कुरते का करिश्मा - भगवती प्रसाद वाजपेयी Kurte Ka Karishma - Hindi book by - Bhagwati Prasad Vajpai
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कुरते का करिश्मा

भगवती प्रसाद वाजपेयी

प्रकाशक : एरागॉन पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स प्रकाशित वर्ष : 2010
पृष्ठ :152
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4157
आईएसबीएन :81-89377-19-1

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‘‘गुप्ता जी, आप अपने कैरियर में कुर्ता-पैजामा पहनते रहे लेकिन रिटायर होते ही टाई-सूट की ड्रेस में क्यों उतर आए ? इस उम्र में केंचुल बदलने की क्या जरूरत थी ? इसमें कुछ राज अवश्य होना चाहिए।’’

Kurte Ka Karishma - A Hindi Book - by Bhagwati Prasad Vajpai

इंजीनियर लक्ष्मीप्रकाश गुप्ता अपने नाम को सदा उजागर करते हुए सिंचाई विभाग में इंजीनियर इन चीफ के ऊँचे पद को कई वर्षों तक सुशोभित करते रहने के बावजूद अपने सारे सर्विस कैरियर में जाड़ा, गर्मी, बरसात, यानी हमेशा लम्बा कुर्ता-पैजामा धारण किए रहे और अपनी सादगी, सरल मुस्कान तथा सद्-व्यवहार के लिए शासन, जनता, प्रेस और प्रदेश के स्टाफ में अपनी लोकप्रियता का ग्राफ बरकरार बनाए रहे।

रिटायरमेंट की तारीख तक उनकी गांधी-नेहरूयुगीन कुर्ताप्रियता का रहस्य सिंचाई विभाग के घाघ ठेकेदार और मंत्री तक कोई भी भाँप नहीं सका। इंजीनियर साहब मधुरभाषी, अल्पभाषी और बहुत हल्की आवाज में बोलने वाले अधिकारी के रूप में जाने जाते रहे सरकार किसी भी पार्टी की आए और जाए, वे अपनी कुर्सी पर मजबूती से जमे रहे और सिंचाई मंत्री की गुडबुक्स में हमेशा चौराहे पर खड़े बिजली के खम्भे की तरह चारों तरफ अपनी रोशनी बिखेरते रहे। विपक्षी दलों के नेताओं का काम वे सबसे पहले करते, पत्रकारों को मनचाहा विज्ञापन दे देते और विधायकों के कहने पर उनके निर्वाचन-क्षेत्र की नहरों में वक्त-बेवक्त पानी छोड़कर किसानों को खुश करते रहते। कुर्ता-पैजामा पहन लेने पर स्थूलकाय और लम्बोदय इंजीनियर साहब सफेद मारकीनी कबर में ढकी बड़ी ढोलक की तरह बीच में फैले हुए जब ऑफिस के जीने चढ़ते तो देखने वालों को उन्हें ऊपर उचकता-उठता हुआ कद दिखलाई पड़ता। जिस दिन उनका रिटायरमेंट हुआ, ऑफिस के बड़े हॉल में कर्मचारियों ने विदाई समारोह आयोजित करते चापलूसी की कविताएँ सुनाकर उनकी कीरत-बख़ानी, एकाउन्ट्स सेक्शन ने उन्हें लक्ष्मी का भाग्यशाली बेटा घोषित किया। पूरे प्रदेश के सभी मण्डलों से सपरिवार पधारे अधीक्षण अभियन्ताओं, अधिशासी अभियन्ताओं और सहायक अभियन्ताओं ने उनकी नई मार्शल जीप में बैठी उनकी पत्नी के हाथों में एक-एक ब्रीफकेश अन्तिम भेंट के रूप में सादर भेंट कर दिया। दो-तीन महीने सहयोगियों, दोस्तों, रिश्तेदारों और सिंचाई विभाग के वफादार ठेकेदारों की दावतें खाते रहने के बाद लक्ष्मीप्रकाश जी ने अपनी गुप्त पंचवर्षीय योजना का विस्तृत प्रारूप तैयार कर डाला और समयबद्ध तरीके से गुपचुप उसका क्रियान्वयन करते हुए दिल्ली, नोयडा, ग़ाजियाबाद और फरीदाबाद में चार एयर कंडीशन मैरेज हॉल और और दो फार्म हाउस बनवाकर खड़े कर दिए। इन सभी नवनिर्मित भवनों के शानदार उद्घाटन समारोहों में भाग लेने वाले सहयोगी, अन्तरंग मित्र, ससुराली रिश्तेदार और दूर से नमस्कार करने वाले पुराने दोस्त गुप्ता जी के कुरता-प्रेम का रहस्य समझने लगे। कुछ लोग उनके पैजामे पर रिसर्ज करने लगे तो कुछ लोग उनकी पतली गांधी टोपी के सफेद कलफ पर गम्भीरता से रिसर्च करने लगे। आखिर में गुप्ता जी के साथ टहलने वाले मार्निंग वाकर्स क्लब के सेक्रेटरी कर्नल भटनागर ने सोचा कि दादरी के एक मामूली परिवार में जन्में, सरकारी वजीफे से पढ़े अपनी पुरानी फिएट कार पर हमेशा चलने वाले गुप्ता जी इतनी जल्दी अरबपतियों की कतार में कैसे खड़े हो गए ? वे अब एक हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र और एक अंग्रेजी साप्ताहिक पत्र के सर्वेसर्वा अधिष्ठाता भी कैसे बन बैठे ? उन्होंने अपने लक्ष्मीप्रकाश के नाम का प्रकाश पश्चिमी उत्तर प्रदेश के पूँजीपतियों की महफिल में कुछ ऐसा बिखेर दिया कि धीरे-धीरे बड़े-बड़े व्यापारिक संगठनों, आयात-निर्यात संस्थानों के प्रेसीडेंट के पद पर निर्विरोध चुन लिए गये। अब वे दिल्ली, चण्डीगढ़, लखनऊ, की शादी-ब्याह के समारोहों में अपनी लेटेस्ट मॉडल की कार में बैठकर शानदार टाई-सूट में सज-धजकर नवदम्पतियों को इक्कीस-इक्कीस गिन्नियों के साथ आशीर्वाद देने लगे। समाचार पत्रों में उनके फोटो और प्रशंसा के बड़े-बड़े कालम छपने लगे। गुप्ता जी के जिगरी दोस्त कर्नल भटनागर ने सुबह टहलते वक्त एक दिन हिम्मत करके उनसे पूछ ही लिया, ‘‘गुप्ता जी, आप अपने कैरियर में कुर्ता-पैजामा पहनते रहे लेकिन रिटायर होते ही टाई-सूट की ड्रेस में क्यों उतर आए ? इस उम्र में केंचुल बदलने की क्या जरूरत थी ? इसमें कुछ राज अवश्य होना चाहिए।’’

‘‘कर्नल साहब मेरे पास राज़ नाम की कोई चीज न कभी थी और न अब है। मेरी ज़िन्दगी एक खुली हुई किताब है।’’ इंजीनियर साहब ने उनके कथन को नकार दिया।

‘‘नहीं गुप्ता जी, आप अपने पुराने दोस्त को, वह भी फौजी अफसर को इस तरह झाँसा मत दीजिए। जवानी की उम्र में सारे सिविल और मिलेट्री आफिसर्स की रुटिन ड्रेस टाई-सूट रहती है, रिटायरमेंट के बाद कुछ अकलमन्द लोग शारीरिक सुविधा की दृष्टि से लखनवी चिकन का कुरता और टेरीकाट का पैजामा पहनना शुरू कर देते हैं। आपने बिलकुल उल्टी गंगा बहाई है। सर्विस पीरियड में हमेशा कुरता-पैजामा और सर पर गांधी टोपी शोभायमान रही और रिटायरमेंट होते ही तरह-तरह के सूट और विदेशी टाइयाँ पहननी शुरू कर दीं। आपकी ड्रेस कोड के इस ‘यूटर्न’ का कोई न कोई सीक्रेट राज़ तो जरूर है।’’ कर्नल साहब ने गुप्ता जी के चेहरे की नाप-जोख करते हुए उन्हें टटोलना चाहा।

‘‘आप मेरे बचपन के लँगोटिया यार हैं। कर्नल साहब, आप सब कुछ जानकर भी मुझसे सुबह-सुबह चुहुलबाजी क्यों कर रहे हैं ?’’ गुप्ता जी ने कर्नल साहब के कन्धे पर हाथ रखते हुए धीरे से उनके कान में कहा।
‘‘लक्ष्मीप्रकाश, मैं तुम्हारी पोल किसी से नहीं खोलूँगा। मैं ड्रेस के मामले में तुम्हारी दल-बदलू नीति की गहराई समझना चाहता हूँ।’’

कर्नल साहब गुप्ता जी का हाथ पकड़कर पार्क के फव्वारे के पास बनी मार्बल की एक साफ-सुथरी छोटी बेंच पर बैठ गए।

‘‘नहीं मानते हो तो सुनो, देवताओं में ब्रह्मा, मनुष्यों में मनु और अक्षरों में ‘अ’ सबसे पहले माना जाता है। ऐसे ही कुरता आदमी की सबसे पहली, पोशाक है। इस मान्यता से क्या आप सहमत नहीं हैं ?’’ गुप्ता जी ने आत्म विश्वास की दृष्टि से कर्नल साहब की आँखों में देखा।

‘‘बिल्कुल नहीं, हरगिज नहीं। डार्विन के विकासवादी सिद्धान्त के अनुसार आदमी के पूर्वज बन्दर कहे जाते थे। वे ‘कुरते’ के विषय में क्या ‘‘विकासवादी नज़रिये से आप यह जानते होंगे ?’’

‘‘विकासादी नज़रिये से आप यह जानते होंगे कि शुरू में बन्दर फिर वनमानुष, फिर एक लम्बे सफर के बाद वनमानुष मनुष्य बन बैठा। इसी विकास-क्रम में जाड़ा, गर्मी, बरसात के खराब मौसम में अपनी खोपड़ी और गुप्तेन्द्रियों को ढकने के लिए पेड़ों के पत्ते, शिकार किए गए पशुओं की खालों का प्रयोग करते-करते दो पत्थरों के बीच में दबाई हुई रूई से उन्हें कपड़ों का ज्ञान हो गया। इसी स्टेज पर वस्त्रों का इतिहास शुरू हो जाता है।’’

कर्नल साहब ने चमकती आँखों से इंजीनियर साहब को ध्यानपूर्वक देखा, ‘‘आप बिल्कुल मनगढ़ंत बातें कहकर मुझे उल्लू मत बनाइए।’’

‘‘आप मेरी बातें ध्यानपूर्वक सुनते और समझते जाइए कर्नल साहब, सबसे पहले चीन, मिस्त्र में कपड़ा बनना शुरू हुआ, कपड़े का व्यापार सात समन्दर पार करके आगे बढ़ा। मर्द और औरत दोनों अपने-अपने गुप्तांगों को ढकने लगे। पहले लज्जावश औरतों ने अपनी कमर के चारों ओर खाल लपेटना छोड़कर कपड़ा लपेटना शुरू किया, फिर मर्दों ने औरतों की नकल की। चरखे के आविष्कार के साथ कपास की खेती बढ़ी। रूई से सूत कातकर घर में कपड़ा बुनने की तकनीक शुरू हो गई। कपड़ा बनते ही सभी मर्द और औरतें अपने शरीर को पूरी तरह ढकने लगे। आखिरकार कपड़े का अल्ट्रामॉडर्न अवतार कुरता-पैजामा हमारे बीच में दिखलाई पड़ गया।’’ इंजीनियर साहब ने अपनी थ्योरी पूरी करके मनमाने ढंग से गलत-सलत बातें कर्नल साहब को समझाने की कोशिश की।

‘‘गुप्ता जी अब आप हाँकना बन्द कीजिए। 21वीं सदी का कोई भी पढ़ा-लिखा और विकासवाद में यकीन रखने वाला व्यक्ति आपकी शेखचिल्ली मार्का कहानी सुनना पसन्द नहीं करेगा। आपको सनकी और गलतफहमी का शिकार होने का सर्टिफिकेट ऊपर से दे देगा। मैं आपकी सिर्फ एक बात से, वह भी आंशिक तौर से सहमत हो सकता हूँ कि शुरू-शुरू में ऊपर के शरीर को उत्तरीय और नीचे के शरीर को तहमद, लुंगी आदि से ढका जाता रहा होगा। आज आप भी उत्तरीय पूर्वी भारत और मध्य अफ्रीका देशों के आदिवासियों की वर्तमान पोशाक देखकर उसके आदिम स्वरूप की आसानी से कल्पना कर सकते हैं।’’ कर्नल साहब गुप्ता जी की गंजी खोपड़ी पर हाथ सहलाते हुए मुस्कराए फिर आगे चालू हो गए, ‘‘जैन, बुद्धकालीन लोग कुरता पहनते थे ? चादर और अधोवस्त्र ही उनकी सर्वग्राह्म पोशाक थी।’’

‘‘चलिए, आपके इस कथन को अर्धसत्य के रूप में स्वीकार कर लेते हैं। आदमी की चादर ने कुरते का और लुंगी ने पैजामे का परिष्कृत रूप प्राप्त कर लिया।’’ इतना कहकर गुप्ता जी बेंच से उठकर घर लौटने की जल्दी करने लगे फिर खड़े होकर कुछ सोचते हुए विद्वत्तापूर्ण मुद्रा में बोले, ‘‘कुरते के इतिहास के बारे में परिधान विशेषज्ञों में हमेशा गहरा मतभेद रहा है। कुछ लोग कुरते को मिस्त्र, अरब और कुछ लोग जो ज्यादा तर्कसंगत लगते हैं–चीन, तिब्बत से जोड़ते हैं।’’

‘‘यह मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं है गुप्ता जी।’’ कर्नल साहब रोषपूर्ण मुद्रा में चलने लगे।
‘‘जब आपने मुझसे सवाल किया है तो आपको मेरी कुरताप्रियता का पूरा रहस्य समझना ही पड़ेगा।’’
‘‘आप कहते रहिए, मैं आँख बन्द करके सुनता जा रहा हूँ।’’ कर्नल साहब कुछ मायूसी में बोले।

‘‘कुरता तन ढकता है, कुरता मन ढकता है और कुरता काला धन ढक लेता है। जितना लम्बा कुरता उतनी ही अधिक उसकी ढकनशीलता। इसलिए बड़े नेताओं की पसन्द बड़े से बड़ा कुरता ही रहता है। अर्थात् जितना ऊँचा नेता, उतना ही नीचा उसका कुरता। तो बड़े कुरता में तीन बड़ी जेंबे होती हैं। जब-जब नेताजी किसी राजनीतिक, आर्थिक अथवा आपराधिक दाँव-पेंच के जाल में फँसकर जेल पहुँच जाते हैं तो कुरते की तीनों जेबें त्रिनेत्र की भाँति एक साथ मिलकर उनकी रक्षा कर लेती हैं।’’ यह कहकर गुप्ता जी मुस्कराए।

‘‘पर आप तो ‘इंजीनियर इन चीफ’ थे। आप नेता कब थे जो आपको कुरता इस कदर भा गया ?’’
‘‘अपने सर्विस कैरियर में मुझे नेताओं के काफी करीब रहना पड़ा, धीरे-धीरे उनके कुरता की खामियाँ समझकर मैंने हमेशा कुरता-पैजामा पहनने की ठीन ली।


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