चेतना का सहज-स्वभाव,स्नेह-सहयोग - श्रीराम शर्मा आचार्य Chetna Ka Sahaj-Swabhav,Sneh-Sahyog - Hindi book by - Sriram Sharma Acharya
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चेतना का सहज-स्वभाव,स्नेह-सहयोग

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :120
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4203
आईएसबीएन :00000

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चेतना का सहज स्वभाव

Chetana Ka Sahaj Swabhav Sneh Sahayog

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

सहयोग-सहकार प्रगति के मूल आधार

प्रकृति का प्रत्येक घटक अपने एक निश्चित नियम के अनुसार जन्म लेता और विकास करता है। यह नियम-व्यवस्था किन्हीं विशिष्ट क्षेत्रों के लिए ही लागू नहीं होती, बल्कि जहाँ कहीं भी प्रगति, विकास और गतिशीलता दिखाई देती है, वहाँ यही नियम काम करते दिखाई देते हैं।

समझा जाता है कि मनुष्य ने इस प्रकृति में अन्य सभी प्राणियों से अधिक उन्नति तथा विकास किया है। उस उन्नति और विकास का श्रेय उसकी बुद्धिमता को दिया जाता है। मनुष्य की बुद्धिमता को उसी प्रगति का आधार मानने में कोई हर्ज भी नहीं है क्योंकि उसने बुद्धिबल से ही अन्य प्राणियों की तुलना में इतनी अधिक उन्नति की है, जिससे सृष्टि का मुकुटमणि बन सकने का श्रेय उसे प्राप्त हो सका। इस मान्यता में यदि कुछ तथ्य है तो उसमें एक संशोधन यह और करना पड़ेगा कि बुद्धिमत्ता उसे सहकारिता के आधार पर ही उपलब्ध हुई है। क्या मनुष्य ने उन्नति अपनी मस्तिष्कीय विशेषता के कारण की है ? मोटी बुद्धि की इस मान्यता का अंधा समर्थन कर सकती है। सूक्ष्म चिंतन का निष्कर्ष यही होता है कि कोई-न-कोई आत्मिक सद्गुण ही उसके मस्तिष्क समेत अनेक क्षमताओं को विकसित करने का आधार हो सकता है। महत्त्वपूर्ण प्रगति न तो शरीर की संरचना के आधार पर संभव होती है और न मस्तिष्कीय तीक्ष्णता पर अवतरित रहती है। उसका प्रधान कारण अंत:करण के कुछ भावनात्मक तत्त्व ही होते हैं। उन निष्ठाओं की प्रेरणा से इच्छाशक्ति जगती है, सक्रियता एवं तत्परता उत्पन्न होती है, मस्तिष्क तथा शरीर के कलपुरजे एकजुट होकर काम करते हैं और निष्ठा के अनुरूप दिशा में कदम तेजी से बढ़ाते चले जाते हैं। व्यक्ति सदा से इसी आधार पर ऊँचे उठते और नीचे गिरते रहे हैं।

मनुष्य की बुद्धिमत्ता, शारीरिक चेष्टा और प्रयत्नपरायणता के मूल में जो अत्यन्त प्रेरक दिव्य प्रवृत्ति झाँकती है, उसे सहकारिता कह सकते हैं। वस्तुत: यही मानव प्राणी की सबसे बड़ी विशेषता है। अन्य प्राणियों में यह वृत्ति यत्किंचिंत् पाई जाती है, पर प्राय: वह शरीर की समीपता तक ही सीमित रहती है। मानसिक आदान-प्रदान कर सकने योग्य उनकी स्थिति नहीं है। कुछ पशु-पक्षी जोड़े बनाकर समूह में साथ-साथ रहने के अभ्यस्त तो होते हैं, इससे उन्हें सुरक्षा में सहायता मिलती है, कुछ और छोटे-मोटे शारीरिक आदान-प्रदान कर लेते हैं, पर मानसिक और भावानात्मक आदान-प्रदान उनसे बन नहीं पड़ता। सहकारिता वृत्ति का सीमित प्रयोग कर सकने के कारण ही अन्य प्राणी सृष्टि के आदि से लेकर अब तक जहाँ-के-तहाँ पड़े हैं, जबकि मनुष्य उस दिव्य प्रकृति को अधिकाधिक विकसित करते हुए उन्नति के उच्च शिखर तक पहुँच सकने में सफल हो गया।

दो जड़ पदार्थ अथवा अविकसित प्राणी मिलकर दो की संख्या ही बनाते हैं। दो बैल मिलकर एक की अपेक्षा दूना वजन भी खींच सकते हैं। एक की अपेक्षा दो रुपये हो तो दूना सामान खरीदा जा सकता है। किन्तु भावप्रधान मनुष्य प्राणी का जहाँ सघन सहयोग आरंभ होगा, वहाँ यह नियम बदल जाएगा और एक-एक मिलकर ग्यारह की संख्या बन जाएगी। 1 और 1 अंक नीचे-ऊपर रहें तो उनका जोड़ 2 होगा किन्तु उन्हीं अंकों को बराबर लिख दें, तो संख्या 11 बन जाएगी। अंकगणित का यही सिद्धांत भाव-प्रधान मनुष्य पर लागू होता है। दो बुद्धिमान चीते मिलकर वन की सुव्यवस्था बिगाड़ तो सकते है, पर बना नही पाते, क्योंकि भावात्मक सहयोग के अभाव में वे एक दूसरे को नीचा दिखाने का ताना-बाना बुनने के अतिरिक्त कुछ कर नहीं सकते, एक-दूसरे से आत्मरक्षा करने और आक्रमण का अवसर ढूँढ़ने के अतिरिक्त और वे कुछ सोच नहीं सकते। यदि सिंहों में-हाथियों में भावनात्मक एकता की- सहकारिता की वृत्ति रही होती और मनुष्य उस दिव्य अनुदान से वंचित रहा होता, तो निश्चित ही वो बलिष्ठ प्राणी संसार का शासन कर रहे होते और मनुष्य उनकी कृपा पाने के लिए लालायित रहता हुआ किसी प्रकार जिंदगी के दिन पूरे कर रहा होता।

मानवी विकास के इतिहास पर दृष्टि डालने से स्पष्ट है कि आदिम काल में वह भी अनपढ़ वानरों की तरह-का पशु मात्र था। उनकी बुद्धि कुछ पैनी तो थी पर उतने तीखे मस्तिष्क तो अन्य अनेक प्राणियों के भी पाए जाते हैं। चमगादड़, कुत्ता, चींटी, मधुमक्खी, मकड़ी जैसे प्राणियों की इंद्रिय शक्ति मनुष्य की तुलना में कहीं अधिक विकसित है और ऋतु-परिवर्तन जैसी सूक्ष्म संभावनाओं को समझने की दृष्टि से कितने ही जीव मनुष्य से आगे हैं। पर वे कोई खास विकास नहीं कर सके जबकि मनुष्य दिन-दूनी रात-चौगुनी प्रगति करता चला जाता है। तथ्यों की गहराई में प्रवेश करते हुए मनुष्य की एक ही सर्वोपरि विशेषता उभरकर आती है- सहकारिता की प्रवृत्ति। एक-दूसरे के प्रति आत्मीयता की, ममता की, सहायता की जो सद्भवानाएँ उमड़ती हैं, उसके समन्वय को सहकारिता कहते हैं। उसमें आदान-प्रदान का, परस्पर मिल-जुलकर रहने का, मिल-बाँटकर खाने का व्यवहार अनिवार्य रूप से जुड़ा रहता है। यही है मानवी प्रगति का मूलमंत्र। जहाँ भी इस प्रवृत्ति का जितना अधिक उपयोग हुआ है, वहाँ उसी अनुपात से सर्वतोमुखी प्रगति की गति तीव्र हुई है। जहाँ इसकी जितनी न्यूनता रही है, वहाँ उतनी ही मात्रा में जड़ता छाई रही है। संसार के अनेक क्षेत्रों में मनुष्य अभी भी आदिम अवस्था में पाए जाते हैं, उनकी अवगति में भावनात्मक सहकारिता की न्यूनता ही प्रधान अवरोध बनकर खड़ी दृष्टिगोचर होती है।

आदिम काल में मनुष्य भी बंदरों की तरह चीं-चीं बोलता था। उसने अपने मुँह से निकलने वाले कई शब्दों को अलग किया और हर उच्चारण के साथ जानकारी जोड़ी। यह उसकी बुद्धिमता कही जा सकती है। इसमें चार चाँद तब लगे, जब उसने उच्चारण के साथ जुड़े हुए संकेतों की जानकारी दूसरे साथियों को कराई। यहाँ से शब्द विज्ञान का प्रवाह चल पड़ा। पीढियों तक- सहस्राब्दियों तक इस दिशा में प्रगति होती रही और आज हम उच्चारण क्षमता का पूरा-पूरा लाभ उठाते हैं। आरंभिक लिपि भी आड़ी-टेढ़ी लकीरों के साथ अमुक जानकारियाँ जोड़ने के रूप में आरंभ हुई पीछे अक्षरों का-स्वर व्यंजनों का- अंक विद्या तथा रेखागणित का आविर्भाव हुआ और क्रमश: सर्वांगपूर्ण शिक्षा विज्ञान बनकर खड़ा हो गया। आज हमारी लेखनी और वाणी इतनी विकसित है कि उसके द्वारा अति महत्त्वपूर्ण जानकारियों का विश्व के एक कोने से दूसरे कोने से तक आदान-प्रदान अति सरल हो गया है।

कृषि, पशुपालन, चिकित्सा, विज्ञान, शिक्षा, शिल्प, कला, व्यवसाय, उद्योग, परिवार, समाज, शासन आदि ज्ञान-विज्ञान की अगणित उपलब्धियाँ हमारे सामने प्रस्तुत हैं और हम देवोपम साधन-संपन्नता का उपभोग कर रहे हैं। यह सारा वैभव-चमत्कार सहकारिता की सत्प्रवृत्ति का है। एक आदमी दूसरे के साथ सघन आत्मीयता स्थापित न करना-दूसरों के सुख-दु:ख में भागीदारी करने में उत्साह न रहता, तो सहयोग की इच्छा ही न उठती और आदान-प्रदान का सिलसिला न चलता। इस स्थिति से उस प्रगति की कल्पना भी नहीं की जा सकती जिनके कारण मनुष्य जीवन को सुरदुर्लभ अनुभूतियों से भरा-पूरा माना जाता है। यर्थाथता यह है कि सहयोग और उत्कर्ष एक दूसरे की न आशा की जा सकती है और न संभावना ही बनती है।

एकाकी मनुष्य जीवित भर रह सकता है। उल्लास एवं उत्कर्ष के लिए उसे साथी ढूँढ़ने पड़ते हैं और समूह में रहने की व्यवस्था जुटानी पड़ती है। इसके अतिरिक्त स्नेह, सद्बावना, आत्मीयता एवं घनिष्ठता के इतने गहरे पुट लगाने पड़ते हैं कि एक-दूसरे के लिए तत्पर रहें। दूसरे के दु:ख बँटाने और अपने सुख को दे डालने में प्रसन्न्ता अनुभव करें। ऐसी स्थिति जो जितनी अधिक और जितने अच्छे स्तर की बना सकता है, वह उतना ही सुखी, समुन्नत एवं सुसंस्कृत पाया जाता है। अनेकानेक सद्गुण इसी सहयोग रूपी कल्पवृक्ष के पत्र-पल्लव समझे जा सकते हैं। जिनका जितना ध्यान इस प्रवृत्ति को विकसित करने वाले आधार खड़े करने की ओर है, वे अपनी, अपने संपर्क परिकर की उतनी ही महत्त्वपूर्ण सेवा कर रहे होते हैं।
मनुष्य जन्मजात रूप से बुद्धिमान नहीं होता। पशुओं के बच्चे बिना सिखाए माता के थन और अपनी खुराक आप ढूँढ़ लेते हैं जबकि मनुष्य का बच्चा कई वर्ष का होने तक पेट भरने तक में पराश्रित रहता है। भेड़ियों की माँद में पाया गया तीन वर्षीय रामू भेड़ियों की तरह ही चलता, बोलता, खाता, सोता है। शिकारियों ने उसे पकड़ा और लखनऊ मेडीकल कॉलेज में उसके सुधार का उपक्रम हुआ, तो यह मनुष्य सभ्यता को बहुत थोड़ा ही अपना सका। यदि जन्मजात बुद्धिमत्ता मनुष्य को मिली होती, तो घने जंगलों में रहने वाले पिछड़े हुए आदिवासी अपनी सहज वृत्ति से अन्य लोगों की तरह सभ्य हो गये होते। वस्तुत: मनुष्य को बुद्धिमत्ता सहित जितनी भी उपलब्धियाँ मिली हैं, उन सबकी जननी सहकार प्रवृत्ति ही है।


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