धर्म के दस लक्षण और पंचशील - श्रीराम शर्मा आचार्य Dharm Ke Dus Lakshan Aur Panchsheel - Hindi book by - Sriram Sharma Acharya
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धर्म के दस लक्षण और पंचशील

श्रीराम शर्मा आचार्य

प्रकाशक : युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :64
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4295
आईएसबीएन :000

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धर्म के लक्षण

Dhram Ke Das Lakshan Aur Panchsheel

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

भूमिका

धर्म शब्द को इन दिनों प्रायः सम्प्रदायों के अर्थ में प्रयुक्त किया जा रहा है, जबकि वस्तुतः दोनों भिन्न हैं। उनमें यत्किंचित संगति भर है।

सम्प्रदाय उपासना-विधानों, कर्मकांडो और रीति-रिवाजों का समुच्चय है। प्रथा परंपराएँ इसी में सम्मिलित होती हैं। व्यवहार, शिष्टाचार आदि का भी इसमें समन्वय है। कितनी ही मान्यताएँ भी अपने-अपने रूप में इनके साथ जुड़ती हैं। इनके लक्षणों में भिन्नताएँ रहती हैं, क्योंकि वे देश, काल, पात्र, क्षेत्र, परिस्थिति आदि की भिन्नताओं पर अवलंबित हैं। अनेक धर्म इसी रूप में दृष्टिगोचर होते हैं। इनकी भिन्नताएँ अनुयायियों को अपने संदर्भ में कट्टर रहने के लिए भी प्रेरित करती हैं। फल यह होता है कि उदारता, सहिष्णुता का परस्पर तालमेल न बैठने से वे आपस में टकराती भी रहती हैं। अपने को सत्य और दूसरों को झूठा भी ठहराती रहती हैं इसलिए इस साम्प्रदायिकता को लोग कोसने भी लगे हैं। उसकी ओर से उदासीन भी होते जा रहे हैं। विग्रह के बीज बोने अंधविश्वास फैलाने जैसे लांछन भी लगते रहते हैं।

धर्म की व्याख्या, परिभाषा विभिन्न तत्त्वदर्शियों ने विभिन्न प्रकार से की है। भारत में उनके लक्षणों की संख्या दस बतायी जाती रही है, पर विभिन्न शास्त्रकारों के मत से उनके लक्षण एक नहीं हैं। उनमें अनेकता विद्यमान है।
जिनके बारे में अधिकांश आप्तजनों की सहमति है, वे- (1) सत्य (2) विवेक (3) संयम (4) कर्त्तव्य पालन (5) अनुशासन (6) व्रतधारण (7) स्नेह-सौजन्य (8) पराक्रम (9) सहकार (10) परमार्थ है।

इन्हीं की इस पुस्तक में व्याख्या की गई है और आशा की गयी है कि उन्हें सार्वभौम स्तर की मान्यता मिलेगी। सभी वर्गीकरण से सहमत होंगे।

लेखक

सत्य को तथ्य की स्थिति तक पहुँचाया जाए


सत्य को धर्म का प्रथम लक्षण माना गया है, पर उसका अर्थ मात्र सच बोलने तक ही सीमित नहीं किया जाना चाहिए। मोटे तौर पर सच बोलने के अर्थ में प्रयुक्त होता है। जो बात जैसी सुनी या समझी है, उसे उसी रूप से कह देना सच बोलना माना जाता है। सामान्य से प्रसंगों में यह ठीक भी है। इस नीति को अपनाने वाले भरोसे मंद माने जाते हैं। उनके कथन सुनने के उपरान्त असमंजस में पड़े जो करना है, उसे कर लिया जाता है। सामान्य व्यवहार को सरल बनाए रहने का यह अच्छा तरीका है, सभी लोग सच बोले तो अविश्वास की, संदेह की, ऊहापोह चलती रहती है, यथार्थता जाँचने के लिए जो खोज-बीन करनी पड़ती है उस झंझट से ढेरों समय बर्बाद करने का, मन को शंकास्पद स्थिति में रखे रहने का अवसर न आए। सभी एक-दूसरे पर विश्वास करें और व्यवहार की सरलता से सभी को सुविधा रहे।

इतने पर भी सत्य को एक सद्गुण मानते हुए भी उसे धर्म स्तर पर सार्वभौम स्तर पर मान्यता मिलने में कठिनाई भी कम नहीं है। हर अवसर पर नग्न सत्य हर किसी के सामने नहीं बोला जा सकता। घर में कितना पैसा है ? कहाँ रखा है ? इसका विवरण यथावत् बता देने पर पर अनेक संकट खड़े हो सकते हैं। चोर, उधार माँगने वाले, चंदा वसूल करने वाले आदि धावे बोलते रहते हैं और यथार्थता विदित होने पर अच्छी स्थिति वाले के ऊपर लगातार घात लगती रहती है। अपने से कोई व्यभिचार जैसे कोई पाप कर्म बन पड़े हों तो उसका उल्लेख हर किसी से करने पर अपनी बदनामी तो होती ही है, साथ ही दूसरे सहयोगी पक्ष को भी कम नीचा नहीं देखना पड़ता। जबकि उसे यह विश्वास रहा है कि इसकी चर्चा अन्यत्र कहीं नही की जाएगी। इतने पर भी कह दिया जाना एक प्रकार का विश्वासघात है।

राष्ट्रपति से लेकर सरकार के सभी उच्च पदाधिकारियों को गोपनीयता की शपथ लेनी पड़ती है। शासन व्यवस्था के सभी निर्धारण यदि समय से पहले ही प्रकट होते रहे तो उसका अनुचित लाभ शत्रु पक्ष के प्रतिद्वंद्वियों को दाँव-पेंच चलाने वालों को मिलेगा और व्यवस्था लड़-खड़ाने लगेगी। गुप्तचर विभाग वाले अपना परिचय स्पष्ट देने लगें तो उनके हाथ कहीं से भी कोई गुप्त भेद न लगें सेनापति यदि अपनी कूच एवं मोर्चेबंदी का विवरण पहले से ही बता दें तो उस रहस्य को जानकर शत्रु पक्ष इस प्रकार आक्रमण करेगा, जिससे बनाई हुई योजना को पराजय का मुँह देखना पड़े, दलाल, वकील आदि के धंधे ही ऐसे हैं, जिनमें कुछ-न-कुछ नमक-मिर्च मिलानी पड़ती है, अपनी शेखी बघारने में भी लोग कम झूठ नहीं बोलते। बच्चों को बिल्ली बंदर की वार्तालाप वाला कथानक सुनाना सरासर गलत है, क्योंकि जानवरों की कोई भाषा ही नहीं होती। फिर दूसरी जाति के पशु-पक्षियों के लिए तो वार्तालाप करना और भी अधिक कठिन है। फिर भी अभिभावक छोटे बच्चे को पशु-पक्षियों के वार्तालाप की, परियों की, अजूबों की ऐसी कहानियाँ सुनाया करते हैं, जिनमें यथार्थता कम और अलंकारिक कल्पना की भर-मार होती है। कथा-पुराणों में ऐसे प्रसंग कम नहीं आते।

इन सब पर विचार करने से प्रतीत होता है कि सत्य का यथासंभव निर्वाह तो किया जा सकता है, पर उसे धर्म धारणा में यथारूप प्रमुखतापूर्वक सम्मिलित नहीं किया जा सकता। सभी के लक्षण सभी शास्त्रकारों ने अपने-अपने ढंग से गिनाए हैं, उनके नामों में अंतर है, पर सत्य को सभी ने मान्यता दी है। ऐसी दशा में विचार करना होगा कि सत्य का वास्तविक स्वरूप और आधार क्या हो सकता है ?

सत्य का समानांतर अर्थ बोधक शब्द है- ‘तथ्य’। तथ्य अर्थात् सच्चाई-यथार्थता। हमारी जानकारियों में से अधिकांश ऐसी होती हैं, जिन्हें माना अपनाया जाता है, पर वे किंवदंतियों के अंध-परंपराओं के ऊपर आधारित होती हैं। उनके पीछे कोई आधार नहीं होते, जिससे उनका बुद्धिसंगत कारण बताया अथवा तर्क एवं तथ्यों के सहारे उनका औचित्य सिद्ध किया जा सके फिर भी वे समाज में चिर पुरातन प्रचलन के रूप में मान्यता प्राप्त हैं। संदेह करने वाले भी लोकमत के विरुद्ध अपना संदेह प्रकट करने में डरते हैं। विरोध तो प्राय: कर ही नहीं पाते। हिन्दू धर्म में खर्चीली विवाह शादियाँ दहेज,  जाति-पाँति, ऊँच-नीच, पर्दा प्रथा, मृतक भोज, भिक्षा व्यवसाय, भाग्यवाद, जादू-टोना आदि ऐसी प्रथाएँ जड़ जमाएँ बैठी हैं, जिनके कारण लाभ तो कुछ होता नहीं, हानियाँ पग-पग पर उठानी पड़ती हैं।

ऐसे अवसरों पर सत्य को जानने की, उसे पहचानने की और साहसपूर्वक यथार्थता को अपनाने की आवश्यकता पड़ती है। ऐसे ही अवसर पर वह परीक्षा हो सकती है कि सत्य-निष्ठ कौन है ? सत्य को धर्म मानकर, उसे अपनाने की हिम्मत किसमें है ?
सत्य बोलना धर्म का एक छोटा अंग है। वास्तविक सत्य वाणी तक सीमित न रहकर, जीवन की समस्त विधि-व्यवस्थाओं में समाहित होता है। चिंतन चरित्र और व्यवहार उससे पूरी तरह प्रभावित हो रहा हो तो समझना चाहिए कि सत्य को पहचानना और अपनाया गया।

बहुधा आवेश में व्यक्ति अपनी ही मान्यताओं पर अड़ जाता है। प्रतिपक्षी के तर्क, तथ्य, प्रमाण अकाट्य होते हुए भी उन पर ध्यान नहीं देता और अपनी ही बात के ओंधे-सीधे कारण बताकर शोर करता रहता है। सांप्रदायिक दंगे प्राय: इसी आधार पर होते हैं। विभेदों और विग्रहों का मूल कारण कट्टरता होती है। यदि लोग तर्कों और तथ्यों के सहारे यथार्थता तक पहुँचने का प्रयत्न करें तो विग्रहों का आधार ही समाप्त हो जाए। लोग सभी धर्मों में से सर्वोपयोगी अंश अपनाने और शेष मान्यताओं को असामयिक अप्रासंगिक समझकर उनकी उपेक्षा करने लगें तो ऐसी दशा में सांप्रदायिक विभिन्नता गुलदस्ते में सजे हुए विभिन्न रंगों के फूलों का समन्वय होने पर सुंदर दीखने लगेंगी।

संसार में अनेक विचारधाराएँ हैं। अनेक दर्शन एवं प्रथा प्रचलन हैं, जो जिसका अनुयायी है, वह उसे अकाट्य मानता है। अतिवाद इस श्रेणी तक जा पहुँचता है कि अन्य सभी मतानुयायी झूठे प्रतीत होने लगते हैं। सत्य का निर्माण तो तभी हो सकता है, जब किसी निष्पक्ष न्यायालय द्वारा यह निर्णय कराया जाए कि किसके कथन में कितना औचित्य है, कितना अनौचित्य ? यदि सभी के औचित्य वाले अंश एकत्रित कर लिए जाएँ तो उनके समन्वय से एक विश्व ‘‘विश्व-धर्म’’ या ‘‘एक विश्व सत्य’’ सामने आ सकता है, पर इसके लिए कोई तैयार नहीं दीखता, जब ‘‘मेरा मत ही सच तथा अन्य सब झूठे’’ मानने का दुराग्रह भूत की तरह सवार हो, तो फिर सत्य की खोज कर सकने जैसी मनोभूमि ही नहीं बनती।
सामान्य लड़ाई-झगड़ों में भी प्राय: गलत फहमियाँ ही विग्रह का मूल कारण होती हैं। यदि दोनों पक्ष ईमानदारी से वस्तु स्थिति को समझ और भ्रांतियों के साथ खुले मन से निपटे तो प्रतीत होगा कि तिल का ताड़ होने से जैसी घटना घटी है। हमें निष्पक्ष न्यायाधीश जैसा मन लेकर अपनी और दूसरे की वस्तुस्थिति, परिस्थिति एवं गलत फहमी को समझने का प्रयत्न करना चाहिए। जो इतना कर सकेंगे उन्हें सच्चाई के निकट तक पहँचने में कठिनाई न पड़ेगी। यदि भूलों को सुधारने का मन हो तो कोई कारण नहीं कि विग्रह टिक सकें और विद्वेष पनप सकें।

इन दिनों यों बुद्धिवाद और प्रत्यक्षवाद का युग कहा जाता है तो भी बात बिल्कुल उल्टी है। जितनी भ्रांतियाँ अनगढ़ लोगों ने अपना रखी हैं, उससे अधिक मात्रा में अपने ढंग की भ्रांतियाँ तथाकथित प्रगतिशील भी अपनाए हुए हैं। आहार, व्यवहार, चिंतन, चरित्र, इच्छा, आशंका, कल्पना के जो प्रवाह बह रहे हैं, उनमें से अधिकांश ऐसे हैं, जो सच्चाई के प्रतिकूल दिशा में जाते हैं। यदि उनका परिशोधन किया जाए तो हम उस सच्चाई के निकट पहुँच सकते हैं, जो हँसते-हँसते जीने और मिल-बाँटकर खाने को संतोष और शांति भरी परिस्थितियों तक हम सबकों सहज ही पहुँचा सकती है। सच बोलना तो ठीक है ही, प्रयत्न हमारा यह भी होना चाहिए कि हर मान्यता की नए सिरे से जाँच-पडताल करें उस स्थिति तक पहुँचे, जिसे तथ्य अथवा सत्य के नाम से धर्म में प्रमुख स्थान दिया गया है।


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