मानस चरितावली भाग 2 - श्रीरामकिंकर जी महाराज Manas Charitavali Part 2 - Hindi book by - Sriramkinkar Ji Maharaj
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आचार्य श्रीराम किंकर जी >> मानस चरितावली भाग 2

मानस चरितावली भाग 2

श्रीरामकिंकर जी महाराज

प्रकाशक : रामायणम् ट्रस्ट प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :352
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4369
आईएसबीएन :0000

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मानस के 24 भिन्न पात्रों के चरित्र का स्वतंत्र मूल्यांकन....

Manas Charitavli (2)

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिन्धु नररूप हरि।

साहित्य और इतिहास में अनेक ऐसे पात्रों का दर्शन होता है जिनसे हम केवल ग्रन्थों के माध्यम से परिचित हो जाते हैं। कभी-कभी उन्हें देखकर उनकी दुर्लभता की ऐसी अनुभूति होती है कि मन यह सोचकर संशयग्रस्त हो उठता है कि क्या सचमुच ऐसे व्यक्ति कभी धरती पर हुए होंगे या केवल वे साहित्यकार की मानसिक सृष्टिमात्र हैं। पर साहित्य और इतिहास के माध्यम से ऐसे भी चित्र सामने आते हैं जिन्हें देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि इनसे तो हम पूरी तरह परिचित ही हैं। ये व्यक्ति ग्राम नगर, हाट-बाट में बहुधा दिखाई दे जाते हैं और कभी-कभी तो वे अपने अन्तराल में ही झाँक उठते हैं। ऐसे लगने लगता है कि जैसे किसी दर्पण में हम अपना ही प्रतिबिम्ब देख रहे हैं। रामचरितमानस के पात्रों से परिचय पाते समय भी कुछ इसी प्रकार के मिले-जुले भावों की अनुभूति होती है। बहुधा इनका विभाजन यथार्थ और आदर्श के रूप में किया जाता है।

कुछ विचारकों की ऐसी धारणा है कि विकृति, क्षुद्रता और स्वार्थपरता ही जीवन का यथार्थ है, शेष बातें तो केवल काल्पनिक उडान मात्र है। यह वे बाते हैं जिन तक व्यक्ति कभी पहुँच ही नहीं सकता है। अध्यात्मवादी विचारक इसे स्वीकार नहीं कर सकता है। उसकी दृष्टि में जीव मूलतः शुद्ध बुद्ध और मुक्त है विकृत्ति केवल आगन्तुक है। ठीक उसी प्रकार जैसे स्वस्थता शरीर का सहज धर्म है और रोग कुछ समय के लिए उस पर अधिकार कर लेते हैं। रोग के विनष्ट होते ही व्यक्ति पुनः स्वस्थता की पूर्व स्थिति में पहुँच जाता है। रोग को शाश्वत सत्य मानकर उसे स्वीकार कर लेने वाला व्यक्ति रोग से लड़नें की कल्पना भी नहीं कर सकता है। इसलिए यदि रोग यथार्थ है तो औषधि उससे कम यथार्थ नहीं है। अन्तर्मन की स्थिति ठीक इसी प्रकार की है। विकृतियों को यथार्थ मानकर उदात्त गुणों को केवल काल्पनिक आदर्श के रूप में उपेक्षा की दृष्टि से देखा आत्मिक स्वस्थता के स्थान पर, आत्मघात को स्वीकार करना है। अतः साहित्य का कार्य यथार्थ के नाम पर केवल विकृतियों का चित्रण करना ही नहीं है। इसीलिए गोस्वामी जी की कृतियों में जीवन के यथार्थ और आदर्श दोनों ही पक्षों का चित्रण प्रस्तुत किया गया है।

मानस चरितावली के प्रथम खण्ड में जिन पात्रों के चरित्र की चर्चा की गई है, वे मुख्यतः मानस के आदर्श पक्ष का प्रतिनिधित्व करते हैं। द्वितीय खण्ड में जीवन की विकृति और स्वस्थता दोनों के ही चित्र अंकित करने की चेष्टा की गई है।

सद्गुणों और दुर्गुणों का अलग-अलग विवेचन करने के पश्चात् रामभद्र ने इनका समापन जिस पंक्ति से किया है वह इनके तात्त्विक स्वरूप को हृदयंगम करने के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। भरत की जिज्ञासा थी, सन्त और असन्त के लक्षणों को लेकर राघव के द्वारा इनका बड़ा ही विस्तृत वर्णन किया गया, पर अचानक ही इस विश्लेषण की धारा बदल सी जाती है। जब वे कहते हैं-गुण और दोष दोनों ही माया की कृति हैं इसलिए इन दोनों को भिन्न रूप में न देखना ही सच्चा गुण है। इन दोनों में भिन्नता देखना सबसे बडा अज्ञान है :


सुनहु तात मायाकृत गुन अरु दोष अनेक।
गुन यह अभय न देखिअहिं देखिअ सो अबिबेक ।।उ-41


ऐसा लगता है कि इस वाक्य से तो सन्त-असन्त का सारा आधार ही समाप्त हो जाता है। यदि गुण और दोष को भिन्न मानना अविवेक है तो उसके आधार पर किसी को सन्त या असन्त की उपाधि देना भी तो अज्ञान का ही परिचायक माना जाएगा। फिर तो सन्त-महिमा और असन्त निन्दा का कोई उद्देश्य ही नहीं रह जाता है। पर विचित्र प्रकार का विरोधाभास तो यही है कि इस विश्लेषण के पहले स्वयं राम ही सन्त के सद्गुणों का वर्णन करने के साथ-साथ ऐसे सद्गुण सम्पन्न सन्तों को प्राणप्रिय बताते हैं और असन्तों के विषय में तो वे इतने सजग हैं कि उनके दुर्गुणों का वर्णन करने से पहले ही उनसे दूर रहने की शिक्षा देते हैं :



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