प्रतिनिधि ऐतिहासिक कहानियाँ - मनमोहन सरल, श्रीकृष्ण (सम्पादक) Pratinidhi Etihasik Kahaniyan - Hindi book by - Manmohan Saral, Shri Krishna (Editor)
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प्रतिनिधि ऐतिहासिक कहानियाँ

मनमोहन सरल, श्रीकृष्ण (सम्पादक)

प्रकाशक : आत्माराम एण्ड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :284
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4256
आईएसबीएन :81-7043-642-7

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प्रतिनिधि ऐतिहासिक कहानियाँ...

Pratinidhi Etihasik Kahaniyan - Manmohan Saral, Shri Krishna, Arun(Editor)

प्रस्तावना

सुप्रसिद्ध आंग्ल आलोचक विलियम हेनरी हड़सन ने लिखा है कि कहानी-उपन्यास में सब कुछ सत्य होता है-बस, नाम और तिथियाँ सत्य नहीं होतीं; किन्तु इतिहास में कुछ भी सत्य नहीं होता-बस, नाम और तिथियाँ ही सत्य होती हैं। इतिहास और साहित्य की पारस्परिक तुलना करते हुए किसी ने कहीं लिखा है कि इतिहास राष्ट्र का जीवन-वृत्त है, जबकि साहित्य राष्ट्र की आत्मकथा है। विशुद्ध वैज्ञानिक अर्थ में इतिहास तो अविसंवादी प्रामाणिक तथ्यावली का धारावाहिक संग्रह है। प्रामाणिक ग्रन्थों, शिला-लेखों, मुद्राओं, ताम्रपट्टों, प्राचीन पत्रों आदि सामग्री का आश्रय ग्रहण करके तथ्य-संचयन किया जाता है। इन तथ्यों को धारावाहिक रूप देने के लिए इतिहास के लेखक को कल्पना का सहारा लेना पड़ता है। कल्पना का सहारा साहित्यकार को भी लेना पड़ता है। कथा-लेखक को तो इसकी और भी अधिक आवश्यकता होती है। गल्प और फिक्शन जैसे नाम इसी कल्पना के आश्रय के कारण सार्थक हैं।

ऐतिहासिक कहानी इतिहास और साहित्य को जोड़ने वाली कड़ी है। यों तो इतिहास और साहित्य बहुत-कुछ एक-दूसरे के पूरक होते ही हैं, किन्तु ऐतिहासिक कहानी दोनों के ही निकट की वस्तु है। वह कहानी भी हैं, और इतिहास भी। वह केवल कहानी ही नहीं है, और न केवल इतिहास ही। ऐतिहासिक कहानी में कल्पना का क्षेत्र एक दायरे में घिरकर रह जाता है। कागज का पुतला बनाने के लिए पहले बाँस की खपचियों से एक ढाँचा बनाया जाता है, फिर उस पर कागज मढ़कर ऐसा रूप देने की चेष्टा की जाती है कि देखने वाले को भ्रम हो जाए और उसमें जीवन का आभास होने लगे। ऐतिहासिक कहानी में ढाँचे का काम करते हैं-इतिहास-पोषित तथ्य, और जिस प्रकार एक खपची को दूसरी से मिलाने के लिए कागज मढ़ा जाता है, उसी प्रकार इन तथ्यों का आधार लेकर, इन्हें सूत्रबद्ध तथा स्वाभाविक करके के लिए कल्पना का सहारा लेना पड़ता है। लेकिन ऐतिहासिक कहानीकार की कल्पना भी सामान्य कहानीकार से भिन्न और सीमित होती है। वह किसी भी तरह वास्तविकता की उपेक्षा नहीं कर सकता। वास्तविकता का आँचल सामान्य कहानीकार भी नहीं छोड़ता, किन्तु उसकी वास्तविकता आज की, आधुनिक काल की वास्तविकता होती है, जबकि ऐतिहासिक कहानीकार की वास्तविकता अतीत की वास्तविकता होती है; उस अतीत की जो सामने नहीं होता, जो अनुभूत और प्रत्यक्ष नहीं होता। उस अतीत की परिस्थिति आदि का अनुमान थोथी कल्पना से नहीं किया जाता। फिर सामान्य कहानीकार के चरित्र उसके जाने-पहचाने होते हैं, सजीव होते हैं। ऐतिहासिक चरित्र अपरिचित होते हैं और उनमें सजीवता लानी होती है। अच्छी ऐतिहासिक कहानी की विशेषता ही यह है कि जिस समय की वह कहानी है, पाठक अपने को भी उसी समय के वातावरण में समझने लगे। उसे वह कहानी सामने घटती हुई-सी जान पड़े। रस-बोध के इस आदर्श को प्राप्त करने के लिए लेखक को छोटी-छोटी बातों में भी सावधान रहना पड़ता है। सम्बोधन अथवा शिष्टाचार के लिए प्रयुक्त शब्दों में ही त्रुटि होने पर खटकने लगती है। इन्हीं सब बातों के कारण सामान्य कहानी के अनुपात में ऐतिहासिक कहानी लिखना कठिन होता है। यही कारण रहा है कि हिन्दी में ऐतिहासिक कहानियों का अभाव दिखाई देता है। ऐतिहासिक उपन्यासों की संख्या तो पर्याप्त संतोषजनक दिखाई देता है, किन्तु कहानियाँ बहुत कम ही लिखी गई हैं। उनमें भी सच्चे अर्थों में स्तरीय ऐतिहासिक कहानियाँ तो और भी कम हैं।

ऐतिहासिक कहानियों की परम्परा का सूत्र पकड़कर कहीं बहुत पीछे नहीं जाना पड़ेगा। कारण सुस्पष्ट है। ‘कहानी’ संज्ञा जिस विधा को दी जाती है वह इसी बीसवीं शताब्दी की उपलब्धि ही तो है, फिर ऐतिहासिक कहानी और पीछे कैसे जा सकती है ! हाँ, ऐतिहासिक कथानकों का प्रयोग अवश्य ही बहुत पहले से किया जाता रहा है। कितने ही खण्ड-काव्य, महाकाव्य अथवा फुटकर कविताओं का आधार ऐतिहासिक कथानक रहे हैं। कहानी के प्रारम्भिक युग में उसे ‘आख्यायिका’ नाम से अभिहित किया जाता था। वे आख्यायिकाएँ अथवा कहानियाँ काल्पनिक हो ही नहीं सकतीं। इन्हें तो सच्ची घटनाओं पर आधारित होना चाहिए। आख्यायिका की परिभाषा देते हुए यह स्थापना आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी ने की थी। इसके आधार पर प्रारम्भिक युग की प्रायः सभी आख्यायिकाएँ ऐतिहासिक अथवा पौराणिक प्रसंगों पर आधारित हैं। स्वयं महावीरप्रसाद द्विवेदी ने भी ऐसी ही कई आख्यायिकाओं की रचना की। उनकी पहली आख्यायिकाएँ 1904-05 में तथा उनकी अन्य आख्यायिकाएँ 1911 में प्रकाशित हुई। ये कहानियाँ केवल इतिहास बनकर रह गईं। इनमें कल्पना तथा भावों का योग नहीं हुआ। तात्विक दृष्टि से भी इन कहानियों में कोई विशिष्टता नहीं आ पाई। इन वर्णन-प्रधान कहानियों में भाषा-कौशल भी साधारण कोटि का ही है।...



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