विद्यारम्भ संस्कार विवेचन - श्रीराम शर्मा आचार्य Vidyarambh Sanskar Vivechan - Hindi book by - Sriram Sharma Acharya
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विद्यारम्भ संस्कार विवेचन

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :24
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4160
आईएसबीएन :0000

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विद्यारम्भ संस्कार विवेचन....

Vidhyaramabh Sanskar Vivechan

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

विद्यारम्भसंस्कार-विवेचन

शास्त्रकार विद्या विहीन की तुलना पशु से की है। ज्ञान ही मनुष्य की विशेषता है अन्यथा अनेक बातों में तो वह पशु से पिछड़ा हुआ है हाथी के बराबर बलवान सिंह की तरह पराक्रमी, घोड़े की तरह चलने वाला, बैल की तरह पराक्रमी, कुत्ते की तरह गंध ज्ञानी बन्दर की तरह वृक्षारोही, गौ की तरह सौम्य भला मौन मनुष्य हो सकता है ? इन दृष्टियों से मनुष्य की उपेक्षा पशु ही नहीं अधिक बढ़े-चढ़े होते है। उनकी तुलना में मनुष्य में जो विशेषता है वह उसकी ज्ञान शक्ति की है। अज्ञानी मनुष्य का जीवन पर निश्चय ही पशुओं से गया-गुजरा है। उसे किसी दिशा में प्रगति करने उल्लासपूर्ण जीवन जीने का अवसर तो मिलता ही नहीं। शरीर प्रेरण की, निर्वाह की आवश्यकता भी कठिनाई से पूरी कर पाता अनेक असुविधा, अभावों और आपत्तियों से भरी जिन्दगी जीनी पड़ती है। ज्ञान की जिसमें अपूर्णता हैं, उसको संसार में सर्वत्र अभाव में अभाव होते रहेंगे। मानवोचित प्रगति के सभी द्वार उसके लिए बन्द हो पड़े रहेंगे।

 विद्या-विहीन न रहें-इसलिए मनीषियों ने हर व्यक्ति को विद्या पढ़ने की अनिवार्य आवश्यकता बताई है। विद्या ज्ञान की आधारशिला है। जिसे विद्या नहीं आती उसे ज्ञान लाभ से वंचित रहना पड़ेगा। ‘ज्ञानात् मूक्ति’ सूत्र के अनुसार कष्ट और क्लेशों से छुटकारा केवल ज्ञानवान को ही मिल सकता है। अज्ञानी तो निविड़ बन्धनों में बँधा ही रहता है और शरीर बन्धनों में पड़े हुए बन्दी को कष्ट भोगने पड़ते हैं। उन्हें सहता ही रहता है। अन्धकार में भटकना ही पड़ता है, सही मार्ग प्रकाश होने पर ही मिलेगा। अज्ञान को अन्धकार और ज्ञान को प्रकाश बताया गया है। हमें क्या करना, किधर चलना, कैसे रहना है, इन प्रश्नों का उत्तर ज्ञान के आधार पर ही उपलब्ध किया जा सकता है। इसलिए अध्यात्म साधना के तीन साधनों-ज्ञान-योग, कर्म-योग और भक्ति योग में प्रथम स्थान ज्ञान-योग का ही है। ज्ञान के बिना मानवीय स्तर पर प्रगति की कोई संभावना नहीं रहती।

यों खाने, नहाने, सोने, कमाने, बच्चे करने आदि शारीरिक प्रवृतियों का प्रकृति प्रदत्त ज्ञान पशु-पक्षियों और कीट-पतंगों को भी होता है। उतनी जानकारी जिसे हो उसे अज्ञानी ही कहा जाएगा। जैसे सांस लेने, आहार पचाने, कमाने और खर्चने की मोटी जानकारियाँ हर शरीरधारी को धर्म के रूप में स्वतः ही बिना प्रयास के ही मिली हुई होती हैं। जो इतना ही जानते हैं वस्तुतः वे शरीर धर्मी जानकारी तक ही सीमित हैं। ज्ञान तो मानसिक चेतना के उस विकास को कहते हैं जिसे विश्व व्यापी क्षेत्र में अब तक मानवीय शोधों एवं उपलब्धियों द्वारा हृदयंगम किया जाता है। इसी से व्यक्ति के समग्र व्यक्तित्व का विकास होता है। यह विकसित व्यक्तित्व ही मनुष्यता की शोभा और शान है।

शिक्षा से व्यक्तित्व विकास


मनुष्य को स्वाभाविक संस्कारगत, वंश परम्परा से प्राप्त चतुरता तो एक सीमा तक मिली हुई है, पर उसका विकास प्रयत्नों से ही सम्भव है। ज्ञान के अंकुर मात्र ही मानवीय चेतना में विद्यमान हैं, पर उनका विकास तभी सम्भव है, जब अनुकूल परिस्थितियों का सिंचन मिले। यह सिंचन अध्ययन अथवा संगति से प्राप्त होता है। बिना दूसरों के सिखाने मनुष्य की बुद्धिमत्ता किसी काम नहीं आती। छोटे बालक को जिन परिस्थितियों में रहना पड़ता है, वह उसी प्रकार का ढल जाता है। कुछ दिन पूर्व आगरा जिले के खन्दौली गाँव से एक मनुष्य बालक को एक मादा भेड़िया उठा ले गयी। उसने उसे खाया नहीं, अपना दूध पिलाकर पाल लिया। बच्चा छः वर्ष का हो गया। शिकारियों ने उस बच्चे को भेड़ियों की माद में देखा, तो उन्होंने भेड़ियों को मारकर बालक को पकड़ लिया। यह बालक आजकल लखनऊ के मेडिकल कालेज में है, ‘रामू’ नाम रखा गया है। बचपन से ही जैसा उसने सीखा, भेड़ियों की तरह वह चलता है, वैसे ही गुर्राता है वैसे ही कच्चा माँस खाता है। उसकी सारी आदतें भेड़िये जैसी ही हैं। मनुष्य की तरह रहने सोचने चलने की जानकारी उसे कराई जा रही है पर अभी बहुत थोड़ी सफलता मिली है।

जंगली लोगों के बच्चों और सुसंस्कृत लोगों के बच्चों में जो अन्तर देखा जाता है, वह उनका जन्मजात नहीं वरन वातावरण और संगति के प्रभाव का फल है। इस सुविधा से जिन्हें वंचित रहना पड़ता है, वे मानसिक दृष्टि से गई-गुजरी दशा में पड़े रह जाते हैं। और जिन्हें उपयुक्त सुविधायें मिल जाती हैं, वे सुविकसित जीवन जीने की परिस्थियाँ प्राप्त कर लेते हैं। इसलिए जिन्हें निकृष्ट परिस्थियों में पड़ा नहीं रहना है, उन्हें ऐसी मानसिक परिस्थियाँ प्राप्त करनी ही चाहिए जिनके आधार पर उत्कर्ष की दिशा में आगे बढ़ सकना संभव हो सके।

एक ही उपाय विद्याध्ययन


दैनिक जन-सम्पर्क से तो कुछ सीखा ही नहीं जाता है-माता-पिता, कुटुम्बी, पड़ोसी एवं सम्पर्क में आने वाले व्यक्ति तो कुछ सिखाते ही हैं, पर इस सीमित दायरे में भी बहुत थोड़ा ज्ञान होता है। उतने मात्र से काम नहीं चल सकता। मानव जाति ने अब तक जिस विशाल ज्ञान का संग्रह किया है, उससे भी लाभ उठाना आवश्यक होता है। इसके लिए एक ही उपाय है। विद्याध्ययन। साक्षरता ही वह प्रवेश द्वार है, जिसमें घुसकर हम यह देख समझ सकते हैं कि मनुष्य जाति अपने आदि काल से लेकर अब तक क्या सोचा, क्या किया और क्या सीखा ?

मनुष्यों द्वारा कमाये और जमा किये धन तो खर्च और कष्ट होते रहे हैं, पर उनकी उपार्जित ज्ञान-सम्पदा अभी भी सुरक्षित रखी हुई है, साथ ही उनकी यह भी एक विलक्षण विशेषता है जो भी चाहे उस महान ज्ञानकोष को बिना किसी मूल्य या उत्तराधिकार के प्राप्त कर सकता है। पूर्वजों के धन को तो उनके वंशज या उत्तराधिकारी ही प्राप्त कर सकते हैं, पर ज्ञान भण्डार किसी भी महान पुरुष द्वारा किसी भी क्षेत्र या दिशा में उपार्जित क्यों न हो, संसार के किसी भी देश का कोई भी व्यक्ति मनचाही मात्रा में चाहे जब प्राप्त कर सकता है, किन्तु इस उपलब्धि की एक अनिवार्यता शर्त-प्रवेश फोस है-विद्याध्ययन। इसके बिना किसी के लिए भी यह संभव नहीं कि विश्व में विद्यमान महान ज्ञान-धन का अपरिमित मात्रा में लाभ प्राप्त कर सके।

सम्बन्धित व्यक्तियों के पास तो बहुत थोड़ा ज्ञान और अवकाश होता है। उतने मात्र से शरीर निर्वाह की आवश्यकता पूर्ति ही की जा सकती है। किसान अपने लड़के को खेती और दुकानदार अपने बच्चों को खरीद-फरोख्त तो सिखा सकता है, पर अगणित दिशाओं में फैले हुए ज्ञान-विज्ञान की जिसे स्वयं जानकारी नहीं, वह अपने बालकों को कहाँ से सिखायेगा ? जो जितना अधिक जानता है। वह क्षेत्र में उतना ही अधिक सफल रहता है। अतएव ज्ञानवान होना ही सच्चे अर्थो में सामर्थ्यवान एवं सम्पत्तिवान बनाना है। यह उपार्जन विद्याध्ययन के माध्यम से ही सम्भव है। इसलिए विद्या-पढ़ना-पढ़ाना मनुष्य का अत्यन्त आवश्यक कर्तव्य माना गया है। जो इसकी उपेक्षा करते हैं, मानवीय विशेषताओं से पतित पशु बताया गया है। विद्या-विहीन को पशु की उपमा दी गई है।

अभिभावकों का कर्तव्य


प्रत्येक अभिभावक का यह परमपुनीत धर्म कर्तव्य है कि बालक को जन्म देने के साथ-साथ आई हुई जिम्मेदारियों में से भोजन-वस्त्र आदि की शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति होने पर उनकी शिक्षा–दीक्षा का भी प्रबन्ध करे। जिस प्रकार कोई माता-पिता जन्म देने के बाद उसके पालन-पोषण की जिम्मेदारी से इनकार कर उसे कहीं झाड़ी आदि में फेंक दे तो वे अपराधी माने जायेंगे, ठीक उसी प्रकार जो लोग अपने बच्चों की शिक्षा-दीक्षा का प्रबन्ध न करके उन्हें मानसिक विकास एवं मानव-जाति की संग्रहीत ज्ञान  सम्पत्ति का साझीदार बनने से वंचित रखते हैं, वे भी उसी श्रेणी के अपराधी हैं जैसे कि बच्चे को भूखों मार डालने वाले।

इस पाप एवं अपराध से मुक्त पाने के लिए हर अभिभावाक को अपने हर बच्चे की शिक्षा का चाहे वह लड़की हो चाहे लड़का, अपनी सामर्थ्यानुसार पूरा-पूरा प्रबन्ध करना होता है। इस धर्म कर्तव्य की पूर्ति का शुभारम्भ करते हुए उसे अपने उत्तरदायित्व को निभाने की घोषणा के रूप में बालक का विद्यारम्भ संस्कार करना पड़ता है। देवताओं की साक्षी में समाज को यह बताना पड़ता है कि मैं अपने परम पवित्र कर्तव्य के साथ कटिबद्ध हो रहा हूँ। ऐसा ही प्रत्येक मनुष्य को करना चाहिए। किसी को भी अपनी सन्तान विद्या से वंचित न रहने देनी चाहिए।

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