तेरह अनुपम कहानियां - मिकी पटेल Terah Anupam Kahaniyan - Hindi book by - Miki Patel
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तेरह अनुपम कहानियां

मिकी पटेल

प्रकाशक : नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :152
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4411
आईएसबीएन :81-237-0840-8

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भारतीय भाषाओं की तेरह अनुपम कहानियां....

tehrah anupam kahaniyan

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

विशेष पुरस्कार

अनंत देव शर्मा
‘‘उफ कितना दुष्ट है यह लड़का। इसे पीटकर सीधी किये बगैर नहीं चलेगा। लड़कों के साथ इसके लड़ने-झगड़ने की कई वारदातें मैं सुन चुका हूँ। बुला ला उसे।’’ ‘‘मोहन, मोहन,’’ हेडमास्टर ने चौकीदार मोहन को ऊंची आवाज में पुकारा। हेडमास्टर के गरजने की आवाज से ही मोहन समझ गया कि उनका पारा चढ़ा हुआ है। तीन छलांग में वह कमरे से बाहर निकल आया और हेडमास्टर के पास पहुंचकर सहमते हुए पूछा, ‘‘जी, सर।’’
‘‘तुरंत जाकर पाँचवीं कक्षा में तपन को बुला ला।’’ हेडमास्टर ने आदेश दिया।
मोहन एकदम कमरे से निकल गया।

यहाँ तपन का जरा परिचय दे दिया जाये।
तपन पदुमनि गाँव के किरानी का मंझला लड़का है। छरहरे कद का होने पर भी बड़ा बलिष्ठ। रंग साँवला, बड़ी-बड़ी आँखें, फुर्तीला, साथ ही पढ़ने लिखने में भी तेज। मगर क्या घर, क्या बाहर, उसके उपद्रवों का कोई पार नहीं। बेकार बातों में उलझने में माहिर। घर के लोग भी उससे आतंकित रहते। वह पहले या बिना कारण किसी को परेशान नहीं करता था, किसी से झगड़ा-टंटा नहीं करता। पर अगर कोई उससे उलझे या उसे चिढ़ा दे तो बस फिर उसकी खैर नहीं। हम उम्र के लड़कों का तो उसे बता देना भर काफी है। उसे वह बिलकुल ठीक करके ही छोड़ता। यूँ कहा जाये तो वह सही मायने में बेसहारों का सहारा है। इसी कारण उसके साथी लड़के जहाँ उसे पसंद करते हैं, वहीं उससे डरते भी हैं।
गाँव के प्राथमिक स्कूल की आखिरी परीक्षा पास करने के बाद वह पंद्रह मील दूर अपने मामा के यहाँ चला गया था और वहाँ के हाईस्कूल में सिर्फ सालभर पढ़ने के बाद घर का लड़का फिर घर लौट आया और गाँव से डेढ़ मील दूर के ज्ञानपीठ हाई स्कूल में भरती हो गया।

इस हाईस्कूल में उसे आये अभी सिर्फ एक माह हुआ था। इसी बीच उसकी शिकायतें आने लगीं। पदुमनि गाँव के ही व्यापारी हरेन महाजन ने तपन के खिलाफ हेडमास्टर से फरियाद की। हेडमास्टर की दी गयी अपनी अर्जी में उसने लिखा था-कल बदमाश तपन ने लड़कों के झुंड के साथ बिना कारण उसकी दुकान पर पत्थर बरसाये और उसके उकसाने पर दूसरे लड़कों ने दुकान में घुसकर गड़बड़ी की है। इसलिए हेडमास्टर साहब इसका उचित फैसला कर दें।

चौकीदार के साथ तपन आया और डरता हुआ हेडमास्टर की ओर नजर डाल, सिर झुकाकर खड़ा हो गया। हेड़ मास्टर ने हाथ में पकड़ी बेंत हिलाते हुए कहा, ‘‘ऐ लड़के तेरा ही नाम तपन है ?’’
- ‘‘जी सर !’’ विनम्रता से जवाब दिया।
- ‘‘हूँ तू इन सज्जन को पहचानता है ?’’ पास खड़े हरेन महाजन की ओर उंगली से इशारा करते हुए हेडमास्टर ने तपन से पूछा।

- ‘‘जी, इनका घर तो हमारे गाँव में ही है।’’ तपन ने पहले जैसे विनम्र भाव से ही जवाब दिया।
- ‘‘हूँ, ठीक है। कल शाम को लड़कों की टोली ले तूने इनकी दुकान पर पत्थर क्यों फेंके थे ? सच-सच बता। नहीं तो बेंत मार-मारकर तेरी चमड़ी उधेड़ दूंगा।’’ हेडमास्टर ने आँखें तरेर कर पूछा।
- ‘‘जी सर, बन्तू आदि के साथ इनकी दुकान पर मैंने पत्थर फेंके थे, यह सच है।’’ तपन बोला।
- ‘‘क्यों फेंके थे पत्थर ? बदमाश कहीं का, बता ?’’ हेडमास्टर ने डाँटा।
- ‘‘सर, चीजें बेचते समय यह आदमी ग्राहकों को ठगा करता है। कीमत भी ज्यादा लेता है, तौल में भी कम देता है। तिस पर कागज के ऐसे थैले बनवाये हैं जिनकी पेंदी में मोटी-मोटी दफ्ती लगी रहती है। ऐसे थैले बनाने के लिए मोटी-मोटी गदि्दयाँ मंगवा रखी हैं सर, परसों सवेरे इसके यहाँ से एक किलो दाल ली थी। घर लाकर तौली तो सिर्फ आठ सौ ग्राम निकली। थैले को फाड़कर उसकी गद्दी तौलने पर वह पचास ग्राम की थी। शेष डेढ़ सौ ग्राम इसने तोल में कम दिया था। गाँव के सभी लोग इसके बारे में कहा-सुना करते हैं। मैंने जब कल शाम को इससे वह बात बतायी तो इसने मुझे उल्टे गालियाँ देकर दुकान से भगा दिया था, सर। इसी कारण मैंने लड़कों को साथ लेकर इसकी दुकान पर पत्थर फेंके थे।’’ तपन ने कहा।

हेडमास्टर ने हरेन महाराज के चहरे पर नजर डाली। उसका चेहरा स्याह पड़ गया था। हेड़मास्टर ने कुछ सोचा। फिर तपन की ओर देखकर बोले - ‘‘जो भी हो, तूने यह काम अच्छा नहीं किया, किसी के यहां जाकर यों उपद्रव करना बड़ा बुरा है। अगर महाजन ने बुरा काम किया है तो उसका फैसला सरकार या और लोग करेंगे। तुझे क्या पड़ी थी ? आ, हाथ फैला-’’
एक एक कर पाँच बेंत खाकर तपन कुछ देर के बाद कमरे से निकल गया। उसकी कक्षा के लड़के उसकी ओर देखकर व्यंग्य करते हुए हँस रहे थे। दो एक ने आवाजें भी कसीं।

कुछ दिन बाद एक और घटना हो गयी। घटना स्कूल की पाँचवीं घंटी में हुई। तपन स्कूल के आसपास घूमनेवाले एक उद्दंड साँड़ को वश में करना चाहता था, तभी वह हंगामा हो गया था। उसके लिए तपन अपने को अपराधी नहीं मानता। उस साँड़ के उपद्रव के मारे वहां के बहुत से लोगों की नाक में दम हो गया था। कई लोगों को सींग मारकर उसने घायल कर दिया था। अगर कोई लकड़ी या डंडा लेकर आगे बढ़ता तो वह साँड़ तनकर उसकी ओर दौड़ पड़ता साँड़ की वह रुद्रमूर्ति देखकर उसके सामने जाने की हिम्मत भला कौन कर सकता था। साँड़ के उपद्रवों से तपन के मन में उसके प्रति एक होड़ की भावना जाग उठी थी। उसने मन ही मन कहा- ठहरो बच्चू, तुम्हें मैं सीधा करके ही छोडूँगा।

कुछ सोच-विचार कर उस दिन विराम की घंटी में वह कहीं से एक रस्सी और एक सीटी ले आया था। चुपके से साँड़ के पास पहुंचकर मौके से न जाने कब, कैसे अचानक कूद कर उसकी पीठ पर सवार हो गया और घोड़े की भांति साँड़ के मुँह में रस्सी की लगाम लगा दी। साँड़ पहले तो समझ ही नहीं पाया था। लेकिन जैसे ही पता चला कि उसकी पीठ पर शासन करने वाला कोई आदमी सवार है, तब तो उसका धीरज टूट गया। बात समझ में आते ही कूद-फाँद, हिल-हुल, दौड़-धूप कर कैसे भी हो उसे नीचे गिरा देने की वह कोशिश करने लगा।

उधर स्कूल में पाँचवीं घंटी की पढ़ाई शुरू हो गई थी। मगर तपन का तो उधर ध्यान ही नहीं था। वह तो साँड़ को वश में करने में जुटा हुआ था। साँड की उछल-कूद के बावजूद तपन अपने को संभाले हुए उसकी पीठ पर लगाम पकड़े रहा। एक बार लगाम खींचकर तपन ने साँड की पीठ पर दो-चार सांटी जमा दी, साँड़ बिलकुल मतवाला सा हो उठा। वह स्कूल की चारदीवारी के अंदर घुस आया और साँतवे वर्ग के बीचोंबीच होकर दौड़ने लगा। अचानक एक ऐसी चिंतनीय घटना देखकर उस वर्ग के शिक्षक और छात्रों के होश-हवास गुम हो गये। भगदड़ मच गई। जिसे जिधर जगह मिली उधर भागा। धक्कम-धक्के, ठेलमठेल में कौन किस पर गिरा, कोई ठिकाना न रहा। शिक्षक रजनी चहरिया भी किसी तरह दौड़ते हुए बाहर निकल कर ही बच पाये। उधर साँड़ की कूद-फाँद और उसके सींगों की चोटों से स्कूल के दरवाजे खिड़कियों के बहुत से शीशे फूट गये। वहाँ भी कोई चारा न पाकर साँड़ हँकड़ता हुआ बाहर दौड़ा और स्कूल के मैदान में दूर जा पड़ा। तपन अपने को किसी तरह बचा पाया और कूदकर दूर जा पड़ा। साँड़ खड़ा होकर डर के मारे पीछे की ओर देखे बगैर तेजी से दौड़ भागा....बिलकुल हवा-सी दौड़... दौड़ते-दौड़ते वह स्कूल की चारदीवारी से दूर निकल भाग।

हेडमास्टर के पास तपन के खिलाफ फिर मामला आया। मामला लानेवाले थे खुद रजनी मास्टर। साँड़ के संबंध में शिकायत पाते ही हेडमास्टर आग-बबूला हो उठा। हरेन महाजन वाली और बीच-बीच में दूसरे लड़कों की छोटी-मोटी घटनाएं याद आ जाने के कारण उनका मन और भी कड़वा हो उठा था। इस उत्पाती लड़के की करतूतों के कारण ही आज स्कूल के शिक्षक और छात्रों की ऐसी दुर्गति हुई और स्कूल का नुकसान भी हुआ। यह सदा सोचकर हेडमास्टर ने तुरंत तपन को बुला लाने के लिए चौकीदार मोहन को भेज दिया।

क्षण भर बाद ही मोहन के साथ तपन डरते-डरते हेडमास्टर के सामने आया। तपन को देखते ही हेडमास्टर ने दाँत पीसते हुए बेंत हिला-हिला कर कहा- ‘‘अरे बदमाश, आज तूने उस साँड़ को कक्षा में क्यों घुसा दिया था ? बता, जल्द बता, नहीं तो.....
-सर, मैंने जान-बूझकर साँड़ को कक्षा में नहीं घुसाया। मैं उसकी पीठ पर चढ़कर उसे वश में करना चाहता था, तभी वह दौड़कर कक्षा में घुस गया था। सिर झुकाकर तपन ने जवाब दिया।
-भला तू क्लास छोड़कर साँड़ की पीठ पर चढ़ने क्यों गया था ? तुझे क्या पड़ी थी ? तो ले हाथ फैला। हथेली पर हेडमास्टर की बैंत की पंद्रह चोटें झेलकर तपन अपनी कक्षा में आया। घृणा और व्यंग्य की हँसी से उसके वर्ग के लड़कों ने उसका स्वागत किया। इस घटना के बाद तपन समूचे स्कूल में एक बुरे लड़के के रूप में प्रसिद्ध हो गया।

कुछ ही देर बाद हर वर्ग में हेडमास्टर की सूचना आयी। सूचना में लिखा था- वर्ग चालू रहते समय पाँचवें वर्ग के छात्र तपन ने एक साँड़ की पीठ पर सवार होकर सातवें वर्ग में घुसकर शिक्षक और छात्रों की दुर्गाति की है तथा स्कूल के शीशे तोड़े हैं। इस अपराध के कारण उसे पंद्रह बेंत लगायी गयी हैं और क्षति-पूर्ति के रूप में उस पर पच्चीस रूपये का जुर्माना किया गया है। भविष्य में ऐसा काम करने पर उसे स्कूल से निकाल दिया जायेगा। सूचना पाकर दो लड़कों ने मुंह टेढ़ा कर तपन की ओर देखा और बरामदे में आकर थूक आये।

उसी दिन शाम को हेडमास्टर स्कूल से लौटकर पदुमुनि गाँव की तरफ घूमने निकले थे। बीच-बीच में वे यों ही टहला करते। गाँव से वापस लौटते समय स्कूल के उस धूमकेतु बदमाश लड़के तपन की एक और करतूत देख वे विस्मित हो उठे। एक भिखारिन को, भीख माँगने की टोकरी अपने सिर पर लिये तथा एक हाथ से उस भिखारिन बुढ़िया को पकड़े तपन चला जा रहा था। कुछ दूरी पर उसी की कक्षा का एक लड़का नरेन और दूसरा महेश, उस बुढ़िया की टोकरी सिर पर रखने के कारण तपन की हँसी उड़ाते आ रहे थे।

बात यह थी कि गाँव से भीख माँगकर लौटते हुए उस बुढ़िया को जोरों का बुखार चढ़ आया था। टोकरी ले चलना तो दूर उसे खुद कदम बढ़ाना भी मुश्किल हो गया था। बुढ़िया की ऐसी बुरी हालत देखकर तपन के मन में बड़ी वेदना हुई। उसने तुरंत टोकरी को सिर पर ले लिया। कहा- ‘‘बूढ़ी दादी, मेरा हाथ पकड़कर चले चलो।’’ और बुढ़िया को हाथ से पकड़े वह उसके घर की ओर चल पड़ा था।
हेड़मास्टर को आते देख नरेन और महेश ने उन्हें नमस्ते किया और तपन की ओर देखते हुए व्यंग्य से हँस दिये। मतलब-तपन की करतूत अब हेडमास्टर महोदय खुद ही देख लें। हेडमास्टर ने बात का पता लगाने के लिए बुढ़िया से पूछा। बुढ़िया ने बुखार से काँपते हुए सारी बातें बता दीं। तपन की ओर उंगली दिखा कर उसने कहा-बाबा, यह बच्चा अगर न होता तो आज मुझे इसी सड़क के किनारे पड़ा रहना पड़ता। भगवान इस लाल का भला करे। उन दोनों लड़कों ने भी मेरी हालत देखी थी, मगर मदद करना तो दूर, उल्टे मेरी मदद करने के कारण इस बच्चे की ही खिल्ली उड़ाते आ रहे हैं। कैसे निर्दयी हैं ये।’’ कहती हुई बुढ़िया थकावट के मारे हाँफने लगी।

सारी बातें समझकर हेडमास्टर ने नरेन और महेश को डाँटकर वहाँ से भगा दिया और बुढ़िया को उसके घर पहुँचा देने के लिए तपन से कहकर उन्होंने अपनी राह ली।
इसके दो हफ्ते बाद। हेडमास्टर उस दिन मधुकुछि गाँव से टहलते हुए डेरे की ओर लौट रहे थे। राह में एक दृश्य देखकर वे दंग रह गये। उन्होंने देखा- उस उपद्रवी साँड़ की एक टाँग किसी ने तोड़ डाली है। तपन उसे पकड़कर कपड़े की पट्टी बाँध, कुछ जंगली पौधों का रस निचोड़ कर उस पर डाल रहा है। उसकी आँखें भरी हुई हैं। हेडमास्टर जब वहाँ आकर खड़े हुए तो वह चौंक-सा गया और उसने दोनों हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया। हेडमास्टर ने तपन की आँखों की ओर देखते हुए पूछा-तपन, तू यहाँ कर क्या रहा है ?

- ‘‘सर, किसी दुष्ट लड़के ने इस बेचारे की एक टाँग तोड़ डाली है। इसे बड़ी तकलीफ हो रही है। सर, अनबोला जीव है, इसी कारण आदमी जैसी चीख-पुकार नहीं मचा पाता। अनबोले जीव को इस तरह से तकलीफ देना बुरा है सर।’’ तपन ने बड़े दुखी मन से हेडमास्टर से कहा।
- ‘‘अरे तूने तो इसी साँड़ को ‘बड़ा दुष्ट है’ कहकर उस दिन लगाम लगाकर दौड़ाया था ? फिर आज यह तेरे लिए इतना भला कैसे हो गया ?’’
- सर, पहले यह दुष्ट था, यह सच है। मगर जिस दिन मैंने लगाम लगायी थी, उसी दिन से यह सुधर गया था। आदमी को मारना तो दूर, आदमी को देखते ही डर के मारे राह से हट जाता था। सर, ऐसी हालत में बेचारे को यों मारना उचित न था। इसे बड़ी तकलीफ हो रही है। इस कारण मैं ही इसका घाव धोकर जंगली पत्तियों का रस निचोड़कर पट्टी बाँधे दे रहा हूं। पिताजी ने बताया था, ये जंगली पत्तियाँ घाव की अच्छी दवा हैं। -तपन ने जवाब दिया।
साँड़ की तकलीफ से उसका मन भी भारी था, आँखें डबडबाई थीं।

हेडमास्टर ने क्षण भर कुछ सोचा। इसके बाद तपन के चेहरे की ओर देखते हुए प्यार से उसके गालों को सहलाया। कुछ कहा नहीं। वहाँ से वे घर की ओर चल पड़े। उनकी आँखें भी भर आयीं थीं। साँड़ के लिए नहीं, तपन के लिए।
ज्ञानपीठ हाई स्कूल में पुरस्कार-वितरण समारोह का दिन। दो बजे से सभा का आयोजन था। गुवाहटी के किसी कालेज के अध्यक्ष को सभा की अध्यक्षता करने के लिए आमंत्रित किया गया था। हेडमास्टर खीन बरूआ ने इस बार अन्य पुरस्कारों के अलावा एक विशेष पुरस्कार भी देने की व्यवस्था की थी। घोषणा कर दी गई थी- ‘‘स्कूल के सबसे उत्तम चरित्रवान लड़के को यह पुरस्कार दिया जायेगा। वह पुरस्कार महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और लालबहादुर शास्त्री के जीवन चरित्र की तीन पुस्तकों का था।

दस बजे स्कूल लगा। इस नये पुरस्कार के बारे में सभी वर्गों के लड़के आपस में काफी चर्चा कर रहे थे। पाँचवें वर्ग में नरेन तपन की ओर संकेत करता हुआ व्यंग्य से हँस रहा था। उसने ऊँची आवाज में पास बैठे भवेश से कहा- ‘‘सुना है न भवेश ! इस बार हमारे स्कूल में उत्तम चरित्र के लिए जिस पुरस्कार की घोषणा की गयी है, वह हमारे वर्ग के तपन को मिलने वाला है।’’ यह सुनते ही वर्ग के सभी लड़के खिलखिलाकर हँस पड़े। शर्म और अपमान से तपन का चेहरा स्याह हो गया। फिर भी वह सिर झुकाये चुप ही रहा।

सभा आरंभ हुई। अध्यक्ष के आसन ग्रहण करने के बाद सचिव ने प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। फिर लड़के-लड़कियों के नृत्य-गीत, कविता-आवृत्ति आदि कार्यक्रम हुए। उपस्थित सज्जनों की ओर से दो चार व्यक्तियों ने भाषण दिये। अध्यक्ष के भाषण के पश्चात पुरस्कार वितरण आरंभ हुआ। विभिन्न विषयों में कई छात्र-छात्राओं को पुरस्कार मिले। जनता की तालियों के बीच तथा अध्यक्ष के हाथों पुरस्कार प्राप्त कर सबने गौरव का अनुभव किया। अब वह नया विशेष पुरस्कार देने की बारी आयी। उपस्थित लोगों की आँखों में उत्सुकता छायी हुई थी। वह विद्यार्थी भला है कौन, जो पांच सौ से अधिक छात्र-छात्राओं में अपने को सबसे चरित्रवान छात्र के रूप में ला सकता है। तभी हेडमास्टर ने अध्यक्ष और उपस्थित सज्जनों को संबोधित करते हुए कहा-माननीय अध्यक्ष महोदय एवं सज्जनवृंद, अब हमारे स्कूल के सबसे चरित्रवान छात्र को विशेष पुरस्कार देने की बारी है। वह पुरस्कार पांचवें वर्ग के विद्यार्थी श्री तपन कुमार हाजारिका को देना तय हुआ है।
हेडमास्टर की घोषणा सुनते ही वहां उपस्थित स्कूल के इक्कीस शिक्षकों और पांच सौ से अधिक छात्रों की जबान पर ताला पड़ गया। नरेन और भवेश के चेहरे ऐसे स्याह हो गये मानों किसी ने उन पर बोतल भर स्याही उड़ेल दी हो।

हेडमास्टर की जुबान से अपना नाम सुनकर तपन को तो पहले विश्वास ही नहीं हुआ था। इसलिए घोषणा सुनकर भी पुरस्कार हेतु उठकर जाने की हिम्मत उसमें नहीं थीं। जब हेडमास्टर ने फिर से ‘‘तपन कुमार हाजारिका, पाँचवाँ वर्ग’’ कहकर पुकारा तो लगा उसके सिर में चक्कर आ गया हो। स्कूल में जो ‘सबसे बुरा लड़का’ के रूप में चर्चित है, भला उसे ही क्यों आज उत्तम चरित्रवान छात्र का पुरस्कार देने को पुकारा जा रहा है ? किसी तरह उठकर वह अध्यक्ष के पास गया और प्रणाम कर हाथ बढ़ाया एवं पुरस्कार ग्रहण किया।
पुरस्कार प्रदान करने के बाद हेडमास्टर ने स्वयं वर्णन किया- तपन ने किस प्रकार उस बुढ़िया भिखारिन की मदद की थी, किस तरह उसने बेजुबान जीव उस साँड़ की सेवा की थी। फिर खुश होकर अपनी ओर से भी तपन को पाँच रुपया पुरस्कार दिया।
तालियों से सभा गूँज उठी। तपन की आँखों में खुशी के आँसू छलक आये।

असमिया से अनूदित : नवारुण वर्मा

सेप्टोपस की भूख


सत्यजीत रे

दरवाजे पर दस्तक हुई तो अपने आप मुंह से नाराजगी की आवाज सी निकली।
इसे लेकर शाम से यह चौथी दस्तक थी। आदमी कैसे कोई नाम करे ? कार्तिक भी बाजार गया तो गया ही रह गया। लौटने का नाम ही नहीं।
लिखना बंद कर मुझे ही उठना पड़ा। दरवाजा खोलकर मैं हैरान रह गया। ‘‘अरे कांति बाबू आप ? आइए ! आइए ! कितना ताज्जुब है.....।’’
‘‘पहचाना मुझे ?’’
‘‘पहचानना है मुश्किल, इतना कह सकता हूं।’’
उन सज्जन को मैंने कमरे के अंदर लाकर बैठाया। सच में, पिछले दस वर्षों में कांति बाबू के चेहरे में अविश्वसनीय ढंग का परिवर्तन आ गया था। असम के जंगलों में मैंने उन्हें कई बार मैग्नीफाइंग ग्लास लेकर उछल कूद करते देखा था। उस समय वे करीब पचास वर्ष के रहे होंगे। पर एक भी बाल पका नहीं था। और उस उम्र में भी उनमें उत्साह और ऊर्जा का जो नमूना देखा था वह आम तौर पर हम युवकों में भी नहीं होता।

‘‘आर्किड का शौक अब भी तुम्हें है ?’’ उन्होंने पूछा।
मेरे कमरे की खिड़की पर कांति बाबू का ही दिया हुआ आर्किड का गमला था। मुझे उसका कोई शौक अब भी है, कहना गलत होगा। पेड़ पौधों की रुचि कांति बाबू ने ही मेरे मन में थोड़ी बहुत जगाई थी। उसके बाद वे भी शहर छोड़ गए और धीरे धीरे मेरे मन से भी यह शौक अपने आप गायब हो गया- जिस तरह से और भी कोई शौक मिट गए थे। अब तो बस अपना लिखना लेकर ही रहता था।
किताबें लिखना भी एक रोजगार ही है। तीन किताबों की बिक्री से ही मेरी गृहस्थी का खर्च निकल आता था।

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