नये युग के रासायनिक तत्व - डी. वी. जहागीरदार Naye Yug Ke Rasaynik Tattva - Hindi book by - D. V. Jahagirdar
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नये युग के रासायनिक तत्व

डी. वी. जहागीरदार

प्रकाशक : नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया प्रकाशित वर्ष : 2004
पृष्ठ :65
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 4613
आईएसबीएन :81-237-1711-3

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रासायन विज्ञान में प्राप्त हुए कुछ नये तत्वों की जानकारी देती हुई यह पुस्तक...

naye yug ke rasaynik tatva D. V. Jahageerdar

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

यह पुस्तक वर्तमान युग में रासायनिक तत्वों के उन पहलुओं के बारे में रोचक पठन सामग्री प्रस्तुत करती है, जिनके विषय में अधिक जानकारी नहीं है। आम पाठकों और वैज्ञानिकों दोनों को संबोधित इस पुस्तक में वायुमंडल और भूपर्पटी में पाए जाने वाले तत्वों एवं यौगिकों की चर्चा की गयी है हालांकि पुस्तक में केवल सामान्य तत्वों के असामान्य और प्रोद्योगिकी संबंधी महत्वपूर्ण गुणधर्मों का विवेचन किया गया है, फिर भी उच्च चालकता, कंप्यूटर और अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में दुर्लभ एवं मानव निर्मित तत्वों पर विशेष बल दिया गया है।

डॉ. डी.वी.जहागीरदार मराठवाड़ा विश्वविद्यालय, औरंगाबाद में रसायनशास्त्र के प्रोफेसर हैं, जहां वे पिछले पैंतीस वर्षों से स्नातकोत्तर विद्यार्थियों को पढ़ा रहे हैं। वह 1977-78 में जार्जिया स्टेट यूनिवर्सिटी, अटलांटा (अमेरिका) तथा 1983-84 में यूनिवर्सिटी आफ डेलावरे, नेवार्क (अमेरिका) में ‘पोस्ट-डॉक्टरल फैलो’ रहे। उनकी तीन पुस्तकें और अस्सी से अधिक अनुसंधान आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। वह मराठी पत्र-पत्रिकाओं में लोकोपयोगी विज्ञान संबंधी रचनाएं प्रायः लिखते रहते हैं।

प्रस्तावना

प्रस्तुत पुस्तक रासायनिक तत्वों और हमारे जीवन में उनके द्वारा निभाई जाने वाली महत्त्वपूर्ण भूमिका के बारे में है। ऐसी आश्चर्यजनक और सर्जनात्मक कृति की प्रस्तावना लिखने में मुझे अतिप्रसन्नता हो रही है।

यदि विज्ञान को सामान्य जन तक पहुंचना है तो यह आवश्यक है कि वैज्ञानिक विचारधाराएं यथासंभव सरलतम भाषा में विभिन्न संचार साधनों के द्वारा प्रस्तुत की जाएं। प्रस्तुत कृति इस प्रयोजन की भली-भांति पूर्ति करती है।

इस पुस्तक की कई विशेषताएं हैं जिनसे मैं बहुत प्रभावित हुआ। सर्वप्रथम लेखक ने लेखन में सरल और सुगम शैली का प्रयोग किया है। यदि इस प्रकार के जटिल विषय को ऐसी बोधगम्य शैली में प्रस्तुत किया जाए तो इसे साधारण व्यक्ति भी समझ सकता है। दूसरी बात यह है कि इस पुस्तक में वास्तविक जीवन के कई उदाहरण दिये गये हैं जिन्हें पाठक अपने जीवन से जो़ड़ सकता है। तीसरे लेखक ने बहुत से उदाहरणों में सुंदर ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का विवेचन किया है। वस्तुतया यह उन पूर्व वैज्ञानिकों का ही तो प्रयास है जिन पर हमारा आधुनिक ज्ञान आधारित है और जिन्होंने वैज्ञानिक अन्वेषण में अपना जीवन समर्पित किया। मुझे इस बात का गर्व है कि मैं वैज्ञानिक हूं। मुझे यह कहने में कोई झिझक नहीं है कि हम वैज्ञानिक आज जो प्रयास और परिश्रम करते हैं, वह हमारे पूर्ववर्ती वैज्ञानिकों के प्रयास और परिश्रम की तुलना में कुछ भी नहीं है। ऐसे प्रेरणाप्रद उदाहरण हमें अधिक उत्साह के साथ विज्ञान के प्रति पुनः समर्पित होने में सहायक होते हैं।

महत्वपूर्ण जानकारी के अतिरिक्त उपर्युक्त तथा अन्य गुणों, के कारण यह पुस्तक एक बहुमूल्य योगदान है। मुझे विश्वास है कि विद्यार्थी, अध्यापक, सामान्य व्यक्ति और यहाँ तक कि वरिष्ठ वैज्ञानिक भी इस पुस्तक का स्वागत करेंगे। मैं इस उल्लेखनीय रचना के लिए डॉ. जहागीरदार को हार्दिक बधाई देता हूँ।

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तत्वों की दुनिया


हम अपने चारों ओर विभिन्न प्रकार के पदार्थ और वस्तुएं देखते हैं। हमारे घर में मेज, कुर्सियां, बाल्टियां, भोजन पकाने के बर्तन, केतलियां, जल तथा पौधे आदि बहुत-सी वस्तुएं हैं। ये वस्तुएं किससे बनाई जाती हैं ? उदाहरणार्थ, लकड़ी से मेज, प्लास्टिक से बाल्टी, ऐलुमिनियम से केतली स्टेनलेस स्टील से भोजन पकाने के बर्तन तथा सूत से कपड़े बनते हैं। हम आकाश में सूर्य, चांद, ग्रह तथा तारे देखते हैं। पृथ्वी अथवा आकाश की वस्तुएं जिससे बनी हैं, उसे वैज्ञानिक द्रव्य कहते हैं। हम जिन वस्तुओं को देखते हैं यदि उनका सावधानीपूर्वक विश्लेषण करें तो पता चलेगा कि ये द्रव्य के विभिन्न प्रकार हैं जो स्थान घेरते हैं और जिनका द्रव्यमान होता है। वस्तुएं सामान्यतया तीन अवस्थाओं-ठोस द्रव तथा गैस के रूप में पाई जाती हैं। बर्फ, जल और वाष्प इन तीन अवस्थाओं के सरल उदाहरण हैं।

यदि हम ऐसी 50 वस्तुओं की सूची बनाएं, चाहे वे जीवित हों या अजीवित, दृश्य हों या अदृश्य पारदर्शी हों या अपरादर्शी और इन्हें अवस्था के अनुसार अलग-अलग करें तो हम देखेंगे कि कुछ रूपों को पहचानने में हमें कोई कठिनाई नहीं होगी। हम ठोसों को लकड़ी, लोहा या संगमरमर की भांति और द्रवों को जल, दूध या पेट्रोल की भांति देख तथा स्पर्श कर सकते हैं। परंतु गैसों को द्रव्य के रूप में पहचानना आसान नहीं है और हम उन्हें वास्तव में ‘स्पर्श’ नहीं कर सकते। परंतु, यदि हम अपने हाथ की हथेली पर श्वास छोड़ें, तो हम फेफड़ों से तेजी से बाहर निकलने वाली गैसों का अनुभव कर सकते हैं।
कभी-कभी हम देखते हैं कि वे पदार्थ जिन्हें हम शुद्ध समझते हैं वे वास्तव में उतने शुद्ध नहीं हैं जितना हम समझते हैं। समुद्र जल के भाप बनने पर लवण शेष रह जाते। जिनमें सोडियम क्लोराइड भी होता है। अब यदि गलित सोडियम क्लोराइड में विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है तो लवण, धातु सोडियम और क्लोरीन नामक गैस में विघटित हो जाता है। आभासी रूप से सरल दिखने वाले पदार्थों का इस प्रकार अन्य पदार्थों में विघटन ऐसी अवस्था तक होता रहता है जब हमें पता चलता है की सभी द्रव्य केवल लगभग एक सौ ‘शुद्ध’ पदार्थों से निर्मित हैं जिन्हें विश्लेषण की सामान्य विधियों द्वारा और सरल पदार्थों में विघटित नहीं किया जा सकता। दूसरे शब्दों में हम, कह सकते हैं कि हम अपने चारों ओर जो वस्तुएं देखते हैं वे केवल कुछ ही रचक-खंडों से बनी हैं जिन्हें हम तत्व कहते हैं। सामान्यतया इस शब्द का अर्थ कुछ मूलभूत, कुछ सरल है जिसकी सहायता से अधिक संकुल पदार्थ बनाए जा सकते हैं। कार्बन, सिलिकन, आक्सीजन, लोहा (आयरन), तांबा (कापर), चांदी (सिल्वर), हाइड्रोजन आदि कुछ सामान्य तत्व हैं। किसी रासायनिक अभिक्रिया में दो या अधिक तत्व संयोग करके यौगिक बनाते हैं। हम जो पदार्थ देखते हैं वे वास्तव में दो या अधिक तत्वों के संयोग से बने यौगिक होते हैं। जल वस्तुतया हाइड्रोजन और आक्सीजन का यौगिक है। इसके विपरीत हाइड्रोजन और आक्सीजन, किसी भी प्रकार की ऊर्जा (ऊष्मा, प्रकाश या विद्युत) के द्वारा अपघटित नहीं हो सकते हैं। सामान्य अवस्थाओं में बहुत से तत्व, जैसे सोना, लोहा, तांबा तथा सीसा ठोस होते हैं। ब्रोमीन, पारा जैसे तत्व द्रव होते हैं, तथा आक्सीजन नाइट्रोजन और क्लोरिन जैसे अन्य तत्व गैसें होती हैं।

हालांकि प्राचीन और मध्ययुगीन दर्शन के अनुसार तत्वों को क्षति (पृथ्वी) पावक (अग्नि) वायु और जल नामक चार सरल पदार्थों के रूप में माना जाता था और यह कल्पना की गयी थी कि इन्हीं से सभी द्रव्य-वस्तुओं का निर्माण हुआ है। पूर्व-वैज्ञानिक रसायन में तत्वों की विभिन्न प्रकार से गणना की जाती थी और अंतिम संख्या पांच या छह होती थी, जैसे स्प्रिट, लवण, गंधक, जल तथा पृथ्वी; अथवा जल, तेल, वायु लवण तथा पृथ्वी।

रासायनिक अभिक्रियाओं के अपने प्रयोगिक अध्ययन से प्राप्त आंकड़ों का प्रयोग कर, फ्रांसीसी रसायनज्ञ एंतोइन लेवाइज़्ये ने सर्वप्रथम तत्वों की एक वैज्ञानिक सूची बनाई जिसे उसने अपनी सुप्रसिद्ध पुस्तक ट्रेटे इलिमेन्टेरे द काइम (1789) (Traite Elementaire de chime 1789) में प्रकाशित किया। उसने अपनी सूची में केवल 23 शुद्ध तत्वों को सम्मिलित किया जिन्हें हम आज जानते हैं। सूची में अन्य पदार्थ वे थे जिन्हें उसने ‘क्षार’ कहा, जो मुख्यतया कुछ धातुओं के आक्साइड थे। विलक्षण बात यह थी कि उसने अपनी सूची में ‘प्रकाश’ और ‘कैलोरी’ को भी शामिल किया जिनका न तो द्रव्यमान होता है और न ही जिनके तत्वों में परिभाषित अभिलक्षण थे।

एलेसेन्ड्रो वोल्टा द्वारा धारा विद्युत का आविष्कार (1800) अधिक सक्रिय तत्वों के यौगिकों से उन सक्रिय तत्वों को पृथक करने का प्रभावी साधन प्राप्त हुआ। इसके बाद शीघ्र ही सर हम्फ्री डैवी ने सोडियम और पोटैशियम के गलित हाइड्राक्साइडों के विद्युत अपघटन से, क्रमशः सोडियम और पोटैशियम तत्व प्राप्त किये जिससे यह सिद्ध हुआ कि सोडियम और पोटैशियम के हाइड्राक्साइड यौगिक हैं, जैसी कि लेवाइ़ज्ये को आशंका थी। 1969 में मेंदलीफ द्वारा आवर्त नियम के प्रतिपादन से नए तत्वों की खोज के लिए अधिक प्रेरणा मिली क्योंकि मेंदलीफ ने न केवल उनके अस्तित्व अपितु उनके संभाव्य गुणधर्मों के बारे में भी पूर्वानुमान किया था। उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक ज्ञात तत्वों की संख्या बढ़कर 82 तक हो गयी और द्रव्य की प्रकृति और संरचना के बारे में हमारे विचारों में परिवर्तन आने लगा। 1950 के दशक के अंत तक ज्ञान तत्वों की संख्या 102 थी, जिनमें 10 तत्व प्रकृति में या तो रासायनिक दृष्टि से मुक्त अवस्था में अथवा अन्य तत्वों के साथ संयुक्त रूप से पाये जाते थे।

प्रकृति में पाये जाने वाले लगभग 90 तत्वों में से लगभग 30 तत्व पृथ्वी पर रासायनिक दृष्टि से मुक्त रूप से पाये जाते हैं, अर्थात् वे अन्य तत्वों के साथ रासायनिक रूप से संयुक्त नहीं हैं। स्पष्ट है, ये तत्व रासायनिक दृष्टि से बहुत सक्रिय नहीं हैं और उदाहरणस्वरूप इनके अंतर्गत नाइट्रोजन, स्वर्ण (गोल्ड), प्लेटिनम, तांबा (कापर) तथा अक्रिय गैसें आती हैं। हालांकि, पर्याप्त सक्रिय तत्व आक्सीजन भी असंयुक्त अवस्था में वायुमंडल में पर्याप्त मात्रा में पायी जाती है, और यह जल, शैलों और खनिजों में संयुक्त अवस्था में मिलती है।

आधुनिक अर्थ में ‘तत्व’ शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम राबर्ट बॉयल ने लगभग 1662 में किया था और लेवाइज़्ये ने 1789 में उसकी स्पष्ट परिभाषा ‘द्रव्य का सरलतम प्रकार’ के रूप में दी थी।

तत्व अक्षर की तरह और द्रव्य शब्दों की तरह हैं। जब अक्षरों को विभिन्न प्रकार से जोड़ा जाता है तो अलग-अलग शब्द बन जाते हैं। प्रत्येक शब्द का नया अर्थ होता है। उसी प्रकार तत्वों के संयोग से बने प्रत्येक यौगिक के अपने गुणधर्म होते हैं।
प्रत्येक तत्व का अंतर्राष्ट्रीय रूप से मान्य एक प्रतीक होता है, जिसका उसके नाम के स्थान पर प्रयोग किया जा सकता है। सरलतम प्रतीक उस तत्व के नाम का प्रथम अक्षर होता है, जैसे-हाइड्रोजन (H) आक्सीजन (O) नाइट्रोजन (N) इत्यादि। ऐसे बहुत-से तत्व हैं जिनके प्रतीक में दो अक्षर हैं, जैसे कैल्सियम (Ca) कैडमियम (Cd) क्रोमियम (Cr) कोबाल्ट (Co) तांबा (Cu) (क्यूप्रम से) सीसा, अर्थात् लेड (Pb) (प्लम्बम से) सोडियम (Na) (नेड्रियम से) इत्यादि प्रकृति में पाये जाने वाले तत्वों की संख्या अक्षरों की संख्या से कहीं अधिक है, और आज ज्ञात तत्वों की कुल संख्या 109 है। इनमें 90 तत्व प्रकृति में या तो रासायनिक दृष्टि से मुक्त रूप में, अथवा अन्य तत्वों के साथ संयुक्त रूप से पाये जाते हैं। शेष तत्व कृत्रिम रूप से बनाए गये हैं।

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