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प्राचीन भारत का सामाजिक एवं आर्थिक इतिहास

शिवस्वरूप सहाय

प्रकाशक : मोतीलाल बनारसीदास पब्लिशर्स प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :519
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4529
आईएसबीएन :81-208-2384-8

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प्राचीन भारत का सामाजिक आर्थिक इतिहास...

pracheen bharat ka samajik evam aarthik Itihas

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

आमुख

समाज और जीवन अन्योन्याश्रित हैं। समाज के विकास की कथा एक गम्भीर विवेचन है। उसमें भी हिन्दू समाज, जिसके मूल्य परम्परा से आज भी शाश्वत हैं, भले ही समय के प्रवाह ने इसके स्वरूप को परिवर्तित किया है। इसी अक्षुण्य परम्परा की लीक की खोज इस ग्रंथ का उद्देश्य है। समय की मांग के अनुसार अपने द्वितीय संस्करण के परिवर्द्धत रूप में विषय की गहराई तक यह पाठक को भले ही न ले जा सके पर उसके तट पर पहुंचाना ही सामाजिक ऋण को उतारने की दिशा में एक बढ़ता चरण होने से मैं अपने को कृतार्थ मानूँगा।


डॉ. शिवस्वरूप सहाय

प्रस्तुत संशोधित संस्करण


हिन्दी भाषा में अभी तक किसी प्रामाणिक ग्रंथ के अभाव के कारण इसका पहला संस्करण ‘हिन्दू सामाजिक संस्थाएँ’ शीघ्र ही समाप्त हो गया। अध्यताओं की मांग पर इसमें आर्थिक जीवन जोड़कर हिन्दू सामाजिक संस्थाएँ एवं आर्थिक जीवन नाम से प्रकाशित इसका दूसरा संस्करण तीन वर्षों में ही समाप्त हो गया। इसकी बढ़ती मांग के कारण तथा सिविल सर्विसेज परीक्षा के पाठ्य क्रमानुसार नवीन अध्यायों को जोड़कर अब यह इस नए कलेवर में प्रस्तुत है। पाठकों की संतुष्टि ही लेखक की सफलता होगी।


डॉ. शिवस्वरूप सहाय

अध्याय 1
हिन्दू धर्म के स्रोत


हिन्दू धर्म के स्रोतों को निर्धारित करने के पूर्व यह जानना आवश्यक है कि हिन्दू और धर्म शब्दों का क्या अभिप्राय है ? जब तक इनके वास्तविक अर्थ से हम परिचित नहीं हो जाते तब तक धर्म के स्रोतों का निर्धारण बड़ा ही जटिल है। ‘हिन्दू’ शब्द का प्रयोग हम दैनिक व्यवहार में करते हैं। उन्हीं लोगों को हम हिन्दू कहते हैं जो भारत के रहने वाले हैं, चाहे वे किसी भी जाति या भारत में विकसित किसी भी धर्म का अनुसरण करते हों। इस प्रकार यह शब्द अपनी परिधि में बड़ा ही व्यापक अर्थ रखता है। भारतीय धर्मों के किसी भी एक सम्प्रदाय का मानने वाला चाहे वह कभी विदेशी ही क्यों न रहा है तो वह हिन्दू शब्द से सम्बोधित किया जाता है। इसीलिए जितने भी विदेशी आक्रमणकारी भारत में आक्रामक होकर आये और यहाँ बस गये जैसे वख्त्री यवन, सीथियन, पार्थियन आदि उनके नाम के आगे विदेशियों ने ‘इण्डो’ शब्द जोड़ दिया जिसका अर्थ है-हिन्दू भारतीय। ये विदेशी आक्रामक जो भारत में बसे पूर्ण भारतीय बन गये जिससे इनको भी पीछे हिन्दू नाम से ही सम्बोधित किया जाने लगा। इनका अलग अस्तित्व समाप्त हो गया।

ऊपर धर्म शब्द का प्रयोग बार-बार हुआ है अतः ‘धर्म’ का अर्थ जानना आवश्यक है। धर्म शब्द की व्युत्पत्ति ‘धृ’ धातु से हुई है जिसका अर्थ है-रक्षा करना तथा धारणा करना।1 यही धर्म का शाब्दिक अर्थ है। किन्तु जब हम इसका व्यावहारिक अर्थ लेते हैं तो वे सभी धार्मिक क्रियाएँ जो हमारे जीवन में समाहित होती हैं धर्म की ही परिधि में आती हैं। साथ ही जो कुछ भी सामाजिक, राजनीतिक आर्थिक आदि क्रियाएँ जीवन में होती हैं उन्हें भी धर्म के अन्तर्गत ही परिगणित किया जाता है। इनके अतिरिक्त वे सम्पूर्ण कर्मकाण्ड एवं बाह्य क्रियाएँ जिनसे हमारी आत्मशुद्धि होती है, वे भी धर्म की ही सीमा में आती है।2 इस प्रकार धर्म के दो अर्थ हैं-संकुचित और व्यापक। धार्मिक क्रियाएँ इसके संकुचित अर्थ की द्योतक हैं और जीवन व्यापार की व्यावहारिक क्रियाएँ व्यापक अर्थ की। इसीलिए स्मृतिकारों तथा अन्य धर्मशास्त्रकारों ने भी धर्म के दो स्वरूप बताये। हैं-श्रौत और स्मार्त। श्रौत से अभिप्राय श्रुति में वर्णित धर्म से है। श्रुतु में धर्म का प्रयोग धार्मिक भावनाओं और कर्मकाण्डों के संदर्भ में हुआ है। अतः यहाँ धर्म का प्रयोग संकुचित अर्थ में है जबकि स्मृतियों के वर्ण्य विषय जीवन के विविध क्रिया व्यापारों और पहलुओं से सम्बन्धित हैं। यह दूसरा पक्ष पूर्णतया सामाजिक है जिसका अध्ययन हम समाज के संदर्भ में करते हैं।

सामाजिक जीवन के अध्ययन के पूर्व धर्म के दूसरे पक्ष के स्रोतों का ज्ञान तथा समाज के संदर्भ में उनका सापेक्षित महत्त्व जानना आवश्यक है जिससे ज्ञात हो सके कि समाज में किस स्रोत को कब और कितनी प्राथमिकता दी गई तथा इन्होंने समाज के स्वरूप को परिवर्तित करने में कितना योगदान दिया।
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1.    History of Dharmashastra, Vol. 1 Part 1, Dr Kane p. 1-4
2.    आपास्तम्ब धर्मसूत्र 1/1/2-3

प्रकार



हिन्दू धर्म के स्रोतों को निश्चिय करते समय ज्ञात होता है भिन्न-भिन्न प्रकार से इसका विवेचन किया गया है। इससे यह प्रतीत होता है कि जैसे-जैसे समय बीतता गया और लोगों का विवेक विकसित होता गया वैसे-वैसे स्रोतों में भी वृद्धि होती गई और नई रचनाएँ समाज को प्रभावित करती रही।

आपस्तम्ब धर्म-सूत्र में वर्णित धर्म के स्रोतों में वेद को ही सर्वाधिक महत्ता दी गई है।1 इसके बाद गौतम ने वेद, स्मृति एवं शील तीनों को ही धर्म का प्रमाण बताया है।2 याज्ञवल्क्य ने इसको और विस्तृत करते हुए कहा कि श्रुति, स्मृति, सदाचार जो स्वयं को प्रिय लगे और सम्यक् संकल्प ये पाँचों ही धर्म के स्रोत हैं। इसी तालिका में पुराणों को भी सम्मिलित किया गया।3 इनके अतिरिक्त मीमांसा, न्याय और निबन्ध सम्बन्धी जो ग्रन्थ पीछे लिखे गये। उनमें भी सामाजिक व्यवस्था का कुछ विवरण प्राप्त है। अतएव इन्हें भी हम साधन रूप में स्वीकार कर सकते हैं समाज का विवेक साधारण व्यक्तियों के हाथ में न होकर श्रेष्ठ पुरुषों के हाथ में होता है जिन्हें हम युगपुरुष कहा करते हैं। इसका कारण यह है कि परिस्थितियों के बदलने पर उन्हीं की क्रियाएँ युग प्रमाण मानी जाती हैं। जनता उन्हीं की क्रियाओं का अनुकरण करती है। अतएव श्रेष्ठ पुरुषों का आचरण भी समाज के लिए धर्म बन जाता है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक गाँव की, वर्तमान सभा जिस प्रकार तात्कालिक परिस्थितियों पर आज निर्णय देती है उसी प्रकार प्राचीन काल में, परिषदें होती थीं जो धर्म के सम्बन्ध में नवीन परिस्थितियों में निर्णय देती थीं। अतएव इन्हें भी स्रोतों की कोटि में सम्मिलित किया जा सकता है।

इस प्रकार ऊपर के विवेचन के आधार पर धर्म के स्रोतों में क्रम से-श्रुति, स्मृति, सदाचार, आत्मनः प्रिय सम्यक् संकल्प पुराण, मीमांसा, निबन्ध और न्याय श्रेष्ठ पुरुष का आचरण तथा परिषद को स्वीकार किया जा सकता है।

विविध स्रोत


1.  श्रुति-

धर्मशास्त्र के लेखकों ने श्रुति को धर्म का सबसे महत्त्वपूर्ण स्रोत माना है। स्मृतियों, धर्मसूत्रों, मीमांसा, ग्रंथों, निबन्धों महापुराणों में जो कुछ भी कहा गया है वह श्रुति की महती मान्यता को स्वीकार करके ही कहा गया है ऐसी धारणा सभी प्राचीन धर्मग्रन्थों में मिलती है। अपने प्रमाण के लिए ये ग्रन्थ श्रुति को ही आदर्श बताते हैं तथा इसकी ओर पूर्ण श्रद्धा एवं निष्ठा रखते हैं। वे इसके अनुशासनों को समुचित स्थान देते हुए ही अपने निर्णयों को व्यक्त करते हैं। इस मान्यता का कारण यह है कि ‘श्रुतु’ ब्रह्मा द्वारा निर्मित है’ यह भावना जन सामान्य में प्रचलित है चूँकि सृष्टि का नियन्ता ब्रह्मा है इसीलिए उसके मुख से निकले हुए वचन पुर्ण प्रमाणिक हैं तथा प्रत्येक नियम के आदि स्रोत हैं, ऐसा मानना स्वाभाविक है। इसकी छाप प्राचीनकाल में इतनी गहरी थी कि वेद शब्द श्रद्धा और आस्था का द्योतक बन गया। इसीलिए पीछे की कुछ शास्त्रों को महत्ता प्रदान करने के लिए उनके रचयिताओं ने उनके नाम के पीछे वेद शब्द जोड़ दिया। सम्भवतः यही कारण है कि धनुष चलाने के शास्त्र को धनुर्वेद तथा चिकित्सा विषयक शास्त्र को आयुर्वेद की संज्ञा दी गई है। महाभारत को भी पंचम वेद इसीलिए कहा गया है कि उसकी महत्ता को अत्यधिक बल दिया जा सके। सामान्यता व्यक्ति के सामाजिक जीवन
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1.    धर्मज्ञसमयः प्रमाणं वेदश्च। आप.ध.सू., 1/1/2-3
2.    वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्धिदाम्। गौ.ध.सू. 1/1/1-2
3.    याज्ञवल्क्यस्मृति, 1/13

में भी वेद के प्रति इसी आस्था का भाव बना है। इसका स्पष्ट उदाहरण है कुन्ती का नियोग स्वीकार करना। कुन्ती नियोग प्रथा के विरुद्ध थी तथा पाण्डु निर्वीर्य थे। वह सन्तान के अभाव में कुन्ती से नियोग द्वारा पुत्र उत्पन्न कराना चाहते थे। अतएव कुन्ती को इसके लिए इतना कहने मात्र से ही अपने विचारों के अनुरूप बना लिया कि वेद के अनुसार पति की इच्छा का पालन करना ही पत्नी का धर्म है चाहे वह धर्मपरक हो अथवा नहीं। चूँकि मैं यह चाहता हूँ इसलिए तुम इसे करो।’1 इसका परिणाम यह हुआ कि कुन्ती ने नियोग द्वारा क्षेत्रज पुत्र उत्पन्न किया। डॉ.अल्तेकर के विचार में यहाँ पाण्डु ने वेद के वचन को मात्र इसलिए उद्धृत किया कि नियोग की प्रथा कुन्ती के लिए अरुचिपूर्ण होने पर भी वह वैदिक मान्यताओं के कारण से स्वीकार कर ले।2

इसीलिए वेद में वर्णित बहुत-सी प्रथाएँ चिर अतीत से वर्तमान काल तक अपने उसी रूप में समाज में विद्यमान हैं यथा औरस पुत्र की महत्ता, गांधर्व आसुर विवाह, दाय का बँटवारा बहनों में न होना आदि। धर्मशास्त्रों में वर्णित अनेक विषय और उनका निर्णय भी ठीक वैसा ही है जैसा श्रुति से ज्ञात होता है। फिर भी धर्मशास्त्रों स्मृतियों आदि में वर्णित बहुत से विषय यथा-वर्ण, आश्रम प्रायश्चित्त, पंचमहायज्ञ संस्कार ऋण आदि का उल्लेख श्रुति में बिल्कुल ही नहीं है।
अतः यह विवादास्पद है कि जब सूत्र-ग्रन्थ और स्मृतियाँ वेद की ही मान्यता को स्वीकार करके चलती हैं तो श्रुतुयों से इतर जो कुछ भी उनमें वर्णित है उसकी मान्यता का क्या आधार है ? इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि श्रुति का अधिकार यद्यपि सर्वोपरि है फिर भी जो कुछ दूसरे शास्त्रों में वर्णित है वह भी श्रुति की मान्यता को स्वीकार करते हुए ही कहा गया है इसके अतिरिक्त श्रुति की ही परिधि में ब्राह्मण आरण्यक और उपनिषदों में वर्णित विषयों को भी स्थान दिया गया। इससे श्रुति की परिधि जो केवल संहिताओं तक ही सीमित थी अब विस्तृत हो गई। वैदिक ऋचाओं के साथ वैदिक साहित्य में वर्णित कथा तथा व्याख्या को भी इसमें वही मान्यता दी गई जो श्रुति के मन्त्रों को है जिनसे एक निश्चित विधि का निर्देश मिलता है। आपस्तम्ब ने तो यहाँ तक कहा है कि तथ्य की प्रामाणिकता के लिए स्मृतिकारों को वैदिक मन्त्र उद्घृत करने की कोई आवश्यकता ही नहीं है।

3 जैमिनी के अनुसार वैदिक साहित्य की व्याख्या के आधार पर भी नियम बनाया जा सकता है। इसीलिए तैत्तिरीय संहिता में वर्णित मनु के पुत्रों के बीच बँटवारे की कथा4 को पीछे वैदिक नियम के रूप में स्वीकार कर लिया गया कि पिता के जीवित रहते पुत्रों में बँटवारा हो सकता है। इसी प्रकार नचिकेता की कथा के आधार पर पुत्र के ऊपर पिता के असीमित अधिकार को स्वीकार किया गया।5 वैदिक ऋचाएँ विस्तृत थीं जिनमें से सब वेद में संकलित नहीं की जा सकीं, जैसे यास्त के निरुक्त में कुछ ऐसे ब्राह्मण अवतरणों का संदर्भ दिया है जो सम्पूर्ण वैदिक साहित्य में अप्राप्य हैं। इसका अभिप्राय यह नहीं कि वे वैदिक वाड्मय में थे नहीं वरन वे उनमें संकलित नहीं किये जा सके थे। अतः यह माना जा सकता है कि यदि किसी स्मृति का कोई नियम वेद में अपना साक्ष्य ने रखे तो भी यह मानकर उसे स्वीकार कर लेना चाहिए कि यह भी वैदिक साहित्य के ही आधार पर है। यह बहुत बड़ी छूट विश्वरूप ने दी है।6 कुमारिल ने तो
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1.    भर्ता भार्यां राजपुत्रि धर्म्यंवाऽधर्म्येमेव वा। यद्ब्रूयत्तत्ताया कुर्यादिति वेदविदो विदुः। 1/122-6
2.    Sources of Hindu Dharma-Dr. Altekar, p.6
3.    अथापि नित्यानुवादमविधिमाहुराचार्याः। 2/14/13
4.    3/9/4-5
5.    कठोपनिषद, 1/1
6.    1/7

इसे और सरल बनाने के लिए कहा कि वैदिक साहित्य के उद्धरणों के अभाव में केवल उसका प्रारूप मात्र उल्लिखित करना ही प्रमाण के लिए पर्याप्त है।1
इसीलिए मनुस्मृति में केवल एक स्थान पर ही प्रमाणार्थ वैदिक ऋचा उद्धृत है तथा सूत्र साहित्य में भी बहुत ही कम स्थलों पर वैदिक उद्धरण दिये गये हैं। निबन्धकार यद्यपि अपनी प्रामाणिकता के लिए पुराणों, स्मृतियों महाकाव्यों आदि के अंश उद्धधृत करते हैं पर शायद ही कहीं श्रुति वाक्य उद्धृत किये गये हों। फिर भी श्रुति की महत्ता को वे स्वीकार करते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि सर्वत्र श्रुति ही एकमात्र मूल प्रामाणिक स्रोत नहीं रह गई। इसकी प्रभुता के अभाव का कारण यह है कि वैदिक भाषा पीछे जनसमुदाय के लिए अग्राह्य हो गई थी तथा पुरानी वैदिक पम्पराएँ और वैदिक यज्ञ युग धारा में विलीन हो चुके थे। कुछ ही ऐसे वैदिक विद्वान थे जो मन्त्रों का सही अर्थ लगा सकते थे। अतएव स्मृतिकारों की मान्यताएँ ही, जो जनग्राह्य थीं, प्रामाणिक स्वीकार की जाने लगीं। इस प्रकार अब धर्म के क्षेत्र में भी स्मृति की प्रभुता को ही स्वीकार किया जाने लगा। इसीलिए समकालीन सामाजिक व्यवस्था को भले ही श्रुति से चुनौती न मिली पर इसकी अप्रतिहतमर्यादा फिर भी बनी रही। कभी-कभी ऐसी भी विषम परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं जहाँ दो वैदिक उद्धरण विरोधी विवरण प्रस्तुत करने लगते हैं। इनमें से किसी को भी काटना सम्भव नहीं है क्योंकि दोनों की ही प्रामाणिकता समान हैं। ऐसे अवसरों पर जनरुचि को ही मानने का विधान है।

2.    स्मृति—

मनु के श्रुति तथा स्मृति महत्ता को समान माना है।2 गौतम ने भी यही कहा है कि ‘वेदो धर्ममूल तद्धिदां च स्मृतिशीले।3 हरदत्त ने गौतम की व्खाख्या करते हुए कहा कि स्मृति से अभिप्राय है मनुस्मृति से। परन्तु उनकी यह व्याख्या उचित नहीं प्रतीत होती क्योंकि स्मृति और शील इन शब्दों का प्रयोग स्रोत के रूप में किया है, किसी विशिष्ट स्मृति ग्रन्थ या शील के लिए नहीं। स्मृति से अभिप्राय है वेदविदों की स्मरण शक्ति में पड़ी उन रूढ़ि और परम्पराओं से जिनका उल्लेख वैदिक साहित्य में नहीं किया गया है तथा शील से अभिप्राय है उन विद्वानों के व्यवहार तथा आचार में उभरते प्रमाणों से। फिर भी आपस्तम्ब ने अपने धर्म-सूत्र के प्रारम्भ में ही कहा है ‘धर्मज्ञसमयः प्रमाणं वेदाश्च’।
छठी शताब्दी ई.पू. के पहले सामाजिक धर्म वेद एवं वैदिक-कालीन व्यवहार तथा परम्पराओं पर आधारित था। आपस्तम्ब धर्म-सूत्र के प्रारम्भ में ही कहा गया है कि इसके नियम समयाचारिक धर्म के आधार पर आधारित हैं।4 समयाचारिक धर्म से अभिप्राय है सामाजिक परम्परा से। सब सामाजिक परम्परा का महत्त्व इसलिए था कि धर्मशास्त्रों की रचना 600 ई.पू. के बाद हुई।

पीछे शिष्टों की स्मृति में पड़े हुए परम्परागत व्यवहारों का संकलन स्मृति ग्रन्थों में ऋषियों द्वारा किया गया। इसकी मान्यता समाज में इसीलिए स्वीकार की गई होगी कि जो बातें अब तक लिखित नहीं थीं केवल परम्परा में ही उसका स्वरूप जीवित था, अब लिखित रूप में सामने आईं। अतएव शिष्टों की स्मृतियों से संकलित इन परम्पराओं के पुस्तकीकृत स्वरूप का नाम स्मृति रखा गया। पीछे चलकर स्मृति का क्षेत्र व्यापक हुआ। इसकी सीमा में विभिन्न धार्मिक ग्रन्थों—गीता, महाभारत, विष्णुसहस्रनाम की भी गणना की जाने लगी। शंकराचार्य ने इन सभी ग्रन्थों को स्मृति ही माना है। गृह्यसूत्रों को इसीलिए इसमें
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1.    निरुक्त, 1/7
2.    वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम्। 2/6
3.    1/1/2
4.    अर्थात् समयाचारिकान्धर्मान् व्याख्यास्यामः। 1/1/10
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परिगणित नहीं किया गया कि ये संस्कारों का वर्णन केवल उनके धार्मिक पक्ष से ही करते हैं न कि सामाजिक-धार्मिक दृष्टि से।
स्मृति की भाषा सरल थी, नियम समयानुसार थे तथा नवीन परिस्थितियों का इनमें ध्यान रखा गया था। अतः ये अधिक जनग्राह्य तथा समाज के अनुकूल बने रहे। फिर भी श्रुति की महत्ता इनकी अपेक्षा अत्यधिक स्वीकार की गई। परन्तु पीछे इनके बीच संधि स्थापित करने के लिए वृहस्पति ने कहा कि श्रुति और स्मृति मनुष्य के दो नेत्र हैं। यदि एक को ही महत्ता दी जाय तो आदमी काना हो जाएगा। अत्रि ने तो यहाँ तक कहा कि यदि कोई वेद में पूर्ण पारंगत हो स्मृति को घृणा की दृष्टि से देखता हो तो इक्कीस बार पशु योनि में उसका जन्म होगा।2 वृहस्पति और अत्रि के कथन से इस प्रकार यह स्पष्ट है कि वेद के समान स्मृति की भी महत्ता अब स्वीकार की गई।

पीछे चलकर सामाजिक चलन में श्रुति के ऊपर स्मृति की महत्ता को स्वीकार कर लिया गया जैसे दत्तक पुत्र की परम्परा का वेदों में जहाँ विरोध हैं वहीं स्मृतियों में इसकी स्वीकृति दी गई है। इसी प्रकार पञ्चमहायज्ञ श्रुतियों के रचना काल की अपेक्षा स्मृतियों के रचना काल में व्यापक हो गया। वेदों के अनुसार झंझावात में, अतिथियों के आने पर, पूर्णिमा के दिन छात्रों को स्वाध्याय करना चाहिए क्योंकि इन दिनों में सस्वर पाठ करने की मनाही थी। परन्तु स्मृतियों ने इन दिनों स्वाध्याय को भी बन्द कर दिया। शूद्रों के सम्बन्ध में श्रुति का यह स्पष्ट निर्णय है कि वे मोक्ष नहीं प्राप्त कर सकते हैं परन्तु उपनिषदों ने शूद्रों के ऊपर से यह बन्धन हटा दिया एवं उनके मोक्ष प्राप्ति की मान्यता स्वीकार कर ली गई। ये सभी तथ्य सिद्ध करते हैं कि श्रुति की निर्धारित परम्पराओं पर स्मृतियों की विरोधी परम्पराओं को पीछे सामाजिक मान्यता प्राप्त हो गई। स्मृतियों की इस महत्ता का कारण बताते हुए मारीचि ने कहा है कि स्मृतियों के जो वचन निरर्थक या श्रुति विरोधी नहीं हैं वे श्रुति के ही प्रारूप हैं। वेद वचन रहस्मय तथा बिखरे हैं जिन्हें सुविधा में स्मृतियों में स्पष्ट किया गया है।3 आगे यह भी कहा गया है कि स्मृति वाक्य परम्पराओं पर आधारित हैं अतः इनके लिए वैदिक प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। इनकी वेदगत प्रामाणिकता स्वतः स्वीकार्य है। वैदिक भाषा जनमानस को अधिक दुरूह प्रतीत होने लगी थी, जबकि स्मृतियाँ लौकिक संस्कृत में लिखी गई थीं जिसे समाज सरलता से समझ सकता था तथा वे सामाजिक व्यवस्था के अनुरूप सिद्धांतप्रतिपादित करती थीं। स्मृति लेखकों को भी वैदिक महर्षियों की तरह समाज ने गरिमा प्रदान की थी। वैदिक और स्मृति काल के बीच व्यवहारों तथा परिस्थितियों के बदलने से एवं विभिन्न आर्थिक कारणों और नवीन विचारों के समागम से स्मृति को श्रुति की अपेक्षा प्राथमिकता मिली। इसका कारण यह भी बताया जा सकता है कि समाजशास्त्रीय मान्यता के पक्ष में था। इन सब कारणों से श्रुति की मान्यता को स्मृतियों की मान्यता के सम्मुख 500 ई. से महत्त्वहीन समझा जाने लगा।

पर यह बड़ी विचित्र बात है कि बहुत बड़ी संख्या में स्मृतियों की रचना की गई। यह क्रम भी एक लम्बी अवधि तक चलता रहा। इसका कारण यह था कि अलग-अलग स्थानों पर प्रचलित परम्पराओं और एक ही स्थान पर भिन्न-भिन्न समयों पर बदलती परिस्थितियों को मान्यता देने के लिए विभिन्न क्षेत्रों में तथा एक ही क्षेत्र में विभिन्न स्मृतियों की रचना की गई। किसी स्थान विशेष में उत्पन्न होने वाली
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1.    श्रुतिस्मृती हि विप्राणं चक्षुषी परमे मते। काणस्तत्रैकया हीनो द्वाभ्यामन्धः प्रकीर्तितः।
2.    5/74
3.    दुर्बोधा वैदिकाः शब्दाः प्रकीर्णत्वाच्च ये खिलाः।
4.    तज्जैस्त एव स्पष्टार्थाः स्मृतितन्त्रे प्रतिष्ठिताः। स्मृ.चं., आ., पृ. 3
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विशिष्ट समस्या के निवारणार्थ भी कुछ स्मृतियाँ लिखी गई जैसे देवल स्मृति सिन्धु पर मुसलमानी आक्रमण के कारण उत्पन्न धर्म परिवर्तन की समस्या के निवार्णार्थ लिखी गई थी। दूसरे आर्थिक व्यवस्था में भी परिवर्तन होने से स्मृतियों की रचना हुई यथाः अलग-अलग स्मृतियों ने दायभाग तथा मिताक्षरा को जन्म दिया। तीसरे जैसे-जैसे परम्पराएँ बदलती गई स्मृतियों की संख्या बढ़ती गई क्योंकि पुरानी परम्परा की पोषक स्मृतियों के स्थान पर नवीन परम्परा की पोषक स्मृतियों की रचना की गई।

अतएव अलग-अलग समय के लिए अलग-अलग स्मृतियाँ प्रमाण बनी। इनमें भी पुराने स्मृतिकारों को विशेष मान्यता मिली क्योंकि मनु ने कहा है कि जो स्मृतियाँ मनुस्मृति के विरोध में हैं, वे त्याज्य हैं। पराशर स्मृति में भी स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यह स्मृति कृतयुग के लिए प्रमाण है, गौतम त्रेता के लिए शंखलिखित द्वापर के लिए और पराशर कलि के लिए।1
प्रायः ऐसी भी परिस्थितियाँ उत्पन्न होती थीं, जब परस्पर स्मृतियों में विरोध उत्पन्न होता था। ऐसे अवसर के लिए गोभिल ने कहा है कि जनरुचि को मान्यता दी जानी चाहिए2




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