दिल के दायरे - ओम प्रकाश सोंधी Dil Ke Dayre - Hindi book by - Om Prakash Sondhi
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दिल के दायरे

ओम प्रकाश सोंधी

प्रकाशक : सावित्री प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2000
पृष्ठ :112
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4096
आईएसबीएन :0000

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मानवीय संबंधों पर आधारित उपन्यास

Dil Ke Dayre

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

मनुष्य के दिल के दायरे में जो कोई भी आ जाता है उसके लिए वह सर्वस्व बलिदान करने को तैयार हो जाता है। वह चाहे उसकी प्रेमिका हो अथवा भाई अथवा माता-पिता के लिए उनके बच्चे। दिल के हाथों विवश वह, बिना सोचे परन्तु पूरी तन्मयता से और निःस्वार्थ भाव से, बलिदान करता है।
निम्न परिवार का बिसरू अपनी पत्नी धन्नो के सहयोग से अपने बच्चों के उज्जवल और सुखमय भविष्य के लिए सर्वस्व बलिदान करने को तैयार हो जाता है तो हेतराम अपनी प्रेमिका सविता के लिए सबकुछ दांव पर लगाने को उत्सुक है।
सविता दिल से विवश होकर, एक ओर हेतराम के लिए अपने पिता के ऊंचे वंश की बलि देती है तो दूसरी ओर सामाजिक मान्यताओं का विरोध करके जीवन मूल्यों को नई दिशा प्रदान करती है।
‘दिल के दायरे’ मानवीय संबंध के सागर में मनुष्य की यात्रा की कहानी है जहाँ पर मानव कभी धैर्य, कभी उत्सुकता, कभी भावुकता, तो कभी निराशा की लहरों पर हिचकोले खाता हुआ नाजुक रिश्तों को निभाने का प्रयत्न करता है।

दिल के दायरे


बिसरू राम के घर हेतराम का जन्म बिसरू राम के जीवन की अति महत्त्वपूर्ण घटना थी। उसकी प्रसन्नता का कोई ठिकाना नहीं था। अपनी प्रसन्नता को छुपा पाना उसके लिए कठिन हो रहा था। हेतराम बिसरू का पहला बच्चा था। उसके वंश में पहली लड़की पैदा होने की परंपरा थी। उसको परम्परा तोड़ने का परमात्मा ने अवसर देकर उसको जाति के लोगों में गौरान्वित किया था। पहला बच्चा लड़का हो तो माता-पिता की मानो करोड़ों की लाटरी निकल आती है। हिंदू समाज में लड़का किसी के लिए व्यापार में सहायता करने वाला होता है तो किसी के लिए उसके वंश को आगे बढ़ाने वाला माना जाता है। और मनुष्य के अंतिम संस्कार के लिए लड़के का होना अति आवश्यक ही नहीं बल्कि अनिवार्य समझा जाता है। बिसरू राम के घर में लड़के के जन्म का अर्थ था उसके पास एक सहायक का आ जाना। उसके घर में निर्धनता से लड़ने के लिए उसके साथी का जन्म लेना। बिसरू को जब हेतराम के विषय में बताया गया तो बिसरू को अपना भविष्य उज्जवल होता हुआ दिखाई दिया। वह तो बड़ी कठिनाई से केवल उतना ही कमा पाता था, जिससे उसकी दो समय की रूखी-सूखी रोटी का जुगाड़ हो सकता था। निर्धन की आय इतनी कम होती है कि उसको कमाने वालों की आवश्यकता पड़ती है। घर में जीव जितने अधिक होंगे उतना अधिक वे कमाकर लाएंगे। निर्धन का चूल्हा जलाए रखने के लिए थोड़ा-सा योगदान भी बहुत बड़ा और महत्त्वपूर्ण होता है। संभवतः इसीलिए निर्धन के बच्चों की संख्या अधिक होती है। वह परिवार सीमित करने की ओर ध्यान नहीं देता। बिसरू सोचने लगा था कि हेतराम बड़ा होकर कमाने लगेगा और तब उसके घर में कमाने वाले दो हो जाएंगे। उससे, निर्धनता से लड़ने के लिए बिसरू की शक्ति बढ़ जाएगी।

बिसरू ने कहा था, ‘‘धन्नो, तुम देखना। मैं अपने हेतू को अपने बाप-दादा का काम सिखाऊंगा और इस काम में इतना योग्य बना दूंगा कि ऐसे जूते बनाने वाला हमारी बिरादरी में पहले कभी पैदा नहीं हुआ होगा। अच्छे जूते बनाने में इसकी धूम दूर-दूर तक मच जाएगी।’’
धन्नो ने हां में हां मिलाई, ‘‘मैं भी यही चाहती हूं कि हमारा बेटा हमारे वंश का नाम चमकाए। हमारी जाति में सबसे अच्छा मोची बने।’’

एक वर्ष पश्चात् जब चेतराम उत्पन्न हुआ तो बिसरू को मानो संसार का खजाना मिल गया। वह सोचने लगा कि दोनों बेटों की सहायता से वह इतना कमा सकेगा कि छोटी-सी लकड़ी की दुकान बना लेगा। दोनों बच्चे लाड़-प्यार से पलने लगे। बिसरू काम पर चला जाता और धन्नो घर के काम में व्यस्त हो जाती। बच्चे अपने ढंग से खेलते और बढ़ते गए। पढ़ाई की ओर मां-बाप का ध्यान नहीं गया। उनके वंश में कभी कोई पढ़ा ही नहीं था। इसलिए उनको कभी पढ़ाई का ध्यान नहीं आया। बिसरू के दिल में तो उनको एक कुशल मोची बनाने का विचार था। जब वे दो-तीन वर्ष के हुए तो बिसरू उनको अपने साथ काम पर ले जाता। उनसे छोटा-मोटा काम करवाता, उनको औजार दे देता और वे उनसे खेलते रहते। कभी उनको चमड़ा पकड़ाने के लिए कहता तो कभी कीलें पकड़ाने के लिए बोलता।

बिसरू राम काम में इतना उलझा हुआ था कि आस-पास होने वाली घटनाओं का उसको पता नहीं चल रहा था। पिछले दो दिन से वह एक ग्राहक को टालता आ रहा था। जूतों में चमड़ा लगाना था। उसके पास चमड़ा, समाप्त हो गया था और नया चमड़ा खरीदने के लिए उसके पास पैसे नहीं थे। पिछले दो दिन से उसके पास ग्राहक भी कम आए थे। बरसात आरंभ हो जाने से उसका काम मंदा पड़ जाता है। आज ही वह चमड़ा खरीदकर लाया था और प्रातः से ही जूतों पर काम कर रहा था। उसको पता ही नहीं चला कि राहुल कब आकर उनके पास खड़ा हो गया था। कुर्ता-पायजामा पहने, आँखों पर चश्मा लगाए राहुल बिसरू राम को काम में मस्त एकटक देखे जा रहा था। वह उसके काम में विघ्न डालना नहीं चाहता था। ऐसा करने का उसको साहस नहीं हुआ। वह तन्मयता से उसको निहारता रहा। राहुल का कद लंबा और शरीर कुछ पतला था। उसके दाएं हाथ में एक पुस्तक थी। वह बिसरू को एकटक देखता रहा और बिसरू चमड़ा लगाता रहा। अकस्मात् बिसरू ने ऊपर देखा तो वह घबरा गया। उसके पास एक मनुष्य खड़ा था। उसने घबराहट में राहुल को देखा। राहुल मुस्करा दिया। बिसरू समझ गया कि कोई ग्राहक उसके सामने खड़ा था।

राहुल ने मुस्कराते हुए कहा, ‘‘अरे, काम करते जाओ भई ! अच्छे लगते हैं वे लोग जो तन्मयता से काम करते हैं। यदि इस देश के सभी लोग इस प्रकार काम करने की आदत डाल लेते तो देश का भला हो जाता। तब हमारा देश संसार में सबसे उन्नत हो जाता।’’

बिसरू मुस्करा दिया, ‘‘अजी साब, यदि मैं ध्यान से काम न करूं तो मुझसे कोई काम नहीं करवाएगा और तब मैं खाऊंगा क्या और खिलाऊंगा क्या। वैसे भी मुझे काम करने में आनन्द मिलता है। जब चमड़ा मेरे सामने एक नया आकार लेता है तो मुझे प्रसन्नता मिलती है, मुझे नशा-सा आ जाता है और उसी नशे में मैं सबकुछ भूल जाता हूं।’’

‘‘यही तो काम करने का सही तरीका होता है। परंतु हमारे देश में नेता से लेकर चपरासी तक काम में मन नहीं लगाते। प्रत्येक एक घंटे के पश्चात् उनको चाय चाहिए और पिएंगे भी तो अपनी सीट पर बैठे हुए। अरे भई ! चाय पीनी है तो कैंटीन में जाकर पीओ। परंतु हमारे लोग तो काम करने की मेज पर काम करते हुए चाय की चुस्कियां लेते रहेंगे। लगता है कि वे दफ्तर में नहीं, बल्कि अपने घर के ड्राइंगरूम में बैठे हुए काम कर रहे हैं। हां, प्रत्येक काम में अपना उल्लू किस प्रकार सीधा किया जा सकता है इस विषय में वे सदा सतर्क रहते हैं और सदा सोचते रहते हैं।’’

बिसरू अपना काम किए जा रहा था। कभी-कभी वह राहुल पर दृष्टि डाल देता था। बिसरू को राहुल की बातें समझ में नहीं आ रही थीं। किसी दफ्तर में जाने का, लोगों से काम करवाने का और बाबुओं से मिलने का अवसर उसको कभी नहीं मिला था। संभवतः इसीलिए वह राहुल की बातों को समझ नहीं रहा था। उसका संसार तो उसकी पत्नी धन्नो और दो बच्चे थे। वह या तो बनिए को जानता था अथवा खुशीराम हलवाई को, जिससे वह राशन और दूध लिया करता है। उसके लिए भारत देश उसके घर से लेकर बाजार की फुटपाथ तक फैला हुआ था। चुनाव के समय उसने कुछ लोगों को एक मनुष्य के पीछे चलते हुए देखा था। वह मनुष्य उसकी भांति निर्धन था। चुनाव के पश्चात् वह गाड़ी में घूमने लग गया था, अच्छे कपड़े पहनने लगा था। और उसके टूटे हुए मकान का कायाकल्प हो गया था। अब उसी मनुष्य के पीछे अनेक मनुष्य चलते हैं। वे लोग देश को किस प्रकार चलाते हैं और उसको चलाने के लिए दौड़-धूप क्यों कर रहे हैं वह समझ नहीं पाता था। कभी-कभी वह चकित हो जाता था, जब उसको पता चलता कि चुनाव के समय लोग देश की सेवा करने और जनता की भलाई करने के लिए आपस में लड़ रहे हैं, एक-दूसरे पर कीचड़ उछाल रहे हैं, एक-दूसरे को बुरा कहते हैं और जनता को बताते हैं कि अन्य देश की भलाई नहीं करेंगे बल्कि वे देश की भलाई करना चाहते हैं तो आपस में क्यों लड़ रहे हैं ? वह यह भी नहीं समझ सका था कि वह मनुष्य जो कुछ दिन पहले पैदल चला करता था, अब गाड़ी में कैसे घूम रहा था और उसका घर पहले छोटा-सा था अब महल किस प्रकार बन गया है। वह तो पहले भी फुटपाथ पर बैठता था और आज भी वहीं बैठा हुआ है। उसकी जाति के लोग पहले भी दो जून की रोटी कमाने के लिए मेहनत करते थे और आज भी मेहनत कर रहे हैं।

राहुल ने बिसरू को देखा। उसके मुख पर कौतूहल था। वह असमंजस में पड़ा हुआ दिखाई दिया था राहुल को। राहुल ने उसको ऐसा कुछ कह दिया था जो उसकी समझ से बाहर था।
 उसने कहा, ‘‘अरे छोड़ो इन बातों को ! तुम्हारे पल्ले नहीं पड़ेंगी। नेता लोग तुम जैसे लोगों को ही लूटते हैं, उल्लू बनाते हैं। तुम जैसे लोगों को, जो अभाव का जीवन व्यतीत कर रहे हैं, सपने दिखाते हैं और दिलासा देते हैं। तुम जैसे लोगों को ही बताते हैं कि तुम्हारा जीवन सुखमय हो जाएगा और आवश्यक वस्तुएँ मिलने लगेंगी। और तुम झांसे में आ जाते हो। भोली-भाली जनता के कंधों पर चढ़कर ही ये लोग अपने को ऊँचा उठा लेते हैं और जिन निर्धन लोगों के मसीहा बनते हैं उन्हीं के धन को हड़प कर जाते हैं।

बिसरू राम अपने काम में मस्त रहा। उसको राहुल की बातों में कोई रुचि नहीं थी। उसको भी तो नेता ने कहा था कि वह उसकी अवस्था को अच्छा बना देगा। उसको कमाने के लिए अनेक अवसर देगा परंतु गाड़ी में घूमने के कारण उसके पास अब बिसरू के लिए और उसके सुख के विषय में सोचने का समय ही नहीं रहा था। कभी-कभी वह मुंह उठाकर राहुल को देख लेता, मुस्कराता और फिर सिर नीचा करके काम में जुट जाता।

राहुल को लगा मानो वह भैंस के आगे बीन बजा रहा था। वह नहीं जानता था कि बिसरू का पेट बातों से नहीं भरेगा। अकस्मात् उसको ध्यान आया कि वह एक ऐसे व्यक्ति से बातें कर रहा था जिसको सायंकाल के खाने की चिंता लगी हुई है। जो चाहता है कि उसके घर सायंकाल का चूल्हा अवश्य जले और उसकी पत्नी को और उसके बच्चों को भरपेट खाना मिल सके। उसके लिए आर्थिक सुधार दलों का बदलना, पदों के लिए लड़ाइयां, मंत्रिमंडल का गठन, संविधान में संशोधन, गुटबंदी, हंग पार्लियामेंट सब कुछ अर्थहीन है। यह सोचकर वह अपने ऊपर हंस दिया।
उसने कहा, ‘‘मेरे जूते की सिलाई उधड़ गई है। शायद कीलें भी लगानी पड़ें। क्या कर दोगे ?’’

बिसरू राम ने जूता हाथ में पकड़ा और उसकी ओर संकेत करते हुए कहा, ‘‘यह काम पिछले दो दिन से रुका हुआ है और इसके ग्राहक को पिछले दो दिन से टाल रहा हूँ। आज तो मुझको इसे पूरा करना ही है। आप दोपहर को आ जाइए।’’ राहुल ने जूते को देखा। बिसरू जिस तन्मयता से काम करता आ रहा था उसको देखकर वह समझ गया कि बिसरू की बातों में सच्चाई थी।
उसने कहा, ‘‘मैं जानता हूं, परन्तु मेरी अवस्था दोपहर को आने की नहीं है। मेरे पास एक ही जूता है और मैं अभी नरेशगढ़ घूमने के लिए जाना चाहता हूं। इसलिए मुझे इसको अभी ठीक करवाना है।’’

बिसरू ने उसके जूते की ओर देखा और फिर उसने राहुल पर दृष्टि डाली वह कंधे पर थैला लटकाए और हाथ में पुस्तक पकड़े हुए उसकी ओर देखकर मंद-मंद मुस्करा रहा था।
उसने पूछा, ‘‘लाइए, क्या करवाना है ?’’
राहुल ने जूता उतारते हुए कहा, ‘‘थोड़ी-सी सिलाई करनी है और कुछ कीलें भी लगानी होंगी।’’
‘‘अच्छा दिखाइए।’’
बिसरू ने जूता हाथ में लिया। जूते की सिलाई उधड़ गई थी। कोई दस मिनट का काम था। उसने जूता एक ओर रख दिया। अपने पास से एक चप्पल राहुल की ओर कर दी। राहुल ने उसको पहन लिया। बिसरू ने धागा लिया और उस पर मोम चढ़ाने लगा। फिर सूआ हाथ में पकड़ा और बाएं हाथ में धागा लिया और सिलाई करने लगा। वह काम में व्यस्त हो गया। राहुल उसको देखता रहा।

‘‘एक दिन में कितना कमा लेते हो ?’’ राहुल ने पूछा।
‘‘कितना कमाना साब, बस, दो जून की रोटी ही बड़ी कठिनाई से निकल पाती है। आपको यहां पहले कभी नहीं देखा।’’
‘‘मैं दिल्ली से घूमने के लिए आया हूं। मुझे स्थान-स्थान पर घूमना अच्छा लगता है। सारा देश घूमा हूं। इस ओर ही नहीं आया था।’’
‘‘आपने सारा देश देख लिया और हमने अपना शहर भी नहीं देखा। यहां से घर और घर से यहां के बीच में ही हमारा संसार बसता है। वह भी दो समय की रोटी कमाने में ही सीमित रहता है।’’
बिसरू ने जूते की सिलाई पूरी कर ली थी। उसने एक कील उठाई, उसको जूते पर रखा और हथोड़ी मार दी।
उसने कहा, ‘‘साब, अब तो अपने बेटों पर ही भरोसा है। वे बड़े हो जाएंगे तो चार पैसे कमाने लगेंगे।’’

तभी हेतराम और चेतराम आ गए। उनके हाथ में चमड़ा था।
हेतराम ने कहा, ‘‘लो बापू, चमड़ा धो लाए।’’
राहुल ने पूछा, ‘‘यही हैं तुम्हारे बेटे ?’’
‘हां साब, दोनों मेरे ही लड़के हैं।’’ छाती फूल गई थी बिसरू की, ‘‘यह हेतू है, बड़ा लड़का और इसके साथ वाला है चेतू, छोटा। केवल दो साल का अन्तर है।’’
‘‘ये दोनों यहां क्या करते हैं ?’’
‘‘मेरे साथ काम करते हैं। अभी से सिखाऊँगा तभी तो कारीगर बनेंगे। मेरा नाम चमकाएँगे।’’
‘‘अर्थात् इन बच्चों को भी तुम इसी फुटपाथ पर बिठाओगे और इनका जीवन भी वैसा ही बनाओगे जैसा कि तुम्हारा है और तुमसे पहले तुम्हारे बाप-दादा का था—अभावों से भरा हुआ, अनिश्चित और न पूरी होने वाली इच्छाओं से जूझता हुआ।’’
‘‘अरे बाबू जी, हम जो हैं वही तो हमारे बच्चों को बनना है। हम यदि चमार हैं तो जूतों का ही काम करेंगे। अपने बच्चों को भी यही कुछ बना सकते हैं।’’

‘‘अरे भाई, इनको पढ़ाओ, लिखाओ ताकि ये योग्य बनकर कोई अच्छी-सी नौकरी कर सकें। जिससे ये अपने बच्चों को वह सबकुछ दे सकें जो तुम इनको नहीं दे सके। यदि ये योग्य बन गए और इनके पास खाने-पीने की कमी नहीं रहेगी तो ये अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दे सकेंगे और उनका जीवन भी संवार सकेंगे। तब इनको किसी वस्तु के लिए तरसना नहीं पड़ेगा।’’
‘‘अरे साब जी, क्या हम अपने बाप दादा का धंधा छोड़ दें ! यदि हम सब अपने बच्चों को नौकरियां करवाने लग गए तो आप लोगों के जूते कौन बनाएगा। आप लोग पहनेंगे क्या ?’’

राहुल हंस दिया, ‘‘तुम किस संसार में रहते हो ! आजकल सारा काम मशीन से होता है क्योंकि आज का युग मशीन का युग है। तुम लोगों का काम तो अब ऊंची जाति के लोगों ने संभाल लिया है। उन्होंने कारखाने लगा लिए हैं। उन कारखानों में काम करने वाले लोग भी केवल तुम्हारी जाति के नहीं है, बल्कि ऊंची जाति के भी हैं। बड़े नगरों में जूते बेचने की बड़ी-बड़ी दुकाने हैं। तुम क्या समझते हो कि वे सब तुम्हारी जाति के लोग चलाते हैं। नहीं भाई। आज के युग में जिस काम में मनुष्य धन का लाभ समझता है वह वही काम करता है। और जिसमें उसे रुचि होती है उसी को अपनाता है। तुम्हारे छोड़ देने से यह धंधा बंद नहीं होगा। मैं तो कहता हूं कि तुम अपने बच्चों को पढ़ाओ-लिखाओ ताकि वे अपना धंधा चला सकें, या फिर कोई अच्छी-सी नौकरी कर सकें।’’

बिसरू सोच में डूब गया। वह राहुल की बातों की सच्चाई जानने का प्रयत्न कर रह था। उसके बच्चों से भला राहुल को क्या लाभ हो सकता है, उसने सोचा कि राहुल सारा देश घूमा हुआ है, अन्य लोगों से मिलता रहा है, बहुत-सी बातें जानता है। इसलिए वह जो कुछ कह रहा है सच ही कह रहा होगा। उसने जूता राहुल के सामने रख दिया।
राहुल ने उसको पैसे देते हुए कहा, ‘‘मेरी बातों को सोचना। जब तुम ध्यान से सोचोगे तो तुमको सच्चाई दिखाई देगी। और मेरी बात मानना और बच्चों को स्कूल में डाल देना। थोड़ी और मेहनत करनी पड़े और सुखों का बलिदान भी करना पड़े तो भी, बच्चों के सुखी जीवन के लिए माता-पिता बहुत कुछ बलिदान कर देते हैं।’’

राहुल चला गया। बिसरू जूते का सोल लगाने लगा। वह सपनों में खो गया। उसने जागते में सपना देखा—दोनों लड़के पैंट-कमीज पहने हुए, सुंदर सा, अच्छा घर, अच्छा फर्नीचर, घर के आगे बगीचा, सबकुछ आंखों के आगे घूम गया। सारा दिन उसकी दृष्टि कारों में घूमते हुए सुंदर लड़कों पर घूमती रही। उसने शाम को बच्चों को पढ़ाने का निर्णय ले लिया।

रात को उसने धन्नो से बच्चों को पढ़ाने के विषय में बात की तो वह चकित हुए बिना न रह सकी। उसने वही युक्तियां दीं जो कि बिसरू ने राहुल को दी थीं। और बिसरू ने वही बातें दोहरा दीं जो कि राहुल ने उसको कही थीं। धन्नो भी मान गई।
दूसरे दिन बिसरू हेतुराम और चेतराम को स्कूल ले गया। मास्टरजी से उसने प्रार्थना की कि वह उनको स्कूल में बैठने दें। उसने बच्चों को एक ही कक्षा में प्रवेश दिलवा दिया।
मास्टरजी ने कहा, ‘‘इनको साफ कपड़े पहनाकर भेजा करना। यदि प्रतिदिन न नहला सको तो कम-से-कम हाथ मुंह धुला दिया करना और इनको पढ़ने के लिए समय देते रहना। घर का और अपना काम कम करवाया करना। बाकी ये समझदार बन जाएंगे। इसकी चिंता मत करना।’’

बिसरू को अब अधिक काम करना पड़ता था। उसने एक दुकान से मिलकर जूते बनाने का काम भी लेना आरंभ कर दिया। दोनों को दो-दो जोड़ी कपड़े सिलवा दिए जिनको धन्नो धो दिया करती थी। उसने पुस्तकें भी ले दीं।
धन्नो ने कहा था, ‘‘अब तो इनको दूध चाहिए। पढ़ाई-लिखाई के लिए तो दिमाग का अच्छा होना आवश्यक है और उसके लिए दूध तो चाहिए ही।’’
‘‘तुम चिंता न करो। मैं अधिक काम करूंगा। मैंने एक दुकान के मालिक से बात कर ली है। वह मुझको जूते बनाने का काम दिलवा देगा।’’

दोनों भाई स्कूल जाने लगे। चेतराम छः वर्ष का था और हेतराम पाँच वर्ष का। चेतराम को पढ़ना-लिखना बुरा नहीं लगा परंतु हेतराम तो एक वर्ष मौज करता रहा था और उसके पश्चात् भी उसका मन सदा खेल में ही रहता था। चेतराम प्रतिदिन स्कूल का काम करता और पाठ याद करता। हेतराम चेतराम को काम करने के लिए कह देता और रात को उसको पाठ बोलने के लिए कहता जिससे हेतराम को थोड़ा-सा याद हो जाता था। हेतराम आरंभ में बाप के साथ दुकान में चला जाता। दुकान पर बिसरू उसको कुछ-न-कुछ कहता रहता। हेतराम घर में मां को कहकर कि वह बापू का हाथ बंटाएगा, दुकान पर जाता और बापू को कह देता कि घर जाकर पढ़ना है। इस प्रकार वह मार्ग में खेलता रहता, मौज-मस्ती करता रहता।

चेतराम घर का काम भी करता था। वह मां के काम के लिए बाजार जाता और रात को बाप के साथ भी हाथ बंटाता। सब उसी को काम करने के लिए कहते। हेतराम को न ही मां झिड़कती और न ही बाप कुछ कहता। संभवतः बिसरू जान गया था कि हेतराम काम करने में आनाकानी करेगा। परिणामस्वरूप चेतराम अपनी मेहनत और लगन से और हेतराम चालाकी से कक्षा में पास होते रहे। वे पास होते-होते सातवीं कक्षा तक पहुँच गए।



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