लाल बहादुर शास्त्री - सी. पी. श्रीवास्तव Lal Bhahadur Shastri - Hindi book by - C. P. Srivastava
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लाल बहादुर शास्त्री

सी. पी. श्रीवास्तव

प्रकाशक : मोतीलाल बनारसीदास पब्लिशर्स प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :358
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4553
आईएसबीएन :81-208-2075-4

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लाल बहादुर शास्त्री का जीवन परिचय

Lal bahadurshastri

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

स्वतंत्र भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री (1904-1966) की जीवन-गाथा एक सामान्य व्यक्ति की असामान्य गाथा है। इस व्यक्ति ने अपने प्रारंभिक जीवन में गरीबी की आग की झुलस को झेलते हुए केवल नैतिक सिद्धान्तों के बल पर असाधारण राजनैतिक ऊँचाई हासिल की। शास्त्री जी अपने पीछे न कोई धन-संपत्ति छोड़ गये, न कोई बैंक-बैलेंस। हाँ, हर तरह के भ्रष्टाचार के बोलबाले वाले आज के माहौल में राजनीति का चक्कर चलाने वालों के लिए एक मिसाल जरूर कायम कर गये। क्या आज का राजनेता इससे कुछ सीखना चाहेगा।
केवल 19 महीने प्रधानमंत्री रहे शास्त्री जी का कार्यकाल सरगर्मियों से भरा, तेज गतिविधियों का काल था। इस काल के दरम्यान राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय अहमियत के कई सामाजिक तथा राजनैतिक मसलों ने सिर उठाया, जिसमें पाकिस्तान के खिलाफ एक बड़ा युद्ध भी शामिल है।

इस सब घटनाओं का विस्तृत विवरण तो इस पुस्तक में है ही, साथ ही ऐसे कई तथ्यों का अन्तर्भाव भी है, जिन्हें पहली बार उजागर करके ठीक ढंग से स्थापित किया गया है।
कई वर्षों तक शास्त्री जी के निजी सचिव रहे लेखक ताशकंद में उनकी मृत्यु तक उनके साथ थे। पाँच साल तक की गहरी खोज, तथ्यों की छानबीन, विभिन्न लोगों के साक्षात्कार, दस्तावेजों का अध्ययन-इन सबका नतीजा है यह विस्तृत, विद्वत्तापूर्ण चरित्रग्रंथ। लेखक ने शास्त्री जी की ताशकंद में हुई रहस्यमय मौत के कारणों की सही जाँच-पड़ताल की दृष्टि से अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर विख्यात चिकित्सा-विशेषज्ञों के साथ भी सलाह-मशवरा किया।

"पुस्तक के लेखक श्री चंद्रिका प्रसाद श्रीवास्तव सेवानिवृत्त आई.ए.एस. अधिकारी हैं, जो भारत सरकार के अनेक विभागों से संबधित थे तथा शास्त्री जी के निजी सचिव भी रह चुके थे। ताशकंद समझौते के दौरान भी वे शास्त्री जी के साथ थे। उन्होंने कई महत्त्वपूर्ण तथ्यों के आधार पर शास्त्री जी की तस्वीर को जीवंत बनाने का प्रयास किया है। जिससे पुस्तक की उपादेयता बढ़ गयी है।"

गाडिव (वाराणसी)

"भारत के राजनीतिक, सामाजिक और साहित्यिक जगत को एक समान गौरवोज्जवल करने वाले शास्त्री जी के जीवन समग्र को दरसाने वाला यह जीवनी ग्रंथ अनुपम भी है और अद्वितीय भी। उत्तम कागज पर शुद्ध मुद्रण और नयनाभिराम कलावरेण्य आवरण न केवल ग्रंथ के विषय गत महत्त्व को बढ़ाता है, अपितु प्रकाशक की गरिमामयी प्रकाशन परंपरा को भी सांकेतित करता है।"

डॉ. श्रीरंजन सूरिदेव,
हिन्दुस्तान, 18मई 2002

आभार


इस चरित्र को लिखने के लिए मैंने कई पुस्तकालयों तथा संस्थाओं से दस्तावेज़ों तथा छायाचित्रों का संकलन किया है। उन सभी के प्रति, विशेषकर, निम्नलिखित संस्थाओं के प्रति मैं अपना धन्यवाद व्यक्त करना चाहता हूँ-नेहरू स्मारक संग्रहालय तथा पुस्तकालय नई दिल्ली : प्रो. रविंद्रकुमार, निदेशक, डॉ. हरिदेव शर्मा, उपनिदेशक, तथा पुस्तकालयाध्यक्ष और उनके सहकर्मी। सूचना तथा प्रसारण मंत्रालय पुस्तकालय, भारत सरकार, नई दिल्ली : पुस्तकालयाध्यक्ष तथा पुस्तकालय के कर्मचारी। आकाशवाणी, नई दिल्ली : महानिदेशक तथा उनके सहयोगी। द सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च, नई दिल्ली :डॉ. वी.ए. पै पणंदीकर, निदेशक तथा उनके सहयोगी। द सर्वेण्ट्स ऑफ द पीपल्स सोसाइटी, नई दिल्ली : श्री सत्यपाल।

द हिंदुस्तान टाइम्स नई दिल्ली : मैंने इस समाचार पत्र से व्यापक रूप से उद्धरण लिये हैं और मैं हिंदुस्तान टाइम्स समूह के मुख्य छाया चित्रकार श्री एन. त्यागराजन के प्रति बहुत ही आभारी हूँ। उन्होंने पुस्तक के मुखपृष्ठ पर प्रकाशित छायाचित्र तथा अन्य छायाचित्रों को उपलब्ध कराया। द फिल्म्स डिवीजन भारत सरकार मुंबई: निदेशक तथा उनके सहयोगी। द लिंडन बेन्स जॉन्सन लाइब्रेरी ऑस्टिन, टेक्सास अमेरिका : डेविड हम्प्रे, प्रमुख अभिलेखाधिकारी; जॉन विलसन, अभिलेखाधिकारी; इटेन पारा, अभिलेखाधिकारी, लिंडा हैनसन, अभिलेखाधिकारी, रेजिना ग्रीनवेल, अभिलाखेधिकारी, क्लाउडिया ऐण्डर्लसन, अभिलेखाधिकारी; तथा जेरेमी डुवेल, कर्मचारी। येल यूनीवर्सिटी, पुस्तकालयाध्यक्ष तथा कर्मचारी। द ब्रिटिश लाइब्रेरी लंदन: पुस्तकालयाध्यक्ष तथा कर्मचारी। द ब्रिटिश लाइब्रेरी न्यूजपेपर क्लार्क जूनियर भारत में अमेरिका के भूतपूर्व राजदूत तथा अमेरिकी दूतावास नई दिल्ली में भूतपूर्व काउंसलर जॉन वॉल्स का मैं बहुत आभारी हूँ, जिन्होंने मेरा परिचय अमेरिका के उपर्युक्त पुस्तकालयों से कराया।

मैं निम्नलिखित उन सभी व्यक्तियों के प्रति कृतज्ञ हूँ, जिन्होंने कई तरह से, आंशिक रूप से इस ग्रंथ को पढ़कर मेरे शोधकार्य में सहायता की है; तथा महत्त्वपूर्ण सुझाव दिये हैं वाशिंगटन के पॉल एलिस और विक्टोरिया बाइलूट; न्यूयॉर्क के ग्रेगॉयर तथा कैथरीन डे कालबरमैटेन, कैरोलीन वैन्स, क्रिस्टीन एगन, मनोज कुमार, गगन अहलूवालिया तथा मिशाइल एफ. फॉसेली; फोर्ट वर्थ टेक्सास के कैप्टेन मंगल सिंह ढिल्लो; इंग्लैंड के डॉ. डेविड स्पाइरो, डॉ. ब्रायन वेल्स, जॉन ग्लोवर, इयान पैराडीन, डॉ. आर.एन. बरजोरी, लुसिंडा कोलमैन, पॉल विंटर, बिल हैनसेल, क्रिस मार्लो, क्रिस फ्लैटमैन; मास्को के महामहिम श्री लिओनिड एम. जामियातिन तथा डॉ. बोडन एम. शोहोवीश; नई दिल्ली के जगदीश कुदेशिया, डॉ. दीपक चुग, डॉ. एस.सी. निगम, श्याम गुप्ता, डॉ. यू. सी. राय, राजीव कुमार, विजय नलगीरकर, किरण वालिया, निर्मल कांता, और हरिकिशन खुराना; मुंबई के राजेश शाह, भगवान कोटक, नरेश कोटक और कृष्ण कोटक; पूना के योगी महाजन, प्रेम वैद्य तथा जगदीश श्रीवास्तव। लाल बहादुर शास्त्री के बचपन के बारे में ठीक-ठीक जानकारी हासिल करने के लिए मैं रामनगर और मिर्जापुर में उनके रिश्तेदारों से मिला। उनकी सहायता के लिए मैं बहुत कृतज्ञ हूँ। वाराणसी में श्री निष्कामेश्वर मिश्र के परिवारवालों से भी मैं मिला। शालेय जीवन में मिश्रजी ने लाल बहादुर की सहायता और मार्गदर्शन में अहम भूमिका अदा की थी।

शास्त्रीजी के जीवन के अत्यंत महत्त्वपूर्ण सृजनशील वर्षों के बारे में विस्तृत वाराणसी में अध्ययन करते रहे-उनके बहुत पुराने और दीर्घकालीन मित्र और सहाध्यायी प्रो. राजाराम शास्त्री से प्राप्त हुआ। प्रो. राजाराम शास्त्री आगे चलकर काशी विद्यापीठ के उपकुलपति भी बने। राजाराम शास्त्री संसद् के सदस्य थे, और उन्हें ‘पद्मविभूषण’ से सम्मानित किया गया था। उन्होंने वाराणसी में अपने निवास स्थान पर बहुत ही गरमजोशी से मेरा स्वागत किया। पूरे एक सप्ताह तक हरेक दिन वह शास्त्रीजी के साथ विताये कई वर्षो के बारे में मुझे बताते रहे। उन्होंने खास घटनाओं तथा संस्मरणों का जिक्र किया, जो शास्त्रीजी के चरित्र एवं व्यक्तियों के विभिन्न पहलुओं को उजागर करते थे। दुर्भाग्य से, 21 अगस्त 1991 को नई दिल्ली में उनका देहान्त हो गया।

वाराणसी में शास्त्रीजी के एक अन्य मित्र श्री बृजनंदन प्रसाद थे, जिन्होंने उनके प्रारंभिक जीवन के बारे में अपने निजी अनुभवों के आधार पर जानकारी दी। श्री बृजनंदन प्रसाद शास्त्रीजी के मामा रघुनाथ प्रसाद के नजदीकी पड़ोसी थे, जिनके साथ शास्त्रीजी करीब आठ साल तक रहे।
नई दिल्ली में मैं संसद् सदस्य और शास्त्रीजी के अभिन्न मित्र बिशंभर नाथ पांडे से मिला। शास्त्रीजी के 1929 से इलाहाबाद में बिताये गये वर्षो के बारे में अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर पांडेजी ने मुझे जानकारी दी उसके लिए मैं उनका बहुत ही आभारी हूँ। इन्हीं वर्षों में शास्त्रीजी जवाहरलाल नेहरु तथा, पुरुषोत्तमदास टंडन के निकट संपर्क में आये।

शास्त्रीजी के साथ जिन्होंने बहुत करीब रहकर काम किया था। ऐसे प्रशासनिक अधिकारियों के साथ बातचीत से मुझे बहुत लाभ हुआ। इनमें प्रमुख थे : श्री धर्मवीर तत्कालीन कैबिनेट सचिव; श्री सी.एस.झा, तत्कालीन विदेश सचिव, श्री एल.पी.सिंह तत्कालीन गृहसचिव श्री के.बी. यूरोपीय आर्थिक समुदाय के तथा बेल्जियम में भारत के राजदूत; तथा श्री गोविंद नारायण, जो उत्तर प्रदेश में शास्त्रीजी के गृह और यातायात मंत्रित्व के काल में गृहसचिव थे। रोजाना आयोग के भूतपूर्व सदस्य तथा अमेरिका में राजदूत डॉ. आबिद हुसेन; रेलवे बोर्ड के भूतपूर्व अध्यक्ष तथा भारत सरकार के मुख्य सचिव श्री प्रकाश नारायण; भूतपूर्व कैबिनेट सचिव श्री नरेश चंद्र; भूतपूर्व विदेश सचिव श्री मुचकुंद दुबे; सूचना तथा प्रसारण मंत्रालय के भूतपूर्व सचिव श्री महेश प्रसाद तथा प्रशासनिक सुधार तथा लोक शिकायत विभाग के भूतपूर्व अतिरिक्त सचिव श्री ए.आर. बंद्योपाध्याय से मुझे मेरे शोधकार्य में बड़ी मदद हुई। इन सबके प्रति मैं कृतज्ञ हूँ।
1965 के भारत-पाक युद्ध से सम्बन्धित कुछ अहम मसलों पर चर्चा करने के लिए मैं तत्कालीन वायुसेनाध्यक्ष अर्जन सिंह; तत्कालीन सेनाउपाध्यक्ष और आगे चलकर सेनाध्यक्ष बने जनरल पी.पी. कुमार मंगलम्; पूर्वी कमान के सेना कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल हरबक्श सिंह तथा विंग कमांडर ट्रेवर कीलर से मिला। उन्होंने अपने व्यक्तित्व ज्ञान व अनुभव और ज्ञान के आधार पर बहुत ही महत्त्वपूर्ण जानकारी और सूचनाएँ दीं।

भारतीय पत्रकारिता के क्षेत्र इन सुप्रसिद्ध हस्तियों के साथ बातचीत करने का सौभाग्य भी मुझे प्राप्त हुआ-
श्री प्रेम भाटिया, श्री कुलदीप नायर और श्री इंदर मल्होत्रा-जो शास्त्रीजी को बहुत अच्छी तरह जानते थे। शास्त्रीजी के प्रधानमंत्रित्व के विभिन्न पहलुओं के बारे में इनकी सूझ-बूझभरी टिप्पणियों के लिए मैं इनका आभारी हूँ।
लंदन के गाइस अस्पताल के फॉरेंसिक मेडीसिन विभाग के प्रमुख डॉ. इयान वेस्ट ने प्रधान मंत्री शास्त्रीजी की मृत्यु के समय की परिस्थितियों को समझने और उन पर विचार करने के लिए अपना बहुमूल्य समय मुझे दिया, जिसके लिए मैं उनका आभारी हूँ।

स्क्वैड्रन लीडर आर. के. पाल ने मेरे शोधकार्य में बहुत मदद की; और इस पूरे लेखन कार्य का गहराई से परीक्षण किया। इस चरित्र ग्रंथ को तैयार करने में उनका अमूल्य योगदान रहा है। पूरी पांडुलिपि को कंप्यूटर में लिपिबद्ध करने के लिए तथा अन्य महत्त्वपूर्ण सहायता के लिए मैं कमांडर एच.एस. शर्मा के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ।
श्री पी.सी. टंडन से बहुविध सहायता हुई, जिनका भारत सरकार के खाद्य तथा नागरिक आपूर्ति मंत्रालय के भारतीय मानक ब्यूरो के भूतपूर्व उपसचिव के रूप में अनुभव इस पुस्तक का आलेख तैयार करने के काम में तथा उसके संशोधन के काम में बहुत ही लाभदायी रहा। श्री टंडन ने पूरी पांडुलिपि पढ़कर महत्त्वपूर्ण सुझाव दिये।
कैम्ब्रिज लंदन स्थित ऐंग्लिया पॉलिटेक्निक यूनीवर्सिटी के स्कूल ऑफ लेंग्वेजेज के श्री डेरेकली ने पूरा आलेख सावधानी पूर्वक पढ़कर कई उपयोगी सुझाव दिये।

 

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Alok  Verma

Good read!