नवधा भक्ति द्वितीय भाग - श्रीरामकिंकर जी महाराज Navdha Bhakti - Part 2 - Hindi book by - Sriramkinkar Ji Maharaj
लोगों की राय

बहुभागीय पुस्तकें >> नवधा भक्ति द्वितीय भाग

नवधा भक्ति द्वितीय भाग

श्रीरामकिंकर जी महाराज

प्रकाशक : रामायणम् ट्रस्ट प्रकाशित वर्ष : 2002
पृष्ठ :145
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4367
आईएसबीएन :00000

Like this Hindi book 10 पाठकों को प्रिय

208 पाठक हैं

भगवान राम द्वारा शबरी को उपदेश...

इस पुस्तक का सेट खरीदें
Navdha Bhakti (2)

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

।। श्री राम: शरणं मम ।।
।। श्री गुरवे नम: ।।


त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव
त्वमेव सर्वं मम देव देव


बैकुण्ठमासी पूज्य मातुश्री एवं परमपूज्य पिताजी की पावन स्मृति में
परमपूज्य शरणागतवत्सल गुरुदेव श्रीरामकिंकरजी महाराज के चरणों में साष्टांद प्रणाम सहित समर्पित

सेवक
गौरीशंकर झा
जबलपुर

।। श्रीराम: शरणं मम ।।

प्राक्कथन


गत 31 वर्षों से परम पूज्य पण्डित रामकिंकरजी की नवदिवसीय कथा-श्रृंखला यहाँ दिल्ली के लक्ष्मीनारायण मन्दिर के पृष्ठ भाग की वाटिका में अनवरत रूप से चलती रही। भक्ति और ज्ञान के दिव्य निर्मल जल से पण्डितजी प्रतिदिन सबका हृदय-सरोवर भरते रहे। ‘निज मन मुकुर सुधारि’ की भैरवी उनके प्रत्येक प्रवचन में सुनाई पड़ती थी। अपनी अमृतवाणी से, मौलिक विवेचन से, बोधगम्य विश्लेषण और रसपूर्ण व्याख्याओं के माध्यम से वह श्रोताओं को भगवान् राम की आदर्श-भावभूमि में तत्काल प्रवेश करा देते थे। उनके प्रवचन से हम सबको अपार आनन्द की तृप्ति होती थी और अगले दिन तीव्र सुधा के साथ पुन: उनकी वाणी को तन्मयता से सुनने अधिकाधिक श्रोतागण मगन रहते। उनके शब्दार्थ जितने विचारोत्तेजक होते, उनके भावार्थ भी उतने ही गूढ़ और सार्वकालिक। कथा की पौराणिकता को वर्तमान की यथार्थता से जोड़ने की उनकी सहजता श्रोताओं को गद्गद् कर देती थी।

राम चरित के जो घूँट पण्डितजी पिलाते रहे वैसे स्वादिष्ट घूँट केवल उनके मानस-घट से ही प्राप्त होते थे। श्रोता समुदाय अपने को आत्मविभोर अनुभव करते और भाव धरातल पर स्वयं को मानस-पात्रों के समीप पाते। भगवान् राम के अध्यात्मिक, दार्शनिक और व्यवहारिक लीला-चरित्र का आचमन कराने वाले, राम के धाम का सही और स्थायी पता बताने वाले, युग-तुलसी रामकिंकर 9 अगस्त, 2002 के राम के धाम में समा गया हैं और ‘‘रामायणम् आश्रम’’ अयोध्या में समाधिस्थ हैं। इस प्रकार राम के किंकर पण्डितजी साकेतवासी बन चुके हैं। वस्तुत: मानस के राजहंस ने मानस की अतल गहराई में निवास कर लिया है।

किन्तु, आज पूज्य पण्डितजी के बिना यह पावन प्रांगण सूना लगता है और साथ-ही-साथ यह प्रांगण उनकी स्मृति में डूबा हुआ भी लगता है। उनके विलक्षण आत्मचिन्तन से अभिभूत और चमत्कृत लगता है। लौकिक नाते तो लगता है कि पण्डितजी हमारे लिए एक अपार अभाव की सृष्टि कर गये हैं पर अलौकिक दृष्टि से दूसरे ही क्षण मन कहने लगता है कि वह हम सबको, वह सब कुछ दे गये हैं जो देना चाहते थे। वह सब कुछ कह गये हैं जो कहना चाहते थे। और वह सब कुछ लिख गये हैं जो लिखना चाहते थे। और इतनी और ऐसी अपार महिमामयी सम्पत्ति छोड़ गये हैं कि ‘हम उसको जितना बाँटेंगे वह उतना ही बढ़ जाएगी।’ एक सन्त की भाँति पण्डितजी अपनी वाणी से इतनी वर्षा कर गये हैं कि उनको सुनकर-समझकर हम हर बार स्वयं को सर्म्पूण रूप से भरा-पूरा पाएँगे।

संगीत कला मन्दिर, कोलकाता के तत्वाधान में हमारे अनुरोध पर सन् 1959 में पूज्य पण्डितजी का प्रवचन प्रारम्भ हुआ था। कालान्तर में ‘बिरला अकादेमी ऑफ आर्ट एण्ड कल्चर’ के लिये यह बड़े गौरव की बात हुई कि हमारे अनुरोध पर पण्डितजी ने सन् 1972 से यहाँ दिल्ली में भी नवरात्र के पावन पर्व पर रामकथा का श्रीगणेश किया जो दिल्ली के सुधी श्रोताओं की श्रद्धानुभूति से निरन्तर उजागर होता रहा।

हम दोनों के लिये परम सौभाग्य की बात थी कि प्रतिवर्ष यहाँ प्रवचन प्रारम्भ करने के पूर्व बड़े आत्मीय भाव से पण्डितजी, हम दोनों का नाम, हमें यजमान बनाकर लिया करते थे और आपना आशीर्वाद दिया करते थे। आज इस प्रसंग के स्मरण मात्र से हमारे नेत्र सजल हो जाते हैं और कंठ अवरुद्ध। गत 13 अप्रैल से प्रवचन प्रारम्भ हो गया था किन्तु 16 अप्रैल को प्रभात की पूजन-प्रार्थना के पश्चात् अनायास गिर जाने से पण्डितजी घोर शारीरिक कष्ट का अनुभव करने लगे। ऐसी स्थिति में हम दोनों ने उनसे अनुरोध किया कि उनके स्वास्थ्य-हित की दृष्टि से यदि कोई कठिनाई होगी। किन्तु कथा-क्रम से वंचित रहना पण्डितजी को असह्य था। सब दिल्ली वासी इसके साक्षी हैं कि शारीरिक पीड़ा होते हुए भी वह मंच तक व्हील चेयर में आते रहे और प्रवचन से हम सबको धन्य करते रहे। वास्तव में दिल्ली के इस नवदिवसीय आयोजन के प्रति उनके मन में बड़ा अनुराग था। पण्डितजी भक्ति को ही लोक संस्कार की पाठशाला का प्रथम पाठ मानते थे और सदा की भाँति ‘नवधा भक्ति’ पर प्रवचन करते हुए उन्होंने नवदिवसीय श्रृंखला को पूरा किया क्योंकि इस आयोजन में उनको एक अनुष्ठान की छवि प्रतीत होती थी।

आयोजन के अन्तिम दिन, हमारी सुपुत्री श्रीमती जयश्री मोहता ने अपने समापन-भाषण में पण्डितजी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए, आपके सबके द्वारा किए गए हर्षोल्लास के बीच यह घोषणा कर दी कि पूज्य पण्डितजी ने कृपापूर्वक अगले वर्ष भी पुन: पधारने की स्वीकृति प्रदान कर दी और किन्तु विधि का विधान कुछ और ही था। और, प्रवचन के स्थान पर आज पण्डितजी की अनुपस्थिति में हम उनका गुणगान कर रहे हैं। पण्डितजी के अनुसार भक्ति का तात्पर्य भगवान् में प्रविष्ट होने का अवसर पाना और प्रभु से एकाकार होना रहा है। वह शब्दों के अर्थों की नहीं, उनके भावार्थ की यात्रा कराते थे और उसे लोकार्थ तक पहुँचाते थे। उनका गुणगान भी किसी लोकार्थ से कम नहीं है।

‘नवद्या भक्ति’ का विश्लेषण करते हुए उन्होंने ‘प्रथम भगति संतन्ह कर संगा’ पर प्रकाश डालते हुए ‘दूसरि रति मम कथा प्रसंगा’ का स्पर्श ‘नवद्या भक्ति के प्रथम भाग में किया था। प्रस्तुत पुस्तक ‘नवद्या भक्ति’ भाग-2 है जिसमें इस कथा-स्थल पर पिछले वर्ष किये गये प्रवचनों का प्रकाशन किया गया है। राम नाम से आप्लावित पण्डित रामकिंकरजी महाराज की यह अन्तिम पुस्तिका ‘नवद्या भक्ति’, जितनी मर्मस्पर्शी है उतनी ही हृदयस्पर्शी भी। पण्डितजी का साहित्य, ज्ञान का भण्डार ही नहीं लोक संस्कारों का दिव्य-द्वार भी है। पण्डितजी ने अपने प्रवचनों में उपमाओं का केवल आनन्द ही नहीं बाँटा, उनकी सात्त्विकता को सिद्ध करते हुए, पाठकगण को उसमें निमग्न रहने का अवसर भी प्रदान किया है। दिल्ली के इस अनुष्ठान की प्रवचन-श्रृंखला के अन्तिम प्रकाशन का, आशा है विद्वजन् और प्रबुद्ध पाठक समान रूप से अभिनन्दन और स्वागत करेंगे।

‘‘श्रीराम जय राम, जय जय राम’’

बसन्त कुमार बिरला
सरला बिरला

महाराजश्री : एक परिचय



प्रभु की कृपा और प्रभु की वाणी का यदि कोई सार्थक पर्यायवाची शब्द ढूँढ़ा जाय, तो वह हैं- प्रज्ञापुरुष, भक्तितत्त्व द्रष्टा, सन्त प्रवर, ‘परमपूज्य महाराजश्री रामकिंकर उपाध्याय’। अपनी अमृतमयी, धीर, गम्भीर-वाणी-माधुर्य द्वारा भक्ति-रसाभिलाषी-चातकों को, जनसाधारण एवं बुद्धिजीवियों को, नानापुराण- निगमागम, षट्शास्त्र, वेदों का दिव्य रसपान कराकर रससिक्त करते हुए, प्रतिपल निज व्यक्तित्व व चरित्र में रामचरित मानस के ब्रह्मराम की कृपामयी विभूति एवं दिव्यलीला का भावात्मक साक्षात्कार कराने वाले पूज्य महाराजश्री, आधुनिक युग के परम तेजस्वी मनीषी, मनस के अद्भुद शिल्पकार, रामकथा के अद्वितीय अधिकारी व्याख्याकार हैं।

भक्त-हृदय, रामानुरागी पूज्य महाराजश्री ने अपने अनवरत अध्यवसाय से श्रीरामचरितमानस की मर्मस्पर्शी भावभागीरथी बहाकर अखिल विश्व को अनुप्राणित कर दिया है। आपने शास्त्रदर्शन, मानस के अध्ययन के लिए जो नवीन दृष्टि और दिशा प्रदान की है वह इस युग की तरफ की एक दुर्लभ अद्वितीय उपलब्धि है-


धेनवः सन्तु पन्थानः दोग्धा हुलसिनन्दन।
दिव्यराम-कथा दुग्धः, प्रस्तोता रामकिंकरः।।


जैसे  पूज्य महाराजश्री का अनूठा भाव दर्शन है, वैसे ही उनका जीवन-दर्शन अपने आपमें एक सम्पूर्ण काव्य है। आपके नामकरण में ही श्रीहनुमानजी की प्रतिच्छाया दर्शित होती है। वैसे ही आपके जन्म की गाथा में ईश्वर कारण प्रकट होता है। आपका जन्म 1 नवम्बर सन् 1924 को जबलपुर (मध्यप्रदेश) में हुआ। आपके पूर्वज मिर्जापुर के बरैनी नामक गाँव के निवासी थे। आपकी माता परमभक्तिमयी श्रीधनेसरा देवी एवं पिता पूज्य श्री शिवनायक उपाध्यायजी रामायण के सुविज्ञ व्याख्याकार एवं हनुमानजी महाराज के परम भक्त थे। ऐसी मान्यता है कि श्री हनुमानजी के प्रति उनके सम्पूर्ण एवं अविचल भक्तिभाव के कारण उनकी बढ़ती अवस्था में श्री हनुमन्तयंती के ठीक सातवें दिन उन्हें एक विलक्षण प्रतिभायुक्त पुत्ररत्न की प्राप्ति दैवीकृपा से हुई। इसलिए उनका नाम ‘रामकिंकर’ अथवा राम सेवक रखा गया।
 
जन्म से होनहार व प्रखर बुद्धि के आप स्वामी रहे हैं। आपकी शिक्षा-दीक्षा जबलपुर व काशी में हुई। स्वभाव से ही अत्यन्त संकोची एवं शान्त प्रकृति के बालक रामकिंकर अपने उम्र के बच्चों की अपेक्षा अधिक गम्भीर थे। एकान्तप्रिय, चिन्तनरत, विलक्षण प्रतिभा वाले सरल बालक अपनी शाला में अध्यापकों के भी अत्यन्त प्रिय पात्र थे। बाल्यावस्था से ही आपकी मेधाशक्ति इतनी विकसित थी कि क्लिष्ट एवं गम्भीर लेखन, देश-विदेश का विशद साहित्य अल्पकालीन अध्ययन में ही आपके स्मृति पटल पर अमिट रूप से अंकित हो जाता था। प्रारम्भ से ही पृष्ठभूमि के रूप में माता-पिता के धार्मिक विचार एवं संस्कारों का प्रभाव आप पर पड़ा, परन्तु परम्परानुसार पिता के अनुगामी वक्ता बनने का न तो कोई संकल्प था, न कोई अभिरुचि।

पर कालान्तर में विद्यार्थी जीवन में पूज्य महाराजश्री के साथ एक ऐसी चामत्कारिक घटना हुई जिसके फलस्वरूप आपके जीवन ने एक नया मोड़ ले लिया। 18 वर्ष की अल्पआयु में जब पूज्य महाराजश्री अध्ययनरत थे, तब अपने कुल देवता श्री हनुमानजी महाराज का आपको अलौकिक स्वप्न दर्शन हुआ जिसमें उन्होंने आपको वट वृक्ष के नीचे शुभासीन करके दिव्य तिलक का आशीर्वाद देकर कथा सुनाने का आदेश दिया। स्थूल रुप में इस समय आप विलासपुर में अपने पूज्य पिता के साथ छुट्टियां मना रहे थे। जहाँ पिताश्री की कथा चल रही थी। ईश्वर संकल्पानुसार परिस्थिति भी अचानक कुछ ऐसी बन गयी कि अनायास ही पूज्य महाराजश्री के श्रीमुख से भी पिताजी के स्थान पर कथा कहने का प्रस्ताव एकाएक निकल गया।

आपके द्वारा श्रोता समाज के सम्मुख यह प्रथम भाव-प्रस्तुति थी, किन्तु कथन व शैली वैचारिक श्रृंखला कुछ ऐसी मनोहर बनी कि श्रोतासमाज विमुग्ध होकर, तन-मन व सुध-बुध खोकर उनमें अनायास ही बँध गया। आप तो रामरस की भावमाधुरी की बानगी बनाकर, वाणी का जादू करके मौन थे, किन्तु श्रोतासमाज आनन्दमयी होने पर भी अतृप्त था। इस प्रकार प्रथम प्रवचन से ही मानस प्रेमियों के अन्तर में गहरे पैठकर आपने अभिन्नता स्थापित कर ली।

ऐसा भी कहा जाता है कि बीस वर्ष की अल्पायु में आपने एक और स्वप्न देखा, जिसकी प्रेरणा से गोस्वामी तुलसीदास के ग्रन्थों के प्राचार एवं उनकी खोजपूर्ण व्याख्या में ही अपना समस्त जीवन समर्पित कर देने का दृढ़ संकल्प कर लिया। यह बात अकाट्य है कि प्रभु की प्रेरणा और संकल्प से जिस कार्य का शुभारम्भ होता है, वह मानवीय स्तर से कुछ अलग ही गति-प्रगति वाला होता है। शैली की नवीनता व चिन्तनप्रधान विचारधारा के फलस्वरूप आप शीघ्र ही विशिष्टतः आध्यात्मिक जगत् में अत्यधिक लोकप्रिय हो गये।

ज्ञान-विज्ञान के पथ में पूज्यपाद महाराजश्री की जितनी गहरी पैठ थी, उतना ही प्रबल पक्ष, भक्ति साधना का, उनके जीवन में दर्शित होता है। वैसे तो अपने संकोची स्वभाव के कारण उन्होंने अपने जीवन की दिव्य अनुभूतियों का रहस्योद्घाटन अपने श्रीमुख से बहुत आग्रह के बावजूद नहीं किया, पर कही-कहीं उनके जीवन के इस पक्ष की पुष्टि दूसरों के द्वारा जहाँ-तहाँ प्राप्त होती रही। उसी क्रम में उत्तराखण्ड की दिव्यभूमि ‘ऋषिकेश’ में श्रीहनुमाजी महाराज का प्रत्यक्ष साक्षात्कार, निष्काम भाव से किये गये एक छोटे से अनुष्ठान के फलस्वरूप हुआ !! वैसे ही श्री चित्रकूट धाम की दिव्यभूमि में अनेकानेक अलौकिक घटनाएँ परमपूज्य महाराजश्री के साथ घटित हुईं जिसका वर्णन महाराजश्री के निकटस्थ भक्तों के द्वारा सुनने को मिला !! परमपूज्य महाराजश्री अपने स्वभाव के अनुकूल ही इस विषय में सदैव मौन रहे।  

प्रारम्भ में भगवान् श्रीकृष्ण की दिव्य लीलाभूमि वृन्दावन धाम के परमपूज्य महाराज, ब्रह्मलीन स्वामी श्रीअखण्डानन्दजी महाराज के आदेश पर आप कहाँ कथा सुनाने गए। वहाँ एक सप्ताह तक रहने का संकल्प था। पर यहाँ के भक्त एवं साधु-सन्त समाज में आप इतने लोकप्रिय हुए कि उस तीर्थधाम ने आपको ग्यारह माह तक रोक लिया। उन्हीं दिनों मैं आपको वहाँ के महान सन्त अवधूत श्री उड़िया बाबाजी महाराज भक्त शिरोमणि श्रीहरिबाबाजी महाराज, स्वामी श्रीअखण्डानन्दजी महाराज को भी कथा सुनाने का सौभाग्य मिला। कहा जाता है कि अवधूत पूज्य श्रीउड़िया बाबा, इस होनबार बालक के श्री मुख से निःसृत, विस्मित कर देने वाली वाणी से इतने अधिक प्रभावित थे कि यह मानते थे कि यह किसी पुरुषार्थ या प्रतिभा का परिणाम न होकर के शुद्ध भगत्वकृपा का प्रसाद है। उनके शब्दों में- ‘‘क्या तुम समझते हो, कि यह बालक बोल रहा है ? इसके माध्यम से तो साक्षात् ईश्वरीय वाणी का अवतरण हुआ है।’’

इसी बीच अवधूत श्रीउड़िया बाबा से संन्यास दीक्षा ग्रहण करने का संकल्प आपके हृदय में उदित और परमपूज्य बाबा के समाज के समक्ष अपनी इच्छा प्रकट करने पर बाबा के द्वारा लोक एवं समाज के कल्याण हेतु शुद्ध संन्यास वृत्ति से जनमानस सेवा की आज्ञा मिली।

सन्त आदेशानुसार एवं ईश्वरीय संकल्पानुसार मानस प्रचार-प्रसार की सेवा दिन-प्रतिदिन चारों दिशाओं में व्यापक होती गई। उसी बीच काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से आपका सम्पर्क हुआ। काशी में प्रवचन चल रहा था। उस गोष्ठी में एक दिन भारतीय पुरातत्त्व और साहित्य के प्रकाण्ड विद्वान एवं चिन्तन श्री वासुदेव शरण अग्रवाल आपकी कथा सुनने के लिए आए और आपकी विलक्षण एवं नवीन चिन्तन शैली से इतने अधिक प्रभावित हुए कि उन्होंने काशी हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति श्री वेणीशंकर झा एवं रजिस्ट्रार श्री शिवनन्दनजी दर से Prodigious (विलक्षण प्रतिभायुक्त) प्रवक्ता के प्रवचन का आयोजन विश्वविद्यालय प्रांगण में रखने का आग्रह किया। आपकी विद्वत्ता इन विद्वानों के मनोमस्तिष्क को ऐसे उद्वेलित कर गई कि आपको अगले वर्ष से ‘विजिटिंग  प्रोफेसर’ के नाते काशी हिन्दू विश्वविद्यलय व्याख्यान देने के लिए निमंत्रित किया गया। इसी प्रकार काशी में आपका अनेक सुप्रसिद्ध साहित्यकार जैसे श्री हजारी प्रसाद द्विवेदी, श्री महादेवी वर्मा से साक्षात्कार हुआ एवं शीर्षस्थ सन्तप्रवर का सन्निध्य प्राप्त हुआ।

अतः पूज्य महाराजश्री परम्परागत कथावाचक नहीं हैं, क्योंकि कथा उनका साध्य नहीं, साधना है। उनका उद्देश्य है भारतीय जीवन पद्धति की समग्र खोज अर्थात भारतीय मानस का साक्षात्कार। उन्होंने अपने विवेक प्रदीप्त खोज अर्थात भारतीय मानस का साक्षात्कार। उन्होंने अपने विवेक प्रदीप्त मस्तिष्क से, विशाल परिकल्पना से श्री रामचरितमानस के अन्तर्रहस्यों का उद्घाटन किया है। आपने जो अभूतपूर्व एवं अनूठी दिव्य दृष्टि प्रदान की है, जो भक्ति-ज्ञान का विश्लेषण तथा समन्वय, शब्द ब्रह्म के माध्यम से विश्व के सम्मुख रखा है, उस प्रकाश स्तम्भ के दिग्दर्शन में आज सारे इष्ट मार्ग आलोकित हो रहे हैं ! आपके अनुपम शास्त्रीय पाण्डित्य द्वारा, न केवल आस्तिकों का ही ज्ञानवर्धन होता है अपितु नयी पीढ़ी के शंकालु युवकों में भी धर्म और कर्म का भाव संचित हो  जाता है। ‘कीरति भनिति भूति भलि सोई’.....के अनुरूप ही आपने ज्ञान की सुरसरि अपने उदार व्यक्तित्व से प्रबुद्ध और साधारण सभी प्रकार के लोगों में प्रवाहित करके ‘बुध विश्राम’ के साथ-साथ सकल जन रंजनी बनाने में आप यज्ञरत हैं। मानस सागर मैं बिखरे हुए विभिन्न रत्नों को सँजोकर आपने अनेक आभूषण रूपी ग्रन्थों की सृष्टि की है। मानस-मन्थन, मानस-चिन्तन, मानस-दर्पण, मानस-मुक्तावली, मानस-चरितावली जैसी आपकी अनेकानेक अमृतमयी अमर कृतियां हैं जो दिग्दिगन्तर तक प्रचलित रहेंगी। आज भी वह लाखों लोगों को रामकथा का अनुपम पीयूष वितरण कर रही हैं और भविष्य में भी अनुप्राणित एवं प्रेरित करती रहेंगी। तदुपरान्त अन्तर्राष्ट्रीय रामायण सम्मेलन नामक अन्तर्राष्ट्रीय संस्था के भी आप अध्यक्ष रहे।

निष्कर्षतः आप अपने प्रवचन, लेखन और शिष्य परम्परा द्वारा जिस रामकथा पीयषू का मुक्तहस्त से वितरण कर रहे हैं, वह जन-जन के तप्त एवं शुष्क मानस में नवशक्ति का सिंचन कर रही है, शान्ति प्रदान कर समाज में आध्यात्मिक एवं दार्शनिक चेतना जाग्रत् कर रही है।

अतः परमपूज्य महाराजश्री का स्वर उसी वंशी में भगवान का स्वर ही गूंजता है। उसका कोई अपना स्वर नहीं होता। परमपूज्य महाराजश्री भी एक ऐसी वंशी हैं, जिसमें भगवान् के स्वर का स्पन्दन होता है। साथ-साथ उनकी वाणी के तरकश से निकले, वे तीक्ष्ण विवेक के बाण अज्ञान-मोह-जन्य पीड़ित जीवों की भ्रांतियों, दुर्वृत्तियों एवं दोषों का संहार करते हैं। यों आप श्रद्धा और भक्ति की निर्मल मन्दाकिनी प्रवाहित करते हुए महान् लोक-कल्याण कारी कार्य सम्पन्न कर रहे हैं।

प्रभु की शरण में
मन्दाकिनी श्रीरामकिंकरजी


प्रथम प्रवचन


भगवान् श्रीरामभद्र और वात्सल्यमयी, करुणामयी माँ श्रीसीताजी की अनुकम्पा से इस वर्ष पुन: यह सुअवसर मिला है कि श्री लक्ष्मीनारायण मन्दिर के पवित्र प्रांगण में जिज्ञासु, श्रद्धालु एवं भावुक श्रोताओं के समझ श्रीरामचरितमानस की कुछ चर्चा की जा सके। यह आयोजन निसन्देह श्रीबसन्तकुमारजी बिरला और सौजन्यमयी श्रीमती सरलाजी बिरला की श्रद्धाभावना और इन पर प्रभु की कृपा का ही परिणाम है।
श्री जाजूजी ने, जो कवि, साहित्यकार, सुधी और बुध भी हैं, मेरी प्रशंसा में जो भावोद्गार प्रकट किए उसके विषय में मैं यही कहूँगा कि इसमें मेरी कोई विशेषता नहीं है। प्रभु मेरे माध्यम से जो बात कहला रहे हैं, यह निश्चित रूप से उनकी अनुकम्पा का ही फल है। अब इसमें यदि ‘जन’ से अधिक बुध को आनन्द आता है, तो यह बात ‘मानस’ में कही गयी है-

जो प्रबंध बुध नहिं आदरहीं।
सो श्रम बादि बाल कवि करहीं।। 1/13/8

अत: उनकी यह भावाभिव्यक्ति तो ‘मानस’ के सन्दर्भ से ही जुड़ी हुई है। और उन्होंने जो कुछ मेरे लिये, माध्यम के रूप में दिखाई देने वाले एक व्यक्ति के लिये कहा, वह उनकी स्नेह-भावना का परिचायक है। मैं इसके लिये उनका आभार प्रकट करता हूँ।

पिछले वर्ष नवधा भक्ति का जो प्रसंग प्रारम्भ किया गया था, इस वर्ष उसी क्रम को आगे बढ़ाने का प्रयास करते हैं।
भगवान् श्रीराम जब भक्तिमती शबरीजी के आश्रम में आते हैं तो भावमयी शबरीजी उनका स्वागत करती हैं, उनके श्रीचरणों को पखारती हैं, उन्हें आसन पर बैठाती हैं और उन्हें रसभरे कन्द-मूल-फल लाकर अर्पित करती हैं। प्रभु बार-बार उन फलों के स्वाद की सराहना करते हुए आनन्दपूर्वक उनका आस्वादन करते हैं। इसके पश्चात् भगवान् राम शबरीजी के समक्ष नवधा भक्ति का स्वरूप प्रकट करते हुए उनसे कहते हैं कि-

नवधा भकति कहउँ तोहि पाहीं।
सावधान सुनु धरु मन माहीं।।
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा।
दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।।
गुर पद पकंज सेवा तीसरि भगति अमान।
चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान। 3/35
मन्त्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा।
पंचम भजन सो बेद प्रकासा।।
छठ दम सील बिरति बहु करमा।
निरत निरंतर सज्जन धरमा।
सातवँ सम मोहि मय जग देखा।
मोतें संत अधिक करि लेखा।।
आठवँ जथालाभ संतोषा।
सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा।।
नवम सरल सब सन छलहीना।
मम भरोस हियँ हरष न दीना।। 3/35/1-5

 

प्रथम पृष्ठ

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book