छत पर वह कमरा - रस्किन बॉण्ड Chhat Par Veh Kamra - Hindi book by - Ruskin Bond
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छत पर वह कमरा

रस्किन बॉण्ड

प्रकाशक : आत्माराम एण्ड सन्स प्रकाशित वर्ष : 1999
पृष्ठ :123
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4085
आईएसबीएन :81-7043-382-7

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एक सोलह वर्षीय अनाथ बच्चे पर आधारित उपन्यास...

Chad Per Vah Kamra

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


देहरा के युरोपीय समुदाय से जुड़े सोलह वर्षीय अनाथ लड़के रस्टी को उसके पिता के दूर के भाई ने पाला था। उन्होंने उसे अच्छे स्कूल में पढ़ाया, पर कभी अपनापन नहीं दिया। गलती होने पर छड़ी से मार पड़ती थी, फिर भी रस्टी उनका अहसान मानता था।

एक दिन सड़क पर चलते हुए रस्टी से साइकिल पर सवार एक सिक्ख लड़के सोमी ने हठपूर्वक पहचान बनायी और उसे साथ बैठने का न्यौता दिया। रास्ते में मिलने वाले और लड़कों-रनबीर और किशन से मिलवाया और अलग होते समय फिर से मिलने का वायदा लिया।
हँसमुख सोमी तथा अन्य अपनी उम्र के लड़कों से यह परिचय उसके जीवन में बड़े परिवर्तन लाता है। अपने गार्जियन से भीत रस्टी उनके न होने पर उनकी आज्ञा भुला नये दोस्तों के साथ वर्जित बाजार और चाट की दुकान के चक्कर लगाने लगता है।

होली की रंगीनी उसके लिए बहुत बड़ा तूफान लाती है। उसके रँगे हुए रूप से क्रुद्धचाचा घ्रणापूर्वक पिटाई करते हुए उसे जन्म का रहस्य बताते हैं। गुस्से से भरा रस्टी उन्हें मारकर घर छोड़ देता है। रात-भर भटकने के बाद सुबह सोमी उसे प्यार से अपने घर ले जाता है। जहाँ पहली बार वह निश्चिन्त होकर सोता है।
नौकरी की तलाश में वह किशन के परिवार से जूझता है जहाँ अपने से बड़ी मीना के प्रति आकर्षित होता है, किन्तु मीना की असमय मृत्यु उसे झकझोर देती है। इसके बाद एक-एक करके रनबीर और सोमी भी पड़ने के लिए बाहर चले जाते हैं। रस्टी निश्चय करता है कि वह भी इग्लैण्ड चला जायेगा पर क्या वह जा पाता है ? भावनात्मक रिश्ते क्या खून के रिश्ते से ज्यादा मजबूत हो सकते हैं ? इसी की कहानी है ‘छत पर वह कमरा’।

दो शब्द


1934 में हिमालय प्रदेश के कसौली शहर में जन्मे रस्किन बॉण्ड का बचपन जामनगर, देहरादून और शिमला में बीता। उनका बचपन पीड़ा और असुरक्षा के भरा था, पर उस पीड़ा ने उन्हें निराशावादी नहीं बनाया। लेखन ने उन्हें एक सजग मनुष्य के रूप में जीने का आधार दिया। सत्रह वर्ष की आयु में उनका पहला उपन्यास ‘छत पर वह कमरा’ (The room on the Roof ) प्रकाशित हुआ, जिसे 1957 में जॉन लेवलिन व्रीस स्मारक पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया। इसी कड़ी में लगभग इसी समय दूसरा उपन्यास ‘घाटी में सैलानी’ (Vagrants in the Valley) लिखा। 1993 में ‘पेंग्विन इंडिया’ ने इन दोनों उपन्यासों को एक पुस्तक के रूप में छापा। 1992 में भारत में अंग्रेज़ी लेखन पर इन्हें साहित्य एकेडेमी पुरस्कार मिला। पुरस्कृत पुस्तक का शीर्षक था, ‘देहरा में हमारे पेड़ अब भी उगते हैं’ (Our trees still grows in Dehra) .
रस्किन बॉन्ड की लेखनी ने मखमली घास से सजी घाटियाँ, मोतियों की लड़ियों जैसे झरने, ऊँचे पहाड़, उमड़ती नदियाँ जिस सुदंरता से आँकी हैं, वैसे ही गरदन मटकाती गौरेया, नाक सिकोड़ती गिलहरी को भी साकार किया है और उसी सजीवता तथा भावपूर्णता से मानव मन के द्वन्द्व, प्रेम और नफरत, आक्रोश आदि को चित्रित किया है। ‘छत पर वह कमरा’ का प्रमुख पात्र रस्टी अपने अंग्रेज़ अभिभावक द्वारा निरंतर तिरस्कृत होता है। भारतीय मित्रों की स्नेहशीलता उसे सदा के लिए उनसे जोड़ देती है, और वह इंग्लैंड जाने का विचार त्याग देता है। पाठक को लगता है जैसे वह रस्टी नहीं स्वयं बॉण्ड है जो सदा के लिए भारत का हो गया है।

लेखक के मन में भारत के प्रति विशेष प्रेम है और वह प्रेम उनके लेखन में प्रतिबिम्बित होता है। हाट बाज़ार का चित्रण हो या त्यौहार उत्सव का; प्रकृति का विवरण हो या मनुष्यों का, लेखक उनके साथ एकात्म हो जाता है। तभी लिखता है’, ओ भारत, मेरे भारत, तेरी धूल में फूलों की खिलन है।’
जीवन और लेखन के प्रति उनका दृष्टिकोण उत्साहपूर्ण है। उनके अनुसार, ‘कभी निराश मत होओ, अगर कुछ गलत हो जाये और मन निराश हो, तब भी काम करते जाओ। ज़रूरत पड़े तो निराशा में भी काम करो। अगर ऐसा करोगे तो पता चलेगा कि एक समय आता है जब चीज़ें बेहतर होने लगती हैं।’’

वे लेखन में सरलता के पक्षधर हैं। उन्होंने स्वयं लिखा है कि ‘कुछ व्यक्ति साहित्य को कठिन बनाना चाहते हैं। कुछ लेखक अपने पाठक से मेहनत करवाना, उसके पसीने छुड़वाना चाहते हैं। मैं सदा एक ऐसा गद्य लिखना चाहता हूँ जो सरल और संवादपूर्ण हो’, उनकी रचनाएँ इसका प्रमाण हैं। ‘छत पर वह कमरा’ उसी दिशा में एक उपलब्धि है।
श्री सुधीर पुरी के आग्रह पर इस अनुवाद का दायित्व लिया था। श्री अतुल माहेश्वरी ने अपना भार बखूबी निभाया। मेरा योग कितना सफल रहा इसका निर्णय पाठक ही कर पायेगा। आशा है पाठक को इसमें मूल का-सा आनंद उपलब्घ होगा।

-उमा पाठक

1


हवा पर सवार बसन्त की हल्की फुहार पेड़ों और नीचे सड़क पर गिर रही थी, इससे हवा में मिट्टी की खुशबू, फूलों की सुगन्ध और एक उल्लसित करनेवाली ताज़गी आ गयी; जिसने सड़क पर खड़े लड़के की आँखों में मुस्कान ला दी।
पहाड़ों के चारों तरफ घूमती, उठती गिरती, लम्बी सड़क देहरा की ओर जा रही थी। वह सड़क पहाड़ों से आती, जंगल और घाटी के बीच से निकलती, देहरा होती हुई। बाजार में कहीं खत्म हो जाती थी पर कहाँ ख़त्म होती थी यह कोई नहीं जानता था, क्योंकि बाज़ार बहुत चकरा देने वाली जगह थी, जहाँ सड़कें आसानी से खो जाती थीं।
लड़का देहरा से तीन मील बाहर था। वह देहरा से जितना दूर होता था, उतना ही खुश होता था। अभी वह केवल तीन मील बाहर था, अतः बहुत खुश नहीं था। और एक बुरी बात यह थी कि वह घर की ओर जा रहा था।

वह गोरे रंग का लड़का था, उसकी नीली आँखों में स्लेटी रंग की झलक थी और बाल हल्के भूरे थे, चेहरा खुरदुरा और अलग-सा था और नीचे का होठ लटका हुआ और मोटा था। उसने अपने हाथ जेबों में डाले हुए थे, सिर झुका था, वह हमेशा ऐसे ही चलता था, और इससे उसके थके होने का भ्रम होता था। वह आलसी था पर थका हुआ नहीं।
उसे चेहरे पर गिरती बारिश अच्छी लगती थी, वह खुशबू और ताज़गी पसन्द थी। वह अपने आस-पास न देखता था न ध्यान देता था-उसका दिमाग, हमेशा की तरह, कहीं दूर था-पर वह इस वातावरण को महसूस कर रहा था, और मुस्करा रहा था।

उसका दिमाग इतनी दूर था कि अपने साथ चलती साइकल के पहियों की आवाज़ की ओर उसने कुछ मिनिट बाद ही ध्यान दिया। साइकल सवार उसके पास से निकल नहीं गया बल्कि साथ-साथ चलता रहा, उसे ध्यान से देखता रहा, हर दीखती चीज़ को ध्यान से देख रहा था, उसका नंगा सिर, खुले गले की कमीज़, फलालैन की पैण्ट, सैंडल, कमर पर बँधी चौड़ी चमड़े की बेल्ट, देहरा में युरोपियन लड़का आम बात नहीं थी अतः साइकल सवार सोमी का ध्यान उसकी ओर आकर्षित हुआ।
‘‘हलो’’, सोमी ने साइकल की घण्टी बजाते हुए कहा।
लड़के ने ऊपर देखा और उसे एक युवा, दोस्ताना चेहरा दिखा जिस पर बेतरतीब पगड़ी बँधी थी।
‘‘हैलो’’, सोमी बोला, ‘‘क्या तुम शहर तक मेरे साथ जाना चाहोगे ?’’
‘‘नहीं, मैं ठीक हूँ।’’ लड़के ने कहा, अपने कदम धीमे नहीं किए। ‘‘मैं चलना पसन्द करता हूँ।’’
‘‘मैं भी, पर बारिश हो रही है।’’

और मानो सोमी की बात को पुष्ट करने के लिए बारिश तेज़ हो गई।
‘‘मुझे बारिश में चलना अच्छा लगता है,’’ लड़के ने कहा, ‘‘और मैं शहर में नहीं, शहर से बाहर रहता हूँ।’’
अच्छे लोग शहर में नहीं रहते...
मैं तुम्हारे रास्ते से जा सकता हूँ,’’ सोमी ने फिर कहा, वह अजनबी की मदद करने को दृढ़ संकल्प था।
लड़के ने फिर सोमी को देखा, वह उसी की तरह कपड़े पहने था, फर्क सिर्फ इतना था कि वह निकर और पगड़ी पहने थे। सोमी की टाँगें लम्बी और खिलाड़ियों जैसी थीं, उसका रंग अस्वाभाविक रूप से साफ, सोने जैसा था, नाक-नक्शा अच्छा था, और चेहरे पर दोस्ताना भाव था। उसके स्वभाव की गरमाई की उपेक्षा करना कठिन था।
लड़का सोमी के सामने साइकल के डंडे पर बैठ गया, और वे चल दिए।
वे नीची पहाड़ियों से फिसलते हुए से धीरे धीरे जा रहे थे, और जल्दी ही सड़क की दोनों ओर के जंगलों का स्थान खुले मैदानों और चाय के बगीचों ने, फिर फल के बगीचों और एक दो घरों ने ले लिया।

‘‘तुम्हारा घर आए तो बता देना’’, सोमी ने कहा, ‘‘तुम अपने माता-पिता के साथ रहते हो ?’’
लड़के को लगा कि ऐसा प्रश्न परिचित का पूछना ठीक है, पर अजनबी का नहीं और उसने कोई जवाब नहीं दिया।
‘‘तुम्हें देहरा पसन्द है ?’’ सोमी ने पूछा।
‘‘बहुत नहीं।’’ लड़के ने खुशी से कहा।
‘‘इंग्लैंड के बाद यह नीरस लगता होगा।’’
कुछ देर चुप्पी रही फिर लड़का बोला : ‘‘मैं इंग्लैंड कभी नहीं गया। मैं यहीं पैदा हुआ था। मैं दिल्ली के अलावा कहीं नहीं गया।’’
‘‘तुम्हें दिल्ली पसन्द है ?’’
‘‘ख़ास नहीं।’’

वे चुपचाप चलते रहे। बारिश अब भी हो रही थी, पर गीली सड़क पर साइकल आसानी से जा रही थी, हल्की खस्स-खस्स की आवाज़ आ रही थी।
तभी एक आदमी नज़र आया-नहीं, वह आदमी नहीं, लड़का था, पर उसका रूप और बनावट आदमी की-सी थी—वह शहर की ओर जा रहा था।
‘‘ऐ, रनबीर !’’ जैसे ही वे उस हट्टे-कट्टे आदमी के पास पहुँचे, सोमी चिल्लाया, ‘‘सवारी चाहिए ?’’
रनबीर दौड़कर सड़क पर आया और सोमी के पीछे साइकल के कैरियर पर बैठ गया। साइकल थोड़ी लड़खड़ाई पर जल्दी ही काबू में आकर ज़रा तेज़ी से बढ़ने लगी।
सोमी ने लड़के के कान में कहा, ‘‘मेरे दोस्त रनबीर से मिलो, यह बाज़ार में सबसे अच्छा पहलवान है।’’
‘‘हलो, मिस्टर !’’ लड़के के मुँह खोलने से पहले ही रनबीर ने कहा।
‘‘हलो, मिस्टर !’’ लड़का बोला।

रनबीर और सोमी ने तेज़ी से पंजाबी में बातचीत शुरू कर दी, और लड़के को अकेलापन-सा लगा, अजीब बात यह थी कि नवागतुंक से जलन भी होने लगी।
फिर देखा कोई बीच सड़क पर खड़ा पागलों की तरह बाँहें फैलाता हुआ, कुछ बोल रहा था, जो समझ में नहीं आ रहा था।
‘‘वह सूरी है।’’ सोमी ने कहा।
वह सूरी था।
चश्मा लगाए हुए, देखने में उल्लू जैसा। सूरी के चेहरे पर एक अपराधी की-सी धूर्त्तता थी, उसे जाननेवाले उससे नफरत और इज्ज़त दोनों करते थे। उसका शहर से बाहर मिलना अचरज की बात थी, क्योंकि उसकी रुचि लोगों और उनकी निजी बातों तक सीमित थी। वे बातें सूरी एक बार जान ले, तो जल्दी ही सबको बता देता था।
वह पीले से रंग का, सूखा, बीमार-सा लड़का था, पर वह शायद रनबीर से अधिक लम्बी उम्र जिएगा।
‘‘ऐ, हमें लिफ्ट दो !’’ वह चीखा।

‘‘पहले ही बहुत हैं।’’ सोमी बोला।
‘‘सोमी, मैं डूब रहा हूँ।’’
‘‘बारिश बंद हो गई है।’’
‘‘ऐ, मान जाओ।’’
और सूरी आगे वाले डंडे पर बैठ गया, इससे सोमी को सड़क देखने में कठिनाई होने के कारण साइकल डगमगाने लगी। रनबीर कैरियर से फिसलता चढ़ता रहा, और लड़के को आगे बैठने में मुश्किल होने लगी।
साइकल काबू में आयी ही थी कि सूरी शिकायती सुर में बोला, ‘‘यह डंडा चुभ रहा है।’’
‘‘मेरे पास गद्दी नहीं है।’’ सोमी ने कहा।
‘‘यह साइकल है’’ रनबीर ने कड़वाहट से कहा, ‘‘रोल्स रॉयस नहीं है।’’
सहसा सड़क सीधी ढलान में आ गई, और साइकल ने तेज़ी पकड़ ली।
‘‘अब धीमे कर लो।’’ सूरी बोला, ‘‘नहीं तो मैं गिर जाऊँगा।’’

‘‘कस कर पकड़ लो।’’ सोमी ने सावधान किया। ‘‘अब सारा रास्ता ढलान ही है। हमें तेज़ ही जाना पड़ेगा क्योंकि ब्रेक बहुत अच्छे नहीं हैं।’’
‘‘ओ मम्मी !’’ सूरी चीखा।
‘‘चुप हो जाओ।’’ रनबीर ने कहा।
अचानक हवा ने तेज़ी से हमला बोला, और उनके कपड़े गुब्बारों की तरह फूल गए, हवा उन्हें साइकल से प्रायः धकेलने लगी। लड़का अपनी तकलीफ भूल गया और डंडे को कसकर पकड़ लिया। वह इतना घबराया हुआ था कि एक शब्द भी नहीं बोला।
सूरी ज़ोर से रोने लगा, और रनबीर उससे चुप होने को कहता रहा, पर सोमी को मज़ा आ रहा था। वह खुशी से हँस रहा था, एक साफ खनकती हँसी, ऐसी हँसी जिसमें न नफरत थी, न मज़ाक, केवल खुशी थी, मज़ा...’’
‘‘तुम्हारा हँसना ठीक है।’’ सूरी बोला, ‘‘अगर कुछ हुआ तो चोट तो मुझे ही लगेगी।’’
‘‘अगर कुछ हुआ तो’’ सोमी बोला, ‘‘चोट हम सबको लगेगी।’’
‘‘ठीक कहा।’’ पीछे से रनबीर चीखा।

लड़के ने अपनी आँखें बंद कर लीं, और भगवान तथा सोमी पर भरोसा किए रहा- पर ज्यादा सोमी पर...
‘‘ओ मम्मी !’’
‘‘चुप।’’
लड़का बोला, ‘‘अब मैं उतरता हूँ, मैं पास में ही रहता हूँ।’’
सोमी ने साइकल रोक ली, और सूरी दलदली पटरी पर गिर गया। लड़का उतर गया, पर सोमी और रनबीर अपनी सीटों पर बैठ रहे। रनबीर ने जमीन पर पैर टिकाकर साइकल को रोके रखा।
‘‘अच्छा धन्यवाद।’’ लड़का बोला।
सोनी ने कहा, ‘‘तुम हमारे साथ चलकर खाना क्यों नहीं खाते, अब ज्यादा दूर नहीं जाना है।’’
लड़के की झिझक बनी हुई थी।
‘‘मुझे घर जाना है।’’ उसने कहा, ‘‘मेरा इन्तज़ार हो रहा होगा। बहुत धन्यवाद !’’

‘‘अच्छा कभी आकर हमसे मिलना।’’ सोमी बोला, ‘अगर बाज़ार में चाट की दुकान पर जाओगे तो हममें से कोई ज़रूर मिल जाएगा। तुम्हें बाज़ार पता है ?’’
‘‘हाँ, वहाँ से गुज़रा हूँ-कार में।’’
‘‘ओह !’’
लड़के ने चलना शुरू किया। उसके हाथ फिर जेब में थे।
‘‘ऐ !’’ सोमी चिल्लाया। ‘‘तुमने अपना नाम नहीं बताया।’’
लड़का मुड़ा, झिझका और फिर बोला, ‘‘रस्टी....’’
‘‘जल्दी ही फिर मिलेंगे, रस्टी।’’ सोमी ने कहा और साइकल बढ़ा दी।
लड़का सड़क पर जाती साइकल को देखता रहा और सूरी की तीखी आवाज़ हवा के सहारे उस तक आती रही। बारिश रुक गई थी, पर लड़के को इसका पता नहीं था; वह प्रायः घर पहुँच गया था और यह विचार उसे परेशान कर रहा था। वह सोमी के साथ देहरा जाना चाहता था और इस बात पर इसे अचरज और खीझ आ रही थी।
वह पटरी पर खड़ा हुआ खाली सड़क को घूरता रहा; और उसे आश्चर्य के साथ चिढ़ भी आई कि वह अचानक बेहद अकेलापन महसूस कर रहा था।

2


जब एक बड़ी सफेद तितली धर्म-प्रचारक की पत्नी की विशाल छाती पर बैठी तो वह प्रसन्न हो गई और उसने उसे वहीं बैठे रहने दिया। उसके बगीचे के फूल खिलने शुरू हो गए थे, जिससे उसे बहुत खुशी हो रही थी-उसका पति उसे कोई खुशी नहीं देता था-और वह सहानुभूति पूर्वक सावधानी से सूँडियों के बीच चलने लगी।
मि. जॉन हैरीसन, लड़के का अभिभावक, उस अच्छी महिला की खुशमिजाजी का निरादर करता था पर फिर भी उसे दयालु मुस्कान देता था।

‘‘मैं आशा करता हूँ कि जब मैं यहाँ नहीं होऊँगा तुम लड़के को काम में व्यस्त रखोगी।’’ वह बोला, ‘‘उससे कुछ काम लेना। वह बहुत सपने देखता है। दुर्भाग्य है कि उसने स्कूल की पढ़ाई पूरी कर ली है, अब मैं नहीं जानता कि उसका क्या करूँ।’’
‘‘वह स्वयं भी नहीं जानता कि वह क्या करे।’’ मिशनरी की पत्नी बोली, ‘पर मैं उसे व्यस्त रखूँगी। वह खर-पतवार निकाल सकता है या दोपहर को मुझे कुछ पढ़कर सुना सकता है। मैं उस पर नज़र रखूँगी।’’
‘‘अच्छा होगा।’’ अभिभावक बोला। और अपने अन्तर्मन को साफ कर जल्दी से चला गया।
खाने के समय वह लड़के से बोला, ‘‘मैं कल दिल्ली जा रहा हूँ। काम से।’’

खाने के बीच उसने केवल इतना कहा। जब वह ख़ाना ख़त्म कर चुका तो उसने सिगरेट सुलगा ली और अपने तथा लड़के के बीच धुएँ का एक पर्दा खड़ा कर लिया। वह बहुत सिगरेट पीता था, उसकी उँगलियों पर गहरे पीले निशान थे।
‘‘आप कितने दिन के लिए जा रहे हैं, सर ?’’ रस्टी ने लापरवाही दिखाते हुए कहा।
मि. हैरीसन ने कोई उत्तर नहीं दिया। वह लड़के के प्रश्नों का बहुत कम उत्तर देता था। और अपने आप पूछता नहीं बताता था, वह छानबीन करता था, तीखेपन और तेजी से सुझाव देता था पर कभी बेकार बातचीत को बढ़ावा नहीं देता था वह अपने बारे में कभी नहीं बताता था, वह कभी बहस नहीं करता था और बहस सहन भी नहीं करता था।
वह लम्बा आदमी था, देखने में साफ-सुथरा और शायद चालीस से ऊपर उम्र का था पर छोटा लगता था, क्योंकि अपने बाल छोटे रखता था और कानों के ऊपर से हजामत बनाता था। उसकी पीले रंग की टुथब्रश जैसी मूँछें लाली लिए हुए थीं।
रस्टी अपने अभिभावक से डरता था।

मि. हैरीसन ने, जो लड़के के पिता का रिश्ते का भाई था, उसके लिए बहुत कुछ किया था और इसीलिए लड़का उससे डरता था। उसके माता-पिता की मृत्यु हो चुकी थी, उसने रस्टी को रखा, खिलाया पिलाया, उस पर खर्च किया और पहाड़ों पर एक महँगे स्कूल में, जो पूरी तरह यूरोपीयन ढर्रे पर चलता था, भेजा। मि. हैरीसन ने उसे एक तरह से खरीद लिया था। और उसे वही करना पड़ता था जो उसका अभिभावक चाहता था।

रस्टी वैसा करने को सहमत था। वह हमेशा उसका कहना मानता था। पर वह उस आदमी से डरता था, उसकी चुप्पी उसकी लाल पीली मूँछों से और उस लचीली मलैका छड़ी से जो ड्राइंग रूम की शीशे की आलमारी में रखी थी।
खाना ख़त्म हुआ, अभिभावक को बावर्ची को आदेश देता छोड़कर लड़का अपने कमरे में चला गया।
खिड़की बगीचे की सड़क पर खुलती थी, और एक जमादार का बेटा उस रास्ते पर अपनी नंगी टाँगों के सहारे, ठनठन करती, एक बाल्टी लिये आना जाना कर रहा था। उसने केवल एक लंगोटी पहनी हुई थी, उसका बदन नंगा था और रंग झुलसकर काला हो गया था और उसका सिर पूरा मुँड़ा हुआ था। वह पानी के टैंक तक जाता और आता था, और हर बार जब वह लौटता था तो नहा जाता था, इससे उसका शरीर गीला होकर चमक रहा था।

देहरा की यूरोपियन बिरादरी में रस्टी के अलावा उसकी उम्र का, यह जमादार लड़का था, छोटी जाति का अछूत, बरतन साफ करता था। पर दोनों आपस में बहुत कम बोलते थे। एक नौकर था और दूसरा साहब और वैसे भी रस्टी अपने आप से बड़बड़ाया ‘‘जमादार लड़के के साथ खेलना स्वास्थ के लिए बुरा है...’’
मिशनरी की पत्नी कहती थी, ‘‘अगर तुम भारतीय भी होते मेरे बच्चे, तो तुम्हें जमादार के लड़के के साथ खेलने नहीं दिया जाता।’’
इसलिए रस्टी बहुत बार सोचता था कि तब यह जमादार लड़का किसके साथ खेल सकता है ?




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