Antara - Hindi book by - Manjula Chaturvedi - अन्तरा - मंजुला चतुर्वेदी
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अन्तरा

मंजुला चतुर्वेदी

प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशित वर्ष : 2003
पृष्ठ :96
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4556
आईएसबीएन :81-263-0845-1

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प्रेम और जीवन की कविताएं

Antara - a hindi book by Manjula Chaturvedi - अन्तरा - मंजुला चतुर्वेदी

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

मंजुला चतुर्वेदी की कविताएँ पारस्परिक अर्थों में प्रेम कविताएँ नहीं हैं। यहाँ प्रेम और जीवन की जुगलबन्दी है। प्रेम जीवन के एक आवश्यक हिस्से की तरह काव्य के क्षितिज पर ससन्दर्भ उपस्थिति है। ‘धूप का एक सुनहरा बूटा’ जब अन्तस के संवादों में धीरे से रेंगकर सरक आता है तो तब मंजुला चतुर्वेदी की कविताओं का रंग आकर्षक हो जाता है। कविता के आकाश में कभी-कभी विरह और छलना के काले बादल भी घिरते हैं।

कवियित्री जिन्दगी की ऊँच-नीच भी समझती हैं। सत्य के सगुण साक्षात्कार के अनुभव भी उनकी कविताओं में दर्ज हैं। संवेदना की पूँजी के साथ मंजुला चतुर्वेदी ‘अन्तरा’ में भविष्य के दरवाजे पर दस्तक देती दिखती हैं।

भूमिका

मंजुला चतुर्वेदी का कविता संग्रह ‘अन्तरा’ सुखद आश्चर्य है। इन्होंने कला-शिक्षण और ब्रजभूमि की लोकसंस्कृति के अध्ययन द्वार से जीवन में प्रवेश किया और यकायक वे कला और काव्य के सृजन की ओर मुड़ीं, दोनों क्षेत्रों में उनकी यात्रा अविराम चलती रही है। उनका अध्यापन कार्य उनके उत्कर्ष की ओर अग्रसर रहा और हिमाचली कला में गहन अध्ययन को विदेशों में मान्यता मिली। दूसरी ओर समानान्तर रूप से उनकी कलम भी कभी रंग उरेहती रही तो कभी शब्दों के कुसुम चुनचुन कर कविता रचती रही। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि मन में कविता रचती है और सामने चित्रपट पर चित्र और कभी चित्र मन में है या सामने कहीं है और कलम कविता रच रही होती है। बहुत कम कलाकार कवि होते हैं और कुछ ही कवि कलाकार होते हैं। इसलिए मैंने प्रारम्भ में कहा मंजुला चतुर्वेदी की इस रूप में रचना-यात्रा आश्चर्य का विषय है। लोक कला और धर्म से अनुप्राणित कला की वीथियों में घूमने वाली लड़की आज के समकालीन जीवन की विसंगतियों के बावजूद इसके सम्मोहनों से प्रभावित होकर ऐसे बिम्ब उभार सकती है जो अधुनातन कविता के स्वभाव के लिए भी स्पृहणीय हों, यह भी आश्चर्य ही है।
मंजुला की कविता का संसार आत्मीय मानवीय सम्बन्धों का संसार है। यह आत्मीयता जितनी पुकार है उतनी प्रत्यक्ष अनुभूति नहीं, है भी तो स्वप्न जैसी इसीलिए लगभग सभी कविताओं में मिलन-बिछुड़न एक दूसरे में गुँथे हुए हैं।
‘स्वप्न-कलश’ कविता की अन्तिम पंक्तियाँ—
‘‘ऐसे ही समय के साये में
चलते रहे हैं हम
कभी आकृति बन तो कभी छाया
यही है परिभाषा-जीवन
और यही है जीवन का क्रम और विभ्रम’’
इसी गुम्फन को निर्देशित करती हैं।

इन कविताओं में जो बहाव है, वह सायास नहीं है, सहज है। मंजुला किसी सत्य की खोज में उतनी व्याकुल नहीं है जितनी व्याकुल है अपनी मुट्ठियों से सुरसुर बहती हुई अर्थहीनता की रेत से। इसलिए फूलों से प्यार करने वाली, बसंत के स्वप्न देखने वाली मंजुला बार-बार मन के मरुस्थल की कल्पना से काँपती रहती है। यह अर्थहीनता का बोध अर्थ से विरक्ति या तटस्थता नहीं है बल्कि अर्थ ही इस भयावह और वास्तविक परिस्थिति के विरुद्ध एक चुनौती है और मंजुला इस चुनौती से कभी भागती नहीं। उसकी कविता अधिकांशतः प्यार की कविता है पर यह प्यार परिवेश की चिन्ता से, परिवेश के साथ तालमेल के लिए अवरोध नहीं, उल्टे यह उस तालमेल को और उकसावा देता है। यह प्यार न खामख़याली है, न रूमानियत, यह मानवीय नीयति विशेष रूप से प्यार करने वाले मनुष्य की नियति का बड़े विश्वास के साथ सहर्ष स्वीकार है, और यह स्वीकार ही इनकी कविताओं की ऊर्जा है।
यह मंजुला का पहला संग्रह है पर मुझे पूरा विश्वास है, संग्रहों का यह सिलसिला बनेगा। मंजुला की काव्य-यात्रा अविराम हो, सार्थक हो और उनकी काव्यभाषा और अधिक पारदर्शी हो, इस मंगल कामना के साथ कवयित्री को मैं हृदय से साधुवाद देता हूँ।

आमुख

ज़िन्दगी में कुछ पल होते हैं जो भावों के साथ गुम्फित होकर ज़िन्दगी का अन्तरा बन जाते हैं, एक अविच्छिन्न हिस्सा। इन्हीं अन्तराओं का अन्तहीन सिलसिला ज़िन्दगी है। इन्हीं भावखण्डों में व्यक्ति बहता चला जाता है—कभी डूबता-सा कभी उतराया-सा कभी ऊँचाइयों पर कभी अतल गहराइयों में, कभी आकाश में बिना पंख उन्मुक्त उड़ता है तो कभी टनों बर्फ़ के नीचे दबा हुआ-सा, कभी वह बहने लगता है तरल मन्दाकिनी-सा, तो कभी जलता है धू-धू करती चिता-सा। आकांक्षाओं का सिलसिला वह ढूँढ़ना चाहता है लेकिन आकांक्षाएँ उगती हैं फूलों-सी और बुझ जाती हैं टिमटिमाते दीये-सी। मन व्याकुल हो ढूँढ़ता है एक सघन छाँव, लेकिन दूर-दूर तक होता है तपता रेगिस्तान, न ओस की बूँदें न कोई अंगारा; भावनाएँ कविता की तरह फूट पड़ती हैं, बहती हैं और बहा ले जाती हैं।
इस संग्रह में मैंने उन्हीं भावों के विविध रंगों को बिम्बित करने का प्रयास किया है। मेरी कविताएँ उन्हीं भावों को सम्बोधित हैं और ये सम्बोधन कभी शीर्षक जान पड़ेंगे और कभी केवल संकेत।

नवागत

नव वर्ष पर
स्नानगृह की दीवारों के बीच
बाहर से आती हुई
तुम्हारी पदचाप
भुला देती है
सैकड़ों जनमती हुई कड़वाहटें
उफनती हुई यादें
बिखरती हुई बातें
सब एक रस हो जाता है
हृदय पगध्वनि के साथ
एकान्त में भी एकाकार हो जाता है

कण्ठध्वनि की गूँज
हृदय की गूँज बन जाती है
और मैं ‘मैं’ नहीं रहती
जो क्षण भर पहले थी
हल्की हो धरा से
ऊपर उठ जाती हूँ
क्षणिक खा़मोशी के बाद
सत्य समझ आता है
आगन्तुक अनजान आता है
बेजान बना जाता है
मैं सत्य को सहज स्वीकारती हूँ
ध्वनि तुम्हारी नहीं है
शब्द-गूँज भी तुम्हारी नहीं है
सोचती हूँ
मात्र साम्य में इतनी हलचल
प्रिय ! मिलन कैसा होगा ?
सोच रही हूँ मैं
सत्य कैसा होगा ?

नव रचना

नई पीढ़ी
रचना चाहती है एक चित्र
जिसमें आकाश हो,
धरा हो, समुद्र हो
समुद्र में प्यार हो
और प्यार
सागर तट पर बैठे
दूर से आये पथिक को
सराबोर कर
स्वयं लौट जाए
नये रूप में
आने के लिए
नवरंग लेकर
लाल और पीले नहीं
बस नीले और श्वेत
कुछ कुछ गुलाबी
कुछ उजले से
ऊपर टँगा आकाश
क्षितिज रेख पर उतर आए
नव रचना रच जाए, टँग जाए
कलयुग की काली दीवारों पर
जहाँ बरसों से लगी है
खाली, जंग लगी एक कील।

उड़ान

चलते चलते
पहली से दूसरी
तीसरी
और अब
चौथी मंज़िल पर आ गयी हूँ
अब मुझे दीख रही है
सातवीं मंजि़ल
वहाँ दीवार पर बने
आले में
बसेरा है गौरैया का
मैं देखती हूँ
यह गौरैया
यहीं से रोज़ उड़ती है
अन्तहीन आकाश
के विस्तार में
और लौट आती है
साँझ को।

मैं सोचती हूँ
हमसे बेहतर है
यह नन्हीं गौरैया
जो अपनी उड़ान ही
सातवीं मंज़िल से भरती है
मैं भी ऐसे ही
उन्मुक्त उड़ना चाहती हूँ
इतने ऊँचे बसेरे से
जिससे न सुन सकूँ
गलियों का चीत्कार
नुक्कड़ का शोर
और न ही
देख सकूँ चोर
बस्ती के।

मेरी दृष्टि
सूरज की
सतरंगी चमक ले
अपलक निहारती रहे
अन्तहीन आकाश
चाँद और तारे
पल प्रति पल।

नीलकण्ठ

जीवन यात्रा में
चलते चलते
स्याह अँधेरों के बाद
एक दिन सहसा
खिड़की से
उजला लाल प्रकाश बन
तुम मेरे सामने
आ जाते हो
मैं पुलक उठती हूँ
मेरे अन्तर का कोहराम
ओझल हो जाता है
और मन के झरोखे
खुल जाते हैं
बाहर की गन्ध
अन्दर तक समा जाती है
और तब मेरे
मन के आकाश में
ऊँची उड़ान भरता है
एक नीलकण्ठ।

मैं उसे अपलक
देखना चाहती हूँ
और छूना चाहती हूँ
उसके नरम नीले पंख
अपनी अँगुलियों की
पोरों से
लेकिन मेरे हाथ
जुड़ जाते हैं
और अन्तर में
गुहार उठती है
ओ नीलकण्ठ !

तुम हमेशा नीले रहना
और यूँ ही उड़ते रहना
मेरे मन के
गहरे आकाश में
क्योंकि
खाली आकाश को जीना
बड़ा बोझिल होता है
वह जीवन की शून्यता का
अर्थ जो देता है
इसीलिए
मैं तुम्हारी नीलिमा को
कहीं गहरी रेखाओं में

उतार लेना चाहती हूँ
इस रीते कैनवास
जैसे आकाश पर
बिखेर देना चाहती हूँ
ढेर सारा नीला रंग
तुम्हारे नीलकण्ठ का
और लालिमा अरुण की।

ज़िन्दगी

स्वप्न में,
ढलती एक साँझ
और मेरे एक ओर हैं
प्राचीरें
लाल किले की
ऊँची-ऊँची
जिसके परकोटों पर
जल रहे हैं
असंख्य नन्हें दीप
और मेरे दूसरी ओर है
एक छाजन
बिना दरवाज़ों की
जहाँ श्वेत वस्त्रों में
एक वृद्धा बैठी है
उसके खा़मोश से चेहरे पर
विषाद गहराया है
मैं दोनों ओर देखती हूँ
जलते दीपक देखना
बहुत भला लगता है
किन्तु माँ की
लम्बी उदासी देख
मैं गहराई में
खो जाती हूँ
और चार क़दम चल
बैठ जाती हूँ
एक विशाल झील
के सामने।

किनारे की छोटी-छोटी
कंकड़ियाँ
शनैः शनैः जलराशि में
डालती जाती हूँ
और देखती हूँ
वृत्तों का जन्म
उनका विस्तार
और उनका अवसान।

यही क्रम है
जल के जीवन का
और मानव का
ज़िन्दगी भर
पत्थर से
जीवन जल की
गहराई नापने का !
सच ! बहुत निरीह होता है
पानी की तरह
तरल बहते
जीवन को नापना
बेजान पत्थरों से।

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