इक्कीसवीं सदी बनाम उज्जवल भविष्य भाग 2 - श्रीराम शर्मा आचार्य Ikkisavin Sadi Banam Ujjval Bhavisya Part 2 - Hindi book by - Sriram Sharma Acharya
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आचार्य श्रीराम शर्मा >> इक्कीसवीं सदी बनाम उज्जवल भविष्य भाग 2

इक्कीसवीं सदी बनाम उज्जवल भविष्य भाग 2

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :56
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4246
आईएसबीएन :0000

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इक्कीसवीं सदी बनाम उज्जवल भविष्य का दूसरा भाग

Ikkisavi Sadi Banam Ujjaval Bhavishay (2)

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

काल चक्र स्वभावतः परिवर्तनशील है। जब कोई बड़ा परिवर्तन, व्यापक क्षेत्र में तीव्र गति से होता है, तो उसे क्रांति कहते हैं। क्रांतियों के बीच कुछ महाक्रांतियाँ भी होती है, जो चिरकाल तक जन मानस पर अपना प्रभाव बनाए रखती हैं। प्रस्तुत युग संधि काल भी एक महाक्रांति का उद्घोषक है। महाक्रांतियाँ केवल सृजन और संतुलन के लिए ही उभरती हैं।

महाकाल का संकल्प उभरता है तो परिवर्तन आश्चर्यजनक रूप एवं गति से होते हैं। रावण दमन, राम राज्य स्थापना एवं महाभारत आयोजन पौराणिक युग के ऐसे ही उदाहरण हैं। इतिहास काल में बुद्ध का धर्मचक्र प्रवर्तन, साम्यवाद और प्रजातंत्र की सशक्त विचारणा का विस्तार, दास प्रथा की समाप्ति आदि ऐसे ही प्रसंग हैं, जिनके घटित होने से पूर्व कोई उनकी कल्पना भी नहीं कर सकता था।

युग सन्धि काल में, श्रेष्ठ मानवीय मूल्यों की स्थापना तथा अवांछनीयताओं के निवारण के लिए क्रांतियों रेलगाड़ी के डिब्बो की तरह एक के पीछे एक दौड़ती चली आ रही हैं। उनका द्रुतगति से पटरी पर दौड़ना, हर आँख वाले को प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होगा। मनीषियों के अनुसार उज्ज्वल भविष्य की स्थापना के इस महाभियान में भारत को अति महत्त्वपूर्ण भूमिका निभानी है।

विभीषिकाओं के अंधकार से झाँकती प्रकाश किरणें



इन दिनों जिधर भी दृष्टि डालें, चर्चा परिस्थितियों की विपन्नता पर होती सुनी जाती है। कुछ तो मानवी स्वभाव ही ऐसा है कि वह आशंकाओं, विभीषिकाओं को बढ़-चढ़कर कहने में सहज रुचि रखता है। कुछ सही अर्थों में वास्तविकता भी है, जो मानव जाति का भविष्य निराशा एवं अंधकार से भरा दिखाती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि मनुष्य ने विज्ञान के क्षेत्र में असाधारण प्रगति कर दिखाई है। बीसवीं सदी के ही विगत दो दशकों में इतनी तेजी से परिवर्तन आए हैं कि दुनियाँ की काया पलट हो गई सी लगती है। सुख साधन बढ़े हैं, साथ ही तनाव उद्धिग्नता, मानसिक संक्षोभ-विक्षोभों में भी बढ़ोत्तरी हुई है। व्यक्ति अंदर से अशांत है। ऐसा लगता है कि भौतिक सुखों की मृग तृष्णा में वह इतना भटक गया है कि उसे उचित-अनुचित, उपयोगी, अनुपयोगी का कुछ ज्ञान नहीं रहा। वह न सोचने योग्य सोचता व न करने योग्य करता चला जा रहा है। फलतः संकटों के घटाटोप चुनौती बनकर उसके समक्ष आ खड़े हुए हैं।

हर व्यक्ति इतनी तेजी से आए परिवर्तन एवं मानव मात्र के विश्व मानवता के भविष्य के प्रति चिंतित है। प्रसिद्ध चिंतक भविष्य विज्ञानी श्री एल्विनटॉफलर अपनी पुस्तक‘ फ्यूचर शॉक’ में लिखते हैं कि ‘यह एक तरह से अच्छा है कि गलती मनुष्य ने ही की, आपत्तियों को उसी ने न्यौत बुलाया एवं वही इसका समाधान ढूँढ़ने पर भी अब उतारू हो रहा है।
‘‘टाइम’’ जैसी प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका प्रतिवर्ष किसी विशिष्ट व्यक्ति को ‘मैन आफ द इयर’ चुनती है। सन् 88 के लिए उस पत्रिका ने किसी को ‘मैन आफ द इयर’ न चुनकर पृथ्वी को ‘प्लनेट आफ द इयर’’ घोषित किया है। यह घोषणा 2 जनवरी 89 को की गई, जिसमें पृथ्वी को ‘एन्डेन्जर्ड अर्थ’ अर्थात् प्रदूषण के कारण संकटों से घिरी हुई दर्शाया गया। यह घोषणा इस दिशा में मनीषियों के चिंतन प्रवाह के गतिशील होने का हमें आभास देती है। क्या हम विनाश की ओर बढ़ रहे हैं ? यह प्रश्न सभी के मन में बिजली की तरह कौंध रहा है। ऐसी स्थिति में हर विचारशील ने विश्व भर में अपने अपने स्तर पर सोचा, अब की परिस्थितियों का विवेचन किया एवं भावी संभावनाओं पर अपना मत व्यक्त किया है। यह भी कहा है कि अभी भी देर नहीं हुई, यदि मनुष्य अपने चिंतन की धारा को सही दिशा में मोड़ दे,  वह आसन्न विभीषिका के घटाटोपों से संभावित खतरों को टाल सकता है।

हडसन इंस्टीट्यूट न्यूयार्क के हरमन कॉन. वर्ल्डवाच इंस्टीट्यूट अमेरिका के लेस्कर आर ब्राउन, जो ऑकड़ों, के आधार पर भविष्य की रूपरेखा बनाते हैं, आज से 400 वर्ष पूर्व फ्रांस में जन्मे चिकित्सक नोस्ट्राडेमस, फ्रांस के नार्मन परिवार में जन्मे काउन्ट लुई हेमन जिन्हें संसार ‘कीरो’ के नाम से पुकारता था क्रिस्टल बॉल के माध्यम से भविष्य का पूर्वानुमान लगाने वाली सुविख्यात महिला जीन डीक्सन तथा क्रांतिकारी मनीषी चिंतक महर्षि अरविंद जैसे मूर्धन्यगण कहते हैं कि यद्यपि यह वेला संकटों से भरी है, विनाश समीप खड़ा दिखाई देता है, तथापि दुर्बुद्धि पर अंततः सदबुद्धि की विजय होगी एवं पृथ्वी पर सतयुगी व्यवस्था आएगी। आसन्न संकटों के प्रति बढ़ी जागरूकता से मनीषीगण विशेष रूप से आशान्वित हैं। वे कहते हैं कि मनुष्य को बीसवीं सदी के समापन एवं इक्कीसवीं सदी के शुभारंभ वाले बारह वर्षों में संधि वेला कहकर पुकारा गया है, अपना पराक्रम पुरुषार्थ श्रेष्ठता की दिशा में नियोजित रखना चाहिए। शेष कार्य ब्राह्मी ही चेतना, दैवी विधि -व्यवस्था, महाकाल की प्रत्यावर्तन प्रक्रिया उससे स्वयं करा लेगी।

इन दिनों औद्योगीकरण के बढ़ने से चिमनियों से निकलता प्रदूषण हवा को और कारखानों का कचरा जलाशयों को पीने, का पानी देने वाली नदियों को दूषित करता चला जा रहा है। बढ़ती आबादी के साथ ईंधन की खपत भी बढ़ी है। इस कारण वायुमंडल में बढ़ती विषाक्तात तथा अंतरिक्ष का बढ़ता तापमान जहाँ एक ओर घुटन भरा माहौल पैदा कर रहा है, वहीं दूसरी ओर ध्रुवों के पिघलने समुद्र में ज्वार आने व बड़े तटीय शहरों के जल -राशि में डूब जाने का भी संकेत देता है। ऊँचे अंतरिक्ष में ‘ओजोन का कवच टूटने से, अयन मंडल पतला होता चला जाने से, ब्रह्मांडीय किरणों के वायरसों के धरातल पर आ बरसने की चर्चा जोरों पर है। युद्धोन्माद के कारण उड़ते जा रहे अणु -आयुधों, रासायनिक हथियारों की विभीषिका भी कम डरावनी नहीं है। बढ़ता हुआ आणविक विकिरण सावर्जनिक स्वास्थ्य के लिए प्रत्यक्षतः किस प्रकार संकट का कारण बन सकता है, यह हम कुछ वर्ष पूर्व सोवियत रूस के चेर्नेबिल रिएक्टर में हुए लीकेज एवं तद्जन्य परिणामों के रूप में देख चुके हैं।

सतत् कटते जा रहे वन, हरीतिमा की चादर को पृथ्वी से हटाते व भयंकर संकट मानव जाति के लिए खड़ा करते देखे जा सकते हैं। वर्षा की कमी, भूक्षरण रेगिस्तानों का विस्मार जल स्रोतों का समाप्त होते चले जाना, जलाऊ ईंधन का अभाव, वायु शोधन में अवरोध तलहटी में आकर बैठी भारी मात्रा में मिट्टी के कारण हर वर्ष बाढ़ की त्रासदियाँ, मौसम, असंतुलन के कारण अतिवृष्टि -ओलों की मार, ये ऐसे संकट हैं जो मनुष्य द्वारा अदूरदर्शिता से काटे जा रहे वनों व भूमि के संसाधनों के तेजी से दोहन के फलस्वरूप जन्मे हैं।

द्रुतगति से बढ़ती जा रही जनसंख्या हर क्षेत्र में अभाव उत्पन्न कर रही है। शहरों में गंदी बस्तियाँ बढ़ रही है, तो कस्बे फूलते नगरों का रूप लेते जा रहे हैं। कचरे की समस्या भी इसके साथ तेजी से बढ़ रही है। ईसवी संवत के प्रारंभ में, पूरे विश्व में 30 करोड़ व्यक्ति रहते थे। आज उसी पृथ्वी पर लगभग सत्रह गुने पाँच अरब से भी अधिक व्यक्ति रहते हैं। साधन सीमित हैं, उपभोग करने वाले अधिक। फलतःप्रगति कार्यक्रम की सफलता को न केवल चुनौती मिल रही है, एक ऐसा असंतुलन उत्पन्न होने जा रहा है, जिससे अराजकता की स्थिति पैदा हो सकती है।

यौन क्षेत्र में बरती गई स्वेच्छाचारिता बढ़ती कामुकता ने, यौन रोगों एवं असाध्य ‘एड्स’ जैसी महामारियों को जन्म दिया है। इसकी चपेट में क्रमशः एक बड़ा समुदाय आता जा रहा है जो विनाश की संभावना को प्रबल बनाता प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर हो रहा है। नशेबाजी जिस तेजी से बढ़ रही है, उसे देखते हुए लगता है कि स्मैक, हेरोइन, मारीजुआना जैसी घातक वस्तुएँ किशोरों युवकों व बेरोजगारों की एक बड़ी संख्या को विक्षिप्त स्तर का न बना दें ? जीवनी शक्ति घटती चली जा रही है। मौसम का जरा सा असंतुलन मनुष्य को व्याधिग्रस्त करता देखा जाता है, अस्पतालों की संख्या में बढ़ोत्तरी तो हुई, किंतु प्रत्यक्षतः स्वस्थ, और परोक्ष रूप से मानसिक रोगी भी बड़ी तेजी से बढ़े हैं।

बिलासिता में कोई कमी आती नहीं दीखती। मँहगाई, बेरोजगारी की दुहरी मार, बढ़ी जनसंख्या को बुरी तरह प्रभावित कर रही है। खर्चीली शादियाँ, जन साधारण को दरिद्र और बेईमान तथा नवविवाहिता वधुओं को बलि का शिकार बनाती देखी जाती हैं। दहेज ही नहीं, अन्यान्य, कुरीतियों मूढ़, मान्यताओं के कारण न जाने कितने घर एवं धन साधन बर्बाद होते देखे जा सकते हैं। मिलावट नकली वस्तुओं की भरमार है। अपराधी आक्रामकता, हिंसा की बाढ़ इस तेजी से आ रही है कि शांति और सुव्यवस्था पर भारी संकट लदता चला जा रहा है। पारस्परिक स्नेह सहयोग की भावना तो पलायन ही कर बैठी है। आदमी को अपनों की सद्भाभावना पर भी अब विश्वास नहीं रहा।

प्रस्तुत घटनाक्रम भयावह तो हैं ही, वास्तविक भी है। इस संदर्भ में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सूझ-बूझ एवं विश्व शांति की बात सोची जानी चाहिए थी, क्योंकि यह विश्व मानवता की, समूचे संसार की समस्या है। साहित्यकार, कलाकार, मनीषी, चिंतकों को बढ़कर आगे आना चाहिए था, पर इस विषम वेला में जितना कुछ किया जाना है, उन आवश्यकताओं को देखते हुए विभूतियों का वर्तमान पुरुषार्थ छोटा ही नजर आता है।

समीक्षक-पर्यवेक्षक अगले दिनों की विभीषिका का प्रस्तुतीकरण इस प्रकार करते हैं, जिससे वर्तमान की अवांछनीयताएँ और भविष्य की अशुभ संभावनाएँ ही उभर कर सामने आती हैं। ऐसी दशा में हताशा का निषेधात्मक वातावरण बनना स्वाभाविक ही है। निराश मन:स्थिति अपने आप में एक इतनी बड़ी विपदा है, जिसके रहते व्यक्ति समर्थ होते हुए भी उज्ज्वल भविष्य की संरचना हेतु कुछ कर पाने में स्वयं को असमर्थ पाता है। उत्साह उल्लास में कमी पड़ती है तथा मनोबल गिरता है।

हौसले बुलंद हों तो प्रतिकूलताओं के बीच भी थोड़े से व्यक्ति मिलजुलकर इतना कुछ कर सकते हैं, जिसे देखकर आश्चर्यचकित रहा जा सकता है। मानवी पराक्रम व भविष्य को बदल देने की उसकी सामर्थ्य मनुष्य को प्राप्त ऐसी विभूति है जिस पर यदि विश्वास किया जा सके, तो यह मानकर चलना चाहिए कि निराशा के वातावरण में भी आशा का उज्ज्वल भविष्य की संभावनाओ का उद्भव हो सकता है।



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