प्रतिघात - नागनाथ इनामदार Pratighat - Hindi book by - Nagnath Inamdar
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प्रतिघात

नागनाथ इनामदार

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :476
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 414
आईएसबीएन :81-263-1031-6

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इतिहासपरक कथालेखन के माध्यम से आधुनिक मराठी में अपना एक विशिष्ट स्थान रखने वाले नागनाथ इनामदार के सशक्त मराठी उपन्यास "झुंझ" का हिन्दी रूपान्तरण...

Pratighat - A Hindi Book by - Nagnath Inamdar प्रतिघात - नागनाथ इनामदार

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा लगाये गये स्वराज-वृक्ष को जिन मराठा घरानों ने पल्लवित-पुष्पित किया, उनमें एक होलकर घराना था। इस घराने के मूल पुरुष तुकोजीराव होलकर के वंशजों में मल्हारराव होलकर के एक अनौरस पुत्र थे- यशवन्तराव होलकर। मराठा इतिहास में वे एक चमत्कार हैं। बीस वर्ष की अवस्था में ही होलकर रियासत का स्वामित्व उन्हें सँभालना पड़ेगा, इसकी कल्पना तक उन्होंने नहीं की थी। मराठा इतिहास में उनका उदय आकस्मिक नहीं था। अजेय समझी जाने वाली अँग्रेजी फ़ौज को उन्होंने जो सबक सिखाया वह इतिहास की गाथा बन गया।
स्वराज के सम्बन्ध में यशवन्तराव की व्याकुलता प्रतिघात के प्रत्येक पृष्ठ पर झलकती है। इसके बावजूद, उनके चरित्र का एक दूसरा पहलू भी रहा है। वे दासीपुत्र थे और मराठा राज्य में जाति-भेद का विचार समाज में गहरी जड़ें जमाये हुए था। इन परिस्थितियों में उत्तराधिकार का प्रश्न उत्पन्न होने पर यशवन्तराव होलकर कितने स्वीकार्य रहे होंगे, यह विचारणीय है। पराक्रमी-मानी होकर भी यशवन्तराव महाभारत के सूतपुत्र कर्ण की तरह इस विषय में निरुपाय थे। मैं कितना ही पराक्रम करूँ, पर ऐसे में क्या मुझे कुछ प्राप्त होगा?- यह टीस उन्हें सदैव सालती रही।
हिन्दी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है नागनाथ इनामदार के सशक्त मराठी उपन्यास "झुंज" का रूपान्तर प्रतिघात !

अर्चन


‘प्रतिघात’ में यशवंतराव होलकर की वेदना को साकार करने का प्रयत्न मैंने किया है। जीवन के अन्तिम क्षण तक यशवंतराव के मन में यह टीस कसकती रही कि श्रीमन्त पेशवा ने मुझ पर अन्याय किया है-मेरी निष्ठा को समझने का प्रयत्न उन्होंने कभी नहीं किया है। उस समय घटना-चक्र भी कुछ इस प्रकार चला कि श्रीमन्त पेशवा अपने इस सेवक पर विश्वास नहीं कर सके।
श्रीमन्त बाजीराव पेशवा (प्रथम) की विजिगीषु राजनीति के कारण अनेक मराठा घरानों का उदय हुआ। इससे साधारण जन का असाधारण कर्तृत्व उभरकर आया ! श्रीमन्त पेशवा ने इन घरानों के शूर पुरुषों का सम्मान किया, उनके गुणों की प्रशंसा की तथा कुशलता से उनका उपयोग किया। उनको बढ़ावा दिया। उनकी पीठ थपथपायी। परिणाम यह हुआ कि ये स्व-शक्ति के बल पर बड़े-बड़े साहसिक राजनीतिक निर्णय लेकर शिवाजी महाराज द्वारा लगाये गये स्वराज्य के पौधे को अपने रक्त-मांस से सिंचित-पोषित करने लगे। देखते-ही-देखते वह पौधा वृक्ष होकर लहलाहने लगा और उसकी शाखा-प्रशाखाओं ने लगभग पूरे भारत पर छाया कर दी। इन पराक्रमी घरानों में एक घराना होलकरों का था। उस घराने के मूल पुरुष मल्हारराव होलकर थे। वे मालवा के सूबेदार थे। नाना साहब पेशवा मल्हारराव को ‘काका’ कहते थे तथा मल्हारराव भी अपना ममतापूर्ण अधिकार पेशवाओं के घर में निजी कार्यों में भी रखते थे।

इसी समय का दूसरा प्रसिद्ध घराना शिन्दों का था। परन्तु मल्हारराव होलकर के सामने उस घराने का तेज उतना प्रकाशित नहीं हुआ। ज्येष्ठत्व का मान होलकर का ही रहा। आगे चलकर स्थितयाँ तेजी से परिवर्तित हुईं। मल्हारराव के जीवन-काल में ही उनका एकमात्र पुत्र दिवंगत हो गया। तब होलकरों की रियासत सँभालने का चुनौती-भरा कार्य मल्हारराव की पुत्रवधू अहल्याबाई को करना पड़ा। यह कार्य अत्यन्त दुष्कर था परन्तु अहल्याबाई ने इसे बड़ी दक्षता से पूर्ण किया। अहल्याबाई के सामने ही उनका एकमात्र पुत्र भी दिवंगत हो गया। इसके साथ ही मल्हारराव के औरस वंश का अन्त हो गया। तब अहल्याबाई ने श्रीमन्त पेशवा के द्वारा होलकर रियासत की अलग व्यवस्था करवायी। तदनुसार अहल्याबाई महेश्वर में रहकर रियासत का कार्य देखती थीं तथा होलकर घराने के तुकोजी होलकर होलकर फौ़ज की देखभाल करते थे और श्रीमन्त पेशवा के बुलाने पर फ़ौज लेकर युद्ध के लिए जाते थे। लगभग इसी समय शिन्दों के वंश में महादजी शिन्दे अग्रसर हो चुके थे।

मल्हारराव होलकर की मृत्यु के कारण उत्तर भारत की मराठा राजनीति में जो एक रिक्तता उत्पन्न हो गयी थी, उसकी पूर्ति महादजी शिन्दे ने बड़ी कुशलता से कर दी और देखते-ही-देखते होलकर का नाम पीछे रह गया, होलकर रियासत का स्थान गौण हो गया। और फिर एक दिन क्षुद्र कारण से लाखोरी की युद्ध-भूमि पर होलकर और शिन्दों की फौज़ों में लड़ाई हुई। उस लड़ाई में होलकरों की फ़ौज पराजित हो गयी। भारत में अजेय समझी जानेवाली होलकर फ़ौज विनष्ट हो गयी। अपने पराक्रमी शवसुर की दिगन्त कीर्ति का साक्षात्कार करनेवाली अहल्याबाई इस अपमान से व्याकुल हो उठीं। वे एक नारी थीं। मैं अपने श्वसुर के यश की रक्षा नहीं कर सकी-यह शल्य उर में लिये ही सन् 1795 ई. में उनका स्वर्गवास हो गया। अहल्याबाई की मृत्यु के बाद तुकोजी होलकर ही सूबेदार की गादी पर आसीन हुए। उनके उत्तराधिकारी उनके दो औरस पुत्र काशीराव और मल्हारराव थे। उनके दो अनौरस पुत्र भी थे-बड़ा था विठोजी और छोटा था यशवन्तराव। तुकोजी होलकर के बाद गादी पर काशीराव आया। वह दुर्बल शरीर का था। उसका शरीर पक्षाघात से पीड़ित था। छोटा मल्हारराव शूर था, परन्तु अविचारी था। उसको यह स्वीकार नहीं था कि काशीराव उसकी उपेक्षा करके अकेले ही रियासत का काम-काज देखें। उसने अपना विरोध प्रकट रूप से अपने कार्यों से प्रदर्शित कर दिया।

अहल्याबाई की मृत्यु के कुछ पूर्व पुणे में महादजी शिन्दे की मृत्यु हो गयी थी। लगभग इसी समय मराठा स्वराज्य के पेशवा सवाई माधवराव साहब की भी अकालमृत्यु हो गयी। इससे सम्पूर्ण मराठाशाही कम्पित हो उठी। नाना फडणीस भी विमूढ़ हो गये। बड़े बे-मन से नाना ने पेशवाओं की गादी पर अन्तिम बाजीराव पेशवा को बैठाया। शिन्दों की गादी पर महादजी बाबा के भतीजे दौलतराव बैठे। इसी समय तुकोजी होलकर की मृत्यु हो गयी। होलकरों के झगड़े में दौलतराव शिन्दे ने काशीराव का पक्ष लिया। इस चिन्गारी से जो विस्फोट हुआ उसमें सम्पूर्ण मराठाशाही झुलस गयी।
‘प्रतिघात’ उपन्यास प्रारम्भ होने से पूर्व उपयुक्त राजनीतिक परिस्थिति थी।

उपन्यास में मैंने यशवन्तराव का कैसा वर्णन किया है- यह मैं यहाँ नहीं कह रहा हूँ। उसका निर्णय पाठकों को उपन्यास पढ़कर स्वयं करना है। वह किस लक्ष्य के लिए अविश्रान्त प्रयासरत था ? उसके मन में कौन से स्वप्न थे ? क्या उसका व्यक्तित्व इतना महान था कि वह इतिहास की धारा को मोड़ सके ? इन प्रश्नों के उत्तर पाठकों को स्वयं प्राप्त करने हैं।
यशवन्तराव के अतिरिक्त उपन्यास का अन्य प्रमुख पात्र तुलसा है। वह सुन्दर है-ढीठ भी है। राजनीति करने की धमक उसमें है। यह स्त्री यशवन्तराव के झंझावती प्रेम की पात्र है।

तुलसा कौन थी- इस संबंध में केवल माल्कम का ही लिखा हुआ वर्णन हमारे सामने है। माल्कम के अतिरिक्त अन्य किसी इतिहासकार ने तुलसा के संबंध में कुछ भी नहीं लिखा है। माल्कम होलकरों का प्रथम क्रम का शत्रु था। पूरे हिन्दुस्तान में अपनी कवायती फ़ौज की डींग मारनेवाले अँग्रेज़ों का नशा केवल यशवन्तराव ने ही उतारा था। अन्तिम क्षण तक अग्रेज़ों की तैनात फ़ौज को स्वीकार न करनेवाला केवल यशवन्तराव ही था। मराठाशाही के अन्तिम समय में अपनी स्वतंत्रता को मृत्यु तक अक्षुण्ण रखनेवाला वही एक पुरुषोत्तम था। अँग्रेज़ों की आँखों में वह कितना खटकता होगा, इसकी कल्पना की जी सकती है। यशवन्तराव को बदनाम करने का एक भी अवसर अँग्रेज़ चूके नहीं हैं। उसके चरित्र पर मनमाने लांछन अँग्रेजों ने लगाये हैं।

यशवन्तराव होलकर मराठा इतिहास में एक चमत्कार है। वह एक सैनिक है। बीस वर्ष की अवस्था में ही होलकर रियासत का स्वामित्व उसे सँभालना पड़ेगा, इसकी कल्पना यशवन्तराव ने स्वप्न में भी नहीं की थी। मराठा इतिहास में उसका आकस्मिक उदय हुआ। अजेय समझी जानेवाली अँग्रेज़ों की फ़ौज को उसने जो पाठ पढ़ाया, उसे देखकर मुझे नैपोलियन का स्मरण हो आता है। योगायोग यह कि नैपोलियन और यशवन्तराव दोनों समकालीन थे और दोनों ने एक ही का सामना किया था।

केसर यशवन्तराव की सखी थी। उसके संबंध में उपन्यास में मैंने जो वर्णन किया है वह बड़े प्रयत्न से मुझको उपलब्ध हुआ था। यशवन्तराव का पता लगाते-लगाते मैं मालवा में सैकड़ों कोस भटका था। गाँवों में घूमा था। ऐसे ही एक गाँव में परम्परागत गीत गानेवाला एक भाट मुझको मिला। उसके पास पूर्वजों के लिखे हुए हज़ारों पृष्ठ थे। उसने श्रद्धापूर्वक वे सब पृष्ठ मुझे पढ़कर सुनाये। उनमें मुझे केसर का वर्णन मिला। तदनन्तर भानपुर में लाक्षणिक अर्थ में मैंने केसर को देखा। उसका गाना सुना। इस सबके आधार पर ‘प्रतिघात’ में केसर का चरित्रांकन हुआ है।

यशवन्तराव होलकर की स्वराज्य के संबंध में व्याकुलता ‘प्रतिघात’ में प्रत्येक पृष्ठ पर दिखाई देती है। यशवन्तराव दासीपुत्र था। परन्तु उस काल में दासीपुत्र होना कोई बड़े आश्चर्य की बात नहीं थी। उस काल में प्रत्येक सरदार-ज़मींदार और अच्छी स्थितिवाला प्रत्येक गृहस्थ एकाध अंगवस्त्र रखता ही था। अनौरस सन्तति इतनी अधिक संख्या में होने पर ‘हम हीन कुल के हैं’-यह विचार इन अनौरस सन्तानों के मन में शायद अधिक नहीं खटकता था। यशवन्तराव जैसे पराक्रमी वीर के मन को तो यह न्यूनता स्पर्श भी नहीं कर सकती थी। मराठा राज्य के समय में जाति-भेद अत्यन्त तीव्र था। जाति-प्रथा जन्म पर आधारित थी। जाति के अनुसार उच्चता-नीचता की कल्पना समाज में गहरी जड़े जमाए हुए थी। ऐसी सामाजिक परिस्थिति में जिसका जन्म विवाहेतर संबंध से हुआ हो-ऐसे व्यक्ति के उत्तराधिकार का प्रश्न उत्पन्न होने पर उस काल के लोग इसे कितना मान देते होंगे, यह विचारणीय है। सूतपुत्र कर्ण की व्यथा प्रसिद्ध है। इसी प्रकार बाजीराव पेशवा (प्रथम) ने इस सामाजिक बंधन से कितना संताप पाया था, यह भी इतिहास में लिखा हुआ है। वह स्वयं समर्थ पेशवा था, परन्तु मस्तानी से उत्पन्न हुई उसकी सन्तान को उस काल की रूढ़िवादिता ने अत्यन्त हीन समझा था। ऐसे दासीपुत्रों की-कुँवरोंकी-बस्ती भी अलग होती थी।

इन्दौर में कुँवरगली है। उस काल के समाज ने-इसमें ब्राह्मण और मराठा दोनों आते हैं-अनौरस सन्तति को सदैव हीन समझा। इन सन्तति के मन में यह शल्य कितना कसकता रहा होगा, इसका बड़ा उदाहरण महादजी शिन्दे हैं। महादजी शिन्दे के पराक्रम और कू़टनीतिज्ञता में कोई सन्देह कर ही नहीं सकता, परन्तु उन्हें भी कुलीन मराठों ने अपनी लड़कियाँ नहीं दी थीं। महादजी इससे मर्माहत हुए थे।

पेशवा के दरबार में जो पक्ष यशवन्तराव के विरुद्ध था उसने यशवन्तराव को सूबेदारी के वस्त्र न देने के लिए यही तर्क दिया था कि यशवन्तराव हीन कुल का है। ये बातें क्या यशवन्तराव तक नहीं पहुँचती होंगी ? वह सब समझता था। उस समय पराक्रमी-मानी व्यक्ति इन घटनाओं की ओर निरुपाय भाव से देखता था। मैं कितना ही पराक्रम करुँ, परन्तु मेरे कलंक के कारण मुझको यश मिलेगा ही नहीं, यह टीस उसे सदैव कसकती रहती थी। जो अपने को कुलीन समझते थे उनका दुर्बल कर्तृत्व उसे दिखाई देता था, परन्तु वह कुछ भी नहीं कर सकता था।
इन्दौर के क्षत्रिय धनगर समाज ने इस उपन्यास के लिए मुझे सम्मानित किया तो मुझको ऐसा लगा जैसे महाराज यशवन्तराव होलकर ने ही ‘साधु’ कहकर मेरी पीठ थपथपायी हो ! उनके इस अपनत्व का उल्लेख करना मैं अपना कर्तव्य समझता हूँ और यह अर्चन यहीं समाप्त करता हूँ।
 
 

नागनाथ इनामदार


प्रतिघात


वैशाख महीना।
सूर्यास्त हो गया था। पुणे के पास मुलामुठा नदी के परिसर में सूबेदार तुकोजीराव होलकर की छावनी फैली हुई थी। छावनी पर सन्ध्या-छायाएँ सघन हो रही थीं। मध्यभाग में एक लंबे बाँस पर सूबेदार का श्वेत-लाल पट्टियों का चितकबरा ध्वज फहरा रहा था। ध्वज के सामने विशाल डेरा लगा हुआ था। डेरे के चारों ओर पीले झगले पहने हुए होलकर के पहरेदार हाथ में बड़े-बड़े फालोंवाले भाले लिये हुए पहरा दे रहे थे।
डेरे में चिराग़दान प्रकाश कर रहे थे। मध्यभाग में एक विशाल पलँग पर वृद्ध सूबेदार तुकोजीराव होलकर अपने जीवन की अन्तिम घड़ियाँ गिन रहे थे।

डेरे में एक कोने में होलकर की गद्दी थी। गद्दी पर मसनद से टिकी हुई रत्नजड़ित मूठवाली तलवार मखमली म्यान में रखी हुई थी। सामने राज्याधिकार की चिह्न ‘सिक्काकटार’ रखी हुई थी।
निजी सचिव गोविन्दपन्त गानू तथा दरबार में सम्मान के अधिकारी तथा वंश-परंपरा से बड़े पदाधिकारी आनन्दराव माधव, शुकजी वरेडे, सोमाजी लाँभाते, बारगल आदि हालचाल जानने के लिए आये थे। सभी के मुखमण्डल चिन्ताग्रस्त थे।

सूबेदार के पैरों के पास पलँग पर ही टिककर उनके सबसे छोटे पुत्र यशवन्तराव बैठे हुए थे। उन्होंने अपने पिता की देह पर पड़ी हुई चादर को व्यवस्थित किया। सूबेदार की मुँदी हुई आँखों को देखकर वे धीरे-से उठे। हालचाल जानने के लिए आयी हुई मण्डली भी उठी और आवाज़ न करते हुए वे सभी चुपचाप डेरे से बाहर चले गये।
परन्तु गोविन्दपंत गानू बैठे ही रहे। वे धीरे से यशवन्तराव के कान में बोले, ‘‘सूबेदार ने कोई निर्णय किया है क्या?’’
यशवन्तराव ने सिर हिलाकर इनकार किया।
इतने में ही सूबेदार तुकोजीराव ने आँखें खोलीं। उन्होंने ने क्षीण आवाज़ में यशवन्तराव से पूछा, ‘‘यशवन्त ! काशीराव कहाँ हैं ?’’

‘‘काशीराव दादा अलिजा बहादुर की छावनी में दोपहर को ही चले गये थे। लगता है कि अभी तक लौटकर नहीं आये हैं।’’ यशवन्तराव ने तुकोजीराव के पास जाकर कहा।
सूबेदार के निस्तेज मुख पर आश्चर्य छा गया। उनके मस्तक पर सिकुड़नें और सघन हो गयीं। उन्होंने बड़े कष्ट से गानू की ओर मुड़कर पूछा, ‘‘सचिव ! शिन्दों की छावनी में काशीराव इस समय क्यों गया है ? अभी उसको गादी पर बैठने में अवकाश है !’’
गानू एक दम उठकर खड़े हो गये। उन्होंने अंगवस्त्र की घड़ी व्यवस्थित की। वे यह निर्णय नहीं कर पा रहे थे कि बोलें या न बोलें। उनके होठ हिल रहे थे,परन्तु उनसे शब्द नहीं निकल रहे थे।

तुकोजीराव की काँपती हुई आवाज़ पुन: उनके कानों में पड़ी, ‘‘शिन्दे हमारे साथी-संगीत हैं, लेकिन उनके काम दुश्मनों जैसे हैं। और जब से पेशवाओं की गादी पर श्रीमन्त बाजीराव साहब बैठे हैं तब से तो उनके पैर धरती पर पड़ ही नहीं रहे हैं। मालवा में हमारा राज्य उनकी आँखों में चुभ रहा है। उसको कैसे हथियाया जा सकता है-इसी ओर उनका ध्यान है। ऐसी स्थिति में हमारे गादी के उत्तराधिकारी हमारे ज्येष्ठ पुत्र काशीराव जब उनकी छावनी में गये तब आपने उनको रोका क्यों नहीं ?’’
‘‘मैंने यथाशक्ति प्रयत्न किये महाराज !’’ गानू को कहने का अवसर मिल गया। वे धड़ाधड़ कहने लगे, ‘‘लेकिन उन्होंने एक नहीं सुनी। बोले-शिकार करने जाता हूँ। मैंने उनसे यहाँ तक कहाँ कि महाराज बीमार हैं, इसलिए शिकार को जाना योग्य नहीं है। परन्तु कोई बात न मानकर वे चले गये।’’
‘‘वह विकलांग क्या शिकार करेगा ?’’इतना कहकर सूबेदार ‘मार्तण्ड-मार्तण्ड’ कहकर चुप हो गये। उनको अपनी आँखों के सम्मुख अपने चारों पुत्र दिखाई देने लगे।
 
सबसे बड़े काशीराव थे। गादी के भावी उत्तराधिकारी-परन्तु विकलांग। पक्षाघात से उनके शरीर का वाम भाग अत्यन्त निष्क्रिय हो गया था। दूसरे मल्हारराव बहुत ही उद्दण्ड थे। काशीराव को तो कुछ समझते ही न थे। वे कभी-कभी स्वयं सूबेदार की भी अवज्ञा कर देते थे। विठोजी और यशवन्तराव का स्मरण होते ही तुकोजीराव को इन लड़कों की माता की-अपनी खाण्डारानी यमुना की-याद एकदम आ गयी उनके पलँग के पीछे चिक का परदा पड़ा हुआ था। उस परदे के पीछे यशवन्तराव की माता यमुनाबाई दिन-भर बैठी रहती है- ये बात वो जानते थे।

मेरे बाद मेरे इन दो अनौरस पुत्रों का क्या होगा- इस विचार ने उनके मन में घबराहट पैदा कर दी। कुछ वर्ष पहले ही खरड़ा की लड़ाई में अपने अस्सी सवारों के पथक के साथ यशवन्तराव ने जो पराक्रम किया था-वह उनको दिखाई देने लगा। होलकर के अनुभवी सरदारों ने यशवन्तराव का पराक्रम देखकर आश्चर्य व्यक्त किया था। उसी समय सूबेदार को स्मरण हो आया। यशवन्तराव के पथक का वेतन चढ़ा हुआ था। सवारों को पैसे न मिलने के कारण वे रोज़ यशवन्तराव के पास आकर धरना देकर बैठ रहे थे।
तुकोजीराव ने यशवन्तराव की ओर देखा। बीस-इक्कीस के इस सुडौल युवक का चेहरा सुतीक्ष्ण और प्रसन्न था। होठों पर मूँछों से और हनु पर छोटी सी दाढ़ी से उनके रौब में और वृद्धि हो रही थी। अपने अधीनस्थ लोगों पर उसका अद्भुत प्रभाव था। वह सूबेदार ने स्वयं देखा था।

कुछ देर बाद सूबेदार बोले, ‘‘यशवन्त !’ तुम्हारे घुड़सवारों का बका़या वेतन तत्काल अदा करने को हमने काशीराव से कहा था। तुमको वह पैसा मिल गया गया न ?’’
यशवन्तराव ने बग़ल में खड़े सचिव की ओर देखा।
गोविन्दपंत बोले, ‘‘आपके आदेशानुसार मैं पैसे अदा करने जा रहा था कि काशीराव ने मना कर दिया। इस बात से छोटे मालिक बहुत दु:खी हैं।’’

‘‘क्यों मना किया ? हमारी अवज्ञा क्यों की ?’’
गानू कुछ न बोले। यशवन्तराव भी चुप खड़े रहे। सूबेदार दोनों की ओर देख रहे थे। फिर उन्होंने ही कहा, ‘‘हम समझ गये। काशीराव का मन साफ़ नहीं है। परन्तु सौतेला होते हुए भी यशवन्तराव उसका भाई ही है। हमारा ही अंश है। वेतन के लिए सवार उसके पास धरना देकर बैठें, यह हम सहन नहीं करेंगे। गोविन्दपंत ! इसी समय आप स्वयं जाकर फ़ौज का वेतन बाँट दें। जाइए !’’

फिर भी गानू कर्तव्यविमूढ़-से खड़े रहे। तब सूबेदार की दृष्टि टालकर यशवन्तराव ने ही कहा, ‘‘सरकारी खज़ाने पर काशीराव दादा का पहरा बैठा हुआ है। उन्होंने कठोर आदेश दिया कि उनके आदेश के बिना फूटी कौड़ी भी बाहर नहीं जानी चाहिए।’’
‘‘अच्छाऽ! हमारे सामने हमारा इतना अपमान मार्तण्ड-मार्तण्ड!..यशवन्त ! तुम्हारी फ़ौज का कितना वेतन चढ़ा हुआ है ?’’
‘‘दस हज़ार रुपये।’’
‘‘ठीक है। यह हमारा कण्ठा लो। इसको रखकर पुणे के साहूकार से पैसे ले लो और अपने पथक का हिसाब चुकता कर दो !’’यह कहकर तुकोजीराव ने अपनी क्षीण गर्दन तकिये से थोड़ी-सी उठायी। गले से बड़े-बड़े मोतियों का हार निकालकर उन्होंने यशवन्तराव की ओर फेंक दिया और एक दम मुख मोड़कर डेरे की कनात की ओर देखते रहे। दुर्बल सन्ताप से अश्रु-प्रवाह को वे रोक नहीं सके।

यशवन्तराव ने उस कण्ठे को उठाया। मस्तक से लगाया। सूबेदार के पलँग के पास जाकर उन्होंने वह कण्ठा सूबेदार के तकिये के पास कख दिया। फिर बोले, ‘‘महाराज ! आपके कष्ट में देखकर क्या हमको सन्तोष मिल सकेगा ? इस कण्ठे को आप अपने कण्ठ में ही शोभित होने दें। आपकी कृपा से लक्ष्मीकान्त मेरी इन भुजाओं में अपार बल प्रदान करे-यह आशीर्वाद मुझको प्रदान करें। फिर वेतन की तो बात ही क्या ? भाग्य ने साथ दिया तो धन का पहाड़ खड़ा हो जाएगा !’’
मन के आवेग कम होने पर तुकोजीरीव ने फिर करवट बदली। गोविन्दपन्त गानू से उन्होंने कहा,‘‘पन्त!  यशवन्त पर हमको विशवास है। बड़े सूबेदार की साकार प्रतिमा है यह। इसको राज्य का स्वामी होना चाहिए था, परन्तु दुर्भाग्य से अनुज बनकर पैदा हुआ। खाण्डारानी से जन्म लिया है-इसलिए कभी-कभी डर लगता है। इसके तेज के सम्मुख हमारे ज्येष्ठ चिरंजीव और गादी के उत्तराधिकारी कैसे टिक पाएँगे ? अब तक गादी संबंधी अनेक झगड़े राजपूताने में हमने सुलझाये हैं। बड़प्पन का गौरव मानकर स्वयं पेशवाओं को गृह-कलह में भी हमने मध्यस्थता की है। अब हमारे घर में यह कलह न घुसे-इतनी ही मार्तण्ड से प्रार्थना है !’’

‘‘यह चिन्ता महाराज न करें। यशवन्तराव अपने अग्रज का सम्मान करते हैं। वे कभी उनकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं करेंगे। महाराज व्यर्थ चिन्ता न करें।’’
‘‘ऐसा ही हो-खण्डोबा से यही हमारी प्रार्थना है।’’ सूबेदार धीरे से बोले।
सूबेदार के स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं हो रहा था।
प्रात:काल सूबेदार की खाण्डारानी यमुनाबाई अपने डेरे में तुलसी की पूजा कर रही थीं। लगभग चालीस वर्षीय यमुनाबाई गौरवर्ण की थीं। परन्तु जब से सूबेदार रोगग्रस्त हुए थे तभी से उनके व्रत-उपवास निरंतर चल रहे थे। इसलिए उनकी मूल गौर-प्रकृति अब स्याह पड़ गयी थी।
सेविका फुली शीघ्रता से उनके पास आकर बोली, ‘‘बाहर छोटे मालिक यशवन्तराव आये हैं। मिलने की अनुमति चाहते हैं।’’

‘‘क्यों ? स्वामी की तबीयत ज़्यादा बिगड़ गयी क्या ? जा। यशवन्त को बुला ला। दौड़कर जा।’’
यशवन्तराव ने अन्दर आते ही अपनी माता के चरण स्पर्श किये और उसके सामने अदब से खड़े हो गये।
‘‘यशवन्त ! तुम्हारे पिता जी की तबीयत ठीक है न ?’’ यमुनाबाई ने चिन्तित स्वर में पूछा।
‘‘औषध चल रही है। वैद्य कहते हैं-जल्दी ही लाभ होगा। परन्तु माँ ! सूबेदार जी ने कल दो-तीन बार तुम्हारे विषय में पूछा। तुमको बुलवाने के लिए सेवक भेजे। तुम कहाँ थीं ?’’
यमुनाबाई की आँखों में तत्काल आँसू आ गये। वे बोलीं, ‘‘यहीं थी रे ! परन्तु मुझको उनसे मिलने से मना कर दिया है न ? जीवन-भर उसने छला है। इस अन्तिम घड़ी में भी वह छल रहा है !’’
‘‘किसने मना कर दिया है ? काशीराव दादा ने ?’’ यशवन्तराव ने आश्चर्य से पूछा, ‘‘परन्तु ऐसे समय में मना करने का क्या कारण है ? अपना व्यक्ति देखकर रोगी को थोड़ी शान्ति मिलती है।’’

‘‘यह उसको अच्छा नहीं लगता न ?’’ यमुनाबाई ने अपनी आँखें आँचल से पोछीं। मन का वेग रोककर वे सामने तुलसी की ओर देखती हुई कहने लगीं, ‘‘वह समझता है कि मैं उनसे कुछ माँग लूँगी। शायद उनसे पूछूँगी-मेरी क्या व्यवस्था की ? भावना के आवेश में हो सकता है कि वे एकाध महल मुझको दे दें। इससे होलकरों की दौलत में कमी आ जाएगी न ?’’
यशवन्तराव मौन खड़े थे। वे चकित थे। उनकी माता सूबेदार की विवाहिता पत्नी थीं-यह बात वे अच्छी तरह जानते थे। परन्तु उनके पिता उनकी माता को कितना चाहते थे-यह भी वह अच्छी तरह जानते थे। वे भाववेग में बोले, ‘‘नहीं-माँ ! मैं यह सहन नहीं करूँगा। मैं तुमको अपने साथ उनके डेरे में ले चलता हूँ। देखता हूँ-मुझको कौन रोकता है ?’’
यमुनाबाई ने मुड़कर अपने पुत्र की ओर देखा। बड़े पुत्र बिठू की अपेक्षा इस छोटे यशवन्त के प्रति उनका मन बड़ा शंकित रहता था। उसका स्वभाव उतावला था। स्नेहवश उनका पुत्र किसी भी प्रकार का अविचार करने में देर नहीं करेगा, इस बात को वे जानती थीं। परन्तु  यह समय भिन्न था। लड़के की आँखों में झाँकती हुई वे बोली,‘‘ यशवन्त ! तेरा यह उतावलापन कब जाएगा रे ! अरे, यह समय कैसा है ? तुम इस तरह झगड़ा करके मुझको डेरे में ले जाओगे तो यह उनको भी क्या अच्छा लगेगा ?’’

और फिर अपनी गर्दन मोड़कर सामने तुलसी की ओर देखती हुई वे मानो स्वगत कहने लगीं, ‘‘मैं भले ही उनके डेरे में न जाऊँ-परन्तु उनको मैं दिखाई न दूँ-ऐसा नहीं हो सकता। मैं कहाँ दिखाई दूँगी-यह वे अच्छी तरह जानते हैं ! मेरे भी सम्मुख उनकी मूर्ति आठों प्रहर रहती है ! पागल कहीं का ! अभी नादान है।’’
यशवन्तराव कुछ कहने जा रहे थे कि उनके पृष्ठभाग की ओर पदचाप सुनाई दी। उन्होंने एकदम मुड़कर देखा। स्त्री-कण्ठ से निकला हुआ आश्चर्य का उद्गार उनके कानों में पड़ा।
दो युवती स्त्रियाँ वहाँ खड़ी थीं। उन्होंने आँचल सिर पर आगे कर रखा था, जिसके उनका मुखमण्डल आवृत हो गया था। दोनों ने ही देह पर आभूषण पहन रखे थे। उनके अनावृत हाथों से उनका वर्ण गौर दिखाई दे रहा था। उनमें एक लगभग सोलह वर्ष की गुलाबी साड़ी पहने हुए थी। वह यशवन्तराव की पत्नी लाडाबाई थी। दूसरी उससे एक वर्ष छोटी थी। वह यशवन्तराव के सौतेले भाई तथा सूबेदार के औरस पुत्र मल्हार राव की पत्नी जयाबाई थी। उसने हरे रंग की गर्म रेशमी साड़ी पहन रखी थी। साड़ी का लाल आँचल बड़ा अच्छा लग रहा था। हाथ मेहँदी से रँगे हुए थे।
यशवन्तराव एक मुख से एकदम शब्द निकले, ‘‘आप ! और यहाँ !’’

उसी समय यमुनाबाई का भी ध्यान अपनी बहुओं की ओर गया। जयाबाई उनके सौतेले लड़के की बहू थी, परन्तु यमुनाबाई के मन में सपत्न्य-भाव कभी नहीं आया था। वे उसके साथ अपनी पुत्रवधू जैसा ही व्यवहार करती थीं। यशवन्तराव के शब्द सुनते ही लाडाबाई और जयाबाई एकदम घबरा गयीं।
यह देखकर यमुनाबाई मुस्करा पड़ीं। उनके मन पर छायी विषण्णता एकदम कम हो गयी। उन्होंने विहँसकर बहुओं से कहा, ‘‘अरी लड़कियों ! आकर एकदम चुप क्यों खड़ी हो ? बोलतीं क्यों नहीं ?’’
फिर भी वे चुपचाप खड़ी रहीं। उनकी कठिनाई यशवन्तराव समझ गये। उन्होंने यमुनाबाई से कहा, ‘‘मैं जाता हूँ। सूबेदार जी के डेरे में कोई नहीं होगा !’’

‘‘ठहर जा रे ! या तू भी लड़कियों की तरह शरमाने लग गया ?’’ इतना कहकर यमुनाबाई तुलसी की पूजा समाप्त कर उठीं। डेरे के मध्यभाग में गलीचा बिछा हुआ था। गलीचे पर बैठती हुई वे बोलीं, ‘‘यशवन्त ! तुम भी बैठ जाओ। मुझको तुमसे कुछ बातें करनी हैं। लाडा-जया ! तुम भी उन पाटों पर बैठ जाओ।’’  
लाडाबाई और जयाबाई पाटों पर अंग सिकोड़कर बैठ गयीं। उनके सामने ही गलीचे पर यशवन्तराव बैठ गये।
‘‘लाडे! तेरी लड़की सुबह से कहीं दिखाई नहीं दी ?’’ यमुनाबाई ने अपनी नातिन के विषय में पूछा।
‘‘जया ! कल मैंने अवलेह दिया था-वह लिया न ? अब तो मिचलाहट बन्द हो गयी न ?’’
‘‘हाँ।’’ अवगुण्ठन की ओर से मधुर स्वर आया।

‘‘बेटी! मैं तो तुम्हारे लिए न जाने क्या-क्या करना चाहती थी ! तुमको क्या अच्छा लगता है क्या नहीं-इसको मैं स्वयं देखना चाहती थी। परन्तु उधर उनकी वैसी दशा देखकर मैं चुप बैठ गयी।’’ यमुनाबाई ने प्रेम से जयाबाई से कहा।
‘‘ओह !’’ बीच में यशवन्तराव के मुख से आश्चर्योद्गार बाहर निकला।
‘‘मुझसे किसी ने नहीं कहा’’-और तत्काल उनको ध्यान आया कि वे माता के सामने बैठे हुए थे। वे सहसा शान्त हो गये।
जयाबाई ने लज्जा से चूर होकर सिर पर आँचल और ज़्यादा खींच लिया। लाडाबाई ने आँचल व्यवस्थित करने के बहाने से यशवन्तराव की ओर देखकर तत्क्षण शरारतपूर्ण इशारा किया।
यमुनाबाई ने यह प्रकट किया जैसे उन्हें कुछ पता ही न हो। वे भोलेपन से बोलीं, ‘‘यशवन्तराव ! तुम्हारे मल्हारराव को पुत्र रत्न होनेवाला है !’’

‘‘यह तो बड़े आनन्द का समाचार है।’’ यशवन्तराव एकदम बोले और उन्होंने चोरी से लाडाबाई की ओर दृष्टि डाली।
यमुनाबाई खिलखिलाकर हँस पड़ीं। उन्होंने लाडाबाई से कहा, ‘‘लाडे ! सुबह-ही-सुबह दोनों मिलकर किसलिए आयी थीं ? अब निस्संकोच कहो।’’
‘‘बाई जाना चाहती हैं।’’ लाडाबाई ने कह डाला।
 













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