अँधेरे की आत्मा - एम. टी. वासुदेवन नायर Andhere ki Atma - Hindi book by - M. T. Vasudevan Nayar
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अँधेरे की आत्मा

एम. टी. वासुदेवन नायर

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :179
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 445
आईएसबीएन :81-263-1091-x

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साहित्य अकादमी पुरस्कार, वायलार पुरस्कार, केरल साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित श्री एम. टी. वासुदेवन नायर की उत्कृष्ट कहानियों का संग्रह ।

Andhere Ki Aatma a hindi book by M. T. Vasudevan Nayar - अँधेरे की आत्मा - एम. टी. वासुदेवन नायर

प्रस्तुत है पुस्तक के कुछ अंश

ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित मलयालम के चर्चित कथाकार एम. टी. वासुदेवन नायर के कहानी-संग्रह अँधेरे की आत्मा में ऐसे सामान्यजन की जिजीविषा की ओर संकेत है जो परिस्थितियों के दबाव में विवश जरूर दिखता है पर फिर भी विपरीत स्थितियों में निरन्तर संघर्षरत रहते हुए अपनी गरिमा पर आंच नहीं आने देता। इस तरह आम आदमी के स्वाभिमान को श्री नायर बहुत खूबसूरती से उकेरते हैं और उसे हमारी स्मृतियों का अंग बना देते हैं।
एक प्रगतिशील कथाकार होने के नाते श्री नायर उन सामाजिक विषमताओं पर प्रहार करते हैं जो मनुष्य को सहज रूप से जीने के अधिकार से वंचित करती है। सीधी-सहज शैली और उतनी ही सादी भाषा में अपने समृद्ध अनुभवों से वे कई यादगार चरित्रों से पाठक को रू-ब-रू कराते हैं।
इन कहानियों में मलयाली समाज के काफी कुछ बानगी हमें देखने को मिलती है। केरल की प्राकृतिक समृद्धि और माटी की उर्वर-आर्द्रता का अहसास भी होता चलता है। श्री नायर अभिजात्य समाज से कहीं ज्यादा लोक-समाज से अपनी निकटता महसूस करते हैं, यहीं उनकी रचनात्मक शक्ति भी है जो इस संग्रह की कहानियों में सर्वत्र नज़र आती है।

अनुवादक की ओर से

एम.टी. वासुदेवन नायर की कहानियों का यह हिन्दी संकलन ‘अँधेरे की आत्मा’ प्रस्तुत करते हुए मुझे बेहद खुशी एवं गर्व का अनुभव हो रहा है। वैसे उनके अधिकांश उपन्यास हिन्दी में अनूदित होकर प्रकाशित हो गये हैं। पर कहानियों का यह दूसरा संकलन है। आज तो एम.टी. भारतीय भाषाओं के सर्वश्रेष्ठ कथाकारों में से एक हैं। भारत के बाहर भी उनके प्रशंसक हैं।
‘वानप्रस्थ’ का विमोचन ज्ञानपीठ पुरस्कार समर्पण समारोह के अवसर पर (मार्च 1996 में) हुआ था। इस संकलन में वासुदेवन नायर की चुनी हुई ग्यारह कहानियाँ दी गयी हैं। इस बार उनकी दस कहानियों का यह विशिष्ट संकलन भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा ही प्रकाशित हो रहा है। इसमें दीदी (ओप्पोल, 1956), अँधेरे की आत्मा (1957) और दार-एस-सलाम (1960) को छोड़कर अन्य सात कहानियाँ अपेक्षाकृत नयी हैं; जैसे छोटे-छोटे भूकम्प (1989), भारी वर्षा के अगले दिन (1990), शिलालिपि (1995), शेरलक (1996), कल्पान्त (1997), कडुगण्णव : एक यात्रा-वृत्तान्त (1998) और दृष्टि (2000)। इनमें से अधिकांश कहानियाँ हिन्दी की स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं।
इन कहानियों के सम्बन्ध में चयनकर्ता और अनुवादक की हैसियत से मैं कुछ नहीं कहूँगा। ये कहानियाँ स्वयं अपने बारे में बताएँगी। इनमें से दीदी, अँधेरे की आत्मा, छोटे-छोटे भूकम्प जैसी कहानियों पर मलयालम में फिल्में भी बन चुकी हैं, जिन्हें राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत भी किया गया। एम.टी. वासुदेवन नायर को चार बार सर्वोत्तम पटकथा-लेखक का पुरस्कार मिल चुका है। यह उनकी सामाजिक चेतना एवं साहित्य को फिल्मी-माध्यम से प्रस्तुत करने की दायित्वपूर्ण भूमिका का परिचायक है। उनकी पहली निर्देशित फिल्म ‘निर्माल्यम’ को राष्ट्रपति का स्वर्ण कमल (सर्वश्रेष्ठ फिल्म पुरस्कार 1973) प्राप्त हुआ था।
एम.टी. वासुदेवन नायर सभी प्रकार के पुरस्कार-ज्ञानपीठ पुरस्कार से लेकर वयलार एवार्ड, साहित्य अकादेमी पुरस्कार, केरल साहित्य अकादेमी पुरस्कार (तीन बार-कहानी, उपन्यास एवं नाटक को) जैसे दर्जनों पुरस्कारों से सम्मानित हैं। वे केरल साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष रह चुके हैं। अभी तुंचन स्मारक ट्रस्ट, तिरूर के अध्यक्ष हैं, साहित्य अकादेमी की कार्यकारिणी के सदस्य एवं मलयालम भाषा के संयोजक भी हैं।
भारतीय ज्ञानपीठ से ‘वानप्रस्थ’ संकलन के तीन संस्करण निकल चुके हैं। आशा है, ‘अँधेरे की आत्मा’ को भी उसी प्रकार पाठकों का प्यार मिलेगा।
वी.डी. कृष्णन नम्पियार



दीदी
दादी रो रही थी।
दीदी को रोते देखना अप्पू को अच्छा नहीं लगता। पिछवाड़े वाले कमरे की खिड़की की चौखट पर माथा टेके दीदी रो रही थी। वह तो हमेशा रोती ही रहती है। शायद नानी ने उसे गाली दी हो। वैसे नानी अप्पू को भी डाँटती रहती है। लेकिन अप्पू को रोना नहीं आता। गुस्सा आता है। अगर वह भी दीदी जैसा बड़ा होता तो दिखा देता।...इतनी बड़ी होने पर भी दीदी डाँट-फटकार क्यों सहती है। उसका चेहरा उतर जाता है। आँखें भर आती हैं...यह देखकर अकसर अप्पू वहाँ से बाहर निकल जाता।
दीदी को रोते देखकर अप्पू से उसके पास रहा नहीं जाता। कभी रोते-रोते दीदी उसे गले लगा लेती। दीदी से प्यार से लिपटना उसे अच्छा लगता है। लेकिन जब ‘बेटा’ कहते हुए सिर और माथे पर बार-बार चुम्बन लेती तो गरम-गरम आँसू अप्पू के बदन पर टपक पड़ते। तब वह भी रुआँसा हो जाता।
नानी की फटकार को वह अक्सर अनसुनी कर देता। बहुत गालियाँ सुन चुका। सुबह उठते ही गालियों की बौछार हो जाती-‘दुपहरिया होने पर ही छोकरा उठता है। देखा न रे, तेरे जनमते ही घर का सत्यानाश हो गया कि नहीं ?’
बरामदे के कोने में सिल के पास बैठे, दातून करते वक्त फर्श पर थोड़ा पानी गिर जाए तो बस काफी है, नानी शुरू कर देती-‘बदतमीज, अपनी हड्डी-पसली तोड़कर फर्श की लीपा-पोती की है मैंने।’
आँगन में कोई कूड़ा डाल दे, कुएँ में कोई कंकड़ी फेंक दे या ताँबें के घड़े पर ताल बजाये तो नानी गालियाँ देने लगती। अब स्कूल जाने लगा है तो उसे थोड़ी राहत मिली है। कम से कम दिन में तो छुटकारा मिल जाता है।
क्यों नहीं दीदी नानी को फटकार देती ? लेकिन अप्पू से ज्यादा दीदी ही नानी से डरती है।
अप्पू को गालियाँ देने पर कभी-कभी दीदी कहती, ‘‘उसे कोस-कोसकर मार डालेंगी माँ।’’
‘‘थू...’’
उसके जवाब में एक डाँट पिलाती। उससे भी बस नहीं करती, ‘‘ऐसे ही शक्कर समझकर क्यों नहीं चाट लेती ?’’
‘‘जब अपना ही खून हो..’’
तब अपने बछड़े को कोई छूने जाए तो जैसे कजरी गाय सींग तानकर आगे बढ़ती है उसी तरह नानी उछलती हुई आती।
‘‘अरी...किसी ऐरे-गैरे से...हाय राम ! मुझसे ज्यादा कहलवाना नहीं री !’’
बातें जब यहाँ तक पहुँच जातीं तो अप्पू चुपचाप आँगन की तरफ निकल जाता। वह अहाते में चक्कन को साथ लेकर घूमता रहता। कभी-कभी कद्दू की बेल के बीच लुकाछिपी करते लाल पूँछवाले पतंगे को पकड़ने की कोशिश करता। लेकिन कभी भी उसके हाथ न लगता। बाहर काफी देर बिताकर अप्पू घर लौटता। इस बीच उसे खयाल आता, दीदी पिछवाड़े के कमरे की खिड़की पर माथा टेके सिसक रही होगी।
सन्ध्या समय नाम जपने का काम अप्पू को तकलीफदेह लगता था। गलियारे में बैठकर ही यह काम करता। कई बार नमः शिवाय रटना पड़ता। फिर नक्षत्रों की नामावली रटनी पड़ती। इन सबमें उससे कोई गलती नहीं होती थी। देशी महीनों के नाम भी उसे गिनना आता था। लेकिन इसके बाद उसे अँग्रेजी के महीने और वन, टू, थ्री...गिनने के काम में दीदी की मदद की जरूरत पड़ती थी।
दीदी को अँग्रेजी आती थी। पौर की दीवार पर टँगी कान्हा की तस्वीर वाले कैलेण्डर में छपी अँग्रेजी दीदी पढ़ लेती थी। आखिर दीदी की पढ़ाई आठवीं तक हुई थी।
सब कुछ रटने के बाद वह दीदी के पास चुपचाप जा बैठता। दीदी उसके बालों पर उँगलियों फेरने लगती। तभी पड़ोस के बड़े घर से गाने की आवाज आती। वह कभी उधर नहीं गया। बाड़े के इस तरफ से देखा भर है। वहाँ काफी लोग रहते थे।
वहाँ से गाने की आवाज आ रही थी। गानेवाली और बातें करनेवाली एक पेटी वहाँ आयी थी। यह पेटी गाती और बोलती कैसे है ? चक्कन कहता है कि उसके अन्दर कोई बैठा होगा। चक्कन को कुछ भी नहीं आता। वह तो स्कूल भी नहीं जाता। कजरी गाय सिर्फ उसी को सींग नहीं मारती। यह तो उसके बड़प्पन से नहीं, उसके हाथ की लकुटी देखने से है।
वे सारे गीत शायद सिनेमा के थे। अप्पू ने अभी तक कोई सिनेमा नहीं देखा।
स्कूल के उसके साथी यशोदा और मणि ने सिनेमा देखा है। सिनेमा की तस्वीरों से बनी एक थैली उसने जरूर देखी थी।
गाना सुनकर, दीदी पर अक्सर एक पागलपन सवार होता। फिर कुछ पूछा जाए तो जवाब नहीं देती। पता नहीं वह क्यों इस तरह नाराज रहती थी ? कभी-कभी दीदी इसी तरह चुप्पी साधे बैठ जाती थी। यह दीदी भी कितनी अजीब है।
फिर भी उसे दीदी पसन्द थी। सवेरे स्कूल जाने के पहले दीदी ही उसे नहलाती। सूखी तुरई के रेशे से शरीर रगड़-रगड़कर नहाना उसे पसन्द नहीं। अँगोछे की नोक से कान के अन्दर साफ करते वक्त उसे गुदगुदी होती। दीदी ही कंजी परोस देती। कंजी पी लेने के बाद गीले अँगोछे से छाती से पानी पोंछ लेती, और पिछले दिन धोकर रखी कमीज और धारीदार जाँघिया पहनाती। बालों पर कंघी करके चेहरे से तेल की चिकनी परत एक बार और पोंछ देती। इसके बाद वह स्कूल रवाना हो जाता।
रात को वह खाने बैठता तो दीदी भी पास बैठ जाती। दीदी का कौर बनाकर खिलाना उसे पसन्द था। लेकिन नानी के सामने दीदी उसे कौर बनाकर नहीं खिलाती थी। क्योंकि एक बार नानी ने डाँटा था, ‘‘यह क्या दुधमुँहा बच्चा है जो तू कौर बनाकर खिलाती है....’’
दीदी कभी-कभार ही नानी को जवाब देती। दीदी की बातें सुनने पर नानी पर भूत सवार हो जाता। फिर कोहराम मच जाता, नानी की जली-कटी बातें सुनने के बाद दीदी रोने लगती। कभी-कभी नानी भी रो उठती।
नानी के रोने से उसे कोई फर्क नहीं पड़ता था। लेकिन सिर्फ एक बार नानी को रोते देखकर उसे भी रोना आया था।
वह घटना अप्पू भूला नहीं था। नानी को रुलाने वाले उस आदमी को भी वह नहीं भूल पाया।
चक्कन के बनाये नारियल के पत्ते की गेंद से वह आँगन में खेल रहा था। तभी फाटक से किसी ने बुलाया।
‘‘माँ !’’
देखा, तो एक आदमी बाड़े के पास खड़ा था। लम्बी, आस्तीनवाली कमीज और बगल में एक थैली। नानी आँगन से होकर बाड़े की तरफ गयी। पता नहीं, नानी क्या बड़बड़ा रही थी।...
‘‘तेरी माँ ही तो कह रही है ! तुम यहाँ तक आ गये हो तो घर के अन्दर क्यों नहीं आते कुमारन ?’’
अप्पू को भी लगा कि नानी ने ठीक ही कहा था। यह कौन है इतना गरूरवाला ? अगर उसे नानी से बातें करनी हों तो उसे उधर बुलाने की क्या जरूरत है ? वह क्या इधर आ नहीं सकता ?
वह आदमी बोला, ‘‘मुझे यह कहकर निकले पाँच साल हो चुके कि अब इस घर में पैर न रखूँगा। वह तो कभी नहीं होगा माँ।’’
नानी उसे डाँट क्यों नहीं रही ? हमेशा गरजनेवाली नानी उस गरूरवाले के सामने गिड़गिड़ा रही थी, ‘‘मेरे पेट की जनमी है ? मैं कैसे उसे मार डालूँ ?’’
उसका जवाब अप्पू की समझ में नहीं आया।
नानी ने कहा, ‘‘और जब तक मैं जिन्दा हूँ कम से कम तब तक...’’
‘‘उसके बाद इतना भी नहीं होगा।’’ उसका चिल्लाना जारी रहा, ‘‘ये सब सीख तुम्हें बेटी को पहले से देनी चाहिए थी।’’
इस बीच उसने अप्पू की तरफ देखा। अप्पू को उसकी नजर जरा गड़बड़-सी लगी। मौका पाकर बच्चों का गला घोंटकर थैली में बाँधकर ले जाने वाले उस साधु की नजर से भी वह इतना नहीं डरा था। यह भी गला घोंटनेवाला है क्या ?
वह चुपके से बरामदे की ओर बढ़ा। दीदी अन्दर चली गयी थी। रसोई के पिछवाड़े के दरवाजे पर खड़ी दीदी केले के बाग की ओर देख रही थी। आँचल थाम कर अप्पू ने पूछा, ‘‘दीदी, फाटक पर खड़ा आदमी कौन है ?’’
शायद दीदी ने उसकी बात नहीं सुनी।
‘‘फाटक पर कौन खड़ा है दीदी ?’’
दीदी कुछ कहने जा रही थी। लेकिन बोली नहीं।
‘‘बोलो, कौन है दीदी...’’
‘‘वह..’’
‘‘गला घोंट देगा क्या ?’’
‘‘कौन ?’’
‘‘वह आदमी...बच्चों का गला घोंटनेवाला तो नहीं है ?’’ लगा कि दीदी का दम घुट रहा है।
‘‘वह...तो, तेरे मामा हैं रे।’’
यह तो नया तमाशा हुआ। मामा होकर क्या ऐसा ही करना चाहिए था उसे ? फाटक पर आकर धीरे से नानी को बुलाना, फिर डराने के लिए अप्पू की ओर घूरना...अजीब मामा है यह।
शायद दीदी ने यों ही कहा हो।
‘‘क्या यह सच है दीदी ?’’
‘‘हाँ !’’
‘‘मामा इधर क्यों नहीं आते ?’’
दीदी ने उसका जवाब नहीं दिया।
‘‘मामा नहीं आएँगे क्या ?’’
और भी कुछ पूछना चाहता था। लेकिन उसने देखा कि दीदी आँखें पोंछ रही थी। यह दीदी तो पागल है...
तब नानी अन्दर आयी। नानी को देख अप्पू घबरा गया। नानी रो रही थी। साथ-साथ कुछ बड़बड़ा भी रही थी। अप्पू को भी गम हुआ। कितनी ही गालियाँ क्यों न दे वह, है तो उसकी अपनी नानी।
हिम्मत बाँधकर वह बाहर निकला और फाटक की ओर नजर दौड़ायी। मामा जा चुके थे।
एक मामा का होना अच्छा है। लेकिन इस तरह घूरकर डराना नहीं चाहिए। फाटक तक आकर नानी को भला-बुरा कहकर रुलाना नहीं चाहिए।
पछाँही के घर की जानू के भी एक मामा थे। वे सात समुन्दर पार दूर कहीं रहते थे। वहाँ रेशमी कपड़े और खूबसूरत छाते बहुत थे। वे जब आये थे तो जानू को ये दोनों चीजें मिलीं। छाता बहुत अच्छा था और बहुत हल्का भी। अपनी माँ के साथ मन्दिर जाते समय वह उसे साथ ले लेती। कमीज बड़ी थी इसलिए पेटी में ही रखी थी।
जानू के जो मामा घर पर पड़े रहते थे, उन्होंने उसे अब तक कुछ नहीं दिया है। सात समुन्दर पार के मामा ही उसे ज्यादा पसन्द थे। वे शायद अगले साल भी आएँगे।
अप्पू को अफसोस हुआ कि उसके मामा ऐसे गड़बड़ निकले। दीदी ने बताया कि वे इधर नहीं आएँगे। उनके यहाँ भी वैसा ही छाता मिलेगा क्या ? मिले तो भी वे नहीं लाएँगे। देखा न कैसे घूर रहे थे वह ? नानी तक को रुला दिया। रूठने से ही घर नहीं आते होंगे। लेकिन वे रूठे किससे थे ?
अब की बार आने पर उनसे पूछने की ठान ली थी। लेकिन मामा नहीं आये।
यह मामा रहते कहाँ हैं ? दीदी तो बताती नहीं। जानू भी ऐसे एक आदमी को नहीं जानती। जानू को यकीन ही नहीं होता कि अप्पू के भी एक मामा हैं। चक्कन थोड़ा-बहुत जानता है-नदी किनारे उनकी घर-जायदाद है।
चक्कन कहता है कि उसने देखा है। वह जब उधर से होकर गुजर रहा था उसी समय नये घर पर खपरैल छाया जा रहा था।
‘‘मामा इधर क्यों नहीं आते रे ?’’
‘‘वे झगड़ा करके जो गये हैं।’’
चक्कन भी नहीं जीनता ये झगड़ा किस बात पर हुआ है ?
सोचने पर उसे कुछ भी नहीं सूझता। उसके मन में कई तरह की शंकाएँ हैं जिन्हें वह सुलझाना चाहता है। मगर पूछे किससे ?
अकसर दीदी ही उसकी शंकाएँ दूर करतीं, रात को सोने के लिए लेटते वक्त।
जब तक वह खाना खाता तब तक दीदी उत्तरवाली कोठरी में बिछौना बिछा देती। बिछौने पर लाल रंग की बड़े-बड़े सफेद फूलों वाली पुरानी साड़ी बिछा देती। उस पर लेटना उसे पसन्द है। वह दीदी की साड़ी है।
दीदी की और एक साड़ी है। वह सन्दूक में करीने से रखी हुई है। उसे पहने दीदी को नहीं देखा। सन्दूक खोलने पर खुशबू आती है, केतकी की खुशबू। केतकी की खुशबूदार साड़ी दीदी पहने तो खूब मजा आएगा।
खाना खाते ही अप्पू लेट जाता। लेकिन जब तक दीदी न आती, वह न सोता। रसोई साफ कर बर्तन माँजकर ही दीदी आती थी। दीदी से लिपटकर सोते वक्त वह अपनी शंकाएँ एक-एक करके दीदी के सामने रखता। अकसर वह जानना चाहता है कि जानू ने जो कुछ कहा, वह सब झूठ है कि नहीं।
कभी-कभी वह कितनी झूठमूठ की बातें बनाती है। कह रही थी कि उसके घर के दक्खिन के सर्प देवता के झुरमुट में एक ऐसा साँप है जो नौ बच्चों को निगल चुका है। वह तो निरा झूठ है न ! एक साँप के पेट में इतने सारे बच्चे कैसे समा जाएँगे !
एक बार जानू ने कहा कि उसने ईश्वर को देखा है।
अप्पू के यकीन नहीं हुआ। अप्पू ने तो ईश्वर को नहीं देखा; न चक्कन ने देखा है और न दीदी ने।
जानू कहती है कि उसने रात को ही ईश्वर को देखा। पूजा के लिए आये पाँडे से भी लम्बी ईश्वर की दाढ़ी-मूँछ है। यह जानने के लिए कि वह झूठ तो नहीं बोल रही, अप्पू ने पूछा, ‘‘सिर पर क्या था ?’’
‘‘काहे के सिर पर ?’’
‘‘ईश्वर के ?’’
जानू ने खूब सोच-समझकर जवाब दिया, ‘‘बाल।’’
‘‘फू-फूय...’’ अप्पू चिल्लाया।
‘‘ईश्वर के सिर पर तो मुकुट रहता है।’’
वह तो जानू ने नहीं देखा था। वह झेंप गयी। झूठ बोलने पर भी जानू उसे अच्छी लगती थी। जब वह यहाँ थी तो साथ खेलती थी, अब वह भी चली गयी। जानू को उसके पिता ले गये। वह एक जंगली इलाके में गयी है। समुन्दर पार करना तो नहीं है। समुन्दर पार तो उसके मामा रहते हैं। पिता के साथ जाने पर वह रेलगाड़ी में बैठ सकती है। एक भारी पहाड़ का पेट चीरती हुई रेलगाड़ी चलती है।
जाने के पिछले दिन जानू अप्पू के यहाँ आयी थी। साथ में उसकी माँ भी थी।
‘‘हम कल रेलगाड़ी से जाएँगे।’’
उसने जब यह कहा तो अप्पू के मन में थोड़ी-सी जलन हुई। वह तो बहुत कुछ देख सकेगी। जहाँ वह जा रही है वहाँ शायद रबड़ का गेंद और साइकिल मिलते होंगे।
अप्पू भी कहीं जाना चाहता है। वह जाए तो कहाँ जाए ? कोई ले चले तभी न ?
बड़े टीले पर जहाँ सप्तपर्णी का पेड़ खड़ा था, उसके आगे वह कभी नहीं गया। सात समुन्दर पार के देश, ऊँची पहाड़ियों के सुरंगों से होकर जाने वाली रेलगाड़ी... सुन्दर छाते, रेशमी कपड़ों से भरे उन जगहों के बच्चों को कितना मजा आता होगा।
जानू की माँ ने दीदी से विदा ली। वे दोनों साथ-साथ पढ़ी थीं। जानू की माँ के पास कई साड़ियाँ हैं। वे जानू के पिताजी के साथ कई जगहों पर गयी हैं ! एक और भी मजेदार बात है, जानू के पिताजी को उसकी माँ ‘मुन्नी के पिताजी’ कहती हैं। जब जानू की माँ चली गयी तो दीदी की आँखें भर आयीं थीं।
शायद दीदी भी पहाड़ी सुरंगों को पार करने वाली रेलगाड़ी में कहीं जाना चाहती हो।
दीदी कहीं नहीं जाती। यहाँ तक कि मन्दिर के तालाब पर भी नहीं। घर के कुएँ पर ही नहाती है। फाटकवाले भगवती के मन्दिर का मेला देखने नानी गयी। अप्पू भी गया। फिर भी दीदी नहीं गयी।
‘‘दीदी नहीं चलेगी नानी ?’’
तब नानी बौखला उठी, ‘‘ए, छोकरे, चुप रह...’’
पिछले जेठ के महीने से वह स्कूल जाने लगा था। अब दो महीने के बाद परीक्षा शुरू होगी। उसमें पास होने पर वह दूसरे दर्जे में बैठेगा।
जानू अपने पिताजी के पास पहुँचने के बाद शायद वहीं किसी स्कूल में भर्ती हो जाएगी। वहाँ भी तो स्कूल होंगे। वहाँ हमारे केलू मास्टर जैसे मास्टर लोग भी होंगे क्या ? न होना ही अच्छा। पिटाई से तो बच सकती है।
क्साल में अप्पू का एक दोस्त है-कुट्टिशंकरन। खेत के उस पार उसका घर है। दोनों साथ-साथ स्कूल जाते हैं। केलू मास्टर कभी-कभी कुट्टिशंकरन को ‘कुट्टिच्चातन’ पुकारते थे। यह सुनकर सब हँसते थे। उसके साथ ही यह नाम ठीक ही लगता था। लेकिन केलू मास्टर की मार बर्दाश्त के बाहर थी।
कुट्टिशंकरन ने एक बार उसे एक नीबू दिया।
वह अपने घर से लाया था। उसके यहाँ पिछले दिन कुछ नीबू खरीदे गये थे, उसकी मँझली दीदी की शादी थी।
‘‘शादी में नीबूँ का क्या काम ?’’
‘‘बेवकूफ, तुम यह भी नहीं जानते क्या ?’’
‘‘वह इस तरह बोल रहा था जैसे उसने बहुत शादियाँ देखी हों। शादी के बारे में कुट्टिशंकरन ने सारा ब्यौरा उसके दिया। बहुत से लोग घर आएँगे। पण्डाल में बैठनेवाले बारातियों पर गुलाब जल छिटकते हैं। गुलाब जल खूब खुशबूदार है। बाद में चन्दन और नीबू सबको दिया जाता है।’’
अप्पू को इन बातों पर यकीन नहीं हुआ। अगर साफ कह दे कि यह सब झूठ है तो शायद वह पूछता, ‘‘क्या तुमने शादी देखी भी है ?’’
तब मानना पड़ता कि नहीं देखी है।
कुट्टिशंकरन को तसल्ली देने के लिए अप्पू ने कहा, ‘‘मेरे यहाँ जब दीदी की शादी होगी तब तुझे भी नीबू दूँगा।’’
मगर कुट्टिशंकरन कह रहा था, ‘‘तुम्हारी कोई दीदी कहाँ है ?’’
यह सुनकर अप्पू को काफी गुस्सा आया। उसे चार बार ‘कुट्टिच्चातन’ कहकर कनपटी पर चमाचा लगाने का मन हुआ। कुट्टिशंकरन उससे भी मोटा-तगड़ा है। इसलिए ऐसा नहीं किया।
‘‘मेरी दीदी फिर कौन है रे ?’’
‘‘अरे बुद्धू ! वह तो तेरी माँ है।’’
तब कुट्टिशंकरन की मूर्खता पर उसे हँसी आयी। इस उल्लू को केलू मास्टर ने ‘कुट्टिच्चातन’ सही नाम दिया है।
‘‘जा, तुझको खाक आता है।’’
‘‘फिर तू आया बड़ा जाननेवाला-मेरी माँ कह रही थी।’’
‘‘तेरी माँ क्या जाने !’’
फिर दोनों में झगड़ा शुरू हुआ। कुट्टिशंकरन ने नीबू वापस माँगा। नीबू उसके सामने फेंककर अप्पू ने नाक-भौं सिकोड़ी।
स्कूल से लौटते वक्त उसने सोचा, दीदी मेरी माँ कैसे हो सकती है ? उसके कोई माँ-बाप नहीं हैं। उसके तो दीदी और नानी हैं, बस। नानी की क्या बिसात ? छोकरे ऐसा मत कर...वैसा मत कर-तेरे जनमते ही...
उसे बस दीदी काफी है। फिर उस अच्छी दीदी को माँ कहने वाले कुट्टिच्चातन को क्या किया जाए ?
उसे माँ नहीं चाहिए।
माँ होती है तो क्या-क्या मुसीबतें झेलनी पड़ती हैं, ये सब वह देखता रहता था। दीदी की माँ है न नानी ? क्या दीदी को वह कभी चैन से बैठने देती है ?
पिछले चार-पाँच दिनों से दीदी दिन-रात रोती रहती है। नानी अब गाली नहीं देती।
दीदी भी कैसी पगली है...
दीदी अप्पू से नाराज नहीं होती। रात को सटकर लेटते समय दीदी ने बहुत कुछ कहा। कोई कहानी तो नहीं। कहानी सुनना ही अप्पू को पसन्द है। दीदी को कई कहानियाँ आती हैं। रत्न ढूँढ़ निकालने वाले राजकुमार की कहानी। उसको सुनने के बाद ही रत्न मिलने पर उसे छिपाने की तरकीब उसे सूझ पड़ी। रत्न को गोबर से ढँका जाय तो उसकी चमक बाहर दिखाई नहीं पड़ती। फिर पत्थर बन जाने वाली राजकुमारी की कहानी। जिन्दा करने के लिए बच्चे की बलि चढ़ाकर पत्थर पर खून डालने की बात सुनकर उसे रोना आया।




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