हिंसा और अस्मिता का संकट - अमर्त्य सेन Hinsa Aur Asmita Ka Sankat - Hindi book by - Amartya sen
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हिंसा और अस्मिता का संकट

अमर्त्य सेन

प्रकाशक : राजपाल एंड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :191
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4449
आईएसबीएन :9788170286745

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Identity And Violence का हिन्दी अनुवाद

Hinsa Aur Asmita Ka Sankat

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

आज सारा संसार हिंसा और आतंकवाद की चपेट में है। कश्मीर के नाम पर हमारे देश में आए दिन आतंकवादी घटनाएँ, आत्मघाती हमले, निरपराध लोगों की हत्या और लूटमार की जा रही है। ऐसी परिस्थिति में देश की अस्मिता और अस्तित्व का संकट बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है।

नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन संस्कृति और समाज विज्ञान के भी मौलिक चिन्तक हैं। अपनी पूर्व प्रकाशित पुस्तक ‘भारतीय अर्थतंत्र, इतिहास और संस्कृति’ में उन्होंने संस्कृति और मानव धर्म से जुड़े प्रश्नों पर विस्तारपूर्वक विचार किया था। अब अपनी इस नई पुस्तक में वे एक सर्वथा नए विषय और मौलिक चिन्तन दृष्टि के साथ हमारे सम्मुख हैं। अस्तित्व अथवा पहचान का प्रश्न और जंगल की आग की तरह फैल रही हिंसा की गहरी अर्थपूर्ण परख और समीक्षा इस पुस्तक का विषय है। विद्वान लेखक के गहरे अनुशीलन और चिंतन का परिणाम है यह अत्यन्त महत्वपूर्ण सामयिक पुस्तक।

अपनी बात

कुछ साल पहले जब मैं विदेश यात्रा से इंग्लैंड वापस आ रहा था—उस समय मैं कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी कालेज में मास्टर (अध्यक्ष) था—हीथरो हवाई अड्डे के आव्रजन अधिकारी ने मेरे भारतीय पासपोर्ट का गहराई से मुआयना करने के बाद मुझसे एक दार्शनिक-सा सवाल पूछा ! मेरा पता—मास्टर्स लॉज, ट्रिनिटी कालेज, कैब्रिज-देखकर उसने पूछा कि जिस मास्टर का मैं अतिथि हूँ, क्या वह मेरा अच्छा मित्र है ? मैं ज़रा देर के लिए रुककर सोचने लगा कि क्या मैं सचमुच अपने प्रति मित्रता का दावा कर सकता हूँ। कुछ देर बाद मैं इस निर्णय पर पहुँचा कि प्रश्न का उत्तर ‘हाँ’ में होना चाहिए, क्योंकि मैं अक्सर स्वयं से मित्र जैसा ही व्यवहार करता हूँ, और जब कभी गलत बात भी कहता हूँ, तो उसका प्रतिकार करने से भी नहीं चूकता हूँ। यह सोचने में मुझे कुछ समय लगा तो अधिकारी कहने लगा कि मैं हिचकिचा क्यों रहा हूँ, और ब्रिटेन के मेरे निवास में क्या कोई ख़ामी है ?

जो हो, प्रश्न का उत्तर तो दे दिया गया लेकिन मैं सोचने लगा कि व्यक्ति की पहचान (इस पुस्तक में सर्वत्र अस्मिता के समानार्थी के रूप में प्रयुक्त संपा.) एक जटिल विषय है। स्वयं को यह विश्वास दिलाने में, कि कोई वस्तु अपने समान ही होती है, विशेष कठिनाई नहीं होती। प्रख्यात दार्शनिक विटगेन्सटाइन ने एक दफा टिप्पणी की कि ‘अर्थहीन प्रस्ताव का कोई उससे अच्छा उदाहरण नहीं मिलेगा’, यह नहीं कहा कि कोई वस्तु अपने समान ही होती है, लेकिन इसी तर्क को आगे बढ़ाते हुए उसने कहा कि प्रस्ताव अर्थहीन होने पर भी ‘कल्पना के किसी खेल के साथ जुड़ा होता है।’

जब हम अपना ध्यान ‘स्वयं अपने समान होने’ की धारणा से हटाकर ‘दूसरों के साथ अपनी पहचान को बाँटने’ की ओर लगाते हैं -सामाजिक पहचान का विचार अक्सर यह रूप ग्रहण करता है—तो जटिलता और भी बढ़ जाती है। आज की अनेक राजनीतिक तथा सामाजिक समस्याएँ विभिन्न समूहों की विविध पहचानों के परस्परविरोधी दावों के इर्द-गिर्द ही घूमती हैं, क्योंकि पहचान की धारणा, अनेक प्रकार से, हमारे विचार तथा कार्यों को प्रभावित करती है।

पिछले कुछ वर्षों की हिंसक घटनाओं और अत्याचारों के कारण वर्तमान युग भयानक भ्रांति तथा भयंकर द्वंद्वों का युग बन गया है। दुनिया में हो रही मुठभेड़ों की राजनीति संसार के धार्मिक तथा सांस्कृतिक विभाजनों के परिणाम के रूप में देखी जा रही है। कहा जा सकता है कि दुनिया को धर्मों अथवा सभ्यताओं के संघ के रूप में ही देखा जाने लगा है—भले ही यह निहित भाव ही हो, प्रत्यक्ष न हो—और लोग स्वयं को जिन अनेक अन्य रूपों में भी देखते हैं, उनकी उपेक्षा की जाने लगी है। इस विचार के पीछे यह अटपटी मान्यता प्रतीत होती है कि दुनिया के लोगों को किसी ‘एकमेव तथा सबको घेर लेने वाली’ विभाजक व्यवस्था के अधीन क्षणीबद्ध किया जा सकता है। दुनिया के लोगों का यह सभ्यतात्मक अथवा धर्मधारित विभाजन की मनुष्य की पहचान को एक ऐसी ‘एकांतिक’ दृष्टि से बांध देता है, जो मनुष्य-प्राणियों को केवल एक समूह के सदस्य से ज़्यादा कुछ और नहीं देखना चाहता-पहले इन्हें राष्ट्र और वर्ग का नाम दिया जाता था, अब सभ्यता या धर्म कहा जाता है।
यह एकान्तिक दृष्टि दुनिया के हर व्यक्ति को गलत समझने का अच्छा कारण है। अपने जीवन को हम स्वयं को अनेक दलों के सदस्य के रूप में देखते हैं—उन सभी से हम जुड़े होते हैं। कोई व्यक्ति अमेरिकी नागरिक है, कैरेबियन द्वीप उसका जन्मस्थल है, पुरखे अफ्रीकी थे, वह ईसाई है, उदारवादी है, स्त्री है, निराभिषभोजी है, सफल धावक है, इतिहासवेत्ता है, स्कूल में पढ़ाता है, उपन्यास लिखता है, नारी आन्दोलन का समर्थक है, उभयलिंगी है लेकिन समलिंगियों का विरोधी नहीं है, नाटक देखना उसे प्रिय है, पर्यावरण-रक्षा में उसे रुचि है, टेनिस खेलता है, जाज़ संगीत का दीवाना है, और यह विश्वास करता है कि अन्तरिक्ष में बुद्धिमान प्राणी निश्चित रूप से रहते हैं, जिनसे शीघ्रातिशीघ्र बात की जानी चाहिए—अंग्रेजी भाषा में बात करना ठीक रहेगा। वह व्यक्ति इन सभी बातों से एक साथ ही जुड़ा हुआ है, और ये सब मिलकर उसे एक विशेष पहचान प्रदान करती हैं। इनमें से कोई भी संबंध व्यक्ति की अकेली पहचान नहीं है और न उसे किसी एक ही श्रेणी से बाँधता है। अपनी इन बहुल पहचानों में से, जिनमें किसी से भी मुक्त होना संभव नहीं है, समय-समय पर आवश्यकतानुसार हम किसी से कम किसी से ज़्यादा संबंध रखकर जीवन में आगे बढ़ते हैं।

इसलिए मनुष्य-जीवन बिताने की शर्त यह है कि तर्क और चुनाव का केन्द्रीय महत्त्व स्वीकार किया जाय। इसके नितान्त विपरीत, किसी एक पहचान को अद्वितीय घोषित कर, और यह कहकर कि इसे अस्वीकार करना सम्भव नहीं है—अक्सर यह पहचान युद्धप्रेरित होती है और लोगों से अपेक्षाएँ भी बहुत ज़्यादा रखती है—दुनिया में हिंसा फैलाई जा रही है। इस प्रकार साम्प्रदायिक मुठभेड़ों की ‘सैन्य कला’ का, अद्वितीय पहचान की यह धारणा, मुख्य हथियार बना दी जाती है।

दुर्भाग्य की बात यह भी है कि इस हिंसा पर काबू पाने के जो प्रयत्न किए जाते हैं, वे भी पहचानों में चयन की सुविधा के अभाव से बाधित होते हैं, और इसलिए हिंसा को हारने की उनकी क्षमता घटती है। इस प्रकार जब विभिन्न मानव समाजों के बीच संबंधों को घनिष्ठ बनाने के प्रयत्न किए जाते हैं—जो अब अक्सर किए जाने लगे हैं—इन्हें ‘सभ्यताओं में परस्पर भाईचारा बढ़ाने’ धार्मिक ग्रुपों में बातचीत करने’ अथवा ‘विभिन्न समुदायों के बीच मैत्री संबंध बढ़ाने’ इत्यादि उद्देश्यों के अंतर्गत किया जाता है—तो ये भी लोगों के अन्य अनेक प्रकार के पारस्परिक संबंधों की उपेक्षा पर ही खड़े होते हैं और मनुष्य की जबर्दस्त सूक्ष्मीकरण करके शांति की योजनाएँ बनाते हैं।

हमारी भागीदारी पर केन्द्रित मानवता उस समय, जब धर्म, समुदाय, संस्कृति राष्ट्र या सभ्यता के किसी भी एक सर्वोपरि श्रेणीकारण के अन्तर्गत—जो भी युद्ध तथा शांति संबंधी अपनी मान्यताओं को ही सर्वश्रेष्ठ और सर्वशक्तिसंपन्न मानते हैं—जीवन को झेलती है, तो यह उसके लिए अत्यंत भयावह चुनौती बन जाती है। हमारी दुनिया में जो प्रकृति विविधताएँ और बहुलताएँ हैं, उनकी तुलना में ये विभाजन कहीं ज़्यादा खतरनाक सिद्ध होते हैं। यह न केवल हमारे इस पुराने विश्वास के विरुद्ध जाता है कि हम मनुष्य प्राणी मोटे तौर पर एक समान हैं—जिसका आजकल यह कहकर मज़ाक उड़ाया जाता है कि यह बहुत भोंदूपन भी बात है, जो शायद ठीक भी है—बल्कि इसके भी विरुद्ध जाता है कि ‘हमारी विभिन्नता वास्तव में विविधता है’—जो शायद ज़्यादा सही है, यद्यपि जिसकी चर्चा बहुत कम की जाती है। आज की दुनिया में लोगों के भाईचारे की आशा तभी की जा सकती है जब मानवी पहचान की बहुलताओं को स्पष्ट रूप से समझ लिया जाय और यह भी कि इन बहुलताओं के बावजूद वे विभाजन की किसी ऐसी कठोर रेखा को बनने से रोकती हैं जिसे तोड़ पाना संभव न हो।

सच्चाई यह है कि घिनौने इरादों से अधिक यह धारणात्मक विसंगति हमारे चारों तरफ फैली बर्बरता तथा संकट को बढ़ाने में ज़्यादा रोल अदा करती है। यह भ्रम कि हमारी तो नियति ही यही है, एक विशेष पहचान ही हमारे लिए सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है, और उसके निहतार्थ भी सबसे महत्त्वपूर्ण हैं, दुनिया में अपनी त्रुटियों तथा कारगुज़ारियों दोनों के द्वारा हिंसा को ही अंजाम देते हैं। हमें यह स्पष्ट रूप से समझना चाहिए कि हमारे एक दूसरे से भिन्न अनेक संबंध हैं और हम अनेक प्रकार से परस्पर क्रिया कर सकते हैं—हमें भड़काने वाले तथा उनके विरोधी लोग जो भी कहें, सही नहीं है। हमें अपनी प्राथमिकताओं का निश्चय करने की स्वतंत्रता प्राप्त है।
हमारे सम्बन्धों की बहुलता तथा चयन और तर्क की सुविधा की आवश्यकता की अवहेलना, जिस दुनिया में हम रह रहे हैं, उसे हमारे लिए धुंधला कर देती है ! मैथ्यू अर्नाल्ड ने अपनी कविता ‘डोवर बीच’ में जो कहा है, उस भयानक दिशा में यह हमें ढकेलती है—

अब हम यहाँ हैं—जो अँधेरा घिरते मैदान की तरह संघर्ष और पलायन के ख़तरों की अस्पष्ट आवाज़ों से भरा है-
जहाँ अज्ञान से ग्रस्त सेनाएँ रात में लड़ रही हैं—

भूमिका

आस्कर वाइल्ड ने कहा है—ज़्यादातर लोग दूसरे लोग होते हैं।’ यह उसकी एक जटिल पहेली लगती है लेकिन इसकी व्याख्या में उसने बहुत संतोषजनक तर्क दिए हैं—‘उनके विचार किसी दूसरे के विचार होते हैं, उनकी ज़िंदगियाँ दूसरों की नकल होती हैं, उनके आवेग दूसरों की बातों से बनते हैं।’ इस दुनिया में हम जिन लोगों से अपनापन महसूस करते हैं, उनका आश्चर्यजनक प्रभाव हम पर पड़ता है। प्रयत्नपूर्वक प्रसारित साम्प्रदायिक नफ़रतें जंगली आग की तरह दुनिया में फैल जाती हैं—जैसा पिछले कुछ वर्षों में हमने कोसोवो, बोस्निया, रवांडा, तिमोर, इज़रायल, फिलिस्तीन, सूडान तथा अनेक अन्य देशों में देखा है। लोगों के किसी समूह को कोई विशेष पहचान देकर योजनापूर्वक उसका प्रचार करने से उन्हें दूसरे समूहों के खिलाफ बर्बर व्यवहार करने के लिए उभारा जा सकता है।

आज की दुनिया के अनेक टकराव तथा हत्याकांड किसी अनुपम और अद्वितीय कही जाने वाली पहचान के भ्रम से जुड़े हैं। नफ़रत को भड़काने की कला किसी पहचान को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करती है, उसके साथ की अन्य पहचानों तथा मनुष्य की सहज-स्वाभाविक दया भावना को दबा देती है और क्रूरता का काला खेल दुनिया को दिखाने लगती है। इसका परिणाम उसकी आदिम हिंसा के उद्रेक में होता है जिसे दुनिया आतंकवाद के नाम से जानती है।


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