बिखरे चेहरे - महेन्द्र मित्तल Bikhare Chehre - Hindi book by - Mahendra Mittal
लोगों की राय

विविध उपन्यास >> बिखरे चेहरे

बिखरे चेहरे

महेन्द्र मित्तल

प्रकाशक : आत्माराम एण्ड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2001
पृष्ठ :364
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4070
आईएसबीएन :81-7043-468-8

Like this Hindi book 7 पाठकों को प्रिय

398 पाठक हैं

प्रस्तुत है श्रेष्ठ उपन्यास

Bikhre Chehre a hindi book by Mahendra Mittal- बिखरे चेहरे - महेन्द्र मित्तल

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

दुःख-दर्द के क्षणों में, जब कोई कहानी जन्म लेती है, तब उसके ‘सत्य’ और ‘संवेदनशील क्षणों’ को मापना बड़ा कठिन होता है। हमारे जीवन में रोज ही न जाने कितने लोग, हमसे मिलते हैं। कुछ घड़ी हमारे साथ रहते हैं और फिर कभी न मिलने के लिए बिछुड़ जाते हैं। उस क्षणिक-सी मुलाकात में, दुःख-सुख के कितने ही अमूल्य क्षण आते हैं, जो अपनी संवेदनशीलता सदैव के लिए छोड़कर किनारा कर जाते हैं।

‘‘क्यों बे बूढ़े ! तेरे को हवालात की हवा खानी है ? यह डण्डा दिखायी देता है तेरो को ?’’
‘‘जब आप कह रहे हैं तो डण्डा मुझे क्यों नहीं दिखाई देगा हुजूर ! पर इस बात पर मैं जरूर बोलूँगा, बाप ! आप लोगों के इस डण्डे की वजह से ही लोग आँखें बन्द कर लेते हैं। वरना यहाँ जितनी दुकाने आस-पास खुली हैं और इस वक्त जितने भी लोग यहाँ सड़क पर थे, सभी ने उस हादसे को देखा था। पर आपने देखा हुजूर ! एक आदमी भी यहाँ गवाही देने नहीं आया।... मेरा क्या है ? मैं तो गरीब आदमी हूँ। बूढ़ा और कमजोर हूँ। आप डण्डा दिखाएँगे तो डण्डा देख लूँगा। हवालात की हवा खिलाएँगे, तो वह भी खा लूँगा।’’

ऐसे ही संवादों और चरित्रों से बनी है यह कहानी ‘बिखरे चेहरे’ की। पता नहीं वह क्या है, जो हमें एक-दूसरे से सहसा जोड़ देती है, जबकि उनसे हमारा कोई रिश्ता नहीं होता।

दो शब्द


आदमी का स्वार्थ–कभी-कभी ऐसी दरिन्दगी को जन्म देने का कारण बन जाता है, जिससे जीवन की सभी संवेदनशील भावनाएँ नष्ट हो जाती हैं। क्या हमें ऐसे स्वार्थ को पालते रहना चाहिए, जिससे जीवन का पवित्र स्वरूप विकृत हो जाए ? निश्चय ही आप ऐसा नहीं चाहेंगे। मैं भी नहीं चाहता। इसीलिए इस उपन्यास की रचना संभव हो सकी। इसमें जीवन- संघर्ष की घटनाओं का घात-प्रतिघात है, जीवन का सत्य है, भाववेग की गहरी संवेदनशील अनुभूति है, त्याग और प्रेम की पवित्रता है।
इस उपन्यास की रूप-रेखा आज से बीस वर्ष पहले बनी थी। तब मेरा बंबई प्रवास का समय था। उस समय जीवन-यापन के लिए मैं बंबई से प्रकाशित ‘माधुरी’ पत्रिका के लिए फिल्म-पत्रकारिता के साथ जुड़ा था। तब फिल्मों के लिए अनेक कथानक मन-मस्तिष्क में घूमा करते थे। मैं उन्हें फिल्म-निर्माताओं को बेचने का इच्छुक था। पर मैं उन्हें कभी बेच नहीं सका।
दरअसल, फिल्म-निर्माताओं को कहानी बेचने की एक अलग ही कला होती है। ऐसे कहानीकार को स्वयं भी एक अच्छा अभिनेता होना चाहिए और संवाद-प्रेषण की जबर्दस्त क्षमता उसमें होनी चाहिए, जो कि मेरे अन्दर नहीं थी। इसलिए यह कथानक भी वर्षों तक फाइलों में दबा रह गया।

अब, मेरा यह उपन्यास ‘बिखरे चेहरे’ आपके सम्मुख है। पता नहीं प्रबुद्ध पाठक इसे किस श्रेणी में रखेंगे, पर इतना मैं बताना चाहूँगा कि इसकी प्रमुख घटनाएँ वास्तविक हैं और इनमें आए अनेक चरित्र मेरे आसपास बिखरे हुए हैं। सिर्फ उनके नाम यहाँ परिवर्तित किए गए हैं। परन्तु अपनी संवेदनशील और पारस्परिक संबंधों में वे आज भी सहज और सजीव हैं। चाहकर भी हम उन्हें अपने से दूर नहीं कर सकते।

कथानक का मूलाधार एक ऐसे व्यक्ति से संबंधित है, जिसे इस समाज में हरामी कहकर पुकारा जाता है क्योंकि वह सामाजिक मर्यादाओं में बँधकर जन्म नहीं लेता। उसका जन्म, प्रेम के नाम पर दो शरीरों की ऐयाशी का परिणाम होता है। इसमें जन्म लेने वाले का क्या दोष है ? यह आज तक कोई समाजसेवी व्यक्ति नहीं बता सका और न ही बड़े-बड़े आदर्शों की स्थापना करने वाले बता सके।

फिर भी ऐसा व्यक्ति समाज का अंग बनता है और उन सभी सुविधाओं-असुविधाओं का उपभोग करता है, जो उसके जीवन में आती हैं। केवल ‘हरामी’ कह देने से उसे समाज वहिष्कृत नहीं किया जा सकता। वह इंसान के रूप में जन्म लेता है और इंसान के रूप में ही अपने अस्तित्व को सिद्ध करता है। रूप कुछ भी हो। किन्तु उसे नाकारा अथवा समाज से वहिष्कृत नहीं माना जा सकता।

मेरी मान्यता है कि किसी भी कथानक को, वर्तमान साहित्य की तथाकथित क्षुद्र सीमाओं में नहीं बाँधा जाना चाहिए। उसे किसी वर्ग विशेष के दायरे में भी कैद नहीं करना चाहिए। कथानक, कथानक होता है। बस, उसे कथानक के रूप में ही देखना चाहिए, परखना चाहिए और आनन्द लेना चाहिए। केवल काल्पनिक कहकर उसके चरित्रों का गला नहीं घोटना चाहिए। ये आपके और हमारे ही विभिन्न रूप और आकार हैं, जो शब्दों में जन्म लेते हैं। उनके माता-पिता की तलाश में आप अपना समय बरबाद मत कीजिए। न जाने संसार की किस राह में, किस मोड़ पर आपकी उनसे भेंट हो जाए।

-महेन्द्र मित्तल

डॉ.घनश्याम अपने ‘क्लीनिक’ में आकर बैठा ही था कि टेलीफोन की घण्टी बज उठी।
‘‘हैलो ! डॉ.घनश्याम दिस साइड।’’
‘‘डॉक्टर साहब ! जल्दी आइए। बीबीजी की तबीयत फिर से बिगड़ गई है। सेठ जी भी घर पर नहीं हैं।’’
डॉ.घनश्याम के कानों में मुरारी काका की घबराई हुई सी आवाज पड़ी तो वह बेचैन हो उठा।
‘‘घबराओ मत मुरारी काका ! मैं आ रहा हूँ।’’
‘‘जरा जल्दी आइए डॉक्टर साहब ! बीबीजी के मुँह से झाग निकल रहा है।’’
‘‘मैं आ रहा हूँ।’’ डॉ.घनश्याम ने टेलीफोन का चोगा क्रेडिल पर पटका और अपने कम्पाउण्डर निरंजन को आवाज दी, ‘‘निरंजन ! मेरा बैग लाओ, जल्दी।’’
निरंजन भट्टाचार्य के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान उभरी और उसने तत्काल डॉक्टर का बैग लाकर टेबल पर रख दिया।
‘‘जब तक मैं न आऊँ, तुम यहीं रहना।’’
डॉ.घनश्याम बैग उठाकर क्लीनिक के दरवाजे की ओर भागा।
डॉ.घनश्याम ने गाड़ी स्टार्ट की और तेजी से निकल गया। उसके जाते ही निरंजन बड़बड़ाया, ‘‘मैं कहाँ जाऊँगा डॉक्टर साहब ! आपको कोई और नहीं, मुझे कहीं ठौर नहीं।’’
वह हँसा और अपने काम में लग गया। मरीज अभी तक कोई नहीं आया था। तब तक सिवाय मक्खियाँ मारने के उसके पास कोई काम नहीं था।
अशोक विहार की एक शानदार कोठी के लॉन में डॉ.घनश्याम ने अपनी कार रोकी और वह शीघ्रता से बाहर निकला। मुख्य द्वार पर ही उसे मुरारी काका मिला।
‘‘अब तबीयत कैसी है ?’’
‘‘तबीयत वैसी ही है।’’ मुरारी ने डॉ. के हाथ से बैग थाम लिया।
दोनों भीतर पहुँचे। अपने बेडरूम में शान्ति देवी उबकाइयाँ ले रही थीं। राधा और मंगलू उन्हें सँभाले हुए थे।
डॉक्टर घनश्याम ने तत्काल एक इंजैक्शन तैयार किया और शान्ति देवी की बाँह में लगा दिया।
कुछ ही देर में उल्टियाँ बन्द हो गईं और उन्हें नींद आ गई। तभी धड़धड़ाते हुए सेठ जुगलकिशोर भीतर आए।
‘‘शान्ति को क्या हुआ, घनश्याम ?’’
‘‘कुछ नहीं हुआ। थोड़ा ब्लड-प्रेशर हाई हो गया था। पर आप जरा बाहर आइए।’’
डॉ.घनश्याम उठकर बेडरूम से बाहर आया और एकाएक सेठ जुगलकिशोर पर फट पड़ा, ‘‘मैंने आपसे मना किया था कि तीसरी ‘प्रैग्नेंसी शान्ति देवी के लिए खतरे की घण्टी है, पर लगता है आप इनकी जान लेकर ही मानेंगे।’’
‘‘मैं शर्मिंदा हूँ, घनश्याम ! मैं तो नहीं चाहता था, पर न जाने यह कैसे हो गया।’’

‘‘भोले बनने की कोशिश मत कीजिए,’’ डॉक्टर ने सेठ को आँखें दिखाई, ‘‘यह सब आपकी कारस्तानी है। आपको सोचना चाहिए था कि इन्हें ब्लड-कैंसर है। मैं आपको बता चुका था, फिर भी आपने...।’’
‘‘अब छोड़ो भी, घनश्याम ! मैं अपनी गलती मानता हूँ। अब तुम्हें जो करना है करो। मैं यह तीसरा बच्चा नहीं चाहता।’’
‘‘वो तो मैं करूँगा ही। लेकिन अगर कुछ उल्टा-सीधा हो जाए तो मुझे दोष मत दीजिएगा।’’
‘‘नहीं दूँगा, घनश्याम ! पर मुझे तुम पर पूरा भरोसा है। शान्ति को कुछ नहीं होगा। तुम सब ठीक कर लोगे।’’
‘‘अब एक ही तरीका है ‘अबॉर्शन’ का, पर उसमें खतरा बहुत है। शान्ति देवी की हालत आप देख ही रहे हैं। अबॉर्शन इनकी जान भी ले सकता है।’’
‘‘नहीं-नहीं, शान्ति को कुछ नहीं होना चाहिए, घनश्याम,’’ सेठ जुगलकिशोर चिन्तित हो उठा।
‘‘आप क्या सोचते हैं, मैं इनकी जान लेना चाहता हूँ ?’’
‘‘नहीं, घनश्याम ! ऐसा तो मैंने नहीं कहा।’’
‘‘फिर क्या मतलब है आपका ? करते आप हैं और भरना हमें पड़ता है। इसीलिए इस खतरे से मैंने पहले ही आपको आगाह कर दिया था। पर आपको तो शायद मेरी चेतावनी मजाक लगी, अब भुगतिए।’’
‘‘नहीं घनश्याम ! ऐसा मत कहो,’’ सेठ जुगलकिशोर की आँखें भर आईं। उसके घनश्याम के दोनों हाथ पकड़ लिए, ‘‘घनश्याम ! मेरा तो सब कुछ लुट जाएगा। शान्ति न रही तो मेरे बच्चों का क्या होगा। नहीं डॉक्टर, नहीं। कुछ भी करो। मेरी शान्ति को बचाओं। मैं उसे मरता हुआ नहीं देख सकता। चाहे कितना भी पैसा खर्च हो जाए। उसे बड़े से बड़े डॉक्टर को दिखाओ। देश में, विदेश में, कहीं भी ले चलो, मैं चलने को तैयार हूँ।’’
‘‘सेठ जी ! पैसा अगर आदमी की जिन्दगी को बचा सकता, तो दुनिया में एक भी पैसे वाला, कभी नहीं मरता।’’
‘‘फिर अब मैं क्या करूँ ?’’
‘‘करना क्या है ? अच्छे से अच्छा इलाज कराके, हम इनको स्वस्थ रख सकते हैं। हम इन्हें यह एहसास ही नहीं होने देंगे कि मौत की दस्तक इनके दरवाजे पर हो चुकी है।’’
‘‘लेकिन यह आने वाला बच्चा ?’’
‘‘ईश्वर के सहारे इसे बढ़ने दीजिए सेठ जी ? ऐसी हालत में अबॉर्शन कराना और भी मुश्किल है। अब टाइम निकल चुका है। मैं आज ही डॉक्टर शिवालकर से बंबई फोन करके बात करता हूँ। वे एक बार इनको चैक कर लें, तो अच्छा रहेगा।’’
‘‘ठीक है, लेकिन फोन करके नहीं। तुम आज ही प्लेन से बंबई चले जाओ और जैसे भी हो, उन्हें लिवा लाओ। तुम आओ मेरे साथ।’’
सेठ जुगलकिशोर डॉक्टर घनश्याम को लेकर अपने बेडरूम में पहुँचे। शान्ति अभी तक आँखें बन्द किए अचेत पड़ी थी। मुरारी पास बैठा था। सेठ ने तिजोरी खोली और सौ-सौ के नोटों की एक गड्डी निकाल डॉक्टर के हाथों में थमा दी।
‘‘यह पैसा रख लो। जरूरत पड़े तो और भी माँग लेना।’’
‘‘सेठ जी ! इससे क्या होगा। फाइव थाउजेंड ‘पर डे’ की तो उनकी ‘विजिट फी’ है। आने-जाने का किराया अलग से। उनके रहने-खाने की व्यवस्था भी आपको ही करनी होगी। अच्छा यही रहेगा कि हम इन्हें बंबई ले चलें। वहाँ हॉस्पिटल में देखने की वे कोई फीस नहीं लेते।’’
‘‘सेठ जुगलकिशोर को तुमने क्या टटपुँजिया सेठ समझा है, घनश्याम ? तुम जानते हो, जुगलकिशोर के एक इशारे पर दिल्ली की इमारतें आकाश को छूती हैं और उसके एक संकेत पर बड़ी से बड़ी ऐस्टेट भी धूल चाटने लगती हैं। मैं अपनी बीवी की जिन्दगी के लिए, बड़े से बड़े डॉक्टर को भी खरीद सकता हूँ।’’
सेठ ने तत्काल सौ-सौ की दो और गड्डिया तिजोरी से बाहर निकालकर डॉक्टर घनश्याम के हाथों में थमा दीं।
‘‘यह पूरा तीस हजार रुपया है। खत्म हो जाए तो और ले लेना। मुझे भरोसा है तुम पर। मैं किसी भी कीमत पर अपनी शान्ति की जिन्दगी बचाना चाहता हूँ। जाओ, शाम तक तुम डॉक्टर शिवालकर को लेकर यहाँ वापस लौट सकते हो।’’
‘‘अच्छी बात है। मैं अभी चला जाता हूँ। निरंजन को मैं यहाँ भेज देता हूँ। मेरे पीछे वह इनकी अच्छी तरह देखभाल कर लेगा।’’
‘‘ठीक है, जैसा तुम उचित समझो करो।’’
सेठ तिजोरी बन्द करके शान्ति की ओर बढ़ा। डॉ. घनश्याम रुपए अपनी जेब में रखकर बाहर निकल गया। उसके चेहरे पर मंद-मंद मुस्कान थी।
निरंजन को सेठ जुगलकिशोर की कोठी पर भेजकर डॉक्टर घनश्याम शालीमार बाग स्थित अपने मकान पर पहुँचा। मकान के बाहर सफेद रंग की एक फिएट कार खड़ी देखकर, उसके माथे में बल पड़ गए। दाँत भींचकर वह बड़बड़ाया।
‘‘यह हरामजादा जैसे मेरे क्लीनिक से बाहर जाने की ही बाट जोहता रहता है। इधर मैं गया, उधर यह यहाँ पहुँचा। आज मौके पर पकड़ा गया है। देखता हूँ साले को।’’
डॉक्टर ने कॉलबैल बजाई तो पल-भर के लिए भीतर सन्नाटा छा गया। उसके दुबारा घण्टी बजाने पर कोई जनाना स्वर दरवाजे के पास सुनाई दिया।
‘‘कौन है ?’’
‘‘आवाज में स्पष्ट घबराहट थी।
‘‘दरवाजा खोलो, मैं हूँ।’’
‘‘मैं कौन ?’’
‘‘नीलाम ! तुम्हारा दिमाग तो खराब नहीं हो गया है ?’’ डॉक्टर फट पड़ा, ‘‘मैं हूँ घनश्याम। दरवाजा खोलो।’’
दरवाजा धीरे से खुला और एक तीस वर्षीय सुन्दर युवती दरवाजे पर दिखाई दी। उसके चेहरे पर घबराहट थी।
‘‘भैय्या ! तुम इतनी जल्दी कैसे लौट आए ?’’
‘‘यह देखने कि हमारी बहन के इश्क का भूत, कहाँ तक सिर चढ़ चुका है।’’
युवती को एक ओर धकेलकर डॉक्टर आगे बढ़ा, ‘‘कहाँ है वह हरामजादा ? मैं आज उसे ऐसा सबक सिखाऊँगा कि फिर कभी वह इधर की रूख नहीं करेगा।’’
डॉक्टर दनदनाता हुआ ड्राइंगरूम में पहुँचा। लेकिन वहाँ सफेद साड़ी में एक विधवा अधेड़ औरत को बैठे देखकर वह ठिठका। घबराई हुई सी नीलम डॉक्टर के पीछे-पीछे लगभग दौड़ती हुई वहाँ पहुँची।
‘‘भैया ! ये नरेन्द्र की मौसी हैं। हमसे मिलने आई हैं।’’
‘‘मुझसे ?...क्या ये बीमार हैं ?’’ डॉक्टर ने उस औरत को देखकर बुरा सा मुँह बनाया।
‘‘हाँ बेटा ! मुझे बीमार ही समझो,’’ विधवा औरत उठकर खड़ी हो गई और डॉक्टर की ओर देखकर मुस्कराई, ‘‘तुम ही मेरा इलाज कर सकते हो।’’
‘‘मैं ही तुम्हारा इलाज कर सकता हूँ ?’’ डॉक्टर ने तीखी नजरों से उसे देखा।
‘‘आप खड़ी क्यों हो गईं ? बैठिए, नरेन्द्र की फिएट में शायद आप ही यहाँ आई हैं ?’’
‘‘हाँ बेटा ! मैं ही आई हूँ। तुमसे एक विनती करने।’’
विनती।....कैसी विनती ?’’
‘‘मेरा बेटा नरेन्द्र, तुम्हारी बहन नीलम से बेहद प्यार करता है। मैं नरेन्द्र के लिए तुम्हारी बहन का हाथ माँगने आई हूँ।’’
‘‘नहीं, यह नहीं हो सकता। नरेन्द्र और हमारी कास्ट एक नहीं है। मैं किसी गैर जाति मैं अपनी बहन की शादी नहीं कर सकता।’’
‘‘नीलम के होंठ फड़फड़ाने लगे। वह मुँह फेरकर वहाँ से चली गई। अधेड़ औरत का चेहरा अपमान से तमतमाने लगा। उसने डॉक्टर की ओर इस तरह से देखा, जैसे जिबह होने वाला जानवर कसाई की ओर देखता है। बड़ी मुश्किल से उसने अपने आप पर काबू पाया।
‘‘देखो बेटा ! मैं एक असहाय औरत हूँ। मैंने उस जमाने में जन्म लिया था, जब इस तरह की बातें पाप समझी जाती थीं। लेकिन तुम पढ़े-लिखे होकर, आज के जमाने में जात-पाँत की बात कर रहे हो, तो मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है। मेरा बेटा इज्जतदार वकील है। उसकी प्रैक्टिस भी अच्छी चल रही है। तुम्हें तो इस प्रस्ताव को खुशी से स्वीकार कर लेना चाहिए था।’’
‘‘देखिए, मैं माफी चाहता हूँ। इस समय में बहुत जल्दी में हूँ। आपसे फिर कभी बात करेंगे।’’
उस औरत को विदा करने के लिए उसने अपने हाथ जोड़ दिए। पर वह अपनी जगह से जरा भी नहीं हिली। कुछ क्षण बाद उसने भीतर की ओर देखा। नीलम वहाँ नहीं थी। वह पलटी।
‘‘कोई बात नहीं। मैं फिर कभी आ जाऊँगी। लेकिन यह ध्यान रखना, ये दोनों बालिग और समझदार हैं। कहीं ऐसा न हो कि ये तुम्हारी मरजी के खिलाफ कदम उठा लें।’’
‘‘आप मुझे धमकी दे रही हैं ? मैं आपकी उम्र का लिहाज कर रहा हूँ। वरना, अभी धक्के देकर आपको घर से बाहर निकाल देता,’’ घनश्याम का चेहरा तमतमा गया।
‘‘भैया !’’ एकाएक क्रोध में बिफरती हुई नीलम भीतर से निकली और अपने भाई के सामने जा खड़ी हुई, ‘‘तुम कौन होते हो इन्हें मेरे घर से निकालने वाले ? यह मेरा घर है। मेरे पैसे से खरीदा गया है। मैंने तुम्हें यहाँ रहने दिया। बड़े लोगों में तुम्हारी उठ-बैठ कराई तो तुम अब मेरे ही मेहमानों की बेइज्जती करने लगे ?’’
डॉक्टर घनश्याम का चेहरा एकबारगी तो बुझ सा गया। फिर चेहरे पर गुस्सा आया। लेकिन उसने तुरन्त अपने को नॉर्मल कर लिया। वह मुस्कराया।
‘‘वाह, मेरी बहना ! तू तो गुस्सा हो गई। मैंने तो इनसे कहाँ कि मैं अभी जल्दी में हूँ। हम इस विषय में फिर किसी वक्त बैठकर इत्मिनान से बात करेंगे। शादी-ब्याह क्या गुड्डे-गुड़ियों का खेल है ? मुझे फौरन इसी वक्त बंबई जाना है। सेठ जुगलकिशोर जी की धर्मपत्नी शान्ति देवी की तबीयत अचानक बहुत ज्यादा खराब हो गई है।’’
‘‘अरे ! लेकिन कल तक तो भली-चंगी थीं।’’
‘‘हाँ, आज सुबह से ही बेहोश हैं। उन्हें ब्लड कैंसर है।’’
‘‘नहीं, यह क्या कह रहे हो तुम ?’’
‘‘मैं ठीक कह रहा हूँ, बहन ! और मैं भी यह जानता हूँ कि जिस सेठ की मेहरबानी से तुम शान्ति देवी कन्या महाविद्यालय की प्रिंसिपल बनी हुई हो, उसकी बीवी का ठीक होना, तुम्हारी शादी से कहीं ज्यादा जरूरी है।’’
‘‘ये ठीक कह रहा है, बेटी। मैं फिर कभी आ जाऊँगी। नरेन्द्र को भी सेठ जुगलकिशोर की धर्मपत्नी की बीमारी की खबर नहीं है। वरना वह मुझे तुम्हारे पास कभी नहीं भेजता।’’
‘‘कोई बात नहीं, मौसी जी ! सुबह क्लीनिक जाने तक मुझे भी कहाँ पता था कि उनकी दशा इतनी सीरियस है। खैर, हम फिर मिलेंगे।’’
डॉक्टर तेजी से भीतर की ओर चला गया। नीलम नरेन्द्र की मौसी को कार तक छोड़कर वापस लौटी। डॉक्टर जल्दी-जल्दी अपनी अटैची लगाने लगा।
‘‘बंबई से कब लौटोगे ?’’
‘‘कुछ पता नहीं। डॉ.शिवालकर की ‘डेट’ पर निर्भर करता है।’’
‘‘आवेश में, न जाने मैं क्या-क्या कह गई भैया ! मुझे माफ़ कर दो।’’
‘‘माफी की क्या बात है, बहन ! तुम्हारे बहुत एहसान हैं मुझ पर। मैं भूल गया था कि यह तुम्हारा घर है। सेठ जुगलकिशोर का फैमिली डॉक्टर बनवाने में तुमने ही मेरी सिफारिश की थी। तुमने ही मेरा क्लीनिक खुलवाया था। तुमने ही मुझे इस लायक बनाया कि...।’’
‘‘अब बस भी करो,’’ नीलम ने उसके मुँह पर हाथ रख दिया और भावावेश में बोली, ‘‘तुम अगर नरेन्द्र को पसंद नहीं करते, तो मैं उससे शादी नहीं करूँगी।’’
‘‘मैं तुम्हें रोकने वाला कौन होता हूँ। शौक से करो। तुम खुदमुख्तार हो, बालिग हो। मैंने सोचा था कि पिता जी के बाद मैं ही इस घर में बड़ा हूँ। पर मेरी यह भूल थी। मुझे अपनी हैसियत नहीं भूलनी चाहिए थी।’’
अटैची उठाकर डॉ.घनश्याम दरवाजे की ओर बढ़ा तो नीलम ने पीछे से उसे रोका।
‘‘सुनो।’’
डॉक्टर दरवाजे के पास जाकर ठिठका और घूमकर नीलम की और प्रश्न-भरी नजरों से देखने लगा। नीलम मुस्कराती हुई पास चली आई।
‘‘गुस्सा थूक दो, भैया ! मैं माफी माँगती हूँ। और सुनो, मैं आज भाभी को लिवा लाने मेहरौली जा रही हूँ। तुम बंबई से लौटकर सीधे घर आना। मैं अब भाभी को वहाँ नहीं रहने दूँगी।’’
‘‘तुम्हारा दिमाग तो नहीं खराब हो गया है। एक बार नहीं, दस बार मैं तुमसे कह चुका हूँ, उस पागल औरत के लिए मेरी जिन्दगी में अब कोई जगह नहीं है। मैं भर गया उससे।’’
‘‘लेकिन भैया ! भाभी पागल नहीं है।’’
‘‘पागल नहीं है तो क्या है ? वे साधु-सन्त उसे क्या औलाद दे सकते हैं ? जबकि वह खुद अच्छी तरह जानती है कि वह बाँझ है।’’
‘‘लेकिन भैया ! स्वामी वेदानन्द के आश्रम में देश-विदेश से आए सैकड़ों शिष्य डेरा डाले हैं। उनमें कुछ तो बात होगी, तभी तो...।’’
‘‘अच्छा, बन्द करो अपना यह लेक्चर। मुझे देर हो रही है। पर यह कान खोलकर सुन लो कि अब मेरा और पार्वती का कोई संबंध नहीं है। मैंने उसे घर से नहीं निकाला, वह खुद ही मुझे छोड़कर गई है। तुम उसे लेने नहीं जाओगी। और अगर वह यहाँ आई तो मैं यहाँ से चला जाऊँगा।’’
दूसरे ही क्षण डॉ.घनश्याम दरवाजा खोलकर बाहर निकल गया।
उसी शाम बंबई के ओबेराय शेरेटन के एक पॉश सुइट में, डॉक्टर घनश्याम के सामने एक रौबदार चेहरे वाला व्यक्ति, शानदार सूट पहने बैठा हुआ था। बीच की मेज पर जॉनी वाकर की बोतल रखी थी। डॉ. घनश्याम ने दो लार्ज पैग बनाए। दोनों ने अपने-अपने ग्लास उठाए।
‘‘चियर्स...।’’
‘‘चियर्स...।’’
डॉ.घनश्याम ने एक घूँट भरा और ग्लास मेज पर टिका दिया। सामने वाला व्यक्ति घूँट भरकर ग्लास हाथ में ही थामे रहा।
‘‘प्रभाकर ! तुम मेरे दोस्त हो। कॉलेज के वक्त से ही हमारे और तुम्हारे रिश्तों में कोई पर्दा नहीं है। इसलिए मैं तुम पर पूरा भरोसा कर सकता हूँ।’’
सामने वाला मुस्कराया। उसने एक ही घूँट में बाकी का गिलास खाली कर दिया और एक झटके से गिलास को मेज पर रखकर डॉ.घनश्याम की ओर देखा।
‘‘घनश्याम ! हम दोनों एक ही पेशे से संबंध रखते हैं और तुम जानते हो कि नंबर दो के धंधे में बेईमानी के लिए कोई जगह नहीं होती।’’
‘‘खूब अच्छी तरह जानता हूँ, प्रभाकर ! और यह भी जानता हूँ कि अगर, इस धंधे में कोई बेईमान होने की कोशिश करता है, तो उसकी सजा क्या होती है।’’
‘‘लगता है दिल्ली में रहकर तुम काफी समझदार हो गए हो। बोलो, कब चलना है ?’’
‘‘कल सुबह !’’ डॉ.घनश्याम ने दुबारा गिलास भर दिए, ‘‘नौ बजे की फलाइट से मैंने टिकट बुक करा ली हैं। एयरपोर्ट पहुँचते ही तुम डॉ.शिवालकर बन जाओगे।’’
‘‘और मेरी फीस...।’’
‘‘मरो मत। जब तुम यहाँ से जाओगे, तुम्हारी जेब में दस हजार रुपए होंगे।’’
‘‘और दिल्ली में ?’’
‘‘इतने ही वहाँ से लौटते समय होंगे।’’
‘‘करेक्ट ! मुझे तुम पर पूरा विश्वास है।’’
प्रभाकर हँसा और उसने तुरन्त अपना गिलास उठा लिया।

प्रथम पृष्ठ

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book