Gayatri Ki 24 Shaktidharayein - Hindi book by - Sriram Sharma Acharya - गायत्री की 24 शक्तिधाराएँ - श्रीराम शर्मा आचार्य
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गायत्री की 24 शक्तिधाराएँ

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :48
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4131
आईएसबीएन :0000

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गायत्री की 24 शक्तिधाराएँ

Gayatri Ki 24 Shaktidharayein

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

गायत्री की चौबीस शक्तियाँ

गायत्री भारतीय धर्म- दर्शन की आत्मा है। उसे परम प्रेरक गुरुमंत्र कहा गया है। गुरु शिक्षा भी देते हैं और सामर्थ्य भी। गायत्री में सद्ज्ञान की ब्रह्मा चेतना और सत्प्रयोजन पूरा कर सकने की प्रचण्ड शक्ति भरी पड़ी है। इसलिए उसे ब्रह्मावर्चस् भी कहते हैं।

गायत्री का उपास्य सूर्य-सविता है। सविता का तेजस सहस्रांशु कहलाता है। उसके सात रंग के सात अश्व हैं और सहस्र किरणें सहस्र शस्त्र गायत्री की सहस्र शक्तियाँ हैं। इनका उल्लेख-संकेत उसके सहस्र नामों में वर्णित है। गायत्री सहस्र नाम प्रख्यात है। इसमें अष्टोत्तर शत अधिक प्रचलित है। इनमें भी चौबीस की प्रमुखता है। विश्वामित्र तंन्त्र में इन चौबीस प्रमुख नामों का उल्लेख है। इन शक्तियों में से बारह दक्षिण पक्षीय हैं और बारह वाम पक्षीय। दक्षिण पक्ष को आगम और वाम पक्ष को निगम कहते हैं। कहा गया है-


गायत्री बहुनामास्ति संयुक्ता देव शक्तिभि:।
सर्व सिद्धिषु व्याप्ता सा इष्टा मुनिभिराहता।।


‘गायत्री के असंख्य नाम हैं, समस्त देव शक्तियाँ उसी से अनुप्राणित हैं, समस्त, सिद्धियों में उसी का दर्शन होता है।


चतुर्विंशति साहस्र महा प्रज्ञा मुखं मतम्।
चतुर्विंशक्ति शवे चैतु ज्ञेयं मुख्यं मुनीषिभिः।।

महाप्रज्ञा के चौबीस हजार नाम प्रधान है, इनमें चौबीस को अधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है।


तत्रापिं च सहस्रं तु प्रधान परिकीर्तिम्।
अष्टोत्तरशतं मुख्यं तेषुक्तिप्रो महर्षिभि:।।


उन चौबीस सौ नामों में भी मात्र सहस्र नाम ही सर्वविदित है। सहस्रों में से एक सौ आठ चुने जा सकते हैं।


चतुर्विंशतिदेवास्या: गायत्र्याश्चाक्षराणि तु।
सन्ति सर्वसमर्थानि तस्या: सादान्वितानि च।।


चौबीस अक्षरों वाली सर्व समर्थ गायत्री के चौबीस नाम भी ऐसे ही हैं, जिनमें सार रूप से गायत्री के वैभव विस्तार का आभास मिल जाता है।


चतुर्विंशतिकेष्वेवं नामसु द्वादमैव तु।
वैदिकानि तथाऽन्यानि शेषाणि तान्त्रिकानि सु।।


गायत्री के चौबीस नामों में बारह वैदिक वर्ग के हैं और बारह तान्त्रिक वर्ग के।


चतुर्विंशंतु वर्णेषु चतुर्विंशति शक्तय:।
शक्ति रूपानुसार च तासां पूजाविधीयते।।


गायत्री के चौबीस अक्षरों में चौबीस देव शक्तियाँ निवास करती हैं। इसलिए उनके अनुरूपों की ही पूजा-अर्चा की जाती है।


आद्य शक्तिस्तथा ब्राह्मी, वैष्णवी, शम्भवीति च।
वेदमाता देवमाता विश्वमाता ऋतम्भरा।
मन्दाकिन्यजंपा चैव, ऋद्धि, सिद्धि प्रकीर्तिता।
वैदिकानि तु नामानि पूर्वोक्तानि कि द्वादश।।


(1)    आद्यशक्ति
(2)    ब्राह्मी
(3)    वैष्णवी
(4)    शाम्भवी
(5)    वेदमाता
(6)    देवमाता
(7)    विश्वमाता
(8)    ऋतुम्भरा
(9)    मन्दाकिनी
(10)    अजपा
(11)    ऋद्धि
(12)    सिद्धि- इन बारह को वैदिकी कहा गया है।


सावित्री सरस्वती ज्ञेया, लक्ष्मी दुर्गा तथैव च।
कुण्डलिनी प्राणाग्निश्च भवानी भुवनेश्वरी।।
अन्नपूर्णेति नामानि महामाया पयस्विनी।
त्रिपुरा चैवेति विज्ञेया तान्त्रिकानि च द्वादश।।


(1)    सावित्री
(2)    सरस्वती
(3)    लक्ष्मी
(4)    दुर्गा
(5)    कुण्डलिनी
(6)    प्राणग्नि
(7)    भवानी
(8)    भुवनेश्वरी
(9)    अन्नपूर्णा
(10)    महामाया
(11)    पयस्विनी और
(12)    त्रिपुरा- इन बारह को तान्त्रिकी कहा गया है।

बारह ज्ञान पक्ष की बारह विज्ञान पक्ष की शक्तियों के मिलन से चौबीस अक्षर वाला गायत्री मन्त्र विनिर्मित हुआ।
गायत्री ब्रह्म चेतना है। समस्त ब्रह्माण्ड के अन्तराल में वही संव्याप्त है। जड़ जगत का समस्त संचालन उसी की प्रेरणा एवं व्यवस्था के अन्तर्गत हो रहा है। अन्य प्राणियों में उसका उतना ही अंश है, जिससे अपना जीवन निर्वाह सुविधापूर्वक चल सके। मनुष्य में उसकी यह विशेषता सामान्य रूप से मस्तिष्क क्षेत्र की अधिष्ठात्री बुद्धि के रूप में सहारे प्राप्त होते हैं। असामान्य रूप से यह ब्रह्म चेतना प्रज्ञा है। यह अन्तःकरण की गहराई में रहती है और प्रायः प्रसुप्त स्थिति में पड़ी रहती है। पुरुषार्थी उसे प्रयत्न पूर्वक जगाते और क्रियाशील बनाते हैं। इस जागरण का प्रतिफल बहिरंग और अन्तरंग में मुक्ति बनकर प्रकट होता है। बुद्धिबल से मनुष्य वैभववान बनता है, प्रज्ञा बल से ऐश्वर्यवान। वैभव का स्वरूप है-धन, बल, कौशल, यश प्रभाव, ऐश्वर्य का रूप महान व्यक्तित्व है। इसके पाँच वर्ग हैं। सन्त ऋषि महर्षि ब्रह्मर्षि देवर्षि। पाँच देवों का वर्गीकरण इन्हीं विशेषताओं के अनुपात से किया है। विभिन्न स्वरूप विभिन्न क्षेत्रों में प्रकट होने वाले उत्कृष्टता के ही पाँच स्वरूप है। वैभव सम्पन्नों को दैत्य (समृद्ध) और ऐश्वर्यमान महामानवों को दैव (उदात्त) कहा गया है।

वैभव उपार्जन करने के लिए आवश्यक ज्ञान और साधन जिस प्रकार प्राप्त किए जा सकते हैं, इसे शिक्षा कहते हैं। ऐश्वर्यवान बनने के लिए जिस ज्ञान एवं उपाय को अपनाना पड़ता है, उसका परिचय विद्या से मिलता है। विद्या का पूरा नाम ऋतम्भरा प्रज्ञा या विद्या है। इसका ज्ञान पक्ष योग और साधन पक्ष तप कहलाता है। योग उपासना है और तप साधना। इन्हें अपनाना परम पुरुषार्थ कहलाता है। अन्तराल में प्रसुप्त स्थिति में पड़ी हुई बीज रूप में विद्यमान शक्ति को सक्रिय बनाने में जितनी सफलता मिलती है, वह उतना ही बड़ा महामानव -सिद्ध पुरुष देवात्मा एवं अवतार कहलाता है।
ब्रह्म चेतना-गायत्री सर्व व्यापक होने से सर्व शक्तिमान है। उसके साथ विशिष्ट घनिष्ठता स्थापित करने के प्रयास साधना कहलाते हैं। इस सान्निध्य में प्रधान माध्यम भक्ति है। भक्ति अर्थात् भाव संवेदना। भाव शरीरधारियों के साथ ही विकसित हो सकता है।  साधना की सफलता के लिए भाव भरी साधना अनिवार्य है। मनुष्य को जिस स्तर का चेतना -तंत्र मिला है, उसकी दिव्य शक्तियों को देव -काया में प्रतिष्ठापित करने के उपरान्त ही ध्यान धारणा का प्रयोजन पूरा हो सकता है। तत्त्वदर्शियों ने इस तथ्य को ध्यान मे रखते हुए समस्त दिव्य शक्तियों के स्वरूप मानव आकृति में प्रतिष्ठित किए हैं। यही देवता और देवियाँ हैं। गायत्री को आद्य शक्ति के रूप में मान्यता दी गई है। निराकार उपासक प्रातःकाल के स्वर्णिम सूर्य के रूप में उसकी धारणा करते हैं।

आद्य शक्ति गायत्री को संक्षेप में विश्वव्यापी ब्रह्म चेतना समझा जाना चाहिए। उसकी असंख्य तरंगें हैं अर्थात् उस एक ही महासागर में असंख्यों सागर की जलराशि के अंग अवयव ही माना जायेगा। गायत्री की सहस्र शक्तियों में जिन 24 की प्रधानता है, वे विभिन्न प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त होने वाली शक्ति धाराएँ हैं। 24 अवतार, 24 देवता, 24 ऋषि, 24 गीताएँ आदि में गायत्री के 24 अक्षरों का ही तत्त्वज्ञान विभिन्न पृष्ठ भूमियों में बताया, समझाया गया है। इन 24 अक्षरों में सन्निहित शक्तियों की उपासना 24 देवियों के रूप में की जाती है।

तथ्य को समझने में बिजली के उदाहरण से अधिक सरलता पड़ेगी। बिजली सर्वत्र संव्याप्त ऊर्जा तत्व है। यह सर्वत्र संव्याप्त और निराकार है। उसे विशेष मात्रा में उपार्जित एवं एकत्रित करने के लिए बिजली घर बनाये जाते हैं। उपलब्ध विद्युत शक्ति को स्विच तक पहुँचाया जाता है। स्विच के साथ जिस प्रकार का यन्त्र जोड़ दिया जाता है, बिजली उसी प्रजोयन को पूरा करने लगती है। बत्ती जलाकर प्रकाश, पंखा चला कर हवा, हीटर से गर्मी, कूलर से ठण्डक, रेडियो से आवाज टेलीविजन से दृश्य, मोटर से गति -स्पर्श से झटका जैसे अनेकानेक प्रयोजन पूरे होते हैं। इनका लाभ एवं अनुभव अलग-अलग प्रकार का होता है। इन सबके यन्त्र भी अलग- अलग प्रकार के होते हैं। इतने पर भी विद्युत शक्ति के मूल स्वरुप में कोई अन्तर नहीं आता है। इन विविधाताओं को उसके प्रयोगों की भिन्नताएँ भर कहा जा सकता है। आद्यशक्ति गायत्री एक ही है, पर उसका प्रयोग विभिन्न प्रयोजनों के लिए करने पर नाम रूप में भिन्नता आ जाती है। और ऐसा भ्रम होने लगता है कि वे एक -दूसरे से पृथक् तो नहीं है ? विचारवान जानते हैं कि बिजली एक ही है। उद्देश्यों और प्रयोगों की भिन्नता के कारण उनके नाम रूप में अन्तर आता है और प्रथकता होने जैसा आभास मिलता है। तत्वदर्शी प्रथकता में भी एकता का अनुभव करते हैं। गायत्री की 24 शक्तियों के बारे में ठीक इसी प्रकार समझा जाना चाहिए।

पेड़ के कई अंग अवयव होते हैं। जड़, छाल, तना, टहनी, पत्ता, फूल, पराग, फल, बीज आदि। इन सबके नाम, रूप, स्वाद, गंध, गुण आदि भी सब मिला कर यह सारा परिवार वृक्ष की सत्ता में ही सन्निहित माना जाता है। गायत्री की 24 शक्तियाँ भी इसी प्रकार मानी जानी चाहिए। सूर्य के सात रंग के सात अश्व पृथक्- प्रथक् निरूपित किए जाते हैं। उनके गुण, धर्म भी अलग- अलग होते हैं। इतने पर भी वे सूर्य परिवार के अन्तर्गत ही हैं। गायत्री की 24 शक्तियों की उपासना को विभिन्न प्रयोजनों के लिए विभिन्न नाम रूपों में किया जा सकता है, पर भ्रम नहीं होना चाहिए कि वे सभी स्वतंत्र एवं विरोधी हैं। उन्हें एक ही काया के विभिन्न अवयव एवं परस्पर पूरक मानकर चलना ही उपयुक्त है।


1-आद्यशक्ति गायत्री :



ब्रह्म एक है। उसकी इच्छा क्रीड़ा- कल्लोल की हुई। उसने एक से बहुत बनना चाहा, यह चाहना- इच्छा ही शक्ति बन गई। इच्छा शक्ति ही सर्वोपरि है। उसी की सामर्थ्य से यह समस्त संसार बन कर खड़ा हो गया है। जड़ चेतन सृष्टि के मूल में परब्रह्म की जिस आकांक्षा का उदय हुआ, उसे ब्राह्मी, शक्ति कहा गया। यही गायत्री है। संकल्प से प्रयत्न, प्रयत्न से पदार्थ का क्रम सृष्टि के आदि से बना है और अनन्त काल से चला आया है। प्रत्यक्ष तो पदार्थ ही दीखता है। सूक्ष्मदर्शी वैज्ञानिक जानते हैं कि पदार्थ की मूल सत्ता, अणु संगठन पर आधारित है। यह अणु कुछ नहीं, विद्युत तरंगों से बने हुए गुच्छक मात्र हैं। यह सूक्ष्म हुआ। उससे गहराई में उतरने वाले तत्वदर्शी अध्यात्म वेत्ता जानते हैं कि विश्व व्यापी विद्युत तरंगें भी स्वतंत्र नहीं है, वे ब्रह्म चेतना की प्रतिक्रिया भर हैं।


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