऑफिसर इस बार कुछ ढीला पड़कर बोला—‘‘लेकिन डर है कि दरवाजा खोलते ही वे साले मुझ पर टूट न पड़ें।’’
‘‘क्या उनके पास हथियार है साब ?’’
‘‘नहीं ! हथियार तो उनके पास नहीं हैं और उन्हें रस्सी से कसकर बाँधा हुआ भी है।’’
‘‘फिर आप काहे को डरते हैं साब !’’ गफूरा बोला—‘‘आप रॉयफल ताने सामने खड़े रहना। मैं उनको खाना खिला दूँगा। गड़बड़ करें तो आप उनके साथ मेरे को भी गोली से उड़ा देना साब !’’
‘‘ठीक है। फिर ले आ उनके वास्ते भी खाना। साले क्या याद करेंगे कि कैप्टन नूर मोहम्मद कितना दरियादिल इन्सान है।’’
‘‘आप ठीक कहते हैं साब ! आपके जैसा दिल जिगरा वाला ऑफिसर पूरे गुलाम कश्मीर में दूसरा नहीं है। क्या मैं जानता नहीं ?’’
‘‘अब जा, जल्दी कर।’’ ऑफिसर बोला—‘‘ज्यादा मक्खन पालिस मत लगा मेरे को। मेरे को आगे भी जाना है। रास्ता लम्बा है।’’
‘‘बस अभी लाया हुजूर !’’ गफूरा तेजी से ढाबे की झोपड़ी में घुसा और अल्मूनियम की देंगों में से सब्जी रकाबियों में डालने लगा।

थोड़ी देर बाद जब वह रहीम और परमिन्दर को खाना खाते देख रहा था तो उसे मुर्दा गाड़ी के फर्श पर लाशों का ढेर दिखाई दिया। रहीम ने और परमिन्दर ने भी लालटेन की मद्धिम-सी रोशनी में उन लाशों को देखा। वे जानते थे कि उनमें एक अभी तक जीवित है। लेकिन कैप्टन नूर मुहम्मद से उन्होंने कुछ नहीं कहा। खाना खाते हुए वे बार-बार कभी लाशों को और कभी नूर मोहम्मद की तनी हुई रॉयफल की ओर देख लेते थे।
खाना खाने के बाद रॉयफल के निशाने पर दोनों ने नीचे उतरकर लघुशंका की और फिर से मुर्दागाड़ी में चढ़ गए। गफूरे ने फिर से उनके हाथ-पैरों को बाँध दिया। हाथों को बाँधते हुए उसने जान-बूझकर रस्सी कुछ ढीली छोड़ दी। उनके मांगने पर पानी की एक छोटी-सी केन भी उनके पास छोड़ दी।
कैप्टन नूर मोहम्मद ने अपने सामने उन्हें मुर्दा गाड़ी में चढ़ाकर दरवाजा बन्द किया और ताला डाल दिया।
‘‘अच्छा गफूरे ! चलता हूँ।’’ नूर मोहम्मद बोला—‘‘खाना बढ़िया था।’
‘‘शुक्रिया साब !’’ गफूरे बोला—‘‘आज आपने एक नेक काम किया है साब ! अल्लाह ताला जरुर आपको तरक्की देगा। आपका रुतबा और ओहदा दोनों बढ़ जाएँगे।’’
‘‘ठीक है...ठीक है।’’ नूर मोहम्मद हँसते हुए ड्राइवर के बगल वाली सीट की ओर बढ़ा—‘‘यह नेक काम तेरी ही वजह से ही हुआ है गफूरे ! अच्छा, खुदा हाफिज !’’
‘‘खुदा हाफिज साब !’’ गफूरे ने हाथ हिलाकर ऑफिसर को विदा किया।

गाड़ी स्टार्ट होकर ढलान की ओर चल पड़ी। गफूरा उसे तब तक देखता रहा, जब तक वह मोड़ से घूम कर आँखों से ओझल नहीं हो गई।
गाड़ी के भीतर दोनों ने जल्दी-जल्दी अपने हाथ-पैर खोल डाले। रहीम ने टटोलकर पानी की केन उठा ली और परमिन्दर से बोला—‘‘पम्मी ! जरा देख तो, इनमें से किसकी साँस चल रही है। पानी पिलाने से शायद उसकी जान बच जाये।’’
परमिन्दर ने जल्दी-जल्दी लाशों के सीने पर कान लगाकर धड़कन सुनने की कोशिश की। लेकिन सारे शरीर लाशों में बदल चुके थे, थोड़ी देर पहले कराहता हुआ, जो सैनिक पानी माँग रहा था, वह भी मर चुका था।
परमिन्दर ने लाशों को एकबार फिर से हिलाडुला कर देखा पर कोई नतीजा नहीं निकला। अँधेरे में उनके जिस्मों को टटोलते हुए परमिन्दर की साँसें चढ़ आई थीं।
एक अजीब-सी घबराहट उस पर हावी हो गयी थी। उसका बोल नहीं फूट रहा था।
‘‘क्या हुआ ?’’ काफी देर तक उसे बोलते न देखकर रहीम ने फुसफुसाकर पूछा।
‘‘कोई जीवित नहीं बचा रहीमे।’’ परमिन्दर ने धीरे से कहा—‘‘पानी देने में हमें देर हो गई।’’
रहीम ने एक गहरी सांस छोड़कर पानी की केन फर्श पर रख दी और फिर गाड़ी की दीवार से टिका दिया।

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