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आचार्य श्रीराम शर्मा >> प्रज्ञावतार की विस्तार प्रक्रिया

प्रज्ञावतार की विस्तार प्रक्रिया

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :32
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4102
आईएसबीएन :000

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गुरुदेव की प्रज्ञावतार की प्रक्रिया पर अमृतवाणी....

Pragyavatar Ki Prakriya

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

युगसंधि -महान परिवर्तन की वेला

धरती में दबे और ऊपर बिखरे बीज वर्षा आरंभ होते ही अंकुर फोड़ने लगते हैं। अंकुर पौधे बनते और पौधे बढ़कर परिपक्व वृक्ष का रूप धारण कर लेते हैं। वृक्ष भी चैन से नहीं बैठते : वसंत आते ही वे फूलों से लद जाते हैं। फूल भी स्थिर कहाँ रहते हैं; वे फल बनते हैं, अनेकों की क्षुघा बुझाते और उनमें से नए बीजों की उत्पत्ति होती है। उन्हें बाद में अंकुरित होने का अवसर मिले, तो एक ही पेड़ की परिणति कुछ ही समय में इतनी अधिक विस्तृत हो जाती है, जिनसे एक उद्यान बनकर खड़ा हो जाए।

मत्स्यावतार की कथा भी ऐसी ही आश्चर्यमयी है। ब्रह्मा जी के कमंडल में दृश्यमान होने वाला छोटा कीड़ा मत्स्यावतार के रूप में विकसित हुआ और समूचे भूमंडल को अपने विस्तार में लपेट लिया। इन्हीं कथाओं का एक नया प्रत्यावर्तन इन्हीं दिनों होने जा रहा है। संभव है 21 वीं सदी का विशालकाय आंदोलन एक छोटे-से शांतिकुंज आश्रम से प्रकटे और ऐसा चमत्कार उत्पन्न करे कि उसके आँचल में भारत ही नहीं, समूचे विश्व को आश्रय मिले। दुनियाँ नया रूप धारण करे और विकृत विचार, परिष्कृत होकर, दूरदर्शी विवेकशीलता के रूप में अपना सुविस्तृत परिचय देने लगे।

यह बहुमत का युग है-संघ शक्ति का। मिल -जुलकर पक्षी एक साथ जोर लगाते हैं, तो मजबूत जाल को एक ही झटके में उखाड़ लेने और उड़ा ले जाने में सफल हो जाते हैं। ईंटें मिलकर भव्य भवन खड़ा कर देती हैं। बूँद -बूँद से घड़ा भरता है। तिनके मिलकर हाथी बाँधने वाला रस्सा बनाते हैं। धूलिकण अंधड़ बनकर आकाश पर छाते देखे गए हैं। रीछ-वानरों और ग्वाल-बालों के संयुक्त पुरुषार्थ की कथा-गाथा युग-युगों से कहीं सुनी जाती रही है। इन दिनों भी यही होने जा रहा है।

इन दिनों वैयक्तिक और सामूहिक जीवन में छाई हुई अतिवादी अवांछनीयता और कुछ नहीं, अधिकांश लोगों द्वारा अचिंत्य-चिंतन और अकरणीय क्रिया-कृत्य अपना लिए जाने का ही प्रतिफल है। यदि यह बहुमत उलट जाए, तो फिर परिस्थितियों के बदल जाने में देर न लगे। पुरातन सतयुग की वापसी के दृश्य पुनः मूर्तिमान होकर, सामने आ खड़े हों। यही होने भी जा रहा है। प्राचीन काल में ऋषि कल्प व्यक्तियों का बाहुल्य था। हर किसी की ललक समाज से, कम से कम लेने और अधिक से अधिक देने की रहा करती थी। वह बचत ही परमार्थ प्रयोजनों में लगकर, ऐसा माहौल बना दिया करती थी, जिसका स्मरण अभी भी लोग सतयुगी परंपरा के रुप में किया करते हैं; वह समय फिर वापस लौट आने की कामना किया करते हैं। दैत्य का कोई आकार विशेष नहीं होता। वे भी मनुष्यों की ही शक्ल-सूरत के होते हैं। अंतर केवल इतना ही होता है कि दैत्य दूसरों से संसार से लूटते-खसोटते अधिक हैं, और अपने समय, श्रम चिंतन तथा वैभव का न्यूनतम भाग सत्कर्मों में लगाते हैं। यही है वह अंतर, केवल इतना ही होता है कि दैत्य दूसरों से संसार से लूटते-खसोटते अधिक हैं और अपने समय श्रम चिंतन तथा वैभव का न्यूनतम भाग सत्कर्मों में लगाते हैं। यही है वह अंतर, जिसके कारण देवता पूजे जाते और दैत्य सर्वत्र भर्त्सना के भाजन बनते हैं।

प्रस्तुत परिवर्तन इसी रूप में अवतरित होने वाला है कि दैत्य वर्ग अपनी हठवादिता से पीछे हटेंगे और देवत्व की सत्प्रवृत्तियों को अपनाने के लिए उन्मुख होंगे। यह हलचल असंख्यों के अंतराल में अनायस ही उठेगी। उस चमत्कार को हम सब इन्हीं आँखों से देखेंगे। दृष्टिकोण में सुधार परिवर्तन होते ही परिस्थितियाँ बदलेंगी। वातावरण बदलेगा और प्रचलन में ऐसा हेर-फेर होगा, जिसे युग परिवर्तन के नाम से समझा, देखा और परखा जा सके।
 
इस प्रयोजन के लिए एक सुनियोजित योजना दैवी चेतना के संकेतों पर इन्हीं दिनों अवतरित हुई है। इस साधना और प्रयास प्रक्रिया का नाम युग संधि महापुरश्चरण दिया गया है। उसका विस्तार भी आश्चर्यजनक गति से हो रहा है। अमरकंटक से नर्मदा उभरा है। निजी प्रयोजनों के लिए तो पूजा-पाठ, के प्रचार-प्रसार के अनेकों आयोजन आए दिन होते रहते हैं, पर इस साधना का संकल्प एवं लक्ष्य एक ही है-युग परिवर्तन के उपयुक्त वातावरण एवं परिवर्तन प्रस्तुत करना। जिनकी इस महान प्रयोजन में तनिक भी रुचि है वे इस आत्मीय आमंत्रण का परिचय प्राप्त करते ही दौड़े चले आ रहे हैं और इस महाक्रांति के प्रवाह में उत्सुकतापूर्वक सम्मिलित हो रहे हैं।

पुरश्चरण की तप-साधना का प्रारंभिक रूप एक लाख दीपयज्ञों की साक्षी में, एक करोड़ प्रतिभाओं को यजमान रुप में सम्मिलित करने का था। अब लोगों की श्रद्धा, सद्भावना और आतुरता को देखते हुए उसे ठीक दूना कर दिया गया है, ताकि कम समय में अधिकाधिक प्रतिफल की उपलब्धि हो सके। इसी उद्देश्य से संकल्प जोशीला हो गया है। प्रारंभिक निश्चय था कि महापुरश्चरण की पूर्णाहुति सन् 2000 में बीसवीं सदी का अंत होते -होते होगी। अब लक्ष्य दूना हो जाने से संकल्प को दो हिस्सों में बाँट दिया गया है। अब 5-5 वर्ष में एक -एक करोड़ करके सन् 2000 तक पूरी पूर्णाहुति में दो करोड़ भागीदार बनाने का लक्ष्य है। दीप यज्ञायोजन भी एक लाख के स्थान पर दो लाख हो जाएँगे।

आरंभ में सोचा गया था कि यह आयोजन हरिद्वार या प्रयाग के कुंभ पर्व के स्थान पर संपन्न किया जाए और एक ही स्थान पर सभी भागीदार एकत्रित हों और उस समारोह को अभूतपूर्व समारोह के रूप में प्रस्तुत करें, पर अब अधिक क्षेत्रों की जनता को अपने -अपने समीपवर्ती केंद्रों में एकत्र होने की सुविधा रहेगी और दो स्थानों की अपेक्षा लाखों स्थानों पर एकत्रित होने का अवसर मिलेगा। सम्मिलित होने वालों को दूर जाने का किराया-भाड़ा भी खर्च न करना पड़ेगा और समीपवर्ती स्थान में ठहरने की भोजन, आदि की व्यवस्था भी बन पड़ेगी। इस महाप्रयास की जानकारी अधिक व्यापक क्षेत्र में सुविधापूर्वक पहुँच सकेगी, जो इस पुरश्चरण का मूलभूत उद्देश्य हैं।
 
स्मरण रहे यह संकल्प महाकाल का है, केवल जानकारी पहुँचाने और आवश्यक व्यवस्था जुटाने का काम शांतिकुंज के संचालकों ने अपने कंधों पर धारण किया है। वही इस प्रयोजन को पूर्ण भी करेगी, क्योंकि युग परिवर्तन का नियोजन भी उसी का है।

शांतिकुंज के संचालक प्रायः अस्सी वर्ष के होने जा रहे हैं। उनका शरीर भी मनुष्य जीवन का मर्यादा के अनुरूप अपने अंतिम चरण में है। फिर नियंता ने उनके जिम्मे एक और भी बड़ा तथा महत्त्वपूर्ण कार्य पहले से ही सुपुर्द कर दिया है, जो कि स्थूल शरीर से नहीं, सूक्ष्म शरीर से ही बन पड़ेगा। वर्तमान शरीर को छोड़ना और नए सूक्ष्म शरीर में प्रवेश करके प्रचंड शक्ति का परिचय देना एक ऐसा कार्य है, जो सशक्त आत्मा के द्वारा ही बन पड़ सकता है। इतने पर भी किसी को यह आशांका नहीं करनी चाहिए कि निर्धारित युग संधि महा पुरश्चरण में कोई बाधा पड़ेगी। महाकाल ने ही यह संकल्प लिया है और वही इसे समग्र रूप में पूरा कराएगा; फिर उज्ज्वल भविष्य के निर्माण हेतु अगले दस वर्षों तक शांतिकुंज के वर्तमान संचालन भी आवश्यक व्यवस्था बनाने और तारतम्य बिठाते रहने के लिए भी तो वचनबद्ध है।

प्रयोजन के अनुरूप दायित्व भी भारी


अखंड ज्योति हिंदी मासिक तथा अन्य भाषाओं में उसके संस्करणों के स्थाई सदस्यों की संख्या प्रायः पाँच लाख है। अखंड ज्तोति के पाठकों के साथ विगत पचास वर्षों से संपर्क, विचार विनिमय और परामर्श का क्रम चलता रहा है। इनमें से अधिकांश ऐसे हैं, जो कई-कई बार यात्राएँ करके, यहाँ आते और घनिष्ठता संपादन करते रहे हैं। इस आधार पर इन्हें परिवार के सदस्य और परिजन माना जाता रहा है। शिक्षक भी अभिभावकों की गणना में आते हैं। गोत्र वंश परंपरा से भी मिलते हैं और अध्यापक परंपरा से भी। इतना बड़ा परिवार अनायास ही कैसे जुट गया ? संभवतः पूर्व जन्मों के संचित किन्हीं संस्कारों ने यह मिलन संयोग स्तर का सुयोग बना दिया हो।

महत्त्वपूर्ण प्रसंगों पर स्वजन संबंधी ही याद किए जाते हैं। उन्हें ही हँसी-खुशी के, दुःख-दर्द के प्रसंगों में याद किया जाता है। सहभागी भी प्रायः वे ही रहते हैं। बाहर के लोग तो कौतुक-कौतूहल भर देखने के लिए प्रायः वे ही रहते हैं। बाहर के लोग तो कौतुक-कौतूहल भर देखने के लिए इकट्ठे हो जाते हैं। इसलिए उनसे कोई बड़ी आशा अपेक्षा भी नहीं की जाती। महाभारत में कृष्ण का प्रयोजन पूरा करने के लिए पाँच पांडव ही आगे रहे। पंचप्यारे भी सिख धर्म में प्रसिद्ध हैं। महाकाल के सौंपे हुए नव-सृजन प्रयोजन का दायित्व भी भारी है और उनमें भाग लेने वालों को श्रेय भी असाधारण मिलने वाला है। इसलिए हर किसी से बड़ी आशा भी नहीं की जा सकती। पाँच में से एक उभर आए, तो बहुत है। पाँच लाख की स्थिति देखते हुए यदि एक लाख कदम-से-कदम मिलाकर चल सकें, तो बहुत है। इतनों के सहारे सौंपा हुआ दायित्व भी निभ जाएगा।


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