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आचार्य श्रीराम शर्मा >> अध्यात्मवादी भौतिकता अपनाई जाए

अध्यात्मवादी भौतिकता अपनाई जाए

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 1999
पृष्ठ :160
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4267
आईएसबीएन :00000

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अध्यात्मवाद पर आधारित पुस्तक


धर्म के जिस रूप की यहाँ व्याख्या की गई है वह आदर्श है; किंतु वह बिना किसी महान् शक्ति के आश्रय में रहे हुए स्थिर नहीं रह सकता। मानवीय हितों की सुरक्षा की आज भी सारे संसार में व्यवस्था है, किंतु उसका परिपालन पूर्णतया कहीं भी नहीं है, इसी से सर्वत्र अस्त-व्यस्तता है। जो शक्तियाँ इन कार्यों के लिए नियुक्त भी हैं, वे भी पूर्णतया विध्वंसक हैं। भारतीय धर्म की पूर्ण शक्ति समन्वय-युक्त है। इसीलिए इसमें समाज के एक व्यक्ति की भी सुरक्षा रही है। वह शक्ति यहाँ की आध्यात्मिक शक्ति ही है। शक्ति का विकास गुण-विकास पर भी है और उसका एक नितांत वैज्ञानिक अंग भी है। ऐसी विशेषता केवल हमारे यहाँ ही है। "धर्म" के साथ "साधना" का शब्द जोड़ दिया जाता है, वह इसी शक्ति का ही बोधक है। आध्यात्मिक शक्तियों के विकास पर ही संपूर्ण प्राणियों के हित का सिद्धांत निश्चयात्मक रूप से चल सकता है। बिना इसके सामाजिक जीवन की सुव्यवस्था का और कोई दूसरा ठोस आधार नहीं हो सकता। इसी रूप में हम अपने आपको पूर्ण शक्तिसंपन्न, श्रेष्ठ और शिरोमणि सिद्ध कर सके हैं। विक्टर कोसिन ने इसी तथ्य का दावा करते हुए लिखा है-

"जब हम भारत की साहित्यिक एवं दार्शनिक कृतियों का अवलोकन करते हैं, तब हमें ऐसे अनेक गंभीर सत्यों का पता चलता है, जहाँ पर पहुँचकर योरोपीय ज्ञान की शक्ति शिथिल पड़ जाती है। हमें भारतवर्ष के इसी तत्त्व के आगे अपने घुटने टेक देने पड़ते हैं।"

काल प्रभाव से यद्यपि अब वैसी शक्ति और सामर्थ्य हममें नहीं रही, जो हमारे अतीत का गौरव थी, किंतु अभी न तो वह ज्ञान ही नष्ट हुआ है और न विज्ञान ही पूर्णतया समाप्त हुआ है। हमारी वृत्तियों में जो भौतिकवादी निकम्मापन भर गया है, उसी के कारण आज यह दुर्दशा हो रही है कि हमारा न तो व्यक्तिगत जीवन ही कुशल है, न सामाजिक ढाँचा ही व्यवस्थित है। जिन तथ्यों को विदेशियों ने समझ लिया है उन पर अभी हमारे अपने ही लोगों की गहरी दृष्टि नहीं पड़ी। हमारे आदर्शों की गहराई में पहुंचने वाले किसी भी व्यक्ति को खाली हाथ नहीं लौटना पड़ा। उन्हें कुछ मिला ही है। अतः अपनी शक्ति का आभास होना पुनर्जागरण की इस पुण्य बेला में प्रत्येक दृष्टि से आवश्यक है।

वे चरित्र और आदर्श जो यहाँ के मानस को संस्कार देते हैं भले ही प्रसुप्त हों, पर अभी भी जीवित हैं। यदि ऐसा न रहा होता तो हमारा धर्म, संस्कृति तथा सभ्यता कभी की टूटकर बिखर गई होती, जैसा कि और जातियों की संस्कृतियों के साथ हुआ। अपने दृढ़ सिद्धांतों और पुष्ट-संस्कारों के कारण, वह आज भी अटूट और अडिग बनी हुई है। अब उन आदर्शों को पुनः जाग्रत् करना होगा।

खोये हुए अतीत को पुनः प्रतिष्ठित करना होगा, उसी से हमारा और समस्त संसार का कल्याण होगा।


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    अनुक्रम

  1. भौतिकता की बाढ़ मारकर छोड़ेगी
  2. क्या यही हमारी राय है?
  3. भौतिकवादी दृष्टिकोण हमारे लिए नरक सृजन करेगा
  4. भौतिक ही नहीं, आध्यात्मिक प्रगति भी आवश्यक
  5. अध्यात्म की उपेक्षा नहीं की जा सकती
  6. अध्यात्म की अनंत शक्ति-सामर्थ्य
  7. अध्यात्म-समस्त समस्याओं का एकमात्र हल
  8. आध्यात्मिक लाभ ही सर्वोपरि लाभ है
  9. अध्यात्म मानवीय प्रगति का आधार
  10. अध्यात्म से मानव-जीवन का चरमोत्कर्ष
  11. हमारा दृष्टिकोण अध्यात्मवादी बने
  12. आर्ष अध्यात्म का उज्ज्वल स्वरूप
  13. लौकिक सुखों का एकमात्र आधार
  14. अध्यात्म ही है सब कुछ
  15. आध्यात्मिक जीवन इस तरह जियें
  16. लोक का ही नहीं, परलोक का भी ध्यान रहे
  17. अध्यात्म और उसकी महान् उपलब्धि
  18. आध्यात्मिक लक्ष्य और उसकी प्राप्ति
  19. आत्म-शोधन अध्यात्म का श्रीगणेश
  20. आत्मोत्कर्ष अध्यात्म की मूल प्रेरणा
  21. आध्यात्मिक आदर्श के मूर्तिमान देवता भगवान् शिव
  22. आद्यशक्ति की उपासना से जीवन को सुखी बनाइए !
  23. अध्यात्मवादी भौतिकता अपनाई जाए
  24. आध्यात्मिक साधना का चरम लक्ष्य
  25. अपने अतीत को भूलिए नहीं
  26. महान् अतीत को वापस लाने का पुण्य प्रयत्न

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