आदिभूमि - प्रतिभा राय Aadibhumi - Hindi book by - Pratibha Rai
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आदिभूमि

प्रतिभा राय

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2001
पृष्ठ :510
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 410
आईएसबीएन :81-263-0129-6

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‘आदिभूमि’ उड़ीसा के बोण्डा आदिवासी जन-जीवन और उसके परिवेश की जीवन्त कथा है।

Aadibhumi

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

भारतीय ज्ञानपीठ के मूर्तिदेवी पुरस्कार, उड़ीसा साहित्य अकादमी पुरस्कार, तथा उड़ीसा के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण साहित्यिक ‘सारला पुरस्कार’ से सम्मानित डा. प्रतिभा राय का आधुनिक उड़िया साहित्य में एक विशिष्ट स्थान है। उनके द्वारा रचित यह एक महत्त्वपूर्ण औपन्यासिक दस्तावेज़...
संस्कृति को सिर्फ़ बाहर से नहीं देखा जा सकता और न ही यह दिखाने की चीज़ है। बाहर-बाहर से देखकर इसे पूरी तरह अभिव्यक्त कर पाना सम्भव भी नहीं है। दरअसल संस्कृति को अपने अन्दर अनुभव कर, उसमें रच-बस कर ही उसकी बहुरंगी छवियाँ उकेरी जा सकती हैं। प्रख्यात उड़िया कथाकार प्रतिभा राय ने अपने इस उपन्यास ‘आदिभूमि’ में यही किया है। ‘आदिभूमि’ उड़ीसा के बोण्डा आदिवासी जन-जीवन और उसके परिवेश की जीवन्त कथा है। इसमें आदिमानव - समाज का प्रतिनिधित्व कर रही बोण्डा जनजाति का चित्रण है। यह बोण्डा के पारम्परिक जीवन-मूल्यों, आवेगों और विश्वासों के साथ ही आज के सांस्कृतिक और आर्थिक वैश्वीकरण के दौर में विकास के नाम पर आधुनिक समाज द्वारा हो रहे उनके दोहन-शोषण और उससे उपजी विकृतियों की गाथा है। इस उपन्यास में पाँच पीढ़ियों की कहानी है, जिसमें प्रागैतिहासिक बोण्डा जीवन और समाज के सुख-दुःख, जय-पराजय, उसके द्वन्द्व और संघर्ष आदि विविध पक्षों को लेकर पूरी एक शताब्दी में फैले कथानक का तानाबाना चुना गया है। कहा जा सकता है कि यह हमारे समय का, मानव के शुद्ध रूप और उसकी सात्विक भावना का एक विराट् फलक पर रचा गया एक महत्त्वपूर्ण औपन्यासिक दस्तावेज़ है।
प्रस्तुत है कथा-साहित्य के सुधी पाठकों के लिए प्रतिभा राय के बहुप्रसंशित उपन्यास ‘आदिभूमि’ का यह हिन्दी रूपान्तर

आदिभूमि की आदि कथा

आर्यभूमि नहीं, अनार्यभूमि नहीं। आदिमानव की आदिभूमि है स्वाधीन बोंडा देश।
देश-देश में फाँक, नदी-नदी में बाँक।
इस देश में नहीं है नदी। यहाँ धार है, झरना, नाला और हज़ारों वर्ष की मानव-संस्कृति का मुकुट धारण किये पहाड़-डूँगर हैं। घने सब्ज़, आकाश चूमते पेड़ों की शाख पर शाख की तरह पहाड़ पर पहाड़—उस पर फिर पहाड़—जिधर देखो—गलबहियाँ डाले, अनाप-शनाप नीले-नीले पहाड़ खड़े हैं। उन्हीं पहाड़ों की तलहटी से चार हज़ार फ़ुट की ऊंचाई पर बत्तीस गाँव मिलकर है—‘बोंडा देश’।

पूर्वी घाट पर्वतमाला का एक लहरदार हिस्सा, कोरापुट ज़िले के मालकानगिरि सब-डिविज़न में खैरीपुट ब्लाक के अधीन माछकुण्ड नदी के उत्तर-पश्चिम में स्थित बोंडा पहाड़ पर अंगोरे हुए एक आदिम सम्प्रदाय के वंशधरों को, न जाने कितने हज़ार वर्षों से !
उड़ीसा में अत्यन्त आदिम अवस्था में जी रहे ‘बोंडा’ सम्प्रदाय के लोगों की आदिम धरती का इतिहास पर्वतों के पन्नों पर ज़रूर लिखा मिलेगा, और कहीं इनका लिखित-अलिखित इतिहास भले न मिले ! वह इतिहास इन वंशजों का कोई पता नहीं देगा। अतीत के बारे में अज्ञ हैं, भविष्य के बारे में निर्लिप्त हैं वे, वर्तमान सर्वस्व है। यह सम्प्रदाय कब, कहाँ फैला—इस पर विधिवत् कोई शोध कार्य नहीं हुआ है।

बोंडा जाति का विश्वास ही उसका इतिहास है। वह मौखिक चलता आ रहा है पीढ़ी-दर-पीढ़ी—सोमा मुदली से सोमा सीसा तक। इनका विश्वास है कि पृथ्वी का प्रारम्भ बोंडा पहाड़, आदिमाटी का जन्म इसी पहाड़ की कन्दरा घाटी से है। वहीं जन्मे हैं प्रथम मनुष्य और प्रथम सेलानी (नारी)। उस प्रथम मानव से, वह चाहे नांगली बनडा हो या पदुम गदबा, उनसे प्रथम बच्चे और टोकी (बेटा-बेटी) ने जन्म लिया। बोंडा पर्वत पर उन्होंने बारह गाँव बसाये। इस बार ‘जंगर देस’ में युगों तक राज्य किया—वही फिर फैल पसरकर बत्तीस गाँव हो गया। उनमें जब विवाद उपजा, पहाड़ तले उतर गए कुछ और वे कहलाने लगे ‘तल बोंडा’। वे ऊपर बोंडा की आदिम संस्कृति, आचार-विचार भूलते गए। फिर फैले इस छोर से उस छोर तक। भूल गये मूल भूमि की आदिम संस्कृति को।

वन में जनमा बनडा कालक्रम में बन गया वनजा। जा-जा को वे कहते हैं डः-डः। अतः बोंडा का अर्थ है—वन की सन्तान। इन प्रकृति पुत्रों को स्वयं को बोंडा कहलाने में कोई लाज नहीं। बोंडा तो सभ्यता विमुख है। हिंस्र है। आपस में वे मारकाट कर अपराधी के रूप में कुख्यात है। सात-आठ बरस का बालक बीस-बाइस बरस की बोंडनी से ब्याह कर लेता है। कम-से-कम दस बरस बड़ी तो होती ही है वह।

फिर वह पुरुषों का हथियार उठाये, बाहर वालों से ज़्यादा अपनों को मारता है। मारकर स्वयं जेल जाता है। जबकि अन्त तक वह कहता रहता है—‘‘मेरा कसूर नहीं है ! मैंने पाप नहीं किया !’’
गाँव में किसी के घर ताला नहीं लगता। उधार लेन-देन ज़बानी चलती है। विश्वास पर। कभी तलहाट से वे नीचे गाँववालों के गाय, बैल हाँक लायें, दुकान से चीज़ें लूट लें। धोबी घाट से कपड़ा उठा लें, वहाँ काफ़ी उपद्रव करें। वे दल में जाकर हाटवाले दिन उपद्रव मचाते हैं। गाँव उस दिन उजाड़ हो जाता है। पुलिस भी तो डरती है इन सबसे। एक मानव जाति का यह विचित्र आचरण क्यों है ?

हर अनोखी चीज़ की तरह बोंडा भी अजीब जीव है। सभ्य जगत् के बीच अनेक कहानियाँ, लोमहर्षक झूठ बढ़ा-चढ़ाकर फैला दी जाती है बोंडा विरोधी नीचे रहने वालों के द्वारा। भला सच-झूठ जानने की फ़ुर्सत किसे है ? दुर्गम पथ पार कर गन्तव्य स्थल तक पहुँच न पाने की छटपटाहट बहुत सालती है।
1985 से 1993—आठ वर्ष ‘बोंडा की अपराध भावना पर शिक्षा का प्रभाव’ विषय पर शोधकार्य किया। मिला क्या ? असम्पूर्णता असन्तोष का भाव। वहाँ शिक्षा है कहाँ, जो उसका प्रभाव देख पाती या दिखा पाती ! वह सन 1960 से वही आठ प्राइमरी स्कूल हैं। वे सिर्फ़ वहाँ शिक्षा के नक्शे में हैं। वास्तव में कोई स्कूलघर नहीं है। शिक्षक अपने गाँव में रह कर वेतन पाते हैं। हर तरफ़ घृणा, हीनभाव, मगरमच्छी आँसू।

ऐसे जटिल विषय को लेकर पोस्ट डॉक्टरेट शोध, फिर बोंडा जीवन और संस्कृति को लेकर कहानी-उपन्यास लिखने का उद्देश्य क्या है ? पिछले आठ वर्षों में बार-बार मन में यह सवाल उठा है। मुझे यही लगा—बोंडा स्वयं ही प्रेरणास्रोत है इसका। बोंडा देश की माटी है मेरी प्रेरणा की ज़मीन।

1085 ई. जून महीने की 8 तारीख़। बोंडा पहाड़ पर पहली बार पहुँच रही थी। उन दिनों वहाँ जीप जाने लायक सड़क भी नहीं थी वहाँ। दुर्गम घाटियों में कुछ दूर तक जीप जाती है। वह भी अंग-अंग हिला देती। इसके आगे फिर पैदल गाँव-गाँव चलना। सौभाग्य से मैं महिला ठहरी। अतः बोंडा मुझे सहज-सादर ग्रहण करने लगे। केवल रघुनाथ साहू (वहाँ नियुक्त सरकारी अधिकारी) से सिर्फ़ इतना पूछा—‘‘ये माँ घाटी में क्यों आयी हैं ?’’ उन्होंने समझाया—‘‘तुम लोगों का भला-बुरा देखने। मैंने तुम्हें यहाँ क्या दिया अथवा नहीं दिया—उसकी देखभाल करके सरकार को बताएँगी इस बारे में, वरना सरकार को कैसे पता चलेगा ?’’
‘‘ओ...ओय...ठीक है !’’ बस, बोंडा गाँव में जाने का अनुमति-पत्र मिल गया।

स्वीकृति मिलने पर भी वहाँ जाकर मिलना-जुलना, तथ्य एकत्र करना उतना आसान नहीं है। नौकरी से छुट्टी मिलना इतना आसान नहीं...और मैंने दो साल के शोध कार्य के लिये छुट्टी माँगी। मंजूर हो गयी। इस बीच कोरापुट के इन्द्रावती प्रोजेक्ट में राय साहब का तबादला हो गया। बीच-बीच में बच्चों को उनके पास छोड़कर महीनों पहाड़ों पर बिताती। क़दम-क़दम पर बाधा-विघ्न। गरमी के दिनों में ही उतर आती है वर्षा वहाँ। तब तो गावों में जाना दुरूह हो जाता है। आकाश में घिर आता है घना अन्धकार। बाघ मदमस्त हो उठते हैं। भालू का उपद्रव। मलेरिया, मेनेंजाइटिस चलते रहते हैं। पर्व-त्यौहारों के समय तथ्य संग्रह करना ज़रूरी है। वहाँ तब शराब-माँस ख़ूब चलता है। बोंडा हो जाते हैं माताल। शोध के जीवन पर हर घड़ी ख़तरा। भय, द्वन्द्व, आशंका मन में लिये, वहीं पड़े रहने को बाध्य—आनन्द-उल्लास और मृत्यु की ताण्डव-लीला देखने के लिए।
वैसे तो ‘आदिभूमि’ उपन्यास है, मगर सत्याधारित है। यहाँ सत्य
पश्चिम
दिशा
राह दिखाती है या राह गँवाती है ?

पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण—अतर सिंग, अलूक सिंग, बिति सिंग, किआंग सिंग।
बस ये ही चार दिशाएँ हैं, जो सूरज को उगाती हैं, डुबाती हैं, अपने चारों ओर चक्कर लगवाकर लुकाछिपी खिलवाती हैं।
जब सिर्फ़ धरती जन्मी थी, सूरज-चाँद नहीं जनमे थे। चारों ओर रात, अँधेरा।
दिशाहीन आकाश था। आदमी दिशा तलाश रहा था प्रकाश के नक्शे में।
दिशा ढूँढ़ते हुए जीना बेहतर है या चिह्नित दिशाओं के बीच चक्कर लगाते हुए मरना ?
तब थी एक ही धरती—
अब हैं सैकड़ों धरती।

कौन-सी धरती अच्छी है और कौन बुरी, कौन-सी नीची है और कौन-सी ऊँची इस बात को लेकर है खींचतान, मार-काट। इसी से धरती लाल-लहूलुहान है ! इससे सोमा मुदली का क्या आता-जाता है। पर वह सोचता रहता है कि यह धरती जीने के लिए है या मरने के लिए ?
सोमा मुदली की धरती तो सिर्फ़ एक है—इससे परे कोई और धरती हो न हो, सोमा मुदली को फ़ायदा-नुकसान नहीं है।
सोमा मुदली की धरती ऊँची है या नीची इस बारे में कोई कुछ भी कहे, सोमा मुदली जानता है कि वह सबसे ऊपर है। किसी की दया, करुणा, दान से उसकीदु निया नहीं चलती—उसकी दुनिया चलती है भगवाँ के दान से। वही जिलाता है, वही मारता है। उसका भगवाँ है पाटखण्डा महाप्रभु।

निचली धरती के लोग कहते हैं बण्डा पहाड़ नहीं—खण्डा (गँडासा) पहाड़ है। उस खण्डा पहाड़ की धार परखते-परखते सोमा मुदली के पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण के सारे वंशज के—अतीत, भविष्य लहूलुहान होने पर भी वह खुद को छोटा नहीं समझता।
बंडा का राजा है खंडा। खंडा की प्रजा है बंडा। उसी एक धरती पर। तब भी जो राजा है वही प्रजा है। ऐसी धरती कहाँ है ?
सभ्यता और आदिमता को दो भागों में बाँटकर चार हज़ार फ़ुट ऊँची घेर-घुमेर पहाड़ी की ओर सन्धि में लिपटी पड़ी छोटी-मोटी मानव बस्तियों के चारों ओर कुण्डली मारे ऊपर चली गई है—पत्थर की बनी चार हाथ की ऊँची दीवार—अनादिकाल से जिसका नाम है रुनुकबोर।

पहाड़ के नीचे वाले लोग कहते हैं—बाना दीवार (बोंडा दीवार। बाना दीवार के बीच एक आदमी के आने-जाने लायक सँकरी पगडण्डी साँप-सँपोली सी ढलती गयी है घने वन से होती हुई—दोनों ओर पहाड़ को धकियाती हुई, नीचे और नीचे—सभ्यता के अन्तस्थल में, मालकानगिरि सब-डिविज़न के खैरीपुट ब्लाक की समतल बस्ती तक। सभ्य आदमी के लिए बोंडा दीवार है—मेघनाद के प्राचीर (जगन्नाथ मन्दिर के चारों ओर बना अति उच्च परकोटा, जिसे अभेद्य माना जाता है)। नीचे से ऊपर की ओर देखो तो आँखें न पहुँचें—हिम्मत ही छूट जाय !

उड़ीसा के कोरापुट से जयपुर बालीमेला सड़क पर घाटी-दर-घाटी पार करने के बाद बैपारीगुड़ा, गोविन्दपल्लि गाँव तक पचास कि.मी. का रास्ता लाँघ जाओ। नाक की सीध में रह जाएगा माथिली गाँव। उसके आगे है मालकानगिरि बारह कि.मी.। गोविन्दपुरा से चलने पर आता है खैरीपुट गाँव। बायें-दायें यहाँ घने झुरमुट हैं। सलप पेड़ों की हरी डालियाँ नशा करके हवा में जहाँ डोलती हुई मिलेंगी—बस वही है खैरीपुट ब्लाक। छोटी-सी डिस्पेंसरी, छोटा-सा देहाती बाज़ार। बस ! अस्पताल के सामने से पर्वत की ओर पसर गया है गेरुवे रंग का सँकरा रास्ता—पहाड़ के ऊपर की ओर। मोड़ पर चढ़ाई से पहले ही मिल जाएगा कुमारपुट गाँव। खपरैल की छतवाला स्कूल है वहाँ। उसके ऊपर झिरियागुड़ा गाँव है। यहाँ पर गाँव का मतलब कुछेक सटे-सटे एक-दूसरे से रगड़ खाते छान-फ़ूस के छप्पर वाले घर हैं। झिरियागुड़ा गाँव के छोर पर महादेव पर छाया किये एकाकी बेल का पेड़—मानो पहरा दे रहा है—उसके पास है चूने से पुता एक गिरजाघर। वह वहाँ पता नहीं कब से किसकी राह ताकता खड़ा है। गाँव वालों का ध्यान उधर नहीं। अकेले खड़े इस बेल के पेड़ से कुछ ऊँचाई पर पहाड़ का मोड़ आ जाता है। दूसरे मोड़ पर कंगार झोला पहाड़ी झरने की धार झर रही है—काली, धूसरचौड़ी-चौड़ी चट्टानों पर। उसके बाद हाँफते-हाँफते ऊपर चढ़ते चलो। ताक की ताक सजे अटूट पहाड़ काफ़ी दूर तक सजे-सजे छोटे-बड़े, मोटे-पतले, घने-ठूँठे, लताओं से घिरे रास्ते में खड़े हैं पेड़। ऊपर ही ऊपर, मोड़ पार कर बढ़ो तो मिलेगा सेमल का बड़ा पेड़—आकाश में छाया हुआ। सेमल के पेड़ से बायीं ओर ढलने पर बोंडा मुलक का पहला गाँव है—तुलागुरुम। मगर और-और गाँवों के लोग राह रोकेंगे। वहाँ पर आँख-मिचौली खेलती पगडण्डी पहुँचती है तुलागुरुम गाँव। कोई अनजान बटोही वहाँ नहीं पहुँच सकेगा, हाँफते-हाँफते पहाड़ पर और भी ऊपर उठ जाएगा। पचासेक मोड़ उठने के बाद सामने राह बन्द है। सामने बोंडा मुलक के प्रवेश पथ पर है आदिमानव के हाथ से गढ़ी वह प्राचीर—जहाँ अनादिकाल से प्रवेश निषेध की बोंडा दीवार—सभ्यता का पथ रोकती है—रुनुकबोर। सतर्क प्रहरी-सी खड़ी है।

रुनुकबोर के ऊपर है आदिम निवासी बोंडा देश। आदि युग से, अनादि युग से खल-खल, छल-छल करती बह रही है माछकुण्ड नदी। उसके उत्तर-पश्चिम में पूर्वी घाट पर्वतमाला है। उसके बाद है कोंडा काँबेरु पहाड़ का कलिंग द्वार...पहाड़ की एक पर्वतमाला का नाम है बोंडा पर्वत। माछकुण्ड नदी के पत्तन से चार हज़ार फ़ुट ऊँचे पर जी रहे हैं—पहाड़ की चोटी पर, गुफा में घाटी में, डूँगर की ढलान में, जंगल के घेरे में, उपत्यका की गोद में, सभ्यता को पीछे रखते हुए, प्रकृति के संग लड़ते-लड़ते हज़ारों वर्षों से जीते आ रहे हैं ये आदिम अधिवासियों के वंशधर। ये स्वयं को कहते हैं—‘रेमो’ अर्थात् मानव। लेकिन नीचे रहने वाले लोग रेमो को ‘बोंडा’ कहते हैं—नंगा और असभ्य !

कमर में हाथ डाल, देह पर देह टिकाकर घूमर-घूमर घेरा डालते हुए नाचना मानों पर्वत की लहर है। लम्बी क़तार में मेघ-पर-मेघ की तरह वन के ऊपर वन। किसी ने ख़ूब सतर्कता के साथ सजाये हैं—पर्वत-पर-पर्वत। ऊँचे-ऊँचे आकाश छूने वाले पर्वतों की सन्धि में कतरे-कतरे पहाड़ ढलते हुए नीचे की ओर चले गये हैं धरती के समतल माटी तक। जहाँ पर सूरज-चाँद की किरणें मेघों को भेद, कोहरा चीर, पहाड़ और वन लाँघ उतर आती हैं ढालू माटी के गले में सफ़ेद फरफराता खगला (गले में पहनने का अलमुनियम का एक गहना) पहन कर। धूप में चमचमाती अनवरत गद-गद करती जल धार बहती रहती है। साल के बारहों महीने।—बारहों महीने माघ पर्व। यहाँ झरने के किनारे-किनारे कुण्डली फिरती गयी है केले, आम, कटहल पता नहीं कितने जाने-अनजाने पेड़ों की। उसी की ओट में बस्ती बसायी है बोंडा लोगों ने। युगों से वे सभ्यता से मुँह छुपाकर समूची देह में मानुष मारने के हथियार सजाकर पर्वत-पर्वत, वन-वन घूमते हैं।

रुनुकबोर से ऊपर की ओर थाक-के-थाक-बादलों के ऊपर नीचे आकाश की नीलिमा की ओर उठते हैं—पहाड़ घाटी, डूँगर, वन, खेत-खलिहान, झरने, गाँव-गोठ, जीव-जन्तु मालभूमि—सब है बोंडा के। बोंडा के सिवा किसी का अधिकार नहीं यहाँ। यहाँ के हवा-पानी पर, जीवन-मरण पर। पहाड़ पर खड़े होने पर जंगल से घिरी धरती, जितनी दूर तक निगाह जाती है, सबकुछ बोंडा राज के आधीन है। बोंडा पहाड़ की तीखी नोक पर टिके आकाश का जितना अंश ढालू होकर औंधे मुँह पड़ा है, बोंडा राजकी ओर मुँह किये, सब बोंडा का है। आकाश के उसी घेरे में जितने चाँद-सूरज-बादल, तारे, पक्षी खेल रहे हैं, सब बोंडा के हैं। यह छोटा-सा इलाका इनके अधीन है—बोंडा पहाड़। यह ज़रा-सा तो आकाश है। इसका भला क्या नाम ? न इसका नाम न ठिकाना। जहाँ तक निगाह जाती है—वह आकाश है ! वहाँ तेरा-मेरा नहीं। एक तरह का नीला आकाश। न जाने कितने हज़ार साल पहले आदिम मानव ने जब धरती पर क़दम रखा था, तब माटी का कोई नाम न था, न ठिकाना। जहाँ पाँव रखो, माटी ही माटी। ‘तुबुक’। सिर पर थे सूर्य देव और पाँवों तले फैली थी माटी माँ। जहाँ चारों ओर ऊँचे-ऊँचे हरे-भरे पहाड़ों को घेरकर वन और वनों के बीच जगह-जगह पाँव पसारे, माटी अपनी नरम गोद फैलाये है—वह है उपत्यका। उपत्यका की गोद में आदिम मानव-सम्प्रदाय है—बोंडा। बस इतनी-सी धरती में उसका सारा लाड़-प्यार है। नदी और पहाड़ की तरह, माटी और आकाश की तरह, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, जल-थल, बिजली-बादल की तरह सब यहाँ आवरणहीन हैं नंगे—बोंडा। बोंडा है दूर अतीत के प्रागैतिहासिक युग का आदिम मानव। निचले इलाके के लोगों की निगाह में वह नंगा है, हिंसक है, जंगली है। बोंडा अपनी उमर नहीं जानता। उसे तो बस इतना पता है कि वह एक योद्धा जाति का उत्तराधिकारी है। उसके ख़ून में झूठ या कपट नहीं। प्रतिहिंसा रग-रग में भरी है। क्षमा शब्द का अर्थ वह नहीं जानता, शत्रु के आगे दुविधा नहीं उभरती, बोंडा राज्य में शत्रुता और अपराध का दण्ड एक ही है—मृत्यु।
जन्म से नहीं, मृत्यु से बोंडा पहाड़ का इतिहास मिल जाता है। मृत्यु से ही मानों शुरू हुई है बोंडा जाति की कहानी। रोज़मर्रे के मरण के खेल में वह इतिहास गढ़ता आया है आज तक। चक्रकोट के राजा को मरे पता नहीं कितने युग बीत गये। किसके पास इसका हिसाब है ? बस्तर की राजधानी चक्रकोट के राजा महाप्रतापी वीर और प्रजापालक थे। उसकी पत्नी बुण्डी महादेवी महारानी थी। शत्रु की लोभी दृष्टि चक्रकोट राज्य की धन-सम्पत्ति पर ही नहीं, बुण्डीमहारानी के रूप यौवन पर भी थी। बुण्डी महारानी की गोद में नन्हा राजकुमार—चक्रकोट का भावी राजा था। उस पर भी शत्रु की बाज दृष्टि थी।

तभी विश्वासघात किया चक्रकोट के महामन्त्री ने। राजा शत्रु के हाथों मारे गये। बुण्डी महारानी बन्दी बना ली गयी। अबोध शिशु को छीन लिया गया। शत्रु की शर्त थी—चक्रकोट का जो राजा बनेगा, बुण्डी महादेवी उसी की पटरानी बनेंगी। राज्य, सम्पदा, सुख सब फिर उनके चरणों में आ जएगा अगर वे इससे राजी हैं, तो बन्धन मुक्त हो जाएँगी। बन्दीशाला से राज्यमहल चली जाएँगी, बुण्डी महारानी ने सोचा—कल तो बेटा बड़ा होगा। वह शत्रु को मारकर फिर सिंहासन दखल करेगा। तब क्या इस शर्त के मुताबिक बुण्डी महादेवी को नये राजा की रानी बनना होगा राजसिंहासन की तरह रानी भी स्वयंवर सम्पत्ति है।

अब बुण्डी महादेवी का ख़ून खौल उठा। शत्रु का ख़ून पीकर ही ज्वाला शान्त होगी। पर क्या उपाय है ? छोटा राजकुमार भी उनकी गोद में नहीं है। बुण्डी महादेवी अगर प्रतिवाद कर बैठीं तो उसका सिर पहले कटेगा, उन्हीं के सामने। मन्त्री ठहरा विश्वासघाती। सेनापति और कई सैनिक मारे जा चुके हैं। वह सती बनी रही तो पुत्रहीन होना पड़ेगा। पुत्र की जननी बनकर रही तो फिर सियार की तरह हीन शत्रु की रखैल बनकर जीवन बिताना पड़ेगा। बुण्डी महादेवी के ख़ून में वीरता है। सामने लड़ाई में शत्रु अगर विजेता होता। तो वे उसका आदर करतीं। मगर उसने शेर की तरह आक्रमण नहीं किया था। उसने तो छिपकर सियार की तरह राजा की हत्या की है। बुण्डी महादेवी ने उपाय पर विचार किया। शत्रु को अपनी शर्त भेजी—‘पुत्र लौटा दो। पहले पति का शोक पालन कर लूँ, फिर शर्त मान ली जाएगी।’ शत्रु की आँख में वासना की आग थी। बुण्डी महादेवी की आँख में प्रतिशोध की आग थी। आग में मिल गयी आग ! अब शत्रु की आँखें चुँधिया गयीं। बुण्डी महादेवी की शर्त मान ली गयी। शत्रु की शर्त बुण्डी महादेवी मान लेंगी, इस आशा में विलास, नृत्य-गीत में डूब गया वह।
अब बेटा गोद में आ गया था। दस साल का अबोध बालक, बुण्डी महादेवी पच्चीस की होंगी। उनके आस-पास चार-चार योद्धा। बुण्डी महादेवी थीं नज़रबन्द, उन्होंने प्रण किया मर भले ही जाऊँ, पर एक बार आखिरी कोशिश करूँगी। चारों योद्धाओंको अपनी ओर कर लिया। वे राजा के ज़माने के पुराने विश्वस्त सैनिक थे। नये राजा का हुक्म प्राणों के भय से मानने के अलावा और चारा न था। रानी ने साहस बँधाया—रातों-रात भाग चलें शत्रु के आगे सिर नहीं झुकाएँगे। चारों ने रानी के आगे सिर झुका लिया।

रात ख़त्म हुई। चक्रकोट में न थी बुण्डी महादेवी, न राजकुँवर और न ही वे चारों सैनिक-योद्धा। कितने पहाड़-पर्वत, नदी-नाले घाटी, झरने पार करती चलीं बुण्डी महादेवी। पीठ पर बँधा पुत्र। पीछे-पीछे धनुष-बाण, कटार, छुरी लिये चारों येद्धा। राह का अन्त नहीं। आपद-विपद ख़तम नहीं होती। कभी आकाश वर्षा उड़ेल देता, कभी ओले, रानी और राजकुँवर दोनों पर। कभी चिलचिलाती धूप बिखेर देती आग ही आग उन सुकुमार देहों पर। कभी आँधी-तूफान रास्ता रोक लेते उन दोनों का। जंगल के रास्ते में पत्थर रोड़े, शूल, काँटों की भला क्या कमी थी ? कभी राह रोक लेते हिंसक जन्तु। बाघ, भालू, शेर, चीते, साँप, बिच्छू, हाथी...क़दम-क़दम पर यमदूत से खड़े। बुण्डी महादेवी का एक ही हुक़्म था—मारो। आदमी हो या पशु, जो भी राह में आता है मारो। न भूख न प्यास। रूप-यौवन की शोभा टूट रही है। उस ओर कोई निगाह नहीं। मन में एक ही भाव—बेटे को कैसे आदमी बना दूँ। राजसिंहासन वापस मिल जाय उसे। पितृहन्ता का वह कैसे प्रतिशोध ले सकेगा ?

पता नहीं कितने दिन, कितनी रातें बीतीं। कोई होश न रहा। अनन्त दुख की तरह जंगल ख़तम ही नहीं होता। वह क़तार में खड़े पहाड़ों की तरह दुख की सीढ़ियों पर क़दम रखते हुए जंगलों को परत-दर-परत पार करती गयीं।

पाँव थम जाते, झरने के पास वह थकान मिटाती मन कहता—भय पीछे छूट गया है। जंगल का रूप बदल जाता है। मन के मीत की तरह वे छोटे झुरमुट बहुत अपने लगते। मुखिए की तरह दिख जाता वह आकाश जितने ऊँचे तक उठ गया पहाड़। अभयदाता दिखते वे ऊँचे-ऊँचे शाल के पेड़। सखी सहचरी की तरह दिखती झरने की पतली धार। कल-कल ध्वनि। ऐसा लगा जैसे वे कोई सुरक्षित दुर्ग में खड़े हैं।—विधाता ने उन्हीं के लिए बनाया है—चक्रकोट की असहाय लाचार आत्मगोपन कर चुकी बुण्डी महादेवी के रहने के लिए। दुर्भेद गिरिकन्दर, घाटी से घिरा सुन्दर राज्य है। ऊँची पर्वतमाला मानों अलंघनीय दीवार की तरह घिरी है। दूर तक—जहाँ तक आँखें जाती हैं, माँ की गोद की तरह खूब सुरक्षित। बहुत अपनी लगी वह वनराई। किसका है यह राज्य ? कौन है इसका राजा ? राजा के ख़ून में तो सदा कामना, वासना, संसार की सारी सुन्दर दुर्लभ चीज़ों को अपना बनाने का अहंकार-ज़िद होती है। इस देश का राजा भी यदि बुण्डी महारानी को पाप-दृष्टि से देखे-? तब तो फिर से दुख की शुरुआत हो जायेगी।

चारों योद्दाओं ने छान मारा सारा इलाका। आकर ख़बर दी—यहाँ न कोई राजा है, न ही प्रजा है, हवा-पानी पशु-पक्षी, नदी-नाले झरना, पहाड़ आदमी सब यहाँ स्वाधीन हैं। आदमी तो नहीं, जंगली लोगों का निवास है। मानव जाति का कोई आदिम-समुदाय पता नहीं किस प्रागैतिहासिक युग के मध्याह्न सूरज की किरण पड़ते ढालू इलाके में छोटी-छोटी झोंपड़ी बनाकर रहता आया है। प्रकृति ही उनकी माँ-बाप, भाई-बन्धु, सखा शत्रु सब है। वे प्रकृति के सिवा किसी को नहीं जानते। वे प्रकृति की सन्तान हैं। उसी की तरह खुले, निर्मल कठोर नंगे। झूठ फरेब कुछ नहीं जानते। आकाश की ओर चले गये पेड़ों की तरह सीधे-सादे बन्धु, नहीं तो शत्रु हैं।

वे हैं, बोंडा, नंगे, इसमें लाज कैसी ? पहाड़ सूरज-चाँद धरती सब तो नंगे हैं। पेड़-पौधे लता-पत्र, पशु-पक्षी सब तो नंगे हैं। आदमी इनसे भी बड़ा है। प्रकृति से भी ऊँचा है ? उसे फिर क्यों इतना आवरण चाहिए। आदमी की देह क्या कोई अनोखी चीज़ है ? हाड़, मांस, रक्त-चाम से ही तो बनी है। जैसे पशु की देह, वैसे ही आदमी की बनी है। जमन हुआ है, माटी में मिलना है। कुछ दिनों के लिए मांस हाड़, चर्ममय देह का भ्रम पैदा करता है। माटी की देह के लिए इतना आडम्बर क्यों ?
पहाड़ का नाम बोंडा—स्वतन्त्र बोंडा राज्य के नंगे आदमी का नाम है —‘रेमो’—अर्थात् मानव। शायद कोई आने-जाने वाला देखे कि ये तो पशु की तरह जीते हैं, चाल-चलन भी वैसा ही है, नंगा रूप देखकर सन्देह कर बैठे कि बोंडा कोई पशु हो, अतः बोंडा ने अपना नाम रखा है—‘रेमो’।


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