गायत्री योग - श्रीराम शर्मा आचार्य Gayatri Yog - Hindi book by - Sriram Sharma Acharya
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गायत्री योग

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :168
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4278
आईएसबीएन :0000

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प्रस्तुत है गायत्री योग

Gayatri Yog

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

भूमिका

योग साधना के अनेक मार्ग हैं, पर आगे चलकर वे सभी मार्ग एक ही उद्देश्य पर जा पहुँचते हैं। योग साधन की असंख्य विधियों में से जो बहुत प्रधान हैं वे गायत्री विद्या के अन्तर्गत आ जाती हैं। 12 प्रधान योगों की साधना गायत्री द्वारा हो सकती है। इस पुस्तक में उन प्रधान योगों के सम्बन्ध में प्रकाश डाला गया है। इन बारह योगों की सहायता से मनुष्य निस्संदेह सच्चा योगी बन सकता है और वे सब सिद्धियाँ प्राप्त कर सकता है जो योगियों को प्राप्त होती हैं।

इस पुस्तक में यद्यपि गायत्री से सम्बन्धित बारह योगों की विवेचना भली प्रकार की है और यह प्रयत्न किया गया है कि साधनों की जानकारी योग्य सभी बातें इस पुस्तक में आ जायें, फिर भी संभव है कोई बात छूट गई हो। इसलिए इनमें से किसी योग की साधना आरम्भ करने से पूर्व यदि साधक, हमसे परामर्श कर लें तो अधिक उत्तम है। परामर्श की आवश्यकता इसलिए भी है कि विभिन्न मानसिक स्थिति के व्यक्तियों के लिए अलग-अलग प्रकार से, अलग-अलग साधनाओं की आवश्यकता होती है। किस व्यक्ति के लिए कौन साधना ठीक रहेगी ? इसका निर्णय केवल पुस्तक के आधार पर नहीं हो सकता, इसके लिए अनुभवी पथ-प्रदर्शक की सलाह आवश्यक होती है।

गायत्री उपनिषद् के महत्त्वपूर्ण विज्ञान को भी इसी पुस्तक में जोड़कर एक अपूर्णता को पूर्ण किया गया है। सिद्धान्त और क्रिया इन दोनों के समन्वय से ही कोई बात पूर्णता को प्राप्त होती है। अध्यात्म विज्ञान के सिद्धांत गायत्री उपनिषद में हैं, इसके द्वारा आत्मदर्शन और प्रकृति का मर्म समझ में आ जाता है। साधना विज्ञान की शिक्षा द्वादश योगों से पूरी हो जाती है, इस प्रकार यह पुस्तक सिद्धांत तथा साधन दोनों ही अंगों को पूरा करती है।

यह पुस्तक गायत्री महाविज्ञान के प्रेमियों के लिए महत्वपूर्ण पथ प्रदर्शन करेगी, ऐसा हमारा विश्वास है।

श्री राम शर्मा आचार्य


गायत्री योग
एक में अनेक गुण



गायत्री तु स्वयं पूर्णो योग इत्युच्यते बुधैः।
किंचित्तत्वं हि योगस्य बहिरस्मान्न विद्यते।।1।।


(गायत्री तु) गायत्री तो (स्वयं) स्वयं (पूर्णो योगः) पूर्ण योग है। (इति) यह (बुधैः उच्चये) विद्वान् लोग कहते हैं। (योगस्य) योग का (किंचित्तत्वं) कोई तत्त्व (अस्मात्-बहिः) इससे बाहर (न) नहीं (विद्यते) है।


या त्वभावं हि भावेनापूर्ण पूर्णेन चाथवा।
योजयत्येव सा विद्या विद्वद्भिर्योग उच्यते।।2।।


(या) जो विद्या (अभावं) अभाव को (भावेन) भाव से (चाथवा) और उसी प्रकार (अपूर्ण) अपूर्ण को (पूर्णेन) पूर्ण से (योजयति) मिलाती है, (सा विद्या) वह विद्या (विद्वद्भिः) विद्वानों द्वारा (योगः) योग (उच्यते) कही जाती है।


योगसाधनतो लोके नास्ति किंचिन्महत्तरम्।
गायत्रीयोग: सुलभः तासु वै साधनास्वपि।।3।।


(लोके) संसार में (योगसाधनतः) योग साघना से (महत्तरं) अधिक बड़ा (किंचित) कुछ भी (न अस्ति) नहीं। (तासु) उन (साधना स्वपि) साधनाओं में भी (गायत्री योगः) गायत्री योग (सुलभः) आसान है।

योग का अर्थ है—मिलना, जुड़ना। दो वस्तुएँ जब आपस में मिलती हैं तो कहा जाता है कि इनका योग हो गया। दो और चार का योग छह है। दवाओं के नुस्खों को योग कहते हैं, क्योंकि उनमें कई चीजों का सम्मिश्रण होता है। आध्यात्मिक भाषा में योग उस प्रक्रिया को कहते हैं, जिसके आधार पर दो प्रमुख आध्यात्मिक तत्त्वों का मिलन होता है। मस्तिष्क और हृदय को, माया और मुक्ति को, पापा और पुण्य को, मन और आत्मा को एक सूत्र में बांध देने से, एक केंद्र पर केंद्रीभूत कर देने से द्वैत मिटकर अद्वैत बन जाता है और विछोह दूर होकर एकीकरण का ब्रह्मानंद प्राप्त होने लगता है।

योग का कार्य है-जोड़ना, मिलाना। आत्मा और परमात्मा को मिलाने वाले जितने भी साधन, उपाय, मार्ग हैं, वे सब आध्यात्मिक भाषा में योग कहे जायेंगे। योगों की संख्या असीमित है। भारतीय योग शास्त्रों में सब मिलाकर लगभग 6000 योग साधन अब तक देखे जा चुके हैं। शोध करने पर उनकी संख्या अभी इससे कई गुनी अधिक निकलेगी। संसार के विविध देशों, धर्मों और विज्ञानों के अनुसार योगों की संख्या इतनी बड़ी है कि उनकी गणना करना असंभव नहीं, तो कठिन अवश्य है। इतना होते हुए भी इन समस्त योगों का उद्देश्य एवं कार्य एक ही है। वे सभी पृथकता को मिटाकर एकता की स्थापना करते हैं। अभाव को भाव से, अपूर्णता को पूर्णता से मिलाने की विद्या योग कही जाती है। जीव अपूर्ण है, अभावग्रस्त है, दुख द्वंद्वों से आच्छादित हो रहा है, इसको पूर्णता से, साधनों से, ज्ञान से, आनंद से, परिपूर्ण बनाने के लिए जो उपाय काम में लाये जाते हैं, वे योग कहलाते हैं।

योग साधना सबसे बड़ी, सबसे महत्त्वपूर्ण विद्या है, क्योंकि उसके द्वारा उन वस्तुओं की प्राप्ति होती है, जो मनुष्य के लिए सबसे अधिक आवश्यक, सबसे अधिक उपयोगी है, जिस उपाय से जितने बड़े लाभ की प्राप्ति होती है, वह उतना ही बड़ा लाभ समझा जाता है। अन्य अनेक सांसारिक चतुरताओं, शक्ति-सत्ताओं द्वारा जो लाभ प्राप्त किये जाते हैं, वे भैतिक और क्षणिक होते हैं। उनके द्वारा केवल सांसारिक वस्तुएँ प्राप्त की जाती हैं वे अधिक ऊँची श्रेणी की होती हैं, उनमें अधिक स्थायित्व होता है। उनके द्वारा मनुष्य को सुख भी अधिक ऊँची श्रेणी का, अधिक ऊँची मात्रा में प्राप्त होता है, इसलिए योग को सर्वश्रेष्ठ विद्या माना गया है।

सांसारिक योग्यताओं तथा शक्तियों द्वारा धन, स्त्री, पुत्र, पद, वैभव, स्वास्थ्य, विद्या आदि को प्राप्त किया जा सकता है। पर इन चीजों की प्राप्ति होने पर भी न तो मनुष्य को तृप्ति मिल सकती है और न अभावजन्य दुखों की निवृत्ति होती है, क्योंकि वस्तुओं में सुख तभी तक दिखाई पड़ता है जब तक वे प्राप्त नहीं होतीं। प्राप्त होने पर थोड़ा-बहुत रस उनमें तब तक रहता है जब तक कि उस वस्तु के प्रति आकर्षण की मात्रा विशेष रहती है। जैसे ही वह आकर्षण कम पड़ा कि वह वस्तु भार निरर्थक, उपेक्षणीय एवं तुच्छ प्रतीत होने लगती है। फिर उसकी ओर से मन हट जाता है और नई वस्तु में सुख तलाश करने लगता है। यह क्रम चलता ही रहता है, प्राप्ति के साथ-साथ तृष्णा बढ़ती है। फलस्वरूप कितनी ही बड़ी मात्रा में, कितनी ही उत्तम वस्तुओं की प्राप्ति हो जाए मनुष्य को संतोष नहीं हो सकता और संतोष के बिना शांति असंभव है।

सच्ची शांति तब मिलती है जब वह वस्तु मिल जाए जिसके बिछुड़ने से आत्मा को बेचैनी रहती हो। वह वधू-जिसका हृदयेश्वर प्राणपति बिछुड़ गया है, तब तक वह चैन नहीं पा सकती जब तक उसको अपने बिछुड़े हुए साथी की प्राप्ति न हो जाए। वह माता जिसका बालक खो गया है, तब तक चैन से न बैठेगी जब तक अपने बालक को पाकर उसे छाती से न लगा ले। वियोगिनी माता या विरहिनी वधू को उनके प्रिय जन प्राप्त न हो जायें। यदि अन्य वस्तुएँ देकर उनके विछोह को दूर करने का प्रयत्न किया जाए तो सफलता न मिलेगी। वे किसी अन्य वस्तु को लेकर संतुष्ट न हो सकेंगी। यही बात आत्मा की है। वह परमात्मा के वियोग में अतृप्त, बेचैन, विरहनी बनी हुई है। हमारा मन उसके सामने तरह-तरह के प्रलोभनकारी खेल-खिलौने उपस्थित करके बहलाना चाहता है, उसके वियोग को भुलाना चाहता है, पर आत्मा की बेचैनी वैसी नहीं है, जो इन खेल-खिलौनों से दूर हो सके। फलस्वरूप सुख-शांति के लिए कितनी श्री, समृद्धि, कीर्ति, शक्ति एकत्रित कर ली जाए, पर आत्मा का असंतोष दूर नहीं होता। बेचैनी मिटती नहीं। अशांत आत्मा को लोक और परलोक में कहीं भी सुख नहीं मिलता।

आत्मा की तृप्ति उस विछोह के निवारण पर निर्भर है, जो उसे परमात्मा से बिछुड़ जाने के कारण सता रहा है। इस जुदाई को मिलन के रूप में बदल देने की प्रतिक्रिया का नाम योग है। योग, आत्मा को परमात्मा से मिलाता है; मस्तिष्क को हृदय से मिलाता है तथा माया को विवेक से मिलाता है। इस मिलने से एक ऐसी आंतरिक तृप्ति मिलती है, जिसकी तुलना में संसार के समस्त सुख तुच्छ हैं। इस प्रगाढ़ तृप्ति का नाम जीवन मुक्ति, परमानंद, ब्रह्मानंद, ब्रह्म निर्वाण, समाधि आदि नामों से पुकारा जाता है। वही वास्तविक जीवनोद्देश्य है।

योग के अनेक मार्गों में प्रत्यक्षतः काफी भिन्नता है। कोई साधना किसी प्रकार होती है कोई किसी प्रकार। अपनी-अपनी स्थिति, योग्यता, रुचि, अनुकूलता के अनुसार साधक लोग अपने लिए कोई मार्ग चुन लेते हैं और उसी पर चलते हुए अभीष्ट स्थान तक पहुँच जाते हैं। इन असंख्य मार्गों में गायत्री साधना भी एक मार्ग है। यह मार्ग ऐसा है, जो सबसे सीधा, सबसे अधिक फलदायक, सबसे सुगम कहा जा सकता है। यह विशेषताएँ अन्य योगों में नहीं देखी जातीं। इसीलिए उन सभी सत्पथगामियों के लिए जो आत्मोन्नति के इच्छुक हैं, गायत्री से बढ़कर और कोई योग नहीं हो सकता।


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