सपने झूठे भी सच्चे भी - श्रीराम शर्मा आचार्य Sapane Jhoothe Bhi Sachche Bhi - Hindi book by - Sriram Sharma Acharya
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सपने झूठे भी सच्चे भी

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :116
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4274
आईएसबीएन :0000

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सपने सच भी होते है और झूठे भी....

Sapne Jhoothe Bhi Sachche Bhi

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

सपनों में सन्निहित जीवन-सत्य

‘‘दि अंडर-स्टैंडिंग आफ ड्रीम्स एंड देयर एन्फ्लूएन्सेस     ऑन दि हिस्ट्री ऑफ मैन’’ हाथर्न बुक्स न्यूयार्क द्वारा प्रकाशित पुस्तक में एडाल्फ हिटलर के एक स्वप्न का जिक्र है, जो उसने फ्रांसीसी मोर्चे के समय सन् 1917 में देखा था। उसने देखा कि उसके आसपास की मिट्टी भरभराकर बैठ गई है, वह तथा उसके साथी लोहे में दब गये हैं- हिटलर बचकर भाग निकले, किंतु तभी बम विस्फोट होता है- उसी के साथ हिटलर की नींद टूट गयी। हिटलर अभी उठकर खड़े ही हुए थे कि सचमुच तेज धमाका हुआ, जिससे आसपास की मिट्टी भरभराकर ढह पड़ी और खंदकों में छिपे उनके तमाम सैनिक बंदूकों सहित दबकर मर गये। स्वप्न और दृश्य का यह सादृश्य हिटलर आजीवन नहीं भूले।

स्वप्नों में भविष्य के इस प्रकार के दर्शन की समीक्षा करने बैठते हैं, तो वह स्पष्ट हो जाता है कि चेतना मनुष्य शरीर में रहती है, विश्व ब्रह्मांड के विस्तार जितनी असीम है और उसके द्वारा हम बीज रूप में विद्यमान अदृश्य के वास्तविक दृश्य चलचित्र की भाँति देख और समझ सकते हैं। यह चेतना के स्तर पर आधारित है। इसलिए भारतीय मनीषी भौतिक जगत् के विकास की अपेक्षा अतींद्रिय चेतना के विकास पर अधिक बल देते हैं। हिंदू धर्म और दर्शन का समस्त कलेवर इसी तथ्य पर आधारित रहा है। और उसका सदियों से लाभ लिया जाता रहा है।

‘‘बुस्साद साल के खुश्की महीने के छठवें दिन गुरुवार की रात मैंने सपना देखा कि एक खूबसूरत जवान से मैं मजाक कर रहा हूँ उस समय मुझे भीतर यह भी आश्चर्य हो रहा था कि मैं किसी से मजाक का आदी नहीं हूँ’ फिर ऐसा क्यों कर रहा हूँ तभी उस जवान ने निर्वस्त्र होकर दिखाया कि वह तो औरत है। मुझे उस वक्त अहसास हुआ कि मराठे औरत वेश में है। मुझे लगा कि मैंने इसी से मजाक किया। उसी साल के उसी महीने के आठवें रोज मैंने मराठों पर हमला किया, तो वे औरतों की तरह भाग निकले और मेरे स्वप्न का अहसास पक्का हो गया।’’ इस तरह सैकड़ों स्वप्न टीपू की मूल ‘नोंध’ किताब में हैं, उनकी हकीकत के वाकये भी हैं। यह सब एकाग्रता द्वारा चित्त की प्रखरता के लाभों की ओर भी संकेत करते हैं। मन को किसी एक ध्येय की ओर लगाया जा सके, उस संबंध की अनेक जानकारियाँ स्वतः ही मिलती चली जाती हैं।

अपने स्वप्नों पर टीपू सुल्तान को आश्चर्य हुआ करता था, सो वह प्रतिदिन स्वप्न डायरी में नोट किया करता था। उनके सच हुए स्वप्नों के विवरण कुछ इस  प्रकार हैं-

‘‘शनिवार 24 तारीख रात को मैंने सपना देखा। एक वृद्ध पुरुष कांच का एक पत्थर लिए मेरे पास आए हैं और वह पत्थर मेरे हाथ में देकर कहते हैं- सेलम के पास जो पहाड़ी है उसमें इस काँच की खान है, यह कांच मैं वहीं से लाया हूँ। इतना सुनते-सुनते मेरी नींद खुल गई।

टीपू सुल्तान ने अपने एक विश्वास पात्र को सेलम भेजकर पता लगवाया, तो ज्ञात हुआ कि सचमुच उस पहाड़ी पर काँच का भंडार भरा पड़ा है। इन घटनाओं से इस बात की पुष्टि होती है कि समीपवर्ती लोगों को जिस तरह बातचीत और भौतिक आदान-प्रदान के द्वारा प्रभावित और लाभान्वित किया जा सकता है, उसी तरह चेतना के विकास के द्वारा बिना साधना भी आदान-प्रदान के सूत्र खुले हुए हैं।


वापी (गुजरात) के पास सलवास नाम का एक गाँव है वहाँ बाबूलाल शाह नाम के प्रतिष्ठित अनाज के व्यापारी हैं। सन् 1973 की घटना है, उसका पुत्र जयंती हैदराबाद मेडिकल कालेज का छात्र था। एक रात वह सिनेमा देखकर लौट रहा था, तभी कुछ डाकुओं ने उसका अपरहण कर लिया और बाबूलाल शाह को पत्र लिखा-यदि बच्चे को जीवित देखना चाहते हैं तो अमुक स्थान पर 50 हजार रुपये पहुँचाने की व्यवस्था करें। श्री शाह जी बहुत दुखी हुए और मित्रों की सलाह से वे एक सन्त के पास गये और आपबीती सुनाकर बच्चे की जीवन रक्षा की प्रार्थना की। स्वामी जी ने उन्हें आश्वास्त किया और कहा-तुम लोग जाओ, जयंती 19 जुलाई को स्वतः  घर पहुँच जायेगा।

जिस दिन स्वामी जी ने आस्वासन दिया वह 17 जुलाई थी। उस रात डकैत जयंती को लेकर एक गुफा में पहुँचे। जयंती बेहद घबड़ाया हुआ था, साथ ही दस दिन का थका हुआ था। तीन बंदूकधारी डकैतों के बीच उसका भी बिस्तर लगाया गया। थका होने के कारण जयंती को नींद आ गई। उसने स्वप्न में देखा-कोई साधु कह रहे हैं- ‘‘डकैत सो गये हैं, तुम यहां से भाग निकलो।’’ इस स्वप्न के साथ ही उसकी नींद भी टूट गई, पर उसकी उठने की हिम्मत न हुई, तब उसने फिर वैसा ही स्वप्न देखा। इस बार उसे विश्वास हो गया कि कोई शक्ति उसके साथ है और उसकी मदद कर रही है। उसने आँखें घुमाकर देखा, सचमुच डकैत गहरी नींद में सो रहे थे। जयंती उठकर गुफा के बाहर आया और वहाँ से भाग निकला। सीधे स्टेशन पहुँचा, गाड़ी बिल्कुल तैयार थी, उसमें सवार होकर वह ठीक 19 जुलाई को घर आ गया। इस स्वप्न ने न केवल बालक जयंती की रक्षा की, अपितु उसे विश्वास भी हो गया कि अतींद्रिय जगत् वस्तुतः दिव्य आत्माओं का निवास स्थल है, उस आश्रम स्थल पर पहुँचकर न केवल अपनी आत्मिक क्षमताएँ प्रखर की जा सकती हैं। अपितु उच्च आत्माओं का स्नेह-सन्निध्य भी पाया जा सकता है।

स्वप्न सभी सत्य होते हों, यह बात नहीं। अनेक स्वप्न ऐसे होते हैं। जो मात्र अपनी शारीरिक और मानसिक स्थिति का संकेत करते हैं। जिस तरह वैद्य नाड़ी और लक्षणों को देखकर रोग और बीमारी का पता लगा लेते हैं, उसी तरह इन समझ में आने वाले स्वप्नों से शरीर और मनोजगत की अपनी स्थिति का अध्यायन शीशे की भाँति किया और उन्हें सुधारा जा सकता है। फ्रायड मनोविज्ञान में स्वप्नों की समीक्षा को इसी रूप में लिया जा सकता है।
स्वप्नो का, स्थान विशेष से भी संबंध होता है। इस संबंध में डॉ. फिशर द्वारा उल्लेखित एक स्त्री का स्वप्न बहुत महत्त्व रखता है। वह स्त्री जब एक विशेष स्थान पर सोती, तो उसे सदैव यही स्वप्न आता कि कोई व्यक्ति हाथ में छुरी लिये दूसरे से उसकी गर्दन दबोच रहा है। पता लगाने पर ज्ञात हुआ कि उस स्थान पर सचमुच ही एक व्यक्ति ने एक युवती का गला दबाया था जिससे वह लगभग मौत के समीप जा पहुँची थी। स्थान विशेष में मानव विद्युत के कंपन चिरकाल तक बने रहते हैं। इसके कब्रिस्तान की भयानकता और देव-मंदिरों की पवित्रता इसके साक्ष्य के रूप में लिए जा सकते हैं।

16 फरवरी 1975 के धर्मयुग अंक में स्वप्नों की समीक्षा करते हुए एक अंधे का उदाहरण दिया गया था, अंधे से पूछा गया कि क्या तुम्हें स्वप्न दिखाई देते हैं इस पर उसने उत्तर दिया-मुझे खुली आँख से भी जो वस्तुएँ दिखाई नहीं देतीं, वह स्वप्न में दिखाई देती हैं। इससे फ्रायड की इस धारणा का खंडन होता है कि मनुष्य दिन भर जो देखता और सोचता-विचारता है, वही दृश्य मस्तिष्क के अंतराल में बस जाते और स्वप्न के रूप में दिखाई देने लगते हैं। निश्चय ही यह तथ्य यह बताता है कि स्वप्नों का संबंध काल की सीमा से परे अतींद्रिय जगत से है अर्थात् चिरकाल से चले आ रहे भूत से लेकर अनंत काल तक चलने वाले भविष्य जिस अतींद्रिय चेतना में सन्निहित हैं, स्वप्न काल में मानवीय चेतना उसका स्पर्श करने लगती है।

 इसका एक स्पष्ट उदाहरण भी इसी अंक में एक बालक द्वारा देखे गये स्वप्न की समीक्षा में है। एक बच्चे ने पहले न तो कश्मीर देखा था न नैनीताल, किंतु उसने बताया ‘‘मैंने हरा-भरा मैदान, कल-कल करती नदियाँ, ऊँचे बर्फीले पर्वत शिखर देखे; कुछ ही क्षणों में पट-परिवर्तन हुआ मेरे सामने जिस मैदान का दृश्य था वह मेरे विद्यालय का था। मेरे अध्यापक महोदय हाथ में डंडा लिए मेरी ओर बढ़ रहे थे, तभी मेरी नींद टूट गयी।’’ इससे स्वप्नों की क्रमिक गहराई का भी बोध होता है। स्पर्श या निद्रा जितनी प्रगाढ़ होगी स्वप्न उतने ही सार्थक, सत्य और मार्मिक होंगे। सामयिक स्वप्न उथले स्तर पर अर्थात जाग्रत अवस्था के करीब होते प्रतीत होते हैं पर तभी संभव है जब अपना अंतः करण पवित्र और निर्मल हो। निराई किए हुए खेतों की फसल में एक ही तरह के पौधे दिखाई देते हैं। वे अच्छी तरह विकसित होते और फलते-फूलते भी हैं। पर यदि खेत खरपतवार से भरा हो, तो उसमें क्या फसल बोई गई है, न तो इसी बात का पता चल पाता है और न ही उस खेत के पौधे ताकतवर होते हैं। ये कमजोर पौधे कैसी फसल देंगे ? इसका भी सहज ही अनुमान किया जा सकता है। मन जितना अधिक उच्च-चिंतन उच्च संस्कारों से ओत-प्रोत और निर्मल होगा, स्वप्न उतने ही स्पष्ट और सार्थक होंगे।

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