शिष्ट बनें सज्जन कहलायें - श्रीराम शर्मा आचार्य Shisht Bane Sajjan Kahlayein - Hindi book by - Sriram Sharma Acharya
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शिष्ट बनें सज्जन कहलायें

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :32
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4208
आईएसबीएन :00000

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सभ्यता और शिष्टाचार....

Shishat Bane Sajjan Kahlayein

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

सभ्यता और शिष्टाचार

सभ्यता और शिष्टाचार का पारस्परिक संबंध इतना घनिष्ठ है कि एक के बिना दूसरे को प्राप्त कर सकने का ख्याल निरर्थक है। जो सभ्य होगा वह अवश्य ही शिष्ट होगा और जो शिष्टाचार का पालन करता है उसे सब कोई सभ्य बतलाएंगे। ऐसा व्यक्ति सदैव ऐसी बातों से बचकर रहता है जिनसे किसी के मन को कष्ट पहुंचे या किसी प्रकार के अपमान का बोध हो। वह अपने से मतभेद रखने वाले और विरोध करने वालों के साथ भी अपमानजनक भाषा का प्रयोग नहीं करता। वह अपने विचारों को नम्रतापूर्वक प्रकट करता है और दूसरों के कथन को भी आदर के साथ सुनता है। ऐसा व्यक्ति आत्म प्रशंसा के दुर्गुणों से दूर रहता है और दूसरों के गुण की यथोचित प्रशंसा करता है। वह अच्छी तरह जानता है कि अपने मुख से अपनी तारीफ करना ओछे व्यक्तियों का लक्षण है। सभ्य और शिष्ट व्यक्ति को तो अपना व्यवहार बोल -चाल कथोपकथन ही ऐसा रखना चाहिए कि उसके सम्पर्क में आने वाले स्वयं उसकी प्रशंसा करें।

बहुत से लोग शिक्षा और अच्छे फैशन वाले वस्त्रों के प्रयोग को ही सभ्यता और शिष्टाचार का मुख्य अंग समझते हैं। पर यह धारणा गलत है। शिथिल और बढ़िया पोशाक पहनने वाला व्यक्ति भी अशिष्ट हो सकता है और गाँव का एक हल चलाने वाला अशिक्षित किसान भी शिष्ट कहा जा सकता है। शिष्टाचार में ऐसी शक्ति है कि मनुष्य बिना किसी को कुछ दिए-लिए अपने और परायों का श्रद्धाभाजन, आदर का पात्र बन जाता है, पर जिसमें शिष्टाचार का अभाव है, जो चाहे जिसके साथ अशिष्टता का व्यवहार कर बैठते हैं। उन लोगों के घर के आदमी भी उनके अनुगत नहीं होते और संसार में सब उनको अपने विरोधी ही नजर आते हैं।

शिष्टाचार मनुष्यता का परिचायक है

एक प्राचीन कहावत है कि मनुष्य का परिचय उसके शिष्टाचार से मिल जाता है।’’ उसका उठना बैठना, चलना, फिरना, बातचीत करना, दूसरों के घर जाना रास्ते में परिचितों से मिलना, प्रत्येक कार्य एक अनुभवी को यह बतलाने के लिए पर्याप्त होता है कि वास्तव में व्यक्ति किस हद तक सामाजिक है ? इस दृष्टि से जब हम अपने पास-पड़ौस पर दृष्टि डालते हैं तो हमको खेद के साथ यह स्वीकार करना पड़ता है कि इस समय हमारे देश में से शिष्टाचार की प्राचीन भावना का ह्रास हो रहा है और आधुनिक शिक्षा प्राप्त नवयुवक प्रायः शिष्टाचार शून्य और उच्छृंखलता को आश्रय दे रहे हैं। कालेज और स्कूलों में पढ़ने वाले अधिकांश विद्यार्थी रास्ते में भी आपस की बातचीत में अकारण ही गालियों का प्रयोग करते और धक्का मुक्की करते दिखाई देते हैं। दुकानदारी पेशे वाले भी हँसी मजाक में ‘साले’ और ‘बहिन’ की गाली देकर बात करना एक मामूली बात समझते हैं। इन सबके उठने बैठने का तरीका भी सभ्य नहीं कहा जा सकता। इन बातों का विचार करके एक विद्वान् ने ठीक ही कहा है-

हम बैठते हैं तो परस्पर, बोलते हैं तो चिघांड़कर। पान खाते हैं तो पीक कुरते पर, खाने बैठे तो सवा गज धरती पर रोटी के टुकड़े और साग-भाजी पैला दी। धोती पहनी तो कुरता बहुत नीचा हो गया। कुरता मैला तो धोती साफ। बिस्तर साफ तो खाट ढीली। कमरे में झाडू लगाई तो दूसरों को धकियाते हुए ये सब तरीके ही किसी को सभ्य या असभ्य बताते हैं। हम चाहे घर में हो या समाज मे, इन सब बातों का हमको ध्यान रखना चाहिए।’’
हमारे आचरण और रहन -सहन में और भी ऐसी अनेक छोटी-बड़ी खराब आदतें शामिल हो गई हैं जो अभ्यास वश हमको बुरी नहीं जान पड़तीं। पर एक बाहरी आदमी को वे असभ्यता की ही जान पड़ेंगी। उदाहरण के लिए किसी से कोई चीज उधार लेकर लौटाने का पूरा ध्यान न रखना। मँगनी की चीजों को लापरवाही से रखना और खराब करके वापिस करना। बाजार से उधार वस्तु खरीदकर दाम चुकाने का ध्यान न रखना। किसी व्यक्ति को वायदा करके घर बुलाना और उस समय स्वयं बाहर चले जाना। चिट्ठियों का समय पर जवाब न देना, अपने कार्यालय में हमेशा देर करके जाना। इस प्रकार की सैकड़ों बातें है, जिनसे मनुष्य की प्रतिष्ठा मे अंतर पड़ता है और वह दूसरों की आँखों में हलके दर्जे का प्रतीत होने लगता है।

 
त्रिविध शिष्टाचार

एक अनुभवी लेखक ने शिष्टाचार से विपरीत बातों को तीन श्रेणियों में बाँटा है-(1) वचन संबंधी (2) चेष्टा संबंधी (3) कर्म संबंधी। इनका संक्षेप में वर्णन करते हुए उन्होंने बतलाया है-

वचनात्मक शिष्टाचार में इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि श्रोता की मर्यादा के अनुकूल आदरसूचक शब्दों का प्रयोग किया जाए। बातचीत में आत्मप्रशंसा करने, अपने मुँह मियामिट्ठू बनने की प्रवृत्ति को रोकना चाहिए और यथासंभव परनिन्दा से भी बचना चाहिए। किसी की बात काटनी और उसके कथन में भूलें निकालते रहना भी शिष्टाचार के विरुद्ध है। बातचीत में आवश्यकता से अधिक विनोद भी अशिष्ट समझा जाता है। मित्र मण्डली में किसी एक ही विषय पर अथवा एक ही व्यक्ति के साथ संभाषण करने से अशिष्टता सूचित होती है। कई लोगों को बोलते समय ‘इसका क्या नाम’- जो है सो’ आदि पाद पूरक शब्द या वाक्यांश बार -बार कहने की आदत पड़ जाती है, दूसरों को अप्रिय या हास्यास्पद जान पड़ती है।

‘चेष्टात्मक शिष्टाचार मनुष्य की मुखमुद्रा तथा शरीर के अन्यान्य अवयवों के संचालन संबंध रखता है। चेहरे पर सदा गंभीरता का भाव धारण करने से मनुष्य का मिथ्याभिमान प्रकट होता है, इसलिए अन्य लोगों से मिलने पर थोड़ी बहुत प्रसन्नतायुक्त मुस्कराहट प्रदर्शित करना चाहिए। शोक में खिन्नता और श्रद्धा में नम्रता का भाव प्रकट करने की आवश्यकता है। किसी प्रश्न का उत्तर शब्दों के बदले सिर हिलाकर देना असंयता समझा जाता है। जब तक कोई विशेष कारण न हो तब तक किसी को विशेषकर स्त्रियों को सिर या हाथ के संकेत द्वारा न बुलाना चाहिए।’’

क्रियात्मक शिष्टाचार में उन सब कार्यों का समावेश होता है, जो मनुष्य किसी व्यक्ति या समाज के सुभीते के लिए करता है। मनुष्य को प्रत्येक कार्य में अपने पड़ौसी की असुविधा का ध्यान अवश्य रखना चाहिए। सड़क पर बांई ओर चलना चाहिए और वृद्धों तथा स्त्रियों को रास्ता दे देना चाहिए। किसी के घर के पास या उसके द्वार के सामने खड़े होकर जोर -जोर से बात करना अशिष्टता है। जब तब विशेष आवश्यकता न हो तब तक किसी को बुलाने के लिए उसके घर के किवाड़ खटखटाना ठीक नहीं होता। अपने घर आए मेहमानों का यथाशक्ति सत्कार करना शिष्टता का आवश्यक अंग हैं।’’


भारतीय शिष्टाचार की विशेषताएँ



इस संसार में विभिन्न प्रकार की राष्ट्रीयताओं, मजहबों, संप्रदायों, जलवायु, वातावरण का जो अंतर पाया जाता है और राजनैतिक, भौगोलिक, आर्थिक, सामाजिक आदि दृष्टियों से यह जिस प्रकार हजारों भागों में बाँटा हुआ है उसे देखते हुए प्रत्येक मनुष्य से शिष्टाचार के एक से नियमों के पालन की आशा करना युक्तियुक्त नहीं है। हिन्दू, मुसलमान और ईसाइयों के जातीय शिष्टाचार में अनेक बातें एक दूसरे से भिन्न फिर भी वर्तमान समय में वैज्ञानिक, आविष्कारों के कारण सब लोगों से मिलना-जुलना और उनका पारस्परिक व्यवहार लेन -देन इतना अधिक बढ़ गया है कि अब शिष्टाचार के कुछ ऐसे सामान्य नियम भी बन गए हैं जिनका ज्ञान प्रत्येक मनुष्य को होना उचित है।

फिर भी हमारा कर्तव्य है कि हम सबसे पहले अपनी भारतीय सभ्यता और शिष्टाचार की जानकारी प्राप्त करें, क्योंकि निःसंदेह यह सबसे प्राचीन सभ्यता है और जबकि संसार की अधिकांश संस्कृतियों का अंत कुछ सौ वर्षों में ही हो चुका है, वह पिछले हजारों वर्षों से स्थिर है। सच तो यह है कि अन्य सभ्यताओं का आविर्भाव इसी की प्रेरणा और अनुकरण से हुआ है। हमारे शास्त्रवेत्ताओं का कथन सर्वथा निराधार नहीं है-


एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः।
स्व स्वं चरित्र शिक्षेन् पृथिव्यां सर्वमानवाः।।


अर्थात्-‘इसी देश के ऋषि मुनि और विद्वानों के संसर्ग से पृथ्वी भर के मनुष्यों ने चरित्र और सभ्यता की शिक्षा प्राप्त की है। इस दृष्टि से भारतीय सभ्यता संसार भर की सभ्यताओं की जननी है और आज भी उसके भीतर वे सब तत्व निहित है, जिससे किसी भी जाति की संस्कृति स्थाई और कल्याणकारी बन सकती है। यद्यपि कुछ समय पूर्व योरोप वाले ज्ञान से प्रमत्त होकर भारत को अर्ध सभ्य कहने लगे थे, पर अब हमारे साहित्य और संस्कृति को सबका आदि स्रोत मानने लग गए हैं। इस सच्चाई को सामने रखकर महात्मा गांधी ने अपने भाषण में कहा था-

मेरी धारणा है कि भारत ने जिस सभ्यता को जन्म दिया था विश्व की कोई सभ्यता उसकी बराबरी की नहीं है। हमारे पूर्व पुरुष जो बीज बो गए हैं उसकी समता करने वाली इस संसार में एक भी वस्तु नहीं है। रोम के धुर्रे उड़ गए, यूनान का नाम शेष रह गया, फिरोज का साम्राज्य रसातल को चला गया, जापान पश्चिम के चंगुल में फँस गया और चीन की तो बात कुछ कहते ही नहीं बनती। परंतु भारत की, पत्ते झड़ जाने पर भी जड़ें मजबूत है।’’

 

 

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