नर से नारायण बनने का जीवन पथ - श्रीराम शर्मा आचार्य Nar Se Narayan Banane Ka Jivan Path - Hindi book by - Sriram Sharma Acharya
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आचार्य श्रीराम शर्मा >> नर से नारायण बनने का जीवन पथ

नर से नारायण बनने का जीवन पथ

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :96
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4193
आईएसबीएन :00000

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नर से नारायण बनने का पथ....

Nar Se Narayan Banane Ka Jeevan Path

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

अंतराल की संपदा खोज निकालने का यही उपयुक्त समय

अभी तक विकास के उतने ही चरण उठे और साधन जुटे हैं, जिनसे आदिम वन-मानुष को सभ्यता के युग में प्रवेश करने का अवसर मिल सके। सुविधा साधनों की दृष्टि से अन्य प्राणियों को अभावग्रस्त समझा और मनुष्य को साधन संपन्न कहा जा सकता है। इतने पर भी यह नहीं कहा जा सकता कि मानवी गरिमा का स्वरूप एवं महत्त्व अनुभव-अभ्यास में आ गया। उस उपलब्धि के लिए सच्चे मन से प्रयत्न भी नहीं चले हैं। धर्म और अध्यात्म की चर्चा भर जोर-जोर से होती है; किंतु उसे हृदयंगम करने तथा व्यवहार में उतारने का कोई ठोस एंव कारगर प्रयत्न नहीं होता। आवश्यकता इस बात की है कि अब नये अध्याय का शुभागंभ किया जाए।

वनमानुष ने सभ्य कहलाने की मंजिलें पूरी कर लीं, पर यह तो एक विराम मात्र हुआ। पूर्णता तक पहुँचने के लिए मनुष्य में देवत्व का उदय करना होगा। यही है वह आधार, जिसे योजनाबद्ध रूप से कार्यान्वित किया जाना चाहिए। उपार्जित कौशल एवं वैभव का सदुपयोग बन पड़े, इसके लिए इस स्तर का विकास परिष्कार इन्हीं दिनों चाहिए। संपदा की आवश्यकता समझी गई और उसे उपार्जित करने में सफलता पाई गई पर इतने भर से काम नहीं चलेगा। बीच रास्ते में बैठ जाने से, मझधार में लंगर डालने से बात कहां बनेगी ? अब तो पार जाने और लक्ष्य तक पहुँचने की तैयारी की जानी चाहिए।

प्रकृति संपदा की निर्वाह भर की मात्रा ही प्राणियों को हजम होती है। यदि इससे अधिक कमा लिया गया है या कमाया जाता है। तो यह भी समझा जाना चाहिए कि बारूद के खिलौने बनाने वाले जैसी सावधानी बरतते हैं; ठीक वैसी ही आज के मनुष्य को बरतनी होगी। इस सावधानी के लिए जिस दूरदर्शिता की आवश्यकता है। उसे प्राप्त करने के लिए मानवी चेतना के अंतस्थल को कुरेदा, उभारा और उर्वर बनाया जाना चाहिए।

पुरातन युग में यह कार्य धीमी गति से भी चलते रहने की गुंजाइश थी; क्योंकि तब तक सभ्यता और सुविधा प्राप्त करके आदिम कालीन पिछड़ेपन से छुटकारा पाना ही लक्ष्य था, पर अब वैसी स्थिति नहीं रही। शक्ति और साधनों की इतनी मात्रा एकत्रित हो गई है कि उनका सदुपयोग संभव हो सके। शक्ति दुधारी तलवार है। उससे आत्मरक्षा ही नहीं आत्मघात का संकट भी खड़ा हो सकता है। इन दिनों आत्मघात की दिशा में बढ़ रहे लोक प्रवाह को आत्मरक्षा के लिए नियोजित करने की आवश्यकता जितनी अधिक अनुभव की जा रही है, उतनी इससे पूर्व कभी नहीं की गई।

पिछले दिनो मानवी तत्परता ने भौतिकी के सभी क्षेत्रों को मथ डाला है और जहाँ से जो कुछ हस्तगत हो सका है, उसे उपलब्ध करने में कमी नहीं छोड़ी गई। भूमि की ऊपरी परत से लेकर, अत्यधिक गहराई तक खोदकर उसकी खनिज संपदा तक के दोहन में कमी नहीं रही। प्राणि जगत के हर वर्ग को अपने आधिपत्य में ले लिया गया है और जिससे जो प्रयोजन सध सकता था, साधा गया है। समुद्र सरोवरों और नदी निर्झरों में से जिससे जितना लाभ लिया जा सकता था, लिया गया। आकाश पर आधिपत्य जमाने की घुड़दौड़ इन दिनों तेजी से चल रही है। बिजली, रेडियो, लेसर आदि प्रकृति के रहस्यों को बहुत हद तक कुरेद लिया गया है। अंतर्ग्रही धावे बोले जा रहे हैं। उद्योग, विज्ञान, शिक्षा कला आदि के क्षेत्रों में भी आश्चर्यजनक प्रगति हुई है। कूटनीति का हर जगह बोलबाला है।

अछूत क्षेत्र एक ही रह गया है, मानवी गरिमा के अंतराल का पुनर्निरीक्षण और पुनर्जीवन। प्राचीनकाल में इस दिशा में समुचित ध्यान दिया गया था और मनुष्य में देवत्व तथा धरती पर स्वर्ग का प्रत्यक्ष दर्शन किया था। अब मध्यकालीन भटकाव को दूर करने एवं मानवी आस्था तथा आत्मा को जगाने की फिर आवश्यकता अनुभव की गई है। युग चेतना की इस माँग को पूरा करने के लिए हमें तथ्यों पर अधिक गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए और समय की माँग को पूरा करने में प्रमाद नहीं बरतना चाहिए।

योगी अरविंद कहते हैं-‘‘युग समस्याएँ विकट से विकट होती जा रही हैं, इनके समाधान के छुटपुट प्रयास भर चलते रहते हैं। उन्हें उत्साही लोग क्रांति के नाम से संबोधित करते रहते हैं। सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक क्रांतियों की चर्चा आये दिन सुनी जाती है, पर तथ्यतः यह सभी पैबंद मात्र हैं। इस समय का वास्तविक कार्य तो यह है कि समूची मनुष्यता को कोई नया वस्त्र दिया जाय। नया वस्त्र अर्थात् स्थिति का समग्र रूपांतर अर्थात् जीवनचर्या के साथ जुड़े हुए दृष्टिकोण एवं क्रिया कलाप में उत्कृष्टता का सर्वतोमुखी समावेश। इसकी पृष्ठभूमि अंतःकरण में अध्यात्मवादी आस्थाओं को जमाने वाली प्रक्रिया अपनाने से ही संभव हो सकेगी। प्रसिद्ध नीतिज्ञ स्माइले वायेन्टन का कथन है-‘मनुष्य के ओछे और बौने रह जाने का एक ही कारण है कि वह अपने गहन अंतराल तक पहुँचने का प्रयत्न नहीं करता। वैभव के खिलौनों से खेलने और अचित्य चिंतन के जंजाल में फँसे रहने के अतिरिक्त उससे एक कदम आगे बढ़ाना बन ही नहीं पड़ता। यदि उच्च चेतना से भरे पूरे आस्था संस्थान के साथ संपर्क साधा जा सके और उसे अनुकूल बनाया जा सके, तो हर कोई अनुभव कर सकता है कि अपनी गरिमा को ऊँचा उठाने के कितने आधार उसके पास मौजूद हैं, प्रशंसा पाने के लिए तरह-तरह के आडंबर रचने वालों को यह प्रतीत नहीं होता कि वे अंतःकरण को भारी भरकम बना सकें, तो असंख्यों द्वारा सम्मान पाने; श्रद्धास्पद बनने का अवसर उन्हें सहज ही मिल सकता है।’’

जीन डब्ल्यू आलपोड ने मानवी पूर्णता की व्याख्या करते हुए लिखा है-‘‘शरीर, बुद्धि पद, धन और स्वामित्व की छोटी परिधियों को पार करते हुए जो अपने को विश्व वसुधा का एक घटक मानता है और लाभ हानि की बात सोचते समय मात्र विश्व कल्याण की बात सोचता है, वह पूर्ण है। अपूर्णता के बंधन उसे, उसी अनुपात से जकड़े रहते हैं, जितनी कि ममता और आसक्ति की अनुभूति होती है।’’

वस्तुतः मनुष्य जिन बंधनों से बँधा छटपटाता रहता है, वे उसके आंतरिक एवं बाहरी पर्यावरण मात्र हैं। संचित आदतें प्रायः पशु प्रवृत्तियों से मिलती-जुलती होती हैं। इसी प्रकार जिस ढर्रे का जीवन आम लोगों द्वारा जिया जाता है। उसके आदि से अंत तक संकीर्णता एवं आपाधापी भरी रहती है। उसका प्रभाव ही क्रमशः सहचरों पर पड़ता और सघन होता जाता है। यही है चेतना पर छाया हुआ वह पर्यावरण, जो मनुष्य को छोटी सीमा में सोचने और छोटे काम करने के लिए विवश करता है। यदि इस घेरे को तोड़ा जा सके और विराट् के साथ अपने को जोड़ा जा सके, तो पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त होने में देर न होगी। क्षुद्रता ही बंधन और विशालता ही मुक्ति का सोपान है।

सामान्य मनुष्य का व्यक्तित्व अनेकों जाल-जंजालों से बना हुआ अच्छा-खासा तमाशा होता है। उसमें कुसंस्कारों निकृष्ट अभिलाषा और उलझते उद्वेगों की भरमार होती है। ऐसे लोगों के लिए न तो एकाग्र होते बन पड़ता है और न अंतर्मुखी होने की स्थिति आती है, ऐसे लोग वस्तुओं की माँग, परिस्थितियों की शिकायत और साथियों पर आक्षेप करते-करते ही दिन गुजारते रहते हैं, उन्हें यह सूझता ही नहीं कि आत्म तत्व में विकृत भर जाने से ही अनेकानेक विपन्नतायें उत्पन्न होती हैं। इस विषम स्थिति से छूटना कठिन नहीं है। अपने हाथों बुने जाले को समेटने का साहस किया जा सके, तो मुक्ति का आनंद ले सकना हर स्थिति के लिए भी सरल हो सकता है।

इस प्रतिपादन को भलीभाँति समझने के लिए मानवी चेतन सत्ता की रहस्यमय परतों को समझना होगा। विज्ञान को हमें धन्यवाद देना चाहिए कि आज हमारे पास मानवी कार्य सत्ता की स्थूल संरचना एवं सूक्ष्म बनावट संबंधी इतनी जानकारी है कि हम आत्मसत्ता के विभिन्न पक्षों पर विवेचन कर पूर्णता के लक्ष्य संबंधी कोई निष्कर्ष निकाल सकें।

वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो खोपड़ी की पिटारी में रखे हुए लिबलिबे भूरे पदार्थ की हलचलों को मन या मस्तिष्क कहते हैं। सोचने-विचारने का काम इसी मशीन से चलता है। विभिन्न प्रकार की जानकारियाँ एवं स्मृतियाँ इसी क्षेत्र में रहती हैं। तर्क, ऊहापोह, विश्लेषण, निर्धारण करने वाला तंत्र बुद्धि कहलाता है। मन तो मात्र इच्छा या कल्पना करता रहता है। इन्हीं दोनों के समन्वय से बनने वाली स्थिति को बुद्धिमत्ता कहते हैं। बाजारू सफलतायें इसी आधार पर मिलती हैं। व्यवहार का निर्धारण एवं उसकी उलट-पुलट के लिए इसी संस्थान में सन्निहित अनुभव एवं चातुर्य महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते, प्रतिस्पर्धा जीतते तथा अवरोधों से जीतने, सफलता का पथ प्रशस्त करने में अपना कमाल दिखाते हैं।

मस्तिष्क कौशल की विशिष्टता सर्वविदित है। अस्तु, उसे समुन्नत बनाने के लिए प्रयत्न भी सर्वत्र किये जाते हैं। स्कूली शिक्षा का प्रधान उद्देश्य यही है। उसके माध्यम से वस्तुओं का स्वरूप और लोक व्यवहार में अपने पक्षों को समझने-समझाने का प्रयत्न किया जाता है। संपर्क, परामर्श घटनाक्रमों का निकटवर्ती पर्यवेक्षण इस प्रयोजन में विशेष रूप से काम आता है। इस संदर्भ में मस्तिष्कीय कोशिकाओं की संरचना भी तीक्ष्णता को न्यूनाधिक करती रहती है। समुन्नत मस्तिष्क व्यक्तियों का सहयोग अर्जित करने से लेकर अभीष्ट सफलतायें उपलब्ध करने में अपने चमत्कार आये दिन दिखाता रहता है। आमतौर से इसी से इसी प्रतिभा के आधार पर मनुष्य का बाजारू मूल्यांकन होता और श्रेय मिलता है।



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