परिश्रम का महत्व - रामगोपाल वर्मा Parisram Ka Mahattva - Hindi book by - Ram Gopal Verma
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परिश्रम का महत्व

रामगोपाल वर्मा

प्रकाशक : एम. एन. पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर प्रकाशित वर्ष : 2001
पृष्ठ :44
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4474
आईएसबीएन :0000

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इसमें बौद्धिक एवं हास्य 13 कहानियों का वर्णन किया गया है।

Parishram Ka Mahatva-A Hindi Book by Ramgopal Varma

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

परिश्रम का महत्व

रात का समय था। ऊँट अपने घर से भाग निकला। वह भागता गया, भागता गया। दिन निकला तो उसे पता चला कि वह जंगल में है। यहाँ मालिक नहीं आ सकता अब वह धीरे-धीरे चलने लगा। एक तालाब आया। उसने तालाब में से पानी पिया। थोड़ी देर आराम किया। वह फिर चलने को हुआ तो उसे आवाज आई-‘रुक जाओ’। उसने समझा मालिक आ गया। वह भागने लगा। आवाज़ फिर आई-‘रुक जाओ’ ऊँट भाई। और आगे मत जाओ।’

ऊँट रुक गया, ऊँट ने देखा कि उसके ऊपर एक कौआ उड़ रहा है। कौए ने कहा, ‘मैने ही तुम्हें रोका है, ऊँट भाई। आगे भयानक जंगल है। थोडा और चलोगे तो एक नाला आ जाएगा। उस नाले के पार एक शेर रहता है। मारे जाओगे।’ ऊँट ने लंबा सांस खींचा। वह बोला, ‘‘कौए भाई तुम मेरे सच्चे मित्र हो। तुमने मेरी जान बचाई। तुम न रोकते तो मेरा काम तमाम हो जाता। शेर मुझे मारकर खा जाता।’

कौए ने कहा, यहीं रहो इसी पेड़ के नीचे। मैं भी इसी पेड़ पर रहता हूँ। आगे नाला गहरा है। उसमें पानी है। इसलिए कोई जंगली जानवर इधर नहीं आता। यहाँ किसी का डर नहीं है।

ऊँट और कौए दोनों मित्र बन गए। ऊँट आस-पास से हरी पत्तियाँ खाता, तालाब का पानी पीता और पेड़ की छाया में आराम करता। ऊँट कौए को देखकर बोला, ‘मित्र तुम्हारा जीवन कितना अच्छा है तुम जहाँ चाहो उड़ते हो। हम तो बँधे रहते हैं, मालिक के डँडे खाते हैं। दिन-रात काम करते हैं।

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