प्रीति-कथा - नरेन्द्र कोहली Preeti-Katha - Hindi book by - Narendra Kohli
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प्रीति-कथा

नरेन्द्र कोहली

प्रकाशक : किताबघर प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :128
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4581
आईएसबीएन :81-88122-36-x

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एक प्रेम-कथा....

Preeti-Katha

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश


नरेन्द्र कोहली का प्रत्येक नई कृति उनके लेखकीय व्यक्तित्व का एक नया आयाम उदघाटित करती है। जब पाठक उन्हें किसी एक वर्ग अथवा धारा से जोड़कर, किसी एक घेरे में घेरकर, देखने का अभ्यस्त होने लगता है, तब तक वे उन घरों को तोड़कर आगे बढ़ जाते हैं और कुछ नया तथा मौलिक लिखने लगते हैं। सूजनधर्मा व्यक्ति प्रयोग और वैविध्य की चुनैती को स्वीकार करता ही है।

प्रीति-कथा नरेन्द्र कोहली का नया उपन्यास है। यह एक प्रेम-कथा है। नरेन्द्र कोहली ने प्रेम-कथा लिखी है, यह सूचना कुछ लोगों के लिए विस्मयकारिणी भी हो सकती है, किन्तु अधिक विस्मयकारी तथ्य तो यह है कि यह प्रेमाख्यानक उपन्यास, जीवन के कुछ मूल-भूत सत्यों का स्वरूप प्रकट करता है। कुछ लोग इसे चिंतन-प्रधान ही नहीं, दार्शनिक उपन्यास भी कहना चाहेंगे। प्रेम का विश्लेषण करते-करते ही, मनुष्य अपनी प्रकृति और ईश्वर के स्वरूप तक को पहचान पाया है। किसी भी वर्ग में रखें, किन्तु है यह उपन्यास ही, पहले से भिन्न, नया ताजा और आकर्षक।

प्रीति-कथा


पेट्रोल पंप की भीड़ देखकर विनीत का माथा ठनकाः पहुँचने में अवश्य ही देर हो जाएगी। यह देश तो बस अब या तो पंक्ति का देश है या भीड़ का। जहाँ भी जाओ, या तो लंबी-सी पंक्ति होगी, जो धक्का-मुक्का। शोर-शराबा। विनीत को लगता है कि न तो उसमें लंबी पंक्ति में खड़े होकर अपनी बारी की प्रतीक्षा करने का धैर्य है और न धक्का-मुक्की कर पाने की क्षमता।
पर पेट्रोल तो लेना ही था।

प्रेट्रोल की बारी आते-आते वह तय कर चुका था कि वह आज गाड़ी के पहियों की हवा चैक नहीं करवाएगा। हवा थोड़ी कम अवश्य हो गई होगी, पर कोई ऐसी कम भी नहीं हुई थी कि गाड़ी चल ही न सके।
‘‘तुमने पिछली बार भी हवा का काम ऐसे ही टाला था। हवा कब भरवाओगे, जब गाड़ी एकदम बैठ जाएगी ?’’
धिक्कार के इस स्वर में उसका खासा परिचय था। उसने उस स्वर को ‘विनीत-शत्रु’ का नाम दे रखा था। जब-जब किसी काम से उसे परेशानी होने लगती, और वह उसे टालने का प्रयत्न करता, तो यह स्वर उसके भीतर जाग उठता था। यह स्वर उठता और विनीत के द्वन्द्व और गहरा जाते। वह और भी अधिक परेशान हो उठता।....वह जानता था कि जिन कामों को वह टाल रहा है, वे आवश्यक हैं और उन्हें निबटा ही डालना चाहिए। पर उसे लगता था कि प्रकृति ने उसके मन में एक शक्तिशाली चुंबक लगा दिया था। एक विशेष प्रकार के कामों को सुनते ही, उसके मन का चुंबक उनसे चिपक जाता था और दूसरी तरह काम की चर्चा होते ही, चुंबक वितृष्णा के मारे पीछे हटने लगता था। और जहाँ उसका मन पीछे हटता था, वहीं यह ‘विनीत-शत्रु’ की एक ओर ध्यान दिया, न उस सेल्समैन की ओर, जो उसकी गाड़ी पर कोई पाउडर मसलकर उसे चमकदार दिखा रहा था।
‘‘मैं जल्दी में हूँ।’’ उसने कहा और गाड़ी बढ़ा दी।

16 मार्च, 1984 की सुबह थी।
मौसम काफी सुहाना था। शीत ऋतु पूरी तरह से विदा हो चुकी थी और ग्रीष्म अभी आई नहीं थी। दिल्ली वैसे भी सुंदर नगर है, पर एशियाई खेलों के दौरान इसे और भी सजाया-सँवारा गया था। फिर संयोग से तटस्थ देशों के राज्याध्क्षों का सम्मेलन भी यहीं हुआ। रही-सही कसर तब पूरी हो गई थी। वन-विभाग, उद्यान-विभाग और दिल्ली नगरनिगम-तीनों ने ही मिलकर नई दिल्ली की हर सड़क के चौराहे को सजा रखा था। मौसमी फूलों के बीच-बीच, कहीं-कहीं सुंदर गुलाबों के झुंड भी लगे हुए थे।
सहसा विनीत का ध्यान स्पीडोमीटर की ओर चला गया। गाड़ी की गति अस्सी किलोमीटर को भी पार करने जा रही थी।.....क्या हो गया था उसे ? किस बात की इतनी जल्दी थी ? यदि वह सेमिनार में दस मिनट देर से ही पहुँचेगा, तो आकाश नहीं गिर पड़ेगा। ऐसा क्या हो गया उस डॉ० केतकी पैटर्सन के उस पर्चे में, जिसका एक-आध अंश नहीं सुन पाया तो वह वंचित रह जाएगा।... वैसे उसने यह नाम सूची में ही देखा था। उसे तो यह भी मालूम है कि केतकी पैटर्सन दिल्ली पहुँची भी है या नहीं। पर्चा पढ़ा रही है या नहीं।...अनेक लोग अपनी स्वीकृति तो भेज देते हैं, किन्तु किन्हीं कारणों से आ नहीं पाते हैं ....

‘‘पर्चा सुनने जा ही कौन रहा है ?’’विनीत-शत्रु का स्वर बहुत करारा हो गया था, ‘‘उत्सुकता तो सारी यही है कि यह उसकी वह पुरानी क्लासमेट केतकी ही है या कोई और ?’’
पर इस बार विनीत का मन, विनीत-शत्रु के धिक्कार के सामने चुप नहीं रहा, ‘‘पुराने मित्रों से मिलने में क्या दोष है ?’’
‘‘वह मित्र नहीं है तुम्हारी।’’ विनीत-शत्रु भी दबा  नहीं, ‘‘पुरानी सखी है। तुम जानते हो कि उसके मन में तुम्हारे लिए आकर्षण था। तुम देखने जा रहे हो कि अब भी उसके मन में तुम्हारे लिए कुछ है क्या ?’’ पर यह मत भूलों कि अब तुम्हें वह स्वतन्त्रता नहीं है। तुम्हारी पत्नी है, बच्चें है...केतकी तुम्हारे लिए पराई स्त्री है। उसकी ओर तुम्हारा आकर्षण नैतिक नहीं है ज़रा-सी असावधानी से तुम्हारा घर बरबाद हो सकता है। उसका परिवार भी बिखर सकता है।....फिर तुम अब बी०ए० के छात्र नहीं हो। ज़िम्मेदार नागरिक हो। दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेज में लेक्चरर हो। लेखक के रूप में भी थोड़ा-बहुत जाने ही जाते हो। ऐसी बात छुपी नहीं रहतीं। जंगल की आग की तरह फैल जाएगी बात। पत्र-पत्रिकाओं में चर्चा होगी.....’’  
विनीत-शत्रु जाने क्या-क्या कहता रहा और विनीत था कि उसकी बात ऐसे सुन रहा था, जैसे कोई बालक मन में यह संकल्प लेकर पिता की बात सुनता है कि उसे वह बात माननी ही नहीं है।
पहले मालूम तो हो जाए कि वह केतकी है भी यह नहीं-उसने सोचा-केवल केतकी नाम से हो तो तय नहीं हो जाता कि यह वही केतकी है। जिस केतकी को वह जानता था, वह केतकी सिन्हा थी। वह विदेश चली गई थी। यह विदेश से आई है और केतकी पैटर्सन है....

तभी उसकी दृष्टि ‘अन्तर्राष्ट्रीय अनुवाद सम्मेलन’ के बड़े-से बैनर पर पड़ी। बैनर विज्ञान-भवन के गेट के ठीक सामने सड़क के ऊपर-ऊपर लगाया गया था। विनीत ने ठीक उसके सामने नीचे से गाड़ी गेट के भीतर घुमा ली।
गाड़ी को पार्क कर, विज्ञान-भवन की मूलभुलैया में से अपना कमरा ‘एच’ खोजता हुआ, वह जब भीतर प्रविष्ट हुआ तो गोष्ठी की कार्यवाही आरंभ हो चुकी थी। डॉ० केतकी पैटर्सन अपना पर्चा पढ़ रही थी।.....
विनीत दरवाज़े के साथ वाली कुर्सी पर ही बैठ गया। उसके कान जैसे बाहरी आवाज़ो के लिए एकदम बहरे हो चुके थे। वह केतकी का बोला हुआ एक भी शब्द नहीं सुन रहा था। उसके शब्द वर्षां की बूँदो के समान, विनीत के कानों क बंद खिड़कियों के कपाटों  पर धमक पैदा कर रहे थे किंतु भीतर प्रवेश नहीं पा रहे थे....पर उसकी दृष्टि जैसे कुछ अधिक सचेत हो गई थी। वह केतकी के वर्तमान चेहरे पर से पिछले बीस वर्षों के परिवर्तन को झाड़-पोछकर उतार रहा था और डॉ० केतकी पैटर्सन में से बीस वर्ष पहले की बी०ए० की छात्रा केतकी सिन्हा को खोज रहा था और...हाँ ! वही थी। तब काफी बदल गई थी। अब सीधी-सादी दो चोटियाँ नहीं थी। बाल कटे हुए थे और एक खास ढ़ंग से सँवरे हुए। बीस वर्षों के स्थान पर वह तैंतालिस वर्षों की हो गई थी। शरीर पहले की तुलना में कुछ भर गया था, किंतु स्थूल नहीं हुआ था। वर्ण पहले से भी अधिक गोरा हो गया था। आँखों पर ऐनक लग गई थी......

तभी केतकी ने पढ़ना बंद कर अपनी ऐनक उतारी और तहाकर बटुए में रख ली। दो-चार तालियाँ बजीं और बस ! अध्यक्ष घोषणा कर रहे थे कि यदि किसी को कोई प्रश्न पूछना हो तो पूछे।
विनीत लगभग खड़ा हो गया। पर सहसा उसे ध्यान आया कि वह पागलपन करने जा रहा है। अध्यक्ष पर्चे में पढ़ी गयी बातों के संबंध में प्रश्न करने को कह रहे थे और वह पूछने जा रहा था कि क्या वह जमशेदपुर की केतकी सिन्हा है ?’’
वह बैठ गया।
केतकी की सहज जिज्ञासाभरी दृष्टि उस तक आई, पर उसे बैठ गया देखकर लौट गई।
अध्यक्ष ने पूछा, ‘‘आप कोई प्रश्न कर रहे थे ?’’
उसने हँसकर ‘न’ में मात्र सिर हिला दिया।

और किसी ने भी प्रश्न नहीं पूछा। स्पष्ट ही, वहाँ उपस्थिति सब लोग अपना-अपना पर्चा पढ़ने आए थे। कोई किसी दूसरे को सुनने और उससे बातें करने नहीं आया था।’’ यह तो अन्तर्राष्ट्रीय गोष्ठियों का स्तर है- विनीत सोच रहा था.....
पर तत्काल ही उसका मन दूसरी ओर चला गया।.....केतकी ने उसकी ओर देखा अवश्य था किंतु उसकी दृष्टि में कहीं रत्ती-भर भी पहचान नहीं थी। कहीं ऐसा तो नहीं कि वह केतकी ही न हो ! उसके अपने मन में तृष्णाएँ ही उसके साथ छाया-प्रकाश का खेल खेल रही हों। और यदि, यह वह केतकी हो भी और उसे पहचानने से इंकार कर दे तो ?.....
‘‘तेरे साथ यही होना चाहिए, यशस्वी लेखक !’’ विनीत-शत्रु ने उसे चिकोटी काटी। विनीत ने-‘यह तो बकता रहता है’- के अंदाज में उसकी उपेक्षा कर दी और फिर से केतकी की ओर देखा।
केतकी के साथ वाली कुर्सी खाली थी और विनीत के भीतर से उसे कोई धक्के मार रहा था, ‘‘चल ! उस कुर्सी पर बैठ जा।’’

बहुत संभव था कि विनीत सचमुच ही उठ खड़ा होता, पर इससे पहले ही उसे अपने भीतर विनीत-शत्रु का खिलखिलाने को तैयार चेहरा दिखाई पड़ गया।
विनीत सायास अपनी जगह पर जमकर बैठ गया। वह बैठा तो रहा, पर उसका मन किसी भी पर्चें में नहीं लगा। न कुछ सुन रहा था, न समझ रहा था। सही मानों में वह वर्तमान को देख भी नहीं रहा था। उसकी आँखों के सामने कई झिलमिलाते पर्दे थे। कभी कोई उठ जाता, कभी कोई।.....बीच में कभी-कभी वह गर्दन उठाकर माइक की ओर देख भी लेता था। किसी पर्चें में तमिल से अंग्रेजी के अनुवाद की चर्चा हो रही थी, किसी में गद्यानुवाद और पद्यानुवाद की तुलना की किसी में अनुवाद की दृष्टि से भारतीय भाषाओं की श्रेष्ठता की, किसी में यूरोपीय भाषाओं की एक सूत्रता की.....
विनीत की स्थिति बड़ी ही विचित्र हो रही थी। जो या बोला जा रहा था, उसमें उसका मन तनिक भी नहीं लग रहा था। कोई और अवसर होता तो ऐसी स्थिति में वह कब का उठकर घर चला गया होता किंतु केतकी अभी वहीं बैठी थी।
सहसा उसके मन में एक ऊब उठीः डॉ० केतकी पैटर्सन किसी समय की केतकी सिन्हा है भी तो उससे क्या ? उसके जीवन में कभी केतकी का महत्त्व था। और शायद केतकी के जीवन में भी उसका महत्त्व था। पर, अब वे दोनों एक-दूसरे के जीवन से दूर जा चुके थे। दोनों का अलग-अलग मिट्टी में विकास हुआ था। अब वे दोनों एक-दूसरे के लिए उतने की परिचित या अपरिचित थे, जितने ये शेष सब लोग....

सहसा उसे शोभा की बात याद आ गई, ‘तुम एकदम अनसोशल हो। हर समय क्या केवल यहीं सोचा जाता है कि इससे मिलकर क्या होगा ? उससे मिलकर क्या होगा ? क्या कुछ पाने के लिए ही किसी से मिला जाता है ? मिलना-जुलना-सोशलाजिंग-अपने-आप में ही अपनी उपलब्धि नहीं है क्या ?’
यह शायद शोभा ने तब कहा था, जब वह स्कूल की अपनी पुरानी सहेली से मिलने के लिए तड़प रही थी और विनीत ने उससे कहा था कि ‘उससे मिलकर क्या होगा ?’
शोभा की बात से चाहे विनीत सहमत हो गया था, पर उसका न तो व्यवहार बदला था और न मन की कार्य पद्धति। वस्तुतः उसे कई बार अपने पुराने मित्रों से मिलकर कोफ्त होती थी। उसे लगता था कि वह पुराना मित्र उसके जीवन के एक खंड के एक-आध से ही परिचित है और उससे मिलने का अर्थ क्या था, उसी खंड के उसी पक्ष को बार-बार जीना; और यह बार-बार का दोहराया हुआ जीना उसे नीरस और उबाऊ लगता था......
किन्तु आज वह केतकी का मोह छोड़ नहीं पा रहा था।....

पर्चें पढ़ते-पढ़ते ही कॉफी-ब्रेक हो गया। वाद-विवाद के लिए समय ही नहीं बचा।.....
वह अपनी कुर्सी पर बैठा रहा। केतकी उसके पास से गुजर गई। न उसकी आँखें विनीत पर रुकीं-ठहरी, न उनमें कोई पहचान उभरी।......
अब भी यदि उसे केतकी से मिलना था तो उसका एक ही तरीका था कि वह स्वयं उसके पास जाकर बातचीत आरम्भ करें और देखे कि केतकी उसे पहचानती है या नहीं।.....पर परेशानी यह भी थी कि प्रत्येक विदेशी प्रतिनिधि के पास बहुत-बहुत सारे भारतीय प्रतिनिधि घिरे हुए थे। विदेशी प्रतिनिधियों से इस प्रकार मिलना-जुलना उसे आपत्तिजनक नहीं लगता था, पर मुखर रूप से अपनी लार टपकाते हुए, अपनी तुच्छयता की घोषणा करते हुए भारतीय, उसे न केवल अच्छे नहीं लगते थे, वरन् उसे लगता था कि वे पूरे देश का अपमान कर रहें है। यहाँ ज्ञान के लिए नहीं, जैसे हर व्यक्ति स्वार्थ साधने ही आया था। इन प्रतिनिधियों को लोग ऐसे घेर रहे थे, जैसे इनके माध्यम से वे लोग तुरन्त ही यूरोप-अमरीका नहीं पहुँचेगे तो यहाँ, दिल्ली में इनके दूतावासों में सुरा-पान के लिए तो आमंत्रित हुआ ही करेंगे।

केतकी, एक झुंड से जैसे छुड़ाकर, सामने की मेज पर अपने लिए कॉफी तैयार करने के लिए बढ़ी विनीत को लगा, यही अवसर था। इससे पहले कि कोई दूसरा झुंड उसको घेर ले, उसे बातचीत कर लेनी चाहिए।
विनीत भी, अपने हाथ में कप लिए हुए उसके पास खड़ा हो गया।
केतकी ने एक चम्मच में कहवा और दूध डाल लिया तो विनीत ने चीनीदानी बढ़ाई, ‘‘चीनी !’’ केतकी ने एक चम्मच चीनी लेकर, मधुर-सा ‘धन्यवाद’ उसकी ओर उछाल दिया। उसने चीनी देने वाले की ओर देखा भी; किन्तु उन आँखों में मात्र शिष्टाचार ही था, परिचय नहीं।
अब विनीत से रहा नहीं गया और बोला, ‘केतकी !’’

डॉ० केतकी ने पलटकर, एक ठहरी हुई दृष्टि उसपर डाली। दृष्टि में पहचान से पहले असमंजस उतरा; असमंजस ठहर नहीं पाया। उसकी आँखों में चमक जन्मी, ‘‘अरे विनीत ! तुम ! तुम्हारी इस दाढ़ी ने तो तुम्हें एकदम ही छिपा दिया है।’’
विनीत का मन एकदम हल्का हो आया। उसे स्वयं ही ध्यान नहीं था कि केतकी ने उसे कभी दाढ़ी में नहीं देखा। केतकी ने जिस विनीत को देखा था, वह बीस-इक्कीस वर्ष का ‘लड़का’ सा था। अब जो विनीत वहाँ खड़ा था वह चवालिस वर्ष का पुरुष था। बेहत घनी और सख्त दाढ़ी में सारा चेहरा ढँका हुआ। इतना ही नहीं कलमों से नीचे की दाढ़ी प्रायः सफेद हो चुकी थी। कई लोग तो उसकी दाढ़ी और उसकी सफेदी के कारण ही उसे काफी अधिक उम्र का व्यक्ति मान लेते थे।
‘‘दाढ़ी क्यों बढ़ा ली ?’’ केतकी एक ओर हटकर बोली, ‘‘कहाँ बैठें ?’’

‘‘दाढ़ी नहीं बढ़ाई।’’ विनीत अपनी प्लेट में चिप्स डालते हुए बोला, ‘‘बस शेव करनी बंद कर दी ।’’
‘‘पर बहुत बढ़ गई है। पूरे बाबाजी लग रहे हो।’’ केतकी हँसी, ‘‘संन्यास लेने का इरादा तो नहीं है ?’’
‘‘संन्यास तो नहीं ले रहा। अभी बच्चे छोटे है।’’ विनीत भी मेज़ से हट आया, ‘‘पर अब अपने-आपको बहुत आकर्षण बनाकर पेश करने की कोई विशेष इच्छा नहीं है ! शेव जब बहुत असुविधाजनक लगने लगती है, तो बीच-बीच में शेव से संन्यास ले लिया करता हूँ।’’
‘‘कोई-न-कोई संन्यास तो ले ही रखा है न !’’ केतकी, एक कोने में रखे, अपेक्षाकृत एकांत-से सोफे की ओर बढ़ी, ‘‘और आकर्षण की भी कोई एक परिभाषा है क्या ? किसी के लिए तुम्हारे क्लीन-शेव्ड चेहरे से अधिक यह दाढ़ी वाला चेहरा हो सकता है।’’

सोफे पर बैठता हुआ विनीत हँसा, ‘‘यह दाढि़याना चेहरा ?’’
‘‘हाँ। क्यों नहीं। किसी की पसन्द दाढ़ियाना हो सकती है। किसी को तुम्हारी दाढ़ी में आ गई यह सफेदी की लकीर भा सकती है।’’ केतकी बोली, ‘‘वैसे खासे लेखक-कलाकार लग रहे हो, पर उम्र कुछ ज्यादा दिखने लगी है।’’
‘‘तुम आजकल दाढ़ी पर तो रिसर्च नहीं कर रहीं ?’’
केतकी हँसी, ‘‘टाल रहे हो। चलो नहीं करते दाढ़ी के विषय में चर्चा। वैसे चर्चा और रिसर्च में कुछ समानता है-ध्वनि साम्य।’’

‘‘है तो।’’ विनीत बोला, ‘‘चर्च और रिसर्च, चर्चा और रिसर्चा।’’
‘‘तुम अब भी शब्दों से वैसे ही खेलती हो।’’ केतकी बोली, ‘‘बल्कि अब तो अभ्यास और भी बढ़ गया होगा।’’
‘‘वैसे तुम्हारी रिसर्च का विषय क्या है ?’’ विनीत ने क़ॉफी की चुस्की ली।
‘‘रिसर्च तो हो चुकी।’’ केतकी बोली ‘‘टापिक था, ‘Concept Of Love’वैसे आजकल उसे माँजने-धोने पर लगी हुई हूँ, इसलिए कुछ काम चल रहा है।’’
‘‘रिसर्च है या बर्तन, जिसे माँज-धो रही हो।’’ विनीत मुस्काया, ‘‘अरे किसी कलात्मक शब्द का प्रयोग करो-हम उसे परिष्कार-संस्कार कहा करते हैं।......’’ और अंत में उसने जोड़ा, ‘‘वैसे विषय अच्छा है तुम्हारा, प्रेम का तत्त्व-चिंतन ! पर प्रेम-मीमांसा के लिए तुम्हें अमरीका क्यों जाना पड़ा ?’’
‘‘अमरीका नहीं, कैनेडा।’’

‘‘ओह ! साडा कनाडा।’’
‘‘यह क्या हुआ ?’’ केतकी ने हैरान होकर उसे देखा, ‘‘तुक भिड़ा रहे हो ?’’
‘‘नहीं। वह आदत नहीं है।’’ मुझे।’’ विनीत ने बताया, ‘‘हमारे पड़ोस में एक सज्जन रहते है रामलुभाया। वर्षों विदेश में रहे है। थोड़ा-सा समय उन्होंने इंग्लैड में भी बिताया है, पर अधिकांशतः अफरीकी देशों में रहे है। वे अफरीका की बात करते हैं, तो बताना चाहते हैं कि वे विदेश की बात कर रहे हैं, पर साथ ही अपनी आत्मीयता भी जताना चाहते है, इसलिए कहते हैं-साड्डे फौरेन विच, अर्थात् हमारे विदेश में। कनाड़ा को वे ‘साड्डा कनाड़ा’ भी कहते हैं,।’’
‘‘ओह !’’

‘‘पर केतकी ! क्या प्रेम-चिंतन के लिए वह अधिक उपयुक्त देश है ?’’
केतकी हँसी, ‘‘प्रेम का देश तो भारत है।’’
और फिर न जाने वह कहाँ खो गई। विनीत को लगा कि केतकी बहुत ही नाटकीय ढ़ंग से उदास हो गई है। वह ऐसी तो नहीं हुआ करती थी। वह कनाडा जाकर अधिक भावुक हो गई है, या बातचीत के बीच इन भंगिमाओं का उपयोग सीख लिया है उसने ?

‘‘वैसे मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि तुम मुझे यहाँ ऐसे मिल जाओगी।’’ विनीत ने धीरे से कहा, ‘‘जब से यह समाचार मिला है कि तुम विदेश चली गई  हो, तब से एक प्रकार से मान लिया था कि तुम भवसागर में खो गई हो और तुम्हारा पता अब कभी नहीं मिलेगा।’’
‘‘ओह ! कितना अच्छा लगता है न सुनना। ‘भवसागर’। टिपिकल इंडियन।’’ केतकी जितने आकस्मिन ढंग से उदास हुई थी, उतने ही आकस्मिक रूप में उससे ऊबर भी आई, ‘‘पर मुझे कभी भी ऐसा नहीं लगा। हिन्दी की पत्रिकाओं में तुम्हारा नाम, तुम्हारी रचनाएँ और कभी-कभी तुम्हारा चित्र भी मिल जाता था; पर तुम्हारा दाढ़ी वाला चित्र कहीं नहीं देखा मैंने, नहीं तो वहाँ सेमिनार रूम में तुम्हें पहचान लेती मैं। Otherwise I have not lost your track’’केतकी बोली, ‘‘मेरे लिए तुम भवसागर में खोय नहीं थे। यूनिवर्सिटी और हाई कमीशन के पुस्तकालयों में तुम्हारी पुस्तकें भी मिल जाती थीं। मैंने पुस्तकों के समर्पणों से समझा है कि तुम्हारा विवाह हो चुका है और शायद दो बच्चें भी है तुम्हारे.....।’’
‘‘सही जानकारी है तुम्हारी।’’

‘‘और अभी तक कॉलेज में ही पढ़ते  हो ?’’
‘‘हाँ। न केवल कॉलेज में ही पढ़ाता हूँ, अभी तक लैक्चरर ही हूँ।’’ विनीत कुछ याद करके हँसा, ‘‘मेरा एक कज़न  है- चचेरा भाई। वह सेना में है। जब वह सैकेण्ड लैफ्टिनेंन बना था तब भी मैं लैक्चरर ही था ! वह लैफ्टिनेंट बना, कैप्टन बना, मेजर बना और अब लैफ्टिनेट कर्नल बन गया है। अब भी मिलता है, पहला प्रश्न पूछता है, ‘स्टिल ए लैक्चरर ?’ मैं कहता हूँ, ‘हाँ।’ तो परेशान होकर कहता है, ‘पर यार ! तेरा तो रिकार्ड तो बहुत अच्छा है।’ मैं हँसकर टाल देता हूँ। एक सैनिक को यह समझाना बहुत मुश्किल है कि एक व्यक्ति योग्य भी हो, परिश्रमी भी हो, और उसका रिकार्ड भी अच्छा हो तो उसकी पदोन्नति क्यों नहीं होती।’’

‘‘मुझे नहीं !’’ विनीत हँसा, ‘‘सीधी सी बात है कि मैं अपने किसी भी यूनिवर्सिटडी हैड के इतने निकट नहीं गया कि मैं उनका इतना प्रिय हो जाता कि वह मुझे रीडर बनाकर यूनिवर्सिटी में बुला लेता.....।’’
‘‘पर क्यों नहीं गए तुम उनके निकट ! ’’ वह बोली ,
‘‘After all it should not have at all been difficult for you with all your published  books and that too of creating writing’’

‘‘यह तो नीति की बात है।’’ विनीत ने उत्तर दिया, ‘‘यूनिवर्सिटी हैड के निकट इसलिए नहीं पहुँच सका, क्योंकि वहाँ तक पहुँचने का रास्ता न योग्यता है, न श्रम है ! जो दूसरे रास्ते हैं, उन पर चलने की अनुमति न मेरा स्वभाव देता है, न काम।’’
‘‘काम क्या कहता है ?’’
‘‘समय मिलते ही लिखने के लिए अपनी मेज़ से चिपक जाता हूँ, इसलिए किसी हैड से चिपकने का समय ही नहीं बचता।’’ विनीत हँस पड़ा, ‘‘और हैड लोग कहते है कि कुर्सी इतनी प्यारी है तो उसी से ले लो रीडर और प्रोफेरशिप।.......
एक सज्जन आए, ‘‘Your are Dr. Patterson from Canada’’
 ‘‘जी।’’ केतकी हिंदी में ही बोली।

‘‘जी मैं हूँ शोक-संतप्त। डॉ० शोक-संतप्त।’’ उसने अपने दाँतो के साथ-साथ मसूडो़ के एक बड़े भाग की प्रगर्शनी कर दी।  
विनीत के मन में आया, कहे, ‘डॉ० के साथ शोक-संतप्त के स्थान पर रोग-संतप्त शब्द ज्यादा अनुकूल बैठेगा।’ और साथ ही विनीत ने अनुभव किया उसके भीतर विनीत-शत्रु बहुत उल्लासित होकर उसे उकसा रहा है ‘कह दे मज़ा आ जाएगा।’  
विनीत सँभल गया। कहीं यह विनीत-शत्रु मुझे फँसा न दे। ‘‘कहिए !’’
‘‘जी ! मैं कवि हूँ।’’ डॉ० शोक-संतप्त मुसकराए ही जा रहे थे, ‘‘कनाडी कविता की प्रकृति समझने के लिए आपके साथ थोड़ी देर के लिए बैठना चाहता हूँ.....’’
‘‘लंच के बाद बैठेगे।’’ केतकी ने उसकी बात पूरी नहीं  होने दी। वह विनीत की ओर घूम गई, ‘‘तो तुम्हारी मेज़ तुम्हें रीडरशिप नहीं दे सकती क्या ?’’ केतकी के स्वर में ईमानदार जिज्ञासा बोल रही थी, ‘‘तुम्हारे लेखन के आधार पर तुम्हें यूनिवर्सिटी में ऊँचा पद मिल सकता है।’’

‘‘अब तक न भी लगा होता तो अब लग रहा है कि तुम कनाडा से आई हो।’’
‘‘क्यों ?    ’’
‘‘हमारी यूनिवर्सिटी में सर्जनात्मक लेखक का कोई स्थान नहीं है।’’ ‘‘आखिर सीहित्य में पढ़ाया तो सर्जनात्मक लेखक ही जाएगा।’’
‘‘मजबूरी में पढ़ाते है।’’ विनीत बोला, ‘‘इनका बस चले तो ये लोग पाठ्यक्रम में भी प्रोफेसर-हैड की लिखी आलोचनात्मक कुंजियाँ ही पढ़ाएँगे। यहाँ तो हालत यह है कि यदि नियुक्ति के लिए इनके सामने बाबा तुलसीदास हों और उनके साथ दूसरे प्रत्याशी बालकांड की कुंजी लेकर जहांगीर लेखक जहाँगीर प्रसाद हों, तो नियुक्ति जहाँगीर प्रसाद की ही होगी, क्योकि उसे आलेचक माना जाएगा और आलोचक सदा ही विद्धान् भी होता है और प्रोफेसर-हैड के गोत्र का भी।’’ केतकी उसे चुपचाप देखती रही। तुम गलत जगह फँस गए लेखक !’’ फिर रुककर बोली, ‘‘चलो यह तो एक मोर्चा है। यह बताओ कि दूसरा मोर्चा कैसा चल रहा है ?’’

विनीत कुछ बोला नहीं। बस देखता रहा।
‘‘नहीं समझे ?’’
‘‘नहीं।’’
‘‘विवाह किससे किया वहीं जो तुम्हारी एम०ए० वाली प्रेमिका थी, उससे ?’’
विनीत ने चारों ओर दृष्टि घुमाईः नहीं ! बहुत निकट कोई नहीं था। केतकी शायद नहीं समझ रही थी कि यह विषय कितना नाजुक है। वह तो एक-आध सप्ताह में वापस लौट जाएगी, पर उसके एक-आध वाक्य को पकड़कर यहाँ पीछे विनीत को महीनों परेशानी झेलनी पड़ सकती है।.....उसने देखा, एक कोने में खड़ा कवि शोक-संतप्त ज़रूर उसकी ओर देख रहा था। शेष सब लोग कहीं-न-कहीं व्यस्त थे।
‘‘नहीं ! विनीत बोला, ‘‘उससे विवाह नहीं हो सका।’’
‘‘दुखी हो ?’’
‘‘नहीं ! कोई ऐसा दुखी भी नहीं हूँ।’’

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