चन्द्रकान्ता - कमलेश्वर Chandrakanta - Hindi book by - Kamleshwar
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चन्द्रकान्ता

कमलेश्वर

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2002
पृष्ठ :168
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4417
आईएसबीएन :81-7028-395-7

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सुविख्यात टी.वी.सीरियल चन्द्रकांता की पटकथा और संवाद

Chandrakanta

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

‘पटकथा लेखन’ एक कला है जिसे बहुस्तरीय अनुभव के बाद ही अर्जित किया जा सकता है। धारावाहिक और फिल्म लेखन के बढ़ते उद्योग में कुछ प्रशिक्षण संस्थान महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। इसके बावजूद ‘पटकथा लेखन’ का बुनियादी उद्देश्य पूरा नहीं होता। इस दृष्टि से प्रसिद्ध कथाकार औऱ पटकथा लेखक कमलेश्वर की यह पुस्तक अत्यंत उपयोगी है। कमलेश्वर का धारावाहिक ‘चन्द्रकांता’ छोटे पर्दे पर अपार सफलता हासिल कर चुका है। इसकी कल्पनाशील कथा के साथ इसकी संवाद अदायगी को दर्शकों ने बेहद पसंद किया है।

कमलेश्वर द्वारा लिखित ‘चंद्रकांता’ के 98 एपीसोड अविकल रूप से प्रदर्शित किये गये हैं। जाहिर है कि इन सबको एक साथ प्रकाशित नहीं किया जा सकता। चूँकि इस पुस्तक का उद्देश्य भिन्न है इसलिए उसमें से केवल पाँच एपीसोड चुने गये हैं-एपीसोड 25, 30, 32,35, और 36 । इनमें पटकथा और डायलॉग लेखन सम्बन्धी सभी विषयों का समावेश हो जाता है। यह भी कि कहानी पर ध्यान केन्द्रित न करके लेखन के तकनीकी पक्ष को बेहतर तरीके से रेखांकित किया जा सकता है।
अब पुस्तक का एपीसोड 1 सीरियल का एपीसोड 25 है, एपीसोड 2 सीरियल का एपीसोड 30 है, एपीसोड 3 सीरियल का एपीसोड 32 है, एपीसोड 4 सीरियल का एपीसोड 35 है और एपीसोड 5 सीरियल का एपीसोड 36 है। पुरानी दुनिया में तिलिस्म और ऐयारी का एक विशेष रहस्य-रोमांच की परम्परा रही है और उन्नीसवीं शताब्दी में देवकीनन्दन खत्री का अनेक भागों में लिखा उपन्यास ‘चन्द्रकांता’ बहुत मशहूर हुआ था और आज भी चाव से पढ़ा जाता है। इसकी लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि उन्हें ‘चन्द्रकांता सन्तति’ के नाम से एक और उपन्यास माला लिखनी पड़ी। अपनी इन विशेषताओं के कारण दूरदर्शन ने इसे चुना और कमलेश्वर की कल्पना तथा कलम ने इसे आज के बदले हुए समय में भी अद्भुत सफलता प्राप्त करने में मदद की दी।
मीडिया लेखन से जुड़े युवा लेखकों के अलावा सामान्य पाठक को भी यह पुस्तक रुचिकर लगेगी।

 

मीडिया लेखन के अपने विशेष पाठकों से

 

टेलीविजन लेखन, जिसे मैं शब्द-सुविधा के लिए मीडिया लेखन कहना चाहूंगा, आज सम्प्रेषण का सबसे बड़ा माध्यम है। इसमें धारावाहिकों का लेखन एक लगभग अलग सी विधा है, जो रचनात्मकता के सबसे निकट भी है। यह सही है कि साहित्य लेखन और मीडिया लेखन के कारणों में मौलिक अंतर है और वह इसलिए कि साहित्य एकांतिक है और यह लेखन सार्वजनीन। मीडिया लेखन इसीलिए अधिक जनतांत्रिक है। यही जनतांत्रिकता इसकी शक्ति भी है और कमजोरी भी, क्योंकि व्यवसायगत सफलता ही इसका अतिंम पैमाना और कीर्तिमान माना जाता है। फिर भी व्यवसायगत विविशता के कारण मीडिया लेखन को कमतर लेखन का दर्जा देकर खाजिर नहीं किया जा सकता। आखिर साहित्य भी तो प्रकाशन का मोहताज है और प्रकाशन भी एक शुद्ध व्यवसाय है। यहाँ तक कि पाठ्य पुस्तकें जो ज्ञान सम्पदा, मौलिक मनीषा के विकास, नैतिक चरित्र निर्माण, वैज्ञानिक दृष्टि के उन्नयन और राष्ट्र निर्माण के लिए जरूरी समझी जाती हैं, वे भी प्रकाशन व्यवसाय के अधीन और उसकी मोहताज हैं।

यह एक लम्बी बहस है जो साहित्य के जड़तावादी-शुद्धतावादियों और मीडिया लेखन के व्यवसाय में निबद्ध परिवर्तनवादियों के बीच चलती रहेगी, पर यह तय है कि आज के भ्रष्ट और पतनशील राजनीतिक दौर में जितना कारगर और तत्कालिक हस्तक्षेप मीडिया कर पा रहा है, उतना साहित्य के द्वारा संभव और संभाव्य नहीं है। इसलिए यह वक्त ऐतिहासिक तकाजा है कि मीडिया लेखन की अहमियत, भूमिका और महत्ता को समझा और स्वीकार किया जाए।
वैसे साहित्य के शुद्धतावादियों के बावजूद मीडिया लेखन की महत्ता और उसकी अहमियत स्थापित हो चुकी है। देश के तमाम जनसंचार पाठ्यक्रमों में मीडिया लेखन को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया जाता है। कोई ऐसा पाठ्यक्रम नहीं है जिसमें इसे शामिल न किया गया हो। साहित्य में शब्द-बिंब होते हैं, मीडिया साहित्य में दृश्य-बिंब होते हैं, जो निश्चय ही अधिक सर्जनात्मक और शक्तिशाली साबित होते हैं। वे संवेदना को अधिक गहराई से छूते और आंदोलित करते हैं।
निष्क्रिय बुद्धिजीवी और साहित्यवादी इस मुद्दे को भी लम्बी बहस का मुद्दा बना देंगे पर वे इस सच्चाई से इनकार नहीं कर सकते कि जिस मीडिया लेखन की महत्ता से वे इनकार करते हैं, वही लेखन और प्रदर्शन उनके परिवारों और घरों का मुख्य आकर्षण है। उनके घरवाले उनकी पुस्तकों को नहीं पढ़ते, वे मीडिया पर मौजूद लेखकों के सही-गलत सीरियल-रचना या उसके सवालों को अधिक महत्व देते हैं।

तो, वैचारिक और रचनात्मक संक्रमण के इस संक्रामक दौर में मैं भारतीय दूरदर्शन के सबसे सफल और लोकप्रिय धारावाहिक ‘चंद्रकांता’ के कुछ एपीसोड्स के आलेखों की यह पुस्तक इसलिए प्रस्तुत कर रहा हूँ ताकि इस स्पर्धात्मक दौर में हमारे नव्यतम लेखकों के लिए लेखन की तकनीकी जानकारी की कुछ खास आवश्यकताओं को उजागर किया जा सके।
‘चंद्रकांता’ एक घंटे की अवधि का 104 एपीसोड वाला सीरियल था। इन सभी एपीसोडों की पटकथा एक पुस्तक में दे पाना न संभव था और न आवश्यक ही था। चूँकि इस पुस्तक का उद्देश्य भिन्न है इसलिए मैंने उसमें केवल पाँच एपीसोड चुने—एपीसोड 25, 30, 32, 35 और 36। इनमें पटकथा और डायलॉग लेखन संबंधी सभी विषयों का समावेश हो जाता है। यह भी कि कहानी पर ध्यान न केन्द्रित करके लेखन के तकनीकी कथा को बेहतर तरीके रेखांकित किया जा सकता है।
अब पुस्तक का एपीसोड 1 सीरियल का एपीसोड 25 है, एपीसोड 2 सीरियल का एपीसोड 30, एपीसोड 3 सीरियल का एपीसोड 32, एपीसोड 4 सीरियल का एपीसोड 35 और एपीसोड 5 सीरियल का एपीसोड 36 है। पाठक और मीडिया लेखन के नवयुवा मित्र इन्हें इसी प्रकार ग्रहण करें।

तकनीकी शब्दावली की मामूली-सी जानकारी भी काफी होती है पर सबसे महत्त्वपूर्ण है पटकथा के व्याकरण को समझना। उस पर बात करने से पहले ‘रीकैप’ : और फिर...’को समझ लेना चाहिए। रीकैप में पिछले एपीसोड की कहानी और घटनाओं का त्वरित विवरण शब्दों और दृश्यों में रहता है ताकि दर्शकों को पिछला कथासूत्र देकर उसकी उत्सुकता को पुनर्जीवित किया जा सके, क्योंकि अधिकांश सीरियल डेलीसोप या सिटकाम नहीं होते, वे प्रति सप्ताह ही आते हैं। ‘और फिर....’ यह उसकी कमेंट्री का अंतिम छोर है जो पिछले कथाक्रम को अगले एपीसोड से जोड़ देता है।

‘फ्रीज़ रिलीज़ होता है’, यह पिछले एपीसोड की समाप्ति की उत्सुकता को जीवित करके फिर वहीं से अगले घटनाक्रम से जोड़ देता है। एपीसोड 1 में ही पात्र के साथ ‘वी.ओ.’ शब्द मिलता है। वैसे इतना तो सभी जानते हैं कि उसे ‘वॉयस ओवर’ कहते हैं लेकिन यहाँ इसका तकनीकी उपयोग उस स्थिति के लिए किया गया है, जहाँ कथापात्र अपने कथन को खुले आम पेश नहीं करना चाहता पर घटनाक्रम को संजीदा या पेचीदा बनाए जाने की जरूरत के कारण लेखक इस तकनीकी का उपयोग करके पात्र के मनोभावों-इरादों को वहीं उजागर कर देना जरूरी समझता है। इसमें आवाज़ तो उसी पात्र की होती है पर ‘लिप मूवमेंट’ नहीं होता।

कई जगह फ्लैश के तकनीकी संकेत मौजूद हैं, यह फ्लैश बैक का ही संक्षिप्त रूप है पर तकनीकी रूप से इसे एक वेधती हुई प्रति-स्मृति के लिए लाया जाता है ताकि पिछली किसी घटना या बात को पात्रों की प्रतिक्रिया या दर्शक की स्मृति के लिए इस्तेमाल किया जा सके या किसी भूली हुई घटना को घटनाक्रम के लिए फिर से सक्रिय किया जा सके।

सीन z/सीन 10, यह क्रमांकन लेखन-सम्पादन की सुविधा के लिए उस वक्त करना पड़ता है जब कहानी की जरूरत के कारण कोई सीन बीच में डालना पड़ता है, क्योंकि शूटिंग के लिए स्क्रिप्ट जा चुकी होती है और अलग-अलग लोकेल्स पर अलग-अलग कैमरा यूनिटों द्वारा शूटिंग चल रही होती है। प्रत्येक कैमरा यूनिट के पास अपने लोकेल वाले दृश्य, संवाद और पात्र होते हैं।
एपीसोडज 2 का फ़्रीज (यानी अंत) दो फ्रीज़ देकर किया गया है। यह एक विकल्प देता है कि या तो शेर के दहाड़ने की भयग्रस्त स्थिति में इसे उस एपीसोड का अंत माना जाए या खलनायकों का अन्त दिखाकर इसे शिवदत्त की आसन्न मृत्यु के संवेदात्मक ‘हुक’ पर छोड़ा जाए।

एपीसोड 3 में शव्या का एक लम्बा एकालाप है (सीन 4)। वैसे रंगमंच पर एकालाप की तकनीक का बहुत सार्थक उपयोग होता रहा है जो अभिनेता-अभिनेत्री की नाट्य क्षमता को उद्घाटित करने का अवसर देता है, लेकिन यहाँ मीडिया लेखन की तकनीक में इसका उपयोग नितान्त अलग है। इस तकनीक का यहाँ पर आवश्यक स्मृतियों को पुनर्जीवित करने औऱ प्रसंग के दंश को और सघन बनाने के लिए किया गया है, वह इस तरह कि शव्या के एकालाप में तमाम पिछले दृश्यों, भावनाओं, संवादों आदि को पुनः दर्शाने की सुविधा प्राप्त हो सके।
कैमरे को ब्लाक करते हुए पात्र का गुज़रना (एपीसोड 5, सीन 6) एक ऐसी तकनीक है जो सीन को संक्षिप्ततम बनाते हुए दृश्य परिवर्तन की सुविधा देती है। इससे शब्दों का अपव्यय भी बचता है और समय भी, क्योंकि मीडिया लेखन में एक-एक सेकेंड की उपादेयता के लिए सतर्क और तत्पर रहना पड़ता है।

MS, MC, CU, Counter Shot आदि तो स्पष्ट है कि यह मिड शॉट, मिड क्लोज़, क्लोज़ अप और सामने वाले के शॉट के लिए इस्तेमाल होते हैं।
जहाँ पर/निशान लगा हुआ है, संवादों के बीच, वह मैंने सम्पादन की सुविधा और संवाद को तोड़ने के लिए इस्तेमाल किया है। दूसरे पात्र का ‘लुक’ या ‘रिएक्शन’ इन्सर्ट करने के लिए।

पटकथा लेखन के मेरे तरीके को सहज ही इन पटकथाओं से समझा जा सकता है। मेरी पहली कोशिश यही रहती है कि कहानी की गति कहीं धीमी न पड़ने पाए। साथ ही किसी भी स्थिति, घटना या उसके कथ्य को एकसरता से लगातार बचाने के लिए सावधान रहा जाए। कोई भी पाठक या लेखक एपीसोड 36 से जांबाज और मेहर के प्रेम-प्रसंग वाले दृश्यों को लेकर सहमत या असहमत हो सकता है, पर मुझे यह आवश्यक लगा, क्योंकि युद्ध के दृश्यों के कारण एकरसता के साथ-साथ कहानी की नीरसता भी बढ़ रही थी, उसे तीन-चार दृश्यों में निर्णायक रूप से समाप्त भी नहीं किया जा सकता था। तो मुझे यह जरूरी लगा कि युद्ध की एकरसता को इसी तरह से तोड़ा जाए, और मेरी यह कोशिश सफल भी रही...दर्शक जांबाज़ और मेहर के अगले संवेदनशील घटनाक्रम को देखने-जानने के लिए बहुत उत्सुक हो उठे थे। और संवाद तो लेखन की जान ही होते हैं।

शेष आप स्वयं ही जान-समझ सकते हैं क्योंकि संवाद रहित यह पटकथाएँ अब आपके हाथों में हैं !
शुभकामनाओं सहित

 

कमलेश्वर
5/116, इरोज गार्डन,
सूरजकुण्ड रोड
नई दिल्ली-110044

 

टेलिविजन लेखन : कमलेश्वर से एक बातचीत

 

 

प्रश्न : आपने पटकथा-लेखन कैसे सीखा ?
कमलेश्वर : इसके लिए मुझे वापस जाना पड़ेगा 1959 में। जब भारत में दूरदर्शन की शुरूआत हुई, तो मुझे यहाँ दूरदर्शन के स्क्रिप्ट राइटर के रूप में काम मिला। यहाँ स्क्रिप्ट राइटर का मुख्य काम ‘नैरेटिव’ को दृश्य-माध्यम के नैरेटिव में बदलना था। तब तक मुझे यह पता नहीं था कि स्क्रिप्ट राइटिंग क्या होती है। लेकिन धीरे-धीरे दूसरे जो साथ के निर्देशक थे, जो हमारे कला-विभाग के प्रमुख थे, कठपुतली विभाग के प्रमुख थे, या जो कल्चरल इवेंट्स आयोजित करते थे, उनसे इस विषय में विचार-विमर्श होता था, क्योंकि इन कार्यक्रमों को नैरेटिव की जरूरत पड़ती थी। तो नैरेटिव किस रूप में लिखा जाए विषय को इंट्रोड्यूस करते हुए ? फिर इस तरह के जो नैरेटिव थे उनको दृश्य माध्यम में कैसे बदला जाए ? इसकी पहली शिक्षा या दीक्षा मुझे दूरदर्शन में ही मिली। फिर वहाँ से पटकथाएँ लिखने का धीरे-धीरे अनुभव बढ़ता गया। दूरदर्शन का पहला स्क्रिप्ट राइटर होने का मुझे सुअवसर मिला और मैं समझता हूँ कि यह मेरी जिन्दगी का बहुत बड़ा अवसर था। आज मैं अपने को विनत महसूस करता हूँ उन दिनों के प्रति। उसके बाद फिर यह क्रम चलता रहा।

फिर जब न्यू वेव सिनेमा आया तो उस समांतर सिनेमा में मुझे पटकथाएँ लिखने के बहुत मौके मिले। कई फिल्में थीं—‘बदनाम बस्ती’ थी, ‘सारा आकाश’ थी। हालाँकि इसको लेकर कभी-कभी राजेन्द्र कंट्रोवर्सी खड़ी कर देते। निश्चय रूप से उसके जो संवाद हैं वे बहुत कुछ राजेन्द्र के उपन्यास से लिए गए हैं और कुछ जोड़े भी गए हैं। इसके अलावा एक फिल्म ‘फिर भी’ थी, जिसे सर्वश्रेष्ठ होने का स्वर्ण कमल भी मिला। वह उसकी ख्याति का बहुत बड़ा कारण नहीं है, लेकिन मुझे उसकी पटकथा लिखने का अवसर मिला और सबसे बड़ी चीज यह थी कि ‘फिर भी’ मेरी अपनी कहानी ‘तलाश’ पर आधारित है। हम नये-नये मुम्बई पहुँचे ही थे। उन दिनों दूरदर्शन में एक निर्देशक थे मिस्टर सिनहा, जो कि रॉयल एकेडमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट, लंदन से आए थे। उन्होंने कहा कि परसों लास्ट डेट है—एफ.एफ.सी. में पटकथा जमा करने की, नहीं तो इस पर विचार नहीं किया जाएगा। फिर डेढ़-पौने दो दिन में पटकथा लिखने का दुर्धर्ष कार्य शुरू हुआ। तो उससे मुझे काफी अनुभव प्राप्त हुआ कि कैसे जल्दी-से-जल्दी किसी भी चीज को इमेजेज़ में ढाला जाए ! कैसे पूरी कहानी को अपने अंदर जाग्रत और जीवित किया जाए ? अपने भीतर पहले उस कहानी को या नैरेटिव को या आख्यान को जीवित करना पड़ता है। जैसे आप उसको अपने भीतर देख रहे हों, घटित होते हुए। तो दृश्यों का शब्द के साथ प्रभावी तरह से घटित होना ही पटकथा की पहली शर्त है।

प्रश्न : आरम्भ में पटकथा-लेखन में आपको क्या-क्या व्यावहारिक कठिनाइयाँ आती थीं ?

कमलेश्वर : बहुत आती थीं। कभी-तभी अटक जाते थे बुरी तरह से। समझ में ही नहीं आता था कि इसको हम किस तरह परिवर्तित करें दृश्य माध्मय में। कभी-कभी बड़ी दिक्कत आ जाती थी। उसके साथ यह भी होता था कि हमने जो दृश्य डाला उससे कहानी आगे नहीं बढ़ती थी। तो कहानी की एक त्वरा या स्पीड भी होनी चाहिए ताकि जो कुछ घटित हो वह अपने में बाँधे रहे। फिर कटिंग प्वाइंट्स बहुत जरूरी होते हैं। कट प्वाइंट्स हमारे पास क्या हैं ? किस तरह से संवाद दूसरे संवाद से जुड़ेगा। किसी समय जब हमें पटकथा में समय को लांघना होता था, समय को जब एकाएक पाँच वर्ष आगे जाना पड़ता था तो समझ में नहीं आता था कि क्या करें ? कभी-कभी उलझी हुई संश्लिष्ट सिचुएशन आ जाती थी। तो समझ में नहीं आता था कि इसको कैसे सँभाला जाए ?
ऐसी स्थिति में मुझे लगता है कि अपने कथन को, अपने कथन से दर्शकों का तादात्म्य स्थापित करने के लिए किन-किन बिम्बों की, किन घटनाओं की, किन संदर्भों की जरूरत होती है, उसके लिए आपको व्यापक जानकारी तो नहीं, पर व्यापक अनुभव की जरूरत होती है। उन्हीं मुश्किलों से पार पाने के क्रम में यह समझ में नहीं आया कि इसका तरीका संवाद से संवाद का कट लेना हो सकता है। इससे चाहे जितनी बड़ी अवधि हो, उसको आप ट्रांसेड कर सकते हैं। उसे आप नाप सकते हैं।

उसी तरह से इमेजेज़ कहाँ मुश्किलें खड़ी करेंगी ? इमेजेज़ झटका देती हैं। जैसे एक दृश्य खत्म हुआ कि एक आदमी चीखता हुआ भागा जा रहा है तो उसका अगला दृश्य सितार बजने से नहीं शुरू हो सकता, नहीं तो दर्शकों को झटका लगता है। इन तमाम चीजों को संभालना पटकथा का मूल काम है जिसकी ट्रेनिंग मुझे फिल्मों से बहुत अधिक मिली। ये न्यू वेव फिल्में थीं- जिनमें ‘बदनाम बस्ती’ भी थी ‘सारा आकाश’ थी, ‘रजनीगंधा’ थी। इसके अलावा ‘अमानुष’ जैसी व्यावसायिक फिल्म भी थी। व्यावसायिक निर्देशकों के साथ जब आप बैठते हैं तो पटकथा की सही पहचान वहाँ पर होती है। कला फिल्म में हम फिर भी थोड़ी-बहुत लिबर्टी लेते हैं लेकिन व्यावसायिक फिल्मों में साँस लेने की जगह भी नहीं होती। यानी कहना चाहिए कि जरा सी भी सिलवट पड़ जाए तो वह सिलवट फिल्म को बैठा देती है। तो व्यावसायिक फिल्में लिखते समय यह ध्यान रखना पड़ता है कि पटकथा अपने तेवर और रफ्तार से चलती जाए और दर्शक बंधा रह जाए। उसमें पटकथा लेखन की शास्त्रीय गलतियाँ हो सकती हैं, लेकिन दर्शक उसे बाद में सोचेगा, जिस समय देख रहा है तब नहीं सोचेगा। हालाँकि इस तरह की चतुराई कोई अच्छी चीज नहीं है पटकथा लेखन के लिए। लेकिन यह जरूरी है कि पटकथा लेखन को तब अपने नैरेटिव को बहुत गहराई से आत्मसात करके देखना चाहिए। इसमें से जो रुके हुए स्थल हैं, या जो ठहरे हुए स्थल हैं, उसे पटकथा की भाषा में झोल पड़ना कहते हैं, वह न होने पाए। व्यावसायिक फिल्में लिखने से मुझे इस बात अनुभव हुआ। उसी का लाभ मुझे टेलीविजन धारावाहिकों में भी मिला।

प्रश्न : आपको लगता है कि कोई भी व्यक्ति अभ्यास के द्वारा पटकथा-लेखक बन सकता है ?

कमलेश्वर : निश्चित रूप से। इसमें कोई ऐसी बड़ी चीज नहीं है। वह इसलिए कि यह एक तरह का अर्द्धवैज्ञानिक, अर्द्धतकनीकी काम है जो अर्द्धरचना्तमक भी है। तो जहाँ अर्द्ध-अर्द्ध है वहाँ उसे कोई भी समझ सकता है। जो पटकथाएँ मौजूद हैं उनको देखना चाहिए कि कैसे क्या किया गया ? जैसे कि जब मैं ‘चंद्रकांता’ लिख रहा था...‘चंद्रकांता’ लिखने में बड़ी भारी दिक्कतें मेरे सामने पेश आईं। कुछ इस तरह की दिक्कतें भी होती थीं कि हमने कहानी आगे बढा़ई और शूटिंग उसी दिन होती थी। आपने लिखा और शूटिंग शुरू हो गई। तब पता लगता था कि फलाँ पात्र मौजूद नहीं है। अब चूँकि वह पात्र मौजूद नहीं है तो आपको तत्काल दृश्य बदलना पड़ता था। तो तत्काल बदलने की यह तो तात्कालिकता है, यह सीरियल्स की मजबूरी है। ऐसी स्थिति में वहाँ पर, जिसे कहना चाहिए कि एक तेज बुद्धि के साथ आपको काम करना पड़ता है। और इसमें मैं समझता हूँ कि पटकथा-लेखन के पास जो सबसे बड़ी शक्ति है, यानी अर्द्ध-तकनीकी जानकारी, अर्द्ध-साहित्यिक जानकारी के अलावा जो सबसे बड़ी शक्ति है उसके पास वह है उसकी स्मृति। जिनकी स्मृतियाँ कमजोर होती हैं, उनको इसमें दिक्कत आ सकती है। जिसकी स्मृति बहुत तेज, बहुत स्थायी है, जो अपने अनुभवों को तत्काल वापस बुला सकता है, इस माध्यम में बहुत संभावनाएँ हैं उनके लिए। यानी जिसके दिमाग में स्मृतियाँ मौजूद हों।

प्रश्न : टेलीविजन जैसे माध्मय से बतौर लेखक जुड़ने के लिए कितनी तकनीकि जानकारी आवश्यक है ?

कमलेश्वर : मैं समझता हूँ कि यह जरूरी नहीं है कि आप कैमरामैन के साथ काम करें। जरूरी नहीं है कि आप निर्देशक के साथ खड़े होकर एक सहायक के रूप में काम करें। अगर आप गौर से ज़िंदगी और अच्छी पटकथा को टेलीविजन पर देखते रहें तो आपको समझ में आ जाता है कि ये चीजें कैसे घटित हो रही हैं और कंपोजीशंस क्या है ? किस तरह से दृश्य बदलते हैं। एंट्रीज़ क्या है ? कट प्वाइंट्स क्या हैं ? और सबसे बड़ी बात जो है सीरियल लेखन में, वह यह कि यहाँ हर दृष्य अपने-आप में क्लाईमेक्स होता है। अगले दृश्य का उससे बड़ा क्लाईमेक्स खोजना पड़ता है, नहीं तो वह जमता नहीं। ऐसे में कभी-कभी ये क्लाईमेक्स चरित्र के माध्मय से निकलकर आते हैं, कभी-कभी संवाद के माध्यम से निकलकर आते हैं। कभी-कभी सिचुएशन के माध्यम से निकलकर आते हैं—तो यही जानकारी होनी चाहिए।

प्रश्न : फिल्म औऱ टेलीविजन की पटकथा में बुनियादी फर्क क्या है ?

कमलेश्वर : वैसे तो दोनों एक ही तरह के टेक्नीकल राइटिंग है पर दोनों में बुनियादी फर्क है। टेलीविजन में रचनात्मकता के लिए काफी जगह होती है, जोकि फिल्मों नहीं होती। हम लगभग 85-90 दृश्यों को पौने तीन घण्टे की फिल्म की पटकथा लिखते हैं तो उसमें चूँकि उसकी जो गतिशीलता है वह इतनी तेज होती है कि उसमें दर्शक के पास सोचने का वक़्त नहीं होता। आपके पास तो होता है यानी लेखक के पास तो होता है, दर्शकों के पास नहीं होता। अगर उसमें आप दर्शकों के सोचने के लिए कोई गहरा क्षण पैदा करना चाहें कि वह बैठकर कुछ सोच रहा है, या वह उदास है और पीछे सिर्फ म्यूजिक बज रहा है तो यह फिल्मों में नहीं हो सकता। पर ये या ऐसे दृश्य फिल्मों से अधिक टेलीविजन में दिये जा सकते हैं। वहाँ इसके लिए अधिक स्पेस है। टेलीविजन या धारावाहिक लेखन में एक सबसे बड़ी और सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इसमें साहित्य से आप बहुत अधिक जुड़े रह सकते हैं। बल्कि साहित्य ही इसका मूल आधार बन जाता है जोकि फिल्मों में संभव नहीं है। एक फिल्म के 90 दृश्यों में अधिक-से-अधिक आठ-दस दृश्य आप अपनी मरजी से लिख सकते हैं। एडीटिंग टेबल पर उनका क्या होगा आपको पता नहीं होता। टेलीविजन में एक तो जल्दी की जरूरत होती है, यानी टेलीविजन का जो एडीटर होता है, उसके पास ज्यादा समय नहीं होता। उसे जल्दी में वही लेना पड़ता है जो लेखक लिखता है। बहस के लिए वक्त नहीं होता। सीरियल लेखन और फिल्म लेखन की पटकथा में जो बुनियादी फर्क है वह यह है कि फिल्म की पटकथा बहुदृश्यवादी होती है और व्यवसाय में रखकर लिखी जाती है, जबकि टेलीविजन की जो पटकथा है वह व्यवसाय के लिए उतनी नहीं होती जितनी कि बात और उत्सुकता बनाए रखने के लिए होती है। उसमें रचनात्मक अवसर अधिक मिलते हैं।

प्रश्न : क्या एक सफल पटकथाकार होने के लिए साहित्यकार होना आवश्यक है ?

कमलेश्वर : नहीं, कोई जरूरी नहीं है साहित्यकार होना। लेकिन साहित्य का अच्छा पाठक होना एक क्वालिफिकेशन मानी जा सकती है, अच्छा पटकथा लेखन होने के लिए। वैसे क्लासिकल पढ़ने से कोई खास मदद नहीं मिलती है। सबसे आवश्यक यह है कि आप जिंदगी देखें। अच्छे सीरियल के वी.एच.एस. बाजार में उपलब्ध हैं, तो आप घर बैठकर आराम से यह देखें कि कथातत्व के विकास के लिए दृश्य परिवर्तन कैसे किया गया है। ग़लत दृश्य परिवर्तन असंगत होकर बोर करने लगता है। उबाऊ बना जाता है। सोचिए तो ये सारे सीरियल्स जब आप वी.एच.एस. पर देखेंगे तो आपको पता लगेगा कि उनमें क्या गलतियाँ हैं, क्या नहीं ? किसी भी सीरियल का एक एपीसोड उठाकर देखिए।

 


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