भारतवर्ष में विवाह एवं परिवार - के. एम. कापड़िया Bharatvarsh Mein Vivah Evam Parivar - Hindi book by - K. M. Kapadiya
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भारतवर्ष में विवाह एवं परिवार

के. एम. कापड़िया

प्रकाशक : मोतीलाल बनारसीदास पब्लिशर्स प्रकाशित वर्ष : 2000
पृष्ठ :309
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4539
आईएसबीएन :81-208-2200-5

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हिन्दू विवाह एवं परिवार का विस्तृत अध्ययन...

Bharatvarsh Mein Vivah Evam Parivar a hindi book by K. M. Kapadiya) : भारतवर्ष में विवाह एवं परिवार - के. एम. कापड़िया

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रस्तुत पुस्तक हिन्दू विवाह एवं परिवार के विस्तृत अध्ययन का एक प्रयत्न है। इसमें देश के विभिन्न भागों में विवाह एवं परिवार पर पड़े सांघातिक प्रभावों का विशद विवेचन किया गया है।
समाज-शास्त्र और विशेषतया भारतीय समाज-शास्त्र के प्रांगण में प्रस्तुत पुस्तक अपना एक अद्वितीय स्थान रखती है। भारतीय संस्थाओं (परिवार तथा विवाह) की वैज्ञानिक विवेचना करने वाली यह एक मात्र पुस्तक है और इसमें भारतीय संस्थाओं का आद्योपांत सारगर्भित व्यवस्थित विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। पुस्तक के आंग्ल-संस्करणों तथा विभिन्न पाठ्य व अपाठ्य पुस्तकों में दिये गये इसके प्रचुर उद्धरणों ने इसकी उपयोगिता को और भी बढ़ा दिया है। विभिन्न देशीय तथा विदेशीय विश्वविद्यालयों ने समाज-शास्त्र के पाठ्यक्रम में भारतीय समाज-शास्त्र के अध्ययन के लिए इस पुस्तक को उचित स्थान देकर शास्त्रीय ग्रंथों की श्रेणी में खड़ा किया है। प्रस्तुत अनुवाद हिन्दी भाषा-भाषी लोगों की दीर्घकालीन माँग की पूर्ति करने का एकमात्र सफल प्रयास है।

निवेदन


पिछले कुछ वर्षों से अधिकांश भारतीय विश्वविद्यालयों द्वारा स्नातक तथा स्नातकोत्तर परीक्षाओं हेतु हिन्दी माध्यम के अपनाए जाने के कारण इस माध्यम वाले विद्यार्थियों में आश्चर्यजनक वृद्धि हुई है। यह वृद्धि भारतीय विद्यार्थियों के हिन्दी के प्रति आन्तरिक अनुराग को प्रकट करती है। अतः विभिन्न भाषाओं, विशेषताओं आंग्ल भाषा में लिखी हुई प्रामाणिक तथा शास्त्रीय पुस्तकों का हिन्दी अनुवाद वांछनीय हो गया है। जनसाधारण को भाषा के माध्यम द्वारा ज्ञानार्जन सुलभ व संभव ही नहीं हो जाता है। अपितु अर्जित ज्ञान के प्रसारण व हस्तन्तारण में भी सहायता मिलती है। स्वतन्त्र भारत के संविधान में हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में पदासीन कर केवल हिंदी भाषा-भाषी क्षेत्रों में इसका प्रवचन बढ़ा है अपितु आहिन्दी क्षेत्रों में भी हिंदी के प्रति अनुराग बढ़ा है।

हिन्दी माध्यम वाले विद्यार्थियों की उत्तरोत्तर वृद्धि ने अहिन्दी भाषा में लिखी हुई शास्त्रीय पुस्तकों के अनुवाद की एक भारी मांग प्रस्तुत की। प्रस्तुत अनुवाद भी इस मांग की पूर्ति का एक लघु प्रयास है। समाज-शास्त्र और विशेषता भारतीय समाज शास्त्र के प्रांगण में प्रस्तुत अपना एक अद्वितीय स्थान रखती है। लेखक की इस कृति को भारतीय संस्थाओं (परिवार तथा विवाह) की वैज्ञानिक विवेचना करने वाली एकमात्र पुस्तक यदि हम न भी स्वीकार करें तब भी यह कृति भारतीय संस्थाओं का आद्योपांत सारर्भित व्यवस्थित विश्लेषण प्रस्तुत करती है। पुस्तक के आंग्ल संस्करणों तथा विभिन्न पाठ्य व अपाठ्य पुस्तकों में दिये गए इसके प्रचुर उद्धरणों ने इसकी उपयोगिता तथा शिक्षार्थियों का इसके प्रति प्रेम को प्रकट किया है। विभिन्न देशीय तथा विदेशी विश्वविद्यालयों ने समाजशास्त्र के पाठ्यक्रम में भारतीय समाजशास्त्र के अध्ययन हेतु इस पुस्तक को उचित स्थान देकर इस पुस्तक को शास्त्रीय ग्रंथों की श्रेणी में ला खड़ा किया है। मुझे आशा है कि प्रस्तुत अनुवाद हिन्दी भाष-भाषी लोगों की इस पुस्तक की दीर्घकालीन मांग की पूर्ति करने का प्रयत्न करेगा।

अनुवाद सम्बन्धी परिभाषिक शब्दों के लिए आंग्ल भाषा से साम्य रखने वाले उपयुक्त हिन्दी शब्दों का यथासंभव चयन कर यथास्थान प्रयुक्त किया गया है फिर भी कहीं-कहीं पर आंग्ल शब्दों से साम्य रखने वाले हिन्दी शब्दों के अभाव मे बहुप्रचलित शब्दों तथा नवीन शब्दों का प्रयोग किया गया है। आवश्यकतानुसार हिन्दी शब्दों के साथ-साथ उनके आंग्ल शब्द भी कोष्टक में दे दिए गए हैं। मेरा यह प्रथम प्रयास तथा भाषा का अल्पज्ञाप होने के कारण भाषा तथा अनुवाद-शिल्प संबंधी त्रुटियों का रहना सम्भव है। इसके साथ-साथ कहीं पर मुद्रण अशुद्धियाँ भी रह गई हैं जिनमें से प्रमुख उल्लेखनीय पृष्ठ संख्या 101 पर बहुपत्नित्व का साम्य आंग्लशब्द Polygyny के स्थान पर Polygamy तथा पृष्ठ संख्या 144 पर ‘नग्निक’ के स्थान पर ‘नग्रिका’ छप गए हैं, जिसका संशोधन कर लिया गया है। आशा है कि विज्ञ हिन्दी पाठक व हिन्दी भाषा शास्त्री भाषा तथा अनुवाद-शिल्प-संबन्धी त्रुटियों की ओर ध्यान आकर्षित कर मुझे मार्गदर्शन करेंगे।

पुस्तक स्वरूप में उपस्थित करने में कई एक महानभावों ने विभिन्न रूपों में सहयोग दिया है जिन सबका व्यक्तित्व रूप में उल्लेख नहीं किया गया है, मैं उन सभी सहयोगियों के प्रति कृतज्ञ हूं। विशेष रूप में श्री श्री बंशीधर जी जड़िया जिनके मार्गदर्शन में यह प्रथम अनुवाद कार्य सम्पादित किया जा सका। मैं उनके इस अथक कष्ट तथा स्नेह के प्रति हृदय से आभारी हूं। मैं अपने अत्यन्त स्नेही भाणेज श्री कृष्णगोपाल खंडेलवाल एम.ए. (इन्टीट्यूट आफ इकानामिक ग्रोथ देहली) तथा लघुभ्राता कैलाशचन्द्र का भी हार्दिक आभारी हूं जिन्होंने यथास्थान व यथास्वरूप प्रस्तुत अनुवाद कार्य में सहायक कर मुझे कृतार्थ किया। अन्त में, मैं श्री महावीरकुमार जैन जिन्होंने पुस्तक की अनुक्रमणिका तैयार करने में सहयोग दिया तथा व्यवस्थापक-मैसर्स मोतीलाल बनारसीदास जिन्होनें पुस्तक को प्रकाशित करने में तत्परता का परिचय दिया, को भी धन्यवाद दिए बिना नहीं रह सकता।

जुलाई, 1962
आनन्द भवन,
ब्यावर।

अनुवादक
हरिकृष्ण रावत

भूमिका


मेरे प्रारम्भिक हिन्दू सम्बन्ध-व्यवस्था (बन्धुता) के अध्ययन में, मैंने हिन्दू विवाह एवं परिवार के कुछ पहलुओं का वर्णन किया है, लेकिन यह केवल उन संस्थाओं की एक आकस्मिक समीक्षा थी, उस समय तो मेरा प्रमुख ध्येय हिन्दु कानून का उसके सामाजिक संदर्भ का विश्लेषण करना था। यह प्रस्तुत पुस्तक हिन्दू विवाह एवं परिवार के सविस्तार अध्ययन का एक प्रयत्न है।

हिन्दू संस्थाओं के सामाजिक तथा राजनैतिक अनेक ग्रन्थ जो हमारे मात्रा में उन्होंने बौद्ध साहित्य तथा यात्रियों के वर्णनों से लिया है। इस प्रकार के ग्रन्थ अब अकांगी माने जाते हैं। क्योंकि सामाजिक संस्थाओं पर किये गये किसी भी शोध कार्य का उद्देश्य, प्रथमतः, उन प्रतिमानों, में जो हम देश के विभिन्न भागों तथा विभिन्न व्यक्तियों के मध्य पाते हैं तथा वह एकता जो इन प्रतिमानों में अन्तर्निहित है तथा विभिन्नता जो इन्हें अद्धितीय बनाती है, जिसका होना चाहिये। द्वितीय रूप में, हिन्दु से संस्थाओं तथा ब्राह्मण आदर्शों के संदर्भ में उनके विकास के कोई भी अध्ययन में अतिरूचिकर तथा उपदेशपूर्ण पहलू वे है जो राजनैतिक तथा आर्थिक विचार तथा संस्थाओं के गत सौ इससे भी अधिक वर्षों के रूपान्तरों के प्रभाव को प्रदर्शित करे। प्रस्तुत अध्ययन द्वारा देश के विभिन्न भागों में विवाह एवं परिवार पर पड़े इस संघात के प्रभाव को मालूम करने का प्रयत्न किया गया है।

सामाजिक सम्बन्धों को उचित वर्णन उच्च कोटि के शास्त्रीय साहित्य पर आधारित होना चाहिये और संबंधों के प्रतिमानों के परिवर्तन से सम्बन्ध शिक्षा नागरीकरण, आदर्शात्मक, संघर्षों आदि अनेक ऐसे प्रभावों के दबाव में आये हुए हर संभव तथ्यों अर्थशास्त्र विभाग में तैयार किये गये कुछ शोध ग्रंथ उपलब्ध हुए, लेकिन ये केवल समस्त देश में हुए कार्य के कुछ भाग का प्रतिनिधित्व करते हैं और स्वभाव रूप में प्रादेशिक हैं।

मैं इस सत्य से भी सचेत हूँ कि इस पुस्तक में विवाह-संस्कारों पर एक अध्याय होना चाहिये। और चूँकि ये विभिन्न जातियों में विभिन्न रूप से सम्पन्न किये जाते हैं अतः ये ‘लोकाचार’, न परम्परागत विधियां, समाज-शास्त्रीय महत्ता रखती है। इससे सम्बन्धित एकत्रित सामग्री विस्तृत मात्रा में नहीं है, अतः इसके विचार को स्थगित कर दिया गया है।

जब पाण्डुलिपी तैयार की गई थी, उस समय विधान सभा में ‘हिन्दू कोड बिल’ पर वाद-विवाद हो रहा था और इसलिये इस पुस्तक में इस ‘बिल’ पर विचार किया गया है। इस बिल’ ने बाद में ‘हिन्दू विवाह तथा तलाक ‘बिल’ को स्थान दिया जो कुछ अंशो में हिन्दू कोड बिल के नियमों को संशोधित करता है। लेखक ने एक अलग पुस्तिका में ‘हिन्दू तथा तलाक बिल’ की समीक्षा की है लेकिन इसके अत्यावश्यक भिन्नता के विषय ‘हिन्दू कोड बिल’ सहित परिशिष्ट में दिए गये हैं।
अरबी भाषा से अनभिज्ञता भी मेरे प्रस्तुत अध्ययन की परिमिति रही है। हिन्दू संस्थाओं में तो मैं मूल संस्कृत उद्गम स्थान की तह तक पहुँच सकता हूँ, लेकिन मुश्लिम संस्थाओं के वर्णन-विवेचना में मुझे कुरान के आंग्ल अनुवाद तथा कुरान सम्बन्धी अग्रणी अधिकृत मुस्लिम अध्ययनों से संतुष्ट होना पड़ा है। इसी भांति आदिवासी व्यक्तियों के विवाह एवं परिवार के प्रतिमानों के लिये मानवशास्त्रियों तथा अन्य के एकनिष्ठ लेखों (Monographs) से सामग्री लेनी पड़ी है। आदिवासी जीवन सम्बन्धित प्राथमिक सूचना की अतिआवश्यकता है, जो कि उनके भूस्थानों के द्रुत प्रवेशक तथा परिणामः नवीन व्यक्तियों तथा नवीन संस्कृति के आगमन द्वारा, अत्यधिक भार से दबे हुए समाजशास्त्र विभाग के अन्तर्गत किये गये स्नात्कोत्तर परीक्षा और पी.एच.डी उपाधि के कुछ समाजशास्त्री अध्ययन इस प्रक्रिया पर प्रकाश डालते हैं, लेकिन मैं सत्यतः क्षोभ प्रकट करता हूँ कि मुझे स्वयं को क्षेत्र-कार्य करने का अभी तक कोई अवसर नहीं मिला है।

अतः मैं पूर्णरूप से जागरूक हूँ कि यह अध्ययन कई दृष्टिकोण से अपर्याप्त है लेकिन मैं आशा करता हूँ कि यह इस देश के वैवाहिक तथा पारिवारिक प्रतिमानों के विकास को समझने में सहायक होगा। मैं कर्तव्यच्युत हूँगा यदि मैं, अपने लड़के तथा मेरे उन सब विद्यार्थियों जिन्होंने मेरे इस गवेषणात्मक कार्य के आकड़ों के विश्लेषण में सहायता प्रदान की, तथा डॉ. एम. एस. ऐ. राव जिन्होंने मुझे अनुक्रमणिका बनाने में सहायता प्रदान करने की, साथ ही बम्बई विश्वविद्यालय जिसने इस पुस्तक को ‘विश्वविद्यालय समाजशास्त्र ग्रन्थमाला’ के अन्तर्गत छापा, हार्दिक धन्यवाद प्रकट करता हूँ। अन्त में, मैं उन सब के प्रति ऋणि हूँ जिनके कार्यों से अत्यधिक लाभान्वित हुआ हूँ लेकिन जिनका व्यक्तिगत उल्लेख इस पुस्तक में नहीं किया जा सका है।

-के. एम. कापड़िया

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