लोगों की राय

स्त्री-पुरुष संबंध >> नरक दर नरक

नरक दर नरक

ममता कालिया

प्रकाशक : किताबघर प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :144
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4416
आईएसबीएन :81-89859-09-9

Like this Hindi book 1 पाठकों को प्रिय

351 पाठक हैं

एक श्रेष्ठ उपन्यास....

Narak Dar Narak

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

पूर्वकथन

मेरे लिए यह विस्मय की बात है कि मेरी कुछ पुस्तकें पिछले तीस पैंतीस वर्ष से जीवित हैं अर्थात् पढ़ी जा रही हैं, उन पर शोध हो रहे हैं और कभी देश के किसी कोने से कोई पत्र या फोन पहुँच जाता है कि आपने ‘बेघर’ उपन्यास में संजीवनी को इतना ट्रेजिक पात्र क्यों बनाया या यह कि ‘नरक दर नरक’ क्या आपके अपने जीवन पर लिखा गया उपन्यास है ? पिछले दिनों कलकत्ते में एक दिन कवि एकान्त श्रीवास्तव का फोन आया कि ‘ममता जी, हमने ‘नरक दर नरक’। मेरा और मेरी पत्नी मंजुल का मानना है कि आपने हमारी कहानी लिख दी है। ऐसा कैसे हुआ ?’ मुझे एकान्त की बात से खुशी और आश्चर्य के साथ-साथ आश्वस्ति भी हुई। पढ़ो तो लगे जैसे झेला हुआ और झेलो तो लगे जैसे पढ़ा हुआ, इससे बढ़कर यथार्थवाद की कसौटी और क्या हो सकती है ? एकान्त समझ सकते हैं कि पिछले तीस वर्षों में, आजाद हिंदुस्तान में युवा वर्ग की जीवन-स्थितियाँ की यांत्रिक स्पर्धा तालमेल के तनाव और स्वप्नों के टूटते तारे। इन सबके बीच अपनी परस्परता बचाए रखना प्रेमियों के लिए वास्तव में चुनौती की तरह आता है।

यही रही है ‘नरक दर नरक’ लिखने की पृष्ठभूमि तथा प्रेरणा। जीवन की उथल-पुथल में उसका उत्स छुपा है। कल्पना और यथार्थ की लुका-छिपी एक बार चली तो इसमें औरों का जीवन संघर्ष भी शामिल होता गया। ‘नरक दर नरक’ 1975 में लिखा और उसी वर्ष के अंत तक यह प्रकाशित हो गया।

इस उपन्यास पर सबसे पहले मुझे अपने प्रिय रचनाकार यशपाल जी का पत्र मिला तो मैं कई दिनों तक रोमांचित रही। इस महान उपन्यासकार ने मेरे जैसी नई लेखिका की पुस्तक न सिर्फ पढ़ी, वरन् उस पर पत्र लिखकर अपनी सराहना व्यक्त की, इस गर्व और सुख का बयान मैं शब्दों में नहीं कर सकती। यशपाल जी का पत्र मैंने प्रमाण-पत्र की तरह पिछले तीस वर्षों से सँभालकर रखा हुआ है। जब कभी लिखने का विश्वास डगमगाने लगता है, यह पत्र ध्रुव तारे की तरह मुझे रास्ता दिखाता है। यशपाल जी के ही शब्दों में : ‘उपन्यास की भाषा संक्रमण काल के उफनते-खलबलाते जीवन की संवेदनाओं की अभिव्यक्ति के अनुकूल सरल ओजस्वी लगी। विशेषकर उषा या माँ की सामाजिकता और आवरणरहति स्वाभाविकता। कथानक और उसके अनुषंग मर्मस्पर्श के साथ नए जीवन-संतुलन की चेतना को भी कुरेदते हैं।

‘नरक दर नरक’ नाम की चोट चौंकाकर ध्यान खींचती है, परंतु पाठक की यात्रा सहारा के नरक की वीरानगियों में दम छूट जाने से पहले ही बागे-अदन की संजीवनी वायु का आभास महसूसती जान पड़ती है। ‘नरक दर नरक’ से घोर बचाव की आशा जगने लगती है। सफल रचना के लिए बधाई।’

यशपाल

1965 से 1970 के बीच बंबई में तरह-तरह के लोग संपर्क में आते गए। कभी वे प्रभावित करते, कभी प्रताड़ित करते। रवि और मैं दिल्ली से अपनी-अपनी स्थायी नौकरियाँ छोड़कर नए सिरे से अगली नौकरियों में संघर्ष कर रहे थे। उषा और जोगेन्द्र साहनी के जैसा बस एक कमरे का फ्लैट था हमारे पास। प्रेम और संघर्ष के सिवा और कोई जमापूँजी पास नहीं थी। हम दोनों के पास कुल मिलाकर माँ-बाप के दो सेट थे, लेकिन उनका हमारे जीवन में स्थान नहीं था। हमें उनका हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं था, उन्हें हमारा विद्रोह। जिया हुआ यह समय 1975 में काम आया, जब मैंने ‘नरक दर नरक’ लिखना शुरू किया।

उपन्यास का शीर्षक मैं कभी नहीं सोच पाती। ‘नरक दर नरक’ शीर्षक भी रवीन्द्र कालिया ने शीर्षक मैं कभी नहीं सोच पाती। ‘नरक दर नरक’ शीर्षक भी रवीन्द्र कालिया ने रखा। बीच के वर्षों में एक बार प्रकाशक की पसंद पर इस उपन्यास का नाम बदलकर ‘साथी’ कर दिया गया। ‘साथी’ शीर्षक से इसका दूसरा संस्करण छपा। लेकिन तब तक पाठकों, छात्रों और शोधार्थियों के बीच नरक दर नरक’ शीर्षक जड़ पकड़ चुका था। मैं स्वयं शीर्षक बदले जाने के पक्ष में नहीं थी, इसलिए वापस यही शीर्षक रखा जा रहा है।

‘नरक दर नरक’ के बारे में पीछे मुड़कर देखते हुए कुछ और प्रकाशस्तंभ याद आ रहे हैं। प्रबुद्ध पाठक के लिए इनका सीमित अर्थ होगा, लेकिन यह बताकर मैं जैसे अपने दीये में कुछ और तेल डाल रही हूँ। अलबेले कवि और मशहूर मनमौजी कथाकार बाबा नागार्जुन उन दिनों इलाहाबाद में थे जब यह उपन्यास छपकर आया। बाबा ने उपन्यास पढ़कर कहा, ‘अरे, तुमने तो अपना इलाहाबाद खींच डाला।’ आलोचक गोपालराय ने ‘हिंदी उपन्यास का इतिहास’ में इस पर लिखा, ‘ममता कालिया के एक अन्य उपन्यास ‘नरक दर नरक’ (1975) में उस मौजूद समाज-व्यवस्था का चित्र प्रस्तुत किया गया है, जिसमें मध्यवर्गीय शिक्षित युवकों को अपनी सारी प्रतिभा, ईमानदारी मेहनत और प्रथम श्रेणी की डिग्रियों के बावजूद रोज़गार के लिए दर-दर की ठोकरें खानी पड़ती हैं। लेखिका ने बंबई के शैक्षणिक वातावरण में व्याप्त शिक्षकों और अधिकारियों की गुटबंदी, भ्रष्टाचार अध्यापकों के प्रति अधिकारियों की साज़िश, व्यवस्था के प्रति छात्रों के असंतोष, अध्यापकों की घुटन-भरी ज़िंदगी आदि का भी प्रामाणिक चित्रण किया है।’

उन दोनों मासिक पत्रिका ‘माया’ भी साहित्यिक रुझान रखती थी। माया में डॉ. सत्यप्रकाश ने इस उपन्यास की बहुत अच्छी समीक्षा की थी। अभी पिछले दिनों युवा आलोचक कष्णमोहन ने ‘पहल’ में मेरे सभी उपन्यासों का विस्तार से मूल्यांकन कर एक लंबा लेख लिखा। ‘नरक दर नरक’ के विषय में उन्होंने लिखा, ‘‘नरक दर नरक’ में उषा और जहन की प्रेम-कहानी लिफ्ट में चुंबन के साथ शुरू होती है। जगन के दुस्साहस पर उषा स्तंभित भी है और स्पंदित भी। कुछ संवादों के आदान-प्रदान के बाद जगन उससे कहता है-ऐसे मौकों पर लड़कियाँ अपनी पवित्रता के बारे में एक विज्ञाप्ति सुनाती हैं। आप अपने बारे में कुछ कहें।
‘उषा जवाब देती है-प्रेम और पवित्रता दो अलग-अलग चीज़ें हैं, एक दूसरे की विरोधी। फिर यह तो शायद अभी प्रेम भी नहीं...’’

‘यह वार्तालाप लेखिका की रचना-यात्रा में पवित्रतावाद के निषेध के साथ आगे बढ़े हुए कदम की सूचना देता है, लेकिन आगे चलकर उसका सामना समाज में व्याप्त पितृसत्ता के अधिक सूक्ष्म और सर्वग्रासी मूल्यों से होता है, हमारी औपनिवेशिक आधुनिकता से जिनका तालमेल अधिक सहज है, बनिस्बत टकराव के।’ इटली के वेनिस विश्वविद्यालय की प्रोफेसर मारिओला आफरिदे ने ‘नरक दर नरक’ की समीक्षा ‘हिंदी’ नाम की अंग्रेज़ी पत्रिका में लिखी थी, जो उन दिनों महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय  द्वारा प्रकाशित होती थी। इसके अलावा स्व. भारतभूषण अग्रवाल ने, जो मेरे चाचा जी तो थे ही, अपने आप में अप्रतिम कवि, नाटककार और कथाकार थे, 1975 के अंत में यूरोप के दौरे से लौटने पर ‘नरक दर नरक’ का एक अध्याय पढ़ने पर मुझे पत्र लिखा कि ‘अभी-अभी तुम्हारा उपन्यास-अंश पढ़ा। अगर समस्त उपन्यास इसी तरह लिखा गया है तो बहुत जल्द लोग मुझे तुम्हारे चाचा के रूप में ही जानेंगे।’

 इस स्नेह-भरी चिट्ठी का मेरे जीवन में विशेष स्थान रहा, क्योंकि भारत जी ने अब तक कभी मेरी किसी रचना को पसंद नहीं किया था। उनके लिए जैसे मेरा लिखना गिनती में ही नहीं था। बहुत सारे विद्वानों, सुधी पाठकों, मित्रों साथी रचनाकारों और शोध छात्रों ने इस उपन्यास को अपनी ऊष्मा दी। बल्कि शोधार्थियों की एक आम शिकायत रही कि यह उपन्यास आसानी से उपलब्ध नहीं होता। मेरा खयाल है, लंबे समय से यह उपन्यास अप्राप्य पुस्तकों की श्रेणी में रहा है, क्योंकि प्रकाशक छोड़ स्वयं लेखक के पास भी इसकी कोई प्रति मौजूद नहीं थी। मेरी कई पुस्तकें ऐसी हैं, जिनकी एक भी प्रति मेरे पास उपलब्ध नहीं है। कभी ऐसा मेरी लापरवाही से हुआ और कभी अंतिम प्रति भी किसी पुस्तक-प्रेमी को सप्रेम भेंट कर दी गई, यह सोचकर कि शाम को जाऊँगी और प्रकाशक से एक प्रति ले आऊँगी।

जब सत्यव्रत जी ने ‘नरक दर नरक’ पुनर्प्रकाशित करने का मन बनाया तो सबसे पहली मुश्किल थी इसकी एक प्रति कहीं से प्राप्त करना। सब दोस्तों के द्वार खटखटाए। सबके यहाँ किताबों के अंबार में यह सूई की तरह गुम रही। गुरु नानक देव विश्वविद्यालय की छात्रा अमित बाला, पटियाला की छात्रा कोमल राजदेव और अन्य कुछ शोधार्थियों ने ‘नरक दर नरक’ उपन्यास पर कई प्रश्नावलियाँ मुझे भेंजीं। मैं क्या उत्तर देती ? उपन्यास की प्रति मेरे पास थी नहीं और मुझे पात्रों के नाम तक भूल गए थे। अंततः उस विश्वविद्यालय की हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. मधु संधु ने मुझे संकट से उबारा। उन्होंने विश्वविद्यालय के पुस्तकालय से ‘नरक दर नरक’ की प्रति निकलवाकर उसकी छायाप्रति मुझे भिजवाई। अब यह उपन्यास पुनर्प्रकाशन की दहलीज़ पर है और इसके लिए मैं डॉ. मधु संधु और अपने प्रिय पाठकों की कृतज्ञ हूँ।

-ममता कालिया


नरक दर नरक


वे जीवन में काफी चौकन्ने रहे थे। फिर भी पता नहीं कैसे बड़ी जल्दी प्रेम उन दोनों के बीच घुसपैठ कर गया। तब रात का वक्त था और दोनों अपने-अपने अकेलेपन से पैदा हुई ज़रूरतों के मारे हुए थे। बाद में कई बार उन्होंने इस बात का मज़ाक उड़ाया, कई बार इसकी व्याख्या की, अफसोस भी किया कि किसी और नाम से यह क्यों नहीं हुआ-उन जैसे तरो ताज़ा दिमाग वाले लोगों को इतनी घिसी हुई संज्ञा ‘प्रेम’ कैसे ले बैठी-पर कोई फायदा नहीं हुआ। प्रेम अपनी जगह डटा रहा। जगन बोला, उसने नहीं सोचा था, उस जैसा आदमी इस आसानी से पकड़ा जाएगा। उषा ने भी शरमाते हुए कहा, उसने नहीं सोचा था कि पहली बार ही वह हमेशा के लिए बँध जाएगी। फिर इस विषय पर वे दोनों चुप हो गए। ज्यादा बोलना दोनों के लिए खतरे पैदा कर सकता था। इसीलिए शायद प्रेम में मौन रहा जाता है।

 इतना वे ताड़ गए कि इस चुप में ही दोनों की भलाई है। बहरहाल वे सभी अजीबोगरीब हरकतें करते रहे, जिनकी गणना प्रेमशास्त्री प्रेम के अंतर्गत करते आए हैं। एक बार वे एलिफें

प्रथम पृष्ठ

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book