मानस रोग भाग 2 - श्रीरामकिंकर जी महाराज Manas Rog Part 2 - Hindi book by - Sriramkinkar Ji Maharaj
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मानस रोग भाग 2

श्रीरामकिंकर जी महाराज

प्रकाशक : रामायणम् ट्रस्ट प्रकाशित वर्ष : 2012
पृष्ठ :237
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4360
आईएसबीएन :0000

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मन के रोगों का विश्लेषण....

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Manas Rog

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

भूमिका

प्रस्तुत पुस्तक ‘मानस-रोग’ को मिलाकर 4 भागों में प्रकाशित होगी। इसके तीन खण्ड इस समय तैयार होकर आपके समक्ष हैं। इस श्रृंखला का एक खण्ड ‘मानस चिकित्सा’ नाम से प्रकाशित हुआ था। ये  प्रवचन ‘रामकृष्ण मिशन’, विवेकन्नद  आश्रम, रायपुर में हुए थे। ब्रह्मलीन स्वामी श्री आत्मानन्दजी महाराज न केवल एक श्रेष्ठ वक्ता थे अपितु वे उतने ही उच्चकोटि के श्रोता भी थे। बार-बार तत्कालीन श्रोता समाज को सम्बोधित करते हुए कहते थे। कि ये  प्रवचन मेरी साधना हैं। साथ ही वे मानव के उन प्रसंगों को प्रवचन के लिए मेरे सक्षम चुनते थे। जो प्रवचन परम्परा से बिलकुल भिन्न होते थे।

‘मानस-रोग’ प्रसंग रामचरितमानस के उन गम्भीरतम प्रसंगों में से एक हैं जिनकी चर्चा प्रायः कथा–मंचों से होने की परम्परा नहीं रही है। रायपुर आश्रम में नौ-नौ के पाँच सत्रों में 45 प्रवचन इस विषय पर हुए थे। स्वामी महाराज की तो इच्छा थी कि लगातार एक वर्ष तक रायपुर में रहकर मैं इस विषय पर प्रवचन करूँ। पर मेरी व्यस्तता और लगातार बने कार्यक्रमों की कतार में उनका यह प्रस्ताव तो मैं पूर्ण नहीं कर सका, पर पाँच वर्षों तक एक ही विषय को लेकर प्रभु ने कुछ अनोखी चर्चा अवश्य कराई।

कागभुशुण्डिजी के द्वारा पक्षिराज गरुण को सम्पूर्ण रामकथा सुनाने के बाद भुशुण्डिजी ने जब गरुड़जी से कहा कि यदि आप और भी कुछ सुनना चाहते हैं तो बताइए तब गरुड़जी ने कागभुशिण्डजी से सात प्रश्न किए। जिनमें अन्तिम प्रश्न है कि मानस रोग कहहु समुझाई ‘मानस-रोग’ क्या हैं और उनके लक्षण और चिकित्सा क्या है ? इन प्रश्नों के पीछे गोस्वामीजी की महती और कल्याणकारी भावना थी। मानो वे रामकथा को व्यक्ति के जीवन से जोड़ना चाहते थे। सब कुछ सुन लेने के पश्चात भी उन्हें यह लगा कि रामचरित मानस केवल एक मनोरंजन का साधन और बुद्धि-विलास बनकर ही न रह जाए, अपितु इसमें मानस का जुड़ना भी आवश्यक है। तभी यह पूर्ण रामचरितमानस होगा। जिस प्रकार अनेक प्रकार के पदार्थों के रहते हुए भी व्यक्ति यदि शरीर से स्वस्थ्य नहीं है तो उनका भोग वह नहीं कर सकता, क्योंकि स्वस्थता के अभाव में वह किये हुए भोजन को पचा ही नहीं सकेगा। और शरीर को किए हुए भोजन का लाभ तभी मिलता है जब वह पूर्ण रूप से पच जाए। इसी प्रकार यदि व्यक्ति का मन स्वस्थ्य नहीं है, मानस-रोगों से ग्रस्त है तो रामचरितमानस में वर्णित पात्रों और उनके चरित्र की व्याख्या को सांसारिक व्याख्या के रूप में ही देखेगा। परिणाम होगा कि उसके जीवन में उस कथा का कोई भी लाभ नहीं होगा। क्योंकि इस कथा के नायक श्रीराम तत्वतः ब्रह्म हैं। और वे लोककल्याण के लिए नर जैसी लीला कर रहे हैं।

सगुण साकार के क्रिया-कलापों की आध्यात्मिकता को समझने के लिए व्यक्ति का मन से स्वस्थ होना  नितान्त आवश्यक है। ‘सरुज सरीर वादि बहु भोगा’ की अर्धाली में इसी सत्य की ओर इंगित किया गया है। पर यदि मन ही अस्वस्थ हो तो शरीर की स्वस्थता उसे पूर्णानन्द की ओर नहीं ले जा सकती।

मानस-रोगों के विश्लेषण एवं उनके प्रदर्शन का तात्पर्य एक स्वस्थ्य और आदर्श जीवन की उपलब्धि है। खासकर तब जब विज्ञान ने मनुष्य की वांछित सुख-सुविधाओं को उपलब्ध करा दिया हो, और फिर भी अशान्ति बढ़ती जा रही हो। तब यह निश्चित हो जाता है कि कारण बाहर नहीं अंदर है। कागभुशुण्डि-संवाद के मध्य जीवन के मूलभूत प्रश्नों को बड़ी ही सूक्ष्मता से उभारा गया है। प्रस्तुत पुस्तक में आशा है, पाठकों को मानस-रोगों के सन्दर्भ से कुछ समाधान मिलेगा।
 
इस ग्रन्थ के प्रकाशन का आर्थिक सहयोग रायपुर के श्री सन्तोषकुमार द्विवेदी ने उठाया है। उनको और उनके परिवार को मेरा हार्दिक आशीर्वाद एवं शुभकामनाएँ। प्रभु की जब विशेष कृपा होती है। तब व्यक्ति के अंतः करण में अर्थ को परमार्थ की दिशा में लगाने की इच्छा उत्पन्न होती है। हमारे यहाँ धन की तीन गति बताई गई हैं- 1. भोग. 2. दान, 3. विनाश। निश्चित रूप से धन की चौथी कोई और गति हो ही नहीं सकती। श्री द्विवेदी का परिवार मेरा शिष्य है। कथा के प्रति इनकी विशेष अभिरुचि का सुपरिणाम है, इनके द्वारा किया जाने वाला यह आर्थिक सहयोग। भगवान भी इनके ऊपर कृपा बनी रहे, यही मेरा आशीर्वाद है।


रामकिंकर


श्रद्धा-सुमन



वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शंकररूपिणम्।
यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते।

 
ज्ञानमय गुरु जो शिव के समान कल्याणकारी हैं, उनकी मैं मन, कर्म, वचन से वन्दना करता हूँ। साधना पथ के दिग्दर्शन गुरु महाराज जी परम पूज्यपाद शिरोमणि युगतुलसी श्रद्धेय श्री रामकिंकरजी उपाध्याय के ‘अमृत-कलश से मुझ जैसे अज्ञानी, आकिंचन एवं विषयी व्यक्ति को जो आशीर्वाद रूपी अमृत बूंद प्राप्त हुई है, उससे मेरा समग्र जीवन कृतार्थ हो गया।

प्रतिकूलता में अनुकूलता का बोध कराने वाली अदृश्य गुरु-शक्ति एवं युगल सरकार की अहेतुकी कृपा तब दृश्य हो गई जब मुझे महाराजश्री के सद्साहित्य के प्रकाशन में सहयोग का सुवअवसर प्राप्त हुआ है।

‘रामचरितमानस’ की तरह ही महाराजश्री का साहित्य भी प्रत्येक काल में प्रासंगिक एवं अनुकरणीय है। मानस के गूढ़तम रहस्यों को समझाने के लिए महाराजश्री का साहित्य निश्चित ही वर्तमान एवं भविष्य के लिए पथप्रदर्शक रहा हैं और फिर है और रहेगा।

मैं जीवन के प्रथम गुरु अपनी माताश्री के चरणों की वन्दना करता हूँ, साथ ही मेरी काया में ओज एवं पुरुषत्व भरने वाले विचारशक्ति के शिल्पी, संघर्षशील, कर्मठ, मेरे शिक्षाजगत् के गुरु राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित स्वर्गवासी पिता शक्ति श्री चिन्ता प्रसाद द्विवेदी को मेरा एवं मेरी पत्नी का कोटि-कोटि नमन। स्वर्गवासी पिताश्री का जीवन मानव के विचारों के अनुरूप ही था। प्रभु श्रीराम उनके आराध्य एवं आदर्श रहे। पिताश्री की ही प्रेरणा से मुझे व मेरी पत्नी को महाराज श्री सद्गुरू के रूप में प्राप्त हुए। मेरे पिताश्री ने यथार्थ के साथ अध्यात्म की शिक्षा एवं तरुणाई में ही  ‘मानस’ की प्रति देकर प्रभु श्रीराम के चरित्र के चिन्तन एवं मनन का मंत्र आशीर्वाद के रूप में दिया और उनके द्वारा कहा वाक्य ‘‘जब कभी भी तुम दिग्भ्रमित होगे, यह तुम्हारा पथ-प्रदर्शक होगा’’ मेरा एकमात्र अवलंबन है।

मैं अज्ञानी, अल्पमति महाराज जी की विरुदावली का गान नहीं कर सकता, क्योंकि ऐसा करना धृष्टता होगी। यह ठीक सूर्य को दीपक दिखाने जैसा होगा।
सम्मान जिनको पाकर स्वयं सम्मानित होते हैं ऐसे नररूप हरि युगदृष्टा हमारे जीवन में चेतना का संचार कर रहे हैं, यह अनुभूति ही आह्लादकारी है।

स्व. पिताश्री की पुण्यस्मृति में माँ वीणापाणि के मन्दिर में पुस्तक रूपी पुष्प को अर्पित करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इस हेतु मैं और मेरा परिवार कृतज्ञ है।


साकेत
76 विवेकानन्द नगर
रायपुर (छत्तीसगढ़)

सादर,

संतोष कुमार द्विवेदी
श्रीमती अंजु द्विवेदी एवं परिवार


महाराजश्री—एक परिचय

प्रभु की कृपा और प्रभु की वाणी का यदि कोई सार्थक पर्यायवाची शब्द ढूँढ़ा जाय, तो वे हैं-प्रज्ञा पुरुष, भक्तितत्त्वद्रष्टा, सन्तप्रवर, ‘परमपूज्य महाराजश्री रामकिंकर  उपाध्याय’। अपनी अमृतमयी, धीर-गम्भीर वाणी के माधुर्य द्वारा भक्ति-रसाभिलाषी-चातकों को, जनसाधारण एवं बुद्धिजीवियों को, नानापुराण- निगमागम, षट्शास्त्र, वेदों का दिव्य रसपान कराकर रसासिक्त करते हुए प्रतिफल निज व्यक्तित्व व चरित्र में रामचरित मानस के ब्रह्मराम की कृपामयी विभूति एवं दिव्यलीला का भावात्मक साक्षात्कार कराने वाले पूज्य महाराजश्री, आधुनिक युग के परम तेजस्वी मनीषी, मानस के अद्भुद शिल्पकार, रामकथा के अद्वितीय अधिकारी व्याख्याकार हैं।

भक्त-हृदय, रामानुरागी पूज्य महाराजश्री ने अपने अनवरत अध्यवसाय से श्रीरामचरितमानस की मर्मस्पर्शी भावभागीरथी बहाकर अखिल विश्व को अनुप्राणित कर दिया है। आपने शास्त्रदर्शन, मानस के अध्याय के लिए जो नवीन दृष्टि और दिशा प्रदान की है वह इस युग की एक दुर्लभ अद्वितीय उपलब्धि है-


धेनवः सन्तु पन्थानः दोग्धा हुलसिनन्दनः।
दिव्यरामकथादुग्धं प्रस्तोता रामकिंकरः।।


जैसे पूज्य महाराजश्री का अनूठा भाव दर्शन है, वैसे ही उनका जीवन-दर्शन अपने आपमें एक सम्पूर्ण काव्य है। आपके नामकरण में ही श्रीहनुमानजी की प्रतिच्छाया दर्शित होती है। वैसे ही आपके जन्म की गाथा में ईश्वर कारण प्रकट होता है। आपका जन्म 1 नवम्बर सन् 1924 को जबलपुर (मध्यप्रदेश) में हुआ। आपके पूर्वज मिर्जापुर के बरैनी नामक गाँव के निवासी थे।

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