जड़ के भीतर विवेकवान् चेतन - श्रीराम शर्मा आचार्य Jad Ke Bhitar Vivekvan Chetan - Hindi book by - Sriram Sharma Acharya
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जड़ के भीतर विवेकवान् चेतन

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 1999
पृष्ठ :112
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4288
आईएसबीएन :0000

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जड़ के भीतर विवेकवान् चेतन

Jad Ke Bheetar Vivekvan Chetan

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रकृति की प्रत्येक रचना परिपूर्ण

प्रकृति ने प्रत्येक जीव को उसकी दुनिया के हिसाब से परिपूर्ण बनाया है। उसे देखकर मनुष्य यह विश्वास करने को विवश होता है कि हर चेतना का निर्माण किसी उच्च चेतना के गहन चिंतन-मनन के बाद होता है। लीमर जीव जब अपने शरीर की सफाई करता है, तो उसके बहुत से बाल दाँतों में फँस जाते हैं। उस बेचारे को जिंदगी भर इस परेशानी का सामना करना पड़ता, यदि रचयिता ने उसकी जीभ के नीचे एक दूसरी छोटी कंघीनुमा जीभ नहीं लगाई होती। इसकी सहायता से वह फँसे हुए बालों को निकाल लेता है, यदि इस सहायक जीभ को नहीं लगाया गया होता, तो बेचारे का मुँह न जाने कब का सड़ जाता।

माना कि मनुष्य की रचना परमात्मा की पूर्ण विकसित कला है, किंतु यदि सांसारिक जीवन की सुख-सुविधाएँ भी अभीष्ट हैं, तो उस दृष्टि से अन्य जीवों को भी छोटा नहीं कहा जा सकता। घोंघे को अपना आहार खुरचकर खाना होता है, इसलिए उसकी जीभ में प्रकृति ने दाँत लगाए हैं। इन दाँतों की संख्या 1200 से 14000 तक होती है।

अनातीदी जाति के पक्षियों में प्रकृति ने उनके पंखों के नीचे कुछ ऐसी ग्रंथियाँ बनाई हैं, जिनसे तेल निकलता रहता है। उसके कारण ही उनके पंखों का विकास होता है तथा वे चिकने और स्वस्थ बने रहते हैं। एक प्रयोग में एक बतख की तेल उत्पादक ग्रंथि को ऑपरेशन करके निकाल दिया गया, तो उसके पंख कुछ ही दिनो में झड़ गए। इसका यह अर्थ हुआ कि प्रकृति स्थानीय परिस्थितियों में प्रत्येक जीव के अनुरूप संरचना का ध्यान पहले से पहले रखती है। इस दृष्टि से मनुष्य निर्माण पर गर्व प्रकृति या परमात्मा करे तब तो उचित भी है, मनुष्य का अहंकार करना तो उसकी तुच्छता ही है। 100 फुट लंबी ह्वेल का कुल वजन 125 टन के लगभग होता है। इसके शरीर में 35 टन चर्बी और 70 टन मांस होता है, यदि उसे हाथियों से तोला जाए, तो दूसरे पलड़े पर 20 से 25 हाथी तक चढ़ाने पड़ जाएँ। अकेले उसकी जीभ 3 टन और 2 मन वजन का दिल होता है। जो 8 टन खून की नियमित सफाई में दिन रात लगा रहता है। इसके लिए उसके फेफड़े एक बार में 14000 लीटर वायु खींचते हैं, नवजात ह्वेल शिशु का वजन ही 6 टन होता है और उसकी वृद्धि 1 क्विंटल प्रतिदिन के हिसाब से होती है। कोई मनुष्य इतना बड़ा विकास स्वेच्छा से कर सकता है क्या ? व्यायाम से कोई किंगकांग, दारासिंह और चंदगीराम हो सकता है, पर ह्वेल बनाने का काम परमात्मा का ही हो सकता है। अतएव सर्वोपरि कलाकार के रूप में वंदनीय वही है, मनुष्य नहीं।

बीटल कीटक की आँखों पर प्रकृति ने एक चश्मा भी चढ़ा दिया है। ऊपर की आँखों से वह हवा में देखता है, किंतु जब यह पानी में चला जाता है तब नीचे की आँखों से देखने लगता है। हम समझते हैं, हमारे पास ही इतनी बुद्धि है कि लेंस लगाकर आँखों की बीमारी ठीक कर लें, पर प्रत्येक परिस्थिति के अनुरुप साधन इकट्ठे करने हों, तो इतने विशालकाय संसाधन आवश्यक होंगे कि उनके वजन से दबकर ही मनुष्य मर जाए। अपनी परिपूर्णता बाहर नहीं, अंदर खोजी जाए, तब तो कोई बात है। बात ही नहीं, मनुष्य के भीतर जो सर्वांगपूर्ण सृष्टि भरी हुई है, उसे खोजा जा सके तो मनुष्य को बाहर कुछ पाने की आकांक्षा हीन रहे।

कुछ भालुओं को ताड़ी के नशे की आदत पड़ जाती है, तो उनको बार-बार ताड़ी के पेड़ों की तरफ जाना पड़ता है। ताड़ी पीकर भालू झूमने लगते हैं। उनके पाँव लड़खड़ाने लगते हैं, शिकारी इस स्थिति का लाभ उठाकर, उसी प्रकार जा धमकते हैं-जिस तरह नशेबाज मनुष्य को बीमारियाँ दबोच लेती हैं। भालू का शिकार भी इस स्थिति में अत्यंत सुगम हो जाता है। अतएव वे इस ताक में रहते हैं कि कब कोई भालू किसी ताड़ में लगे और मिट्टी के बर्तन को फोड़कर वे ताड़ी पी मदमस्त हो। मनुष्य को भी लगता है, उसी तरह सुखों को बाहर खोजने का नशा हो गया है। उससे संभव है, कुछ समय की मस्ती तो हाथ लग जाए, पर शिकारी के हाथों पड़ जाने वाले भालू की तरह अंततः मनुष्य भी दुर्देव का ही ग्रास बनता है। तब फिर उसकी शोभा क्या रही ?

मनुष्य ने बिजली बना ली, पर अपने भीतर की बिजली को तो वह जान भी नहीं सका। ह्वेल मछली का तो नाम ही ‘‘इलेक्ट्रिक ह्वेल’’ है, जिसके नाम से ही उसके विद्युत जनरेटर होने का पता चलता है। इस विद्युत शक्ति का उपयोग वह शिकार करने में करती है। वह इसके एक झटके से तैरते हुए घोड़े को भी गिरा देती है।

‘‘इलेक्ट्रिक रे’’ या ‘‘टारपीडो फिश’’ का विद्युत भाग पीठ पर होता है। इसमें कितनी अधिक विद्युत शक्ति होती है, इस संबंध में जेराल्ड ड्यूरेल नामक जीवविज्ञानी का एक संस्करण उल्लेखनीय है। वे यूनान की एक घटना के हवाले से बताते हैं कि एक लड़का त्रिशूल से मछलियों का शिकार किया करता था, एक दिन उसने अपना निशाना इस मछली को बनाया, किंतु त्रिशूल ने जैसे ही मछली का स्पर्श किया इतना जबर्दस्त झटका उसे लगा कि एक भयानक आवाज के साथ वह पानी में जा गिरा। उसे इतना जबर्दस्त विद्युत-शॉक लगा था कि घंटो बाद उसे होश आया।

सात आठ फुट लंबा। 2।।-3 मन वजन का शुतरमुर्ग संकट के समय बालू में सिर घुसेड़ लेने की मूर्खता के लिए ही विख्यात नहीं है, तेज दौड़ने की गति के लिए भी प्रसिद्ध है। इसकी दौड़ने की गति प्रायः 60 मील प्रति घंटे की है। इसकी चोंच का प्रहार इतना तीक्ष्ण होता है कि लोहे की चादर में भी छेद हो जाता है। इसकी पाचन शक्ति भी ऐसी होती है कि कठोर से कठोर वस्तु भी खाकर पचा लेता है। लगता है यह बीमारी मनुष्य को भी है, तभी तो कुछ भी इकट्ठा करते रहने की तृष्णा उसे अहर्निश पीड़ित किए रहती है। वास्तव में यह शुतुरमुर्ग की तरह रेत में मुँह छिपाने की तरह की मूर्खता है, जबकि मृत्यु निरंतर पास आती रहती है। उसके लिए जो पूर्व तैयारी की जा सकती थी, मूर्खतावश मनुष्य उससे वंचित बना रहता है।

संरचना की दृष्टि से तो एक मक्खी भी मनुष्य से कम रहस्यपूर्ण नहीं। उसे देखकर कलाकार की कला पर आश्चर्य होता है। उसके पाँव में एक विशेष प्रकार का स्राव होता है। मक्खी जहाँ बैठी यह स्राव उस स्थान पर चिपका और उस स्थान की भोजन सामग्री को पैरों से ही चूस कर सारे शरीर में पहुंचा दिया। उसकी आँखें प्रकृति की विलक्षण रचना है। इस पर भी उसकी लगभग 80000 जातियां पृथ्वी पर तब से विद्यमान चली आ रही हैं, जब मनुष्य भी नहीं आया था। इसके पंख अत्यधिक कुशल संतुलन तो बनाए रखते ही हैं, वह उनसे ही इंद्रियों की बोध क्षमता का लाभ लेती है, कोई भी यांत्रिक ऐसा यंत्र नहीं बना पाया जो जिरास्कोप का भी काम कर सके, हिचकोले भी ले सके। उसके पंख सीधे मस्तिष्क के ज्ञान तंतुओं से संबद्ध होते हैं, जिससे वह तुरंत परिस्थिति के अनुरूप इनसे काम ले लेती है।

जीवन का नाम यदि पेट और प्रजनन ही हो तो मक्खी बनने में ज्यादा लाभ है। मादा मक्खी एक ही बार में 125 से लेकर पाँच हजार तक अंडे देती है। मनुष्य के शरीर का विकास तो लंबी अवधि के बाद होता है, पर मक्खी के शरीर में ऐसा न जाने क्या तंत्र है कि यदि उसे उसे 5 माह की भी जिंदगी मिल जाए, तो वह इसी अवधि में 500000000000 (पांच खरब) बच्चे पैदा कर देगी। यही नहीं, यदि एक ही जोड़ा पितामह बनने तक जीवित बच जाए, तो वह इतनी संतान पैदा कर देगा जिससे 6 माह में ही सारी पृथ्वी में 50 फुट ऊँचा विशालतम ढेर लग जाएगा। यह तो उसकी क्षुद्र प्रवृत्ति ही है कि वह जितनी वंश वृद्धि करती है, काल उतना ही उसे चबेना बना डालता है और यह बताता रहता है कि जो भी जीवन पृथ्वी का भार बढ़ाने का प्रयास करेगा, उसका भी अंत इन्हीं की तरह शत्रुओं से अकाल, मृत्यु और रोग शोक से घिरा हुआ रहेगा, उसे अन्यत्र कुछ सोचने-विचारने प्रगति करने का तो अवसर ही मिलता कहाँ है ?

मक्खियाँ धरती के लिए ही नहीं, हर जीव के लिए भार हैं। उन्हें स्थान नहीं मिलता तो कुछ हवा में ही अंडे दे देती है। कुछ भेड़ों के थूथन पर अंडे देती है। कुछ उड़ती हुई मधुमक्खियों की पीछ पर अंडे देकर अपना प्रयोग तो पूरा कर लेती हैं, पर यह प्रयोग अंततः उसके ही वंश नाश का कारण बनते हैं। अधिक प्रजनन कम आयु का सिद्धांत चाहे मक्खी हो या मनुष्य सर्वत्र एक सा है। मक्खी का बच्चा 6 दिन में ही विकसित हो जाता है। और दस दिन में ही मर जाता है। कुछ दी मक्खियाँ ज्यादा दिन जीती हैं, पर उनकी प्रजजन क्षमता उतनी ही कम होगी। इतनी वंश वृद्धि आखिर जियेगी तो प्रकृति के सीमित साधनों को नष्ट करके ही जियेगी। कनाडा की ‘‘पाइन-सा’’ मक्खियाँ प्रतिवर्ष हजारों एकड़ भूमि की उपज हजम कर जाती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार मुर्गियों के विनाश का मूल कारण यह मक्खी ही है, जिसके छोटे से पंख में एक लाख से अधिक रोग कीटाणु होते हैं। संख्या का गंदगी से अन्योन्याश्रित संबंध है, गंदगी का बीमारी से। मनुष्य जीवन का वर्तमान लेखा-जोखा उसी का नमूना है, यदि यह क्रम न रुके, तो अगले दिनों हर मनुष्य एक लाख विषाणुओं की प्रयोगशाला बन जाए, तो कोई आश्चर्य नहीं। आज तो मक्खी प्रति वर्ष हजारों मनुष्यों को अंधा कर देती हैं, तब मनुष्य मनुष्य को ही जीवित खाने लग सकता है। मनुष्य स्वयं बढ़ सकता है-आखिर पृथ्वी तो नहीं बढ़ सकती, साधन तो उस अनुपात का साथ नहीं दे सकते।


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