अनोखा साधू - ओम प्रकाश सोंधी Anokha Sadhu - Hindi book by - Om Prakash Sondhi
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अनोखा साधू

ओम प्रकाश सोंधी

प्रकाशक : फीनिक्स बुक्स इंटरनेशनल प्रकाशित वर्ष : 2006
पृष्ठ :175
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4620
आईएसबीएन :81-89356-08-9

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चाणक्य के जीवन पर आधारित कथा। एक रोचक ढंग से

Anokha Sadhu

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

पागलों की भाँति नगर में घूमने वाला, लोगों से चाहे-अनचाहे बातें करने वाला और माँग कर खाने वाला साधु पाटलिपुत्र की जनता को अनोखा इसलिए लगता था क्योंकि किसी को पता नहीं था कि वह कहाँ से आया है और क्यों आया है।
एक दिन साधु देवपाल नगर के बाज़ार में घूमते हुए अजीब-सी हरकतें करने लगा और तब अदृश्य हो गया। राजा धननन्द के सिपाही उसकी खोज करते रहे परन्तु वह किसी जादूगर की भाँति गुम हो गया था।

जब वह दोबारा सामने आया तो उसके सामने नन्द वंश के साम्राज्य को नष्ट करने का उदेश्य था। इस बीच वह बिना बाप के एक लड़के चन्द्रगुप्त का लालन-पालन करता रहा था, उसको शिक्षा दिलाता रहा। चन्द्र को इस योग्य बना दिया कि वह अपने पिता की मौत का बदला ले सके। चन्द्रगुप्त की मुलाकात एक जिद्दी और दृढ़निश्चयी पण्डित से होती है। तब शक्ति और बुद्धि के मिलन से भारत का इतिहास बदल जाता है।
तब अनोखे साधु का रहस्य खुलता है। वह सच ही अनोखा होता है।

अनोखा साधू

उस दिन भी वह सारा दिन घूमता रहा था। एक बाजार से दूसरे बाजार में, एक बस्ती से दूसरी बस्ती और प्रत्येक दुकान को ध्यान से देखता हुआ चुपचाप चलता रहा था। उस दिन से पहले लोगों ने उसको इस प्रकार गुमसुम और चुपचाप चलते हुए नहीं देखा था। वह तो सबसे बतियाता रहता था, प्रत्येक दुकान के स्वामी से, प्रत्येक मिलने वाले व्यक्ति से वह बात करता था। किसी का हाल पूछता तो किसी के घर के विषय में प्रश्न करता। किसी के बच्चों के भविष्य के बारे में पूछता तो किसी की लड़की के विवाह के बारे में बात करता। दुकानदारों से उनके व्यापार के विषय में तो ग्राहकों से उनके व्यवसाय के बारे में बतियाता रहता था। मार्ग में मिलने वाले व्यक्ति का ध्यान अपनी ओर बरबस कर लिया करता था और उसकी कुशलक्षेम पूछा करता था। यदि किसी का ध्यान उसकी ओर नहीं होता तो वह उसको आवाज देकर बुलाता। उसके स्वास्थ्य के बारे में पूछता, उसके माता-पिता का हाल-चाल मालूम करता, उसके बीमार बच्चे की बीमारी का पता करता। सुनार से गहनों के बारे में पता करता तो लोहार से दराँती और हल के विषय में पूछताछ करता। यदि राजा का कर्मचारी मिल जाता तो देश की आर्थिक दशा, देश की सुरक्षा और शासक के व्यक्तित्व के बारे में प्रश्न करता और उसके विचार पूछता। सब लोग उसके प्रश्नों का सहर्ष उत्तर दिया करते थे मानो उसके बतियाने से वे प्रसन्न हुआ करते थे वह एक मस्तमौला साधु था। किसी काम से और किसी के काम से उसका कोई निजी स्वार्थ नहीं था, कोई लेना-देना नहीं था। उसकी अपनी कोई इच्छा नहीं थी, अपना कोई शौक नहीं था। उसकी किसी के साथ किसी प्रकार की कोई शत्रुता नहीं थी, बल्कि वह तो सभी का भला चाहता था और आशीर्वाद देते हुए नहीं थकता था, उसके सुख के लिए भगवान से प्रार्थना किया करता था। बाजार में घूमते रहना साधु देवपाल का नित्य का काम था। वह साधुओं जैसे साधारण कपड़े पहनता था। लोग उसे साधु ही तो समझते थे।

परन्तु उस दिन वह चुपचाप था। बिल्कुल मौन। अपने में डूबा हुआ सा, जैसे उसके लिए सारा नगर कहीं दूर चला गया हो, नगर के लोग और दुकानें कहीं छुप गईं हों और वह किसी जगंल में से होकर जा रहा हो। किसी वस्तु का कोई अस्तित्व नहीं रहा हो। जनता उसकी ओर देखती और प्रतीक्षा करती कि वह उससे बात करेगा, परन्तु वह चुपचाप पास से निकलता जा रहा था। व्यक्ति जो कुछ समय पहले उससे बात करने के लिए लालायित था, साधु के पास से चुपचाप निकल जाने के कारण पहले तो घबरा जाता, तब चकित हो जाता और अन्त में असमंजस में पड़ा हुआ सोचने पर विवश हो जाता था।
साधु देवपाल नगर में नया नहीं था। मगध साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र में वह चार वर्ष पहले आया था। वह कहाँ से आया था इस बात का किसी को पता नहीं था। वह कौन था, कब साधु बना और क्यों बना, कौन-सी बात ने उसे संसार के सुख छोड़ कर विरक्ति की ओर आकर्षित कर दिया था, इन बातों की ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया। लोग तो यह जानते थे कि वह एक साधु था और साधु का सा जीवन व्यतीत कर रहा था। नगर के बाहर उसने एक छोटी सी कुटिया बना ली थी। दो कमरे के मकान में ईंट और पत्थर का प्रयोग कम ही किया गया था और खपरैल अधिक मात्रा में प्रयोग की गई थी। देवपाल को उस मकान में रहते हुए लोगों ने कम ही देखा था। रात व्यतीत करने के लिए वह किसी के घर का किवाड़ खटखटा दिया करता था। लोग प्रसन्नतापूर्वक उसको आश्रय दे देते और खाना खिला दिया करते थे जबकि वह स्वयं किसी को खाने के लिए कहता नहीं था। उसने कभी किसी से अपने मुँह से कुछ नहीं माँगा था। लोग उसको एक मस्तमौला साधु के रूप में पहचानने लगे थे; जिसका इस संसार में अपना कोई नहीं था। उस दिन वह चुप था। लोगों को अचरज तो हुआ था तब भी वे कुछ नहीं बोले थे। किसी को साधु से पूछने का साहस नहीं हुआ। चुप्पी को वे सब तो साधु की प्रवृत्ति ही मानते थे। साधु सम्भवतः भगवान की भक्ति में लीन होगा ऐसा कुछ लोगों ने सोचा था। दोपहर के समय वह सुनार महिपाल की दुकान के आगे से जा रहा था कि अकस्मात् रूक गया। पहले भी वह उस दुकान के आगे से दो बार निकल गया था। उसने महिपाल से उसका हाल पूछा था। उसके अभिनन्दन का उत्तर मुस्करा कर दिया था और हाथ उठाकर आशीर्वाद भी दिया था। इस समय वह अकस्मात् रूक गया था। महिपाल के साधु की ओर ध्यान से देखा और घबरा गया। बिना बोले साधु चुपचाप कभी नहीं खड़ा हुआ था। वह जानता था कि साधु देवपाल महल में जाता था। राजन से बातें करता था। राजन जानता था कि साधु सदा सच बोलता था। मगध का राजन धननन्द देवपाल को वैरागी समझता था। वह समझ गया था कि देवपाल को संसार और सांसारिक गतिविधियों से कोई मोह नहीं था। इसी कारण वह साधु की बात मान लिया करता था। कुछ लोग कभी-कभार असमंजस में पड़ सोचने लग जाते थे कि साधु जैसा भेस और साधु जैसी प्रवृत्ति वाला देवपाल वन में क्यों नहीं रहता जबकि उसकी कुटिया वन में है। वह क्यों नगर में रहता था और नगर के ही किसी घर में सो जाता था। साधु का सारा समय पूजा-पाठ में व्यतीत होना चाहिए, भक्ति और समाधि में व्यतीत होना चाहिए। परन्तु बहुत से लोग, जो मन में उसकी भक्ति करते थे समझते थे कि इतना पहुँचा हुआ साधु यदि जंगल में बैठा रहे तो संसार के व्यस्त लोगों को उसके दर्शन नहीं हो पाएँगे और उससे आशीर्वाद नहीं ले सकेंगे। महान साधु के दर्शन करने के लिए मनुष्य को जंगल में जाना पड़ता है जबकि उनके भाग्य के कारण उनको साधु के दर्शन घर में ही हो जाते हैं। और तो और उनको साधु को अपने घर में ठहरने और खाना खिलाने का सुअवसर मिल जाता है जिससे पुण्य कमाकर स्वर्ग में स्थान प्राप्त करने के अधिकारी बन जाते हैं। उनके अनुसार भगवान ने स्वयं अपना रुप उनके पास भेज दिया था जिसकी संगत प्राप्त करके उनके पाप घुल जाएँगे। साधु के दर्शन करके, उसका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए उनको परिश्रम नहीं करना पड़ता। वे समझते थे कि जब कोई साधु से मिलता था तो साधु उनकी कुशल पूछता था। उसके बाल-बच्चों के बारे में पता करता और उसको ढेरों आशीश दिया करता था। इसके बदले में उसने किसी से कभी कुछ नहीं माँगा था। यहाँ तक कि वह तो खाने को भी कुछ नहीं माँगता था। लोग ही उसको खाना खिला दिया करते थे।

राजा धननन्द साधु की बातों को सुना करता था। उसने उसकी बातों को कभी गम्भीरता से नहीं लिया था। वह केवल उसकी हाँ में हाँ मिला दिया करता था। देवपाल ने कभी राजा से कुछ नहीं माँगा था, कभी किसी मनुष्य का काम कर देने के लिए अनुरोध नहीं किया था। हाँ, उसने अनेक बार लोगों पर दया दिखाने के लिए राजन से प्रार्थना की थी। इससे धननन्द के दिल पर साधु के दयावान होने की छाप पड़ गई थी। जब कभी देवपाल किसी मन्त्री के विषय में बात करता तो राजन उसकी बात को हँसी में टाल दिया करता था।
परन्तु महिपाल डर रहा था कि कहीं देवपाल राजा को उसके बारे में कुछ न कह दे और कहीं राजन उसकी बात को सच न समझ ले। यदि ऐसा हुआ तो वह किसी मुसीबत में पड़ जाएगा जबकि उसका कोई दोष भी नहीं होगा। वह जानता था कि शासकों के मन का पता नहीं होता, किस समय वे किस मनःस्थिति में होते हैं। इस बात का पता लगाना जनता के लिए कठिन होता है।

महिपाल नगर का सबसे प्रसिद्ध सुनार था। वह कोई पाँच वर्ष पहले पाटलिपुत्र में आकर बस गया था। वह कहाँ से आया था इस बात का पता किसी को नहीं था। उस समय लोग दूसरों के बारे में पूछताछ करने के इच्छुक नहीं हुआ करते थे। उन दिनों जनता को घूमने-फिरने की स्वतन्त्रता थी और वह अपनी इच्छा से कहीं भी आ-जा सकती थी, रह सकती थी और काम-धन्धा कर सकती थी। किसी के आगे-पीछे के विषय में मीन-मेख नहीं निकाली जाती थी।

महिपाल कुछ ही समय में नगर में प्रसिद्ध हो गया था। उसकी कारीगरी की धूम राजा के महलों तक पहुँच गई तो राजन ने उसको अपने पास बुलाया महिपाल को गहने बनाने के लिए दिए। महिपाल ने इतने अच्छे गहने बनाए कि राजा और उसकी रानियों को बहुत पसन्द आए। अब तो रानियों और राजप्रासाद के लोगों ने महिपाल से गहने बनवाने आरम्भ कर दिए। राजन का अनुसरण करते हुए नगर के प्रभावशाली व्यक्ति और मन्त्री भी उससे कांम करवाने लगे थे। इस कारण नगर के वरिष्ठ पदाधिकारियों और प्रतिष्ठित व्यक्तियों से उसकी जान-पहचान हो गई थी। वह अपने साथ दो भाई लेकर आया था। एक भाई का नाम शिव और दूसरे का शंकर था। दोनों भाई गहने बनाने में निपुण थे; क्योंकि गहने बनाने का काम उनके वंश में अनेक पीढ़ियों से चला आ रहा था। दोनों भाई एक गाँव में रहते थे। वह गाँव पिपहलीवन राज्य में था। पाटलिपुत्र में आने से पहले उन्होंने पाटलिपुत्र का केवल नाम सुना हुआ था। उनको बस इतना ज्ञात था कि पाटलिपुत्र मगध राज्य की राजधानी था और अति समृद्ध था। परन्तु वह समृद्धि किस प्रकार की थी वे नहीं जानते थे। क्या सभी लोग धनवान थे अथवा केवल राज्याधिकारी ही समृद्धिशाली थे। क्या साधारण जनता भी सुखी जीवन व्यतीत कर रही थी ? क्या उसके पास खाने को पर्याप्त अनाज, पहनने को पर्याप्त कपड़ा और सिर छुपाने को मकान था ? उन्हें किसी अभाव का एहसास तो नहीं होता रहता था ? अथवा वे सब सुखी जीवन व्यतीत कर रहे थे ? क्या राजन उनकी सुख-सुविधा का ध्यान रखता था अथवा निजी जीवन की उपलब्धियों में खोया रहता था और प्रसन्न था ? महिपाल में शिव और शंकर को रहने के लिए नगर में एक मकान ले दिया था। वह मकान एक वृद्ध बुढ़िया का था जोकि अकेली रहती थी। वृद्ध बुढ़िया का संसार में कोई नहीं था इस कारण वह शिव और शंकर को बेटों जैसा प्यार करने लग गई थी। वह उन दोनों के सुख का पूरी लगन से ध्यान रखती थी।

महिपाल ने जब काम आरम्भ किया था तो वह सारा दिन दुकान पर ही बैठा रहता था। शिव और शंकर काम किया करते और वह ग्राहकों को अपनी बातों से प्रभावित करता रहता। इससे जो कोई एक बार उसकी दुकान पर आ जाता था वह पक्का ग्राहक बन जाता था। एक तो उसने बहुत मेहनत की और साथ में भगवान ने उसका साथ दिया, उसकी मेहनत को सफल बनाया। इसी कारण वह एक वर्ष में ही नगर में प्रसिद्ध हो गया था। एक बार उसने राजन से मिलकर और उससे प्रार्थना करके काम ले लिया था। धननन्द ने उसको केवल एक गहना, एक हार बनाने को दिया था। महिपाल ने हार बनाया तो राजा धननन्द चकित हो गया। हार से आँखें नहीं हटती थीं। धननन्द ने हार रानी को दिखाया तो रानी बहुत प्रसन्न हुई और उसने और गहने बनवाने के लिए प्रार्थना की। इस प्रकार महिपाल ने राजा से काम ले लिया था। राजपरिवार के सभी सदस्य महिपाल से गहने बनवाने लगे। इस कारण महिपाल का राजमहल में आना-जाना और लोगों से मिलना-जुलना आरम्भ हो गया। कोई-न-कोई राज्याधिकारी महिपाल की दुकान पर आ जाता था। महिपाल उसी समय उसका काम करवाना आरम्भ कर देता था। वह चाहता था कि राज्याधिकारी उसके पास बैठा रहे। इसलिए वह उसे कहा करता था कि वह गहना बनता हुआ स्वयं देखता रहे ताकि यदि कोई कमी रह जाए तो उसको दूर कर दिया जाए। उसको उकताहट से बचाने के लिए वह उससे बातें किया करता था। वह बातें होती थीं राजकीय समस्याओं, राजन की सोच और उसके भावी कार्यक्रम के विषय में। अनेक बार महिपाल कुछ ऐसे प्रश्न पूछता जिन का उत्तर देना कठिन होता था। उस समय राज्याधिकारी महिपाल को संदेह की दृष्टि से इस प्रकार देखता मानो पूछ रहा हो कि ऐसे प्रश्न उसको किस प्रकार सूझ जाते हैं। अधिकारी समझ नहीं पाता था कि महिपाल सुनार होते हुए राज्य के विषय में इतनी गहरी बातें किस प्रकार कर लेता है।

एक बार तो एक ग्राहक ने पूछ लिया था, ‘‘मान्यवर, आप राजनीति में इतनी गहरी रुचि लेते हैं। इसका क्या कोई विशेष कारण है ?’’
महिपाल ने उसके ओर देखा। वह मनुष्य टकटकी लगाये ध्यान से उसके मुख की ओर देख रहा था। महिपाल ने झट से अपना मुख दूसरी ओर कर लिया वह अपने मुख पर उभर आए चिन्ता और घबराहट के विचारों को दिखाना नहीं चाहता था। उसने सोचा ही नहीं था कि किसी के मन में इस प्रकार की बेतुकी बात भी आ सकती है। उसको वह मनुष्य अटपटा-सा लगा। उसी ने केवल उससे प्रश्न पूछा था नहीं तो महिपाल ही प्रश्न पूछा करता था। मनुष्य के प्रश्न को महिपाल ने गम्भीता से न लेने का निश्चय कर लिया। तब भी उसको सतुष्ट करने के लिए उत्तर तो देना ही पड़ेगा। ऐसा उसने सोचा।
उसने मुस्कराते हुए कहा, ‘‘अरे मेरे भाई, अब राजनीतिज्ञों से आलू-गोभी के भाव में आए उतार-चढ़ाव के विषय में तो बात नहीं कर सकता। उनको इस बात में भी कोई रुचि नहीं होगी कि एक भवन को बनाने में कितना समय लगेगा और कितना सामान लगेगा। अब आप ही बताओ कि यदि मैं आप से पूछूँ कि विजय प्राप्त करने के लिए सेना का संचालन किस प्रकार करना चाहिए, घुड़सवार सेना को कहाँ खड़ा करना चाहिए, तो क्या आप बता पाएँगे और यदि कोई आपको बताना भी चाहे तो कुछ पल सुनते रहने के पश्चात आप को उकताहट होने लगेगी और आपको निद्रा आने लगेगी। आप उस व्यक्ति से अपना पिण्ड शीघ्रता से छुड़ाने की बात मन में सोचते रहेंगे। अब मैं जब आपसे भवन निर्माण के विषय में बातें करता हूँ तो आप प्रतिप्रश्न का उत्तर बड़े चाव से देते हैं। और बोलते हुए थकते भी नहीं है। है न यही बात ?’’
मनुष्य ने ध्यान से सोचते हुए उसकी ओर देखा। तब अकस्मात् कहा, ‘‘आप ठीक कहते हैं।’’

महिपाल ने देखा कि वह मनुष्य जाते हुए अपना सिर खुजला रहा था। महिपाल समझ गया कि उसके उत्तर से मानो मनुष्य को तसल्ली नहीं हुई थी।
महिपाल सारा दिन दुकान में रहता था और काम करवाने में व्यस्त रहता था। उसका मकान दुकान के पीछे था। सायंकाल दुकान बन्द करके वह मकान के अन्दर चला जाता था और मकान के किवाड़ बन्द कर लेता था। वह किसी से मिलता-जुलता नहीं था। आस-पड़ोस के लोगों से भी वह दूर ही रहता था। किसी के पूछने पर उसने बताया था कि सारा दिन काम करके और ग्राहकों से बातें करके वह इतना थक जाता है कि उसे मेल-मिलाप करने और बातें करने का मन नहीं करता। उसका एक नौकर था बलभद्र। नौकर सारा दिन मकान के अन्दर बन्द रहता था। महिपाल ने उसको बाहर घूमने की आज्ञा नहीं दी थी।

एक बार एक ग्राहक ने पूछ लिया था, ‘‘आप नौकर को घर से बाहर जाने की आज्ञा क्यों नहीं देते ? बेचारा सारा दिन घर में अकेला पड़ा रहता है। ऐसा लगता है जैसे आपने उसे बन्दी बनाकर रखा हुआ है।’’
महिपाल ने पहले उसकी ओर संदेह की दृष्टि से देखा। वह जान लेना चाहता था कि उसके मन में क्या था।
उसने गम्भीरता से कहा, ‘‘श्रीमान, बलभद्र को बिना कारण घूमते रहने की आदत नहीं डालना चाहता। एक बाद यदि आदत पड़ गई तो वह घेरे के काम से जी चुराने लगेगा।’’
महिपाल दुकान बन्द करके घर जाता तो बलभद्र बाहर आता था और घर के लिए सामान इत्यादि का प्रबन्ध किया करता था। बलभद्र के बाल बिखरे हुए थे। उसके मुख पर लम्बी-सी दाढ़ी थी। ऐसा लगता था मानो वह अशिक्षित था उससे कोई बात करता तो वह उसका उत्तर ऊलजलूल तरीके से दिया करता। लोग समझ गए कि वह कोई आधा पागल था। बिना बात के हँस देता था। कोई प्रश्न पूछता तो कभी अनसुना करता तो कभी हँस देता। कभी बताता कि उसको प्रश्न समझ नहीं आया।

परन्तु चार मास पहले महिपाल की दिनचर्या के कुछ परिवर्तन आ गया था। अब वह नगर के बाहर बने प्राचीन शिव मन्दिर में जाने लगा था। नगरवासियों को याद नहीं था कि वह मन्दिर कब और किसने बनवाया था। मन्दिर बहुत विशाल था और अभी तक लोगों को पता नहीं चल सका था कि उसमें कितने कमरे, कितने आँगन और कितने गलियारे थे। पिछले चार मास से महिपाल उस मन्दिर में नित्य जाने लगा था। उसका पड़ोसी रामधन उसको कई दिन देखता रहा। उसको समझ नहीं आ रहा था कि महिपाल नगर में बने अनेक भव्य और महत्त्वपूर्ण मन्दिरों को छोड़कर नगर के बाहर अकेले पड़े हुए मन्दिर में ही क्यों जाता है और वह भी सांयकाल को ही जबकि वह प्रातःकाल कभी नहीं गया। वह जानता था कि पूजा तो प्रातःकाल भी की जाती है। एक दिन महिपाल जब मन्दिर से वापस आ रहा था तो रामधन ने उसे रोक लिया।

उसने पूछा, ‘‘भाई महिपाल जी, आप उजाड़ में बने उस मन्दिर में क्यों जाते हैं जबकि नगर में ही अनेक मन्दिर हैं।’’
महिपाल घबरा गया परन्तु अगले ही क्षण सँभल गया। उसने रामधन को समझाते हुए कहा, ‘‘श्रीमान, आपको सम्भवतः नहीं पता कि शिव का वह मन्दिर पाण्डवों ने बनवाया था। ऐसा भी कहा जाता है कि इसी मन्दिर में भगवान शिव ने पाण्डवों को साक्षात दर्शन दिए थे।’’
रामधन चकित होते हुए बोला, ‘‘आपको किसने बताया ?’’
महिपाल ने कहा, ‘‘जिस नगर से मैं आया हूँ उस नगर के वृद्ध लोगों ने बताया हुआ है।’’
रामधन सिर खुजलाते हुए बोला, ‘‘अच्छा। परन्तु हमने तो कभी नहीं सुना।’’

रामधन के साथ हुई बातचीत के दिन के पश्चात् महिपाल सायंकाल तनिक देर से घर से निकला करता। उस समय तक लोग अपने घरों के किवाड़ बन्द कर चुके होते थे। वह नहीं चाहता था कि लोग उसकी भक्ति के विषय में उससे प्रश्न पूछें। भक्ति करना तो भक्त का अधिकार है और वह चाहे जिस मन्दिर में जाए और जैसे भक्ति करे। परन्तु लोगों के प्रश्न करने के चाव को वह समझता था। लोगों को तो बिना सिर-पैर की बातें खोजने में आनन्द आता था। वह किस-किस को उत्तर देता रहेगा और सन्तुष्ट करने का प्रयास करता रहेगा। इसी कारण उसने मन्दिर जाने का वह समय चुन लिया था जब लोग सोने की तैयारी करने लग जाते थे।
वह मन्दिर के अन्दर चला जाता और बहुत देर तक मन्दिर में ही रहता। एक बार तो वह चार दिन तक मन्दिर के अन्दर रहा। पाँचवे दिन जब लोगों ने उसको दुकान पर देखा तो प्रश्नों की बौछार लगा दी। वह उनको उत्तर देता रहा।
रामधन ने उस दिन उससे पूछा, ‘‘भाई महिपाल, आप तो मन्दिर गए थे। पिछले चार दिनों से आप कहाँ थे ?’’
महिपाल इस प्रश्न के लिए पहले से ही तैयार था।

वह गम्भीरता से बोला, ‘‘क्या बताऊँ भाई रामधन, मैं इस संसार में बिल्कुल अकेला हूँ। मेरा अपना कोई नहीं है। मुझे घर का कोई मोह नहीं है। बस भगवान का आश्रय खोज लिया है। उसकी भक्ति में समय व्यतीत कर देता हूँ। चार दिन पहले जब मैं मन्दिर गया था तो मैं पूजा करने लग गया। मैंने ध्यान लगा लिया। ध्यान में मैं इतना लीन हो गया कि समाधि लग गई। मुझे तो आज पता चला कि मैं चार दिन लगातार भगवान की भक्ति में लीन रहा। भाई, अब तो मन यही करता है कि बाकी का जीवन भक्ति में व्यतीत कर दूँ। वैराग्य ले लूँ।’’
उसने आँखें बन्द कर लीं। रामधन आगे कुछ नहीं पूछ सका। वह चुपचाप अपने घर की ओर चला गया।

इस घटना के दूसरे ही दिन जब महिपाल अपनी दुकान पर बैठा ग्राहक से बातें कर रहा था तभी साधु देवपाल को उसने अपनी दुकान के आगे रुकते हुए देखा था। देवपाल को अपनी ओर एकटक देखते हुए वह सहन नहीं कर सका। साधु का इस प्रकार देखना उसके मन को विचलित कर गया। उसके मन ने कहा कि कोई घटना घटने वाली है। देवपाल को देखकर वह घबरा गया था। वह जानता था कि साधु इससे पहले उसकी दुकान पर इस प्रकार आकर कभी खड़ा नहीं हुआ था और इस प्रकार उसने एकटक नहीं देखा था। महिपाल ने साधु को अनदेखा कर दिया। वह ग्राहक से बातें करता रहा। ग्राहक को भी आभास नहीं होने दिया कि उसने साधु को अपनी तरफ एकटक देखते हुए देख लिया है। देवपाल धीरे-धीरे उसके पास पहुँच गया और घूरकर उसको देखने लगा। महिपाल का दिल धक् से रह गया।
घबराहट को छिपाते हुए वह फीकी हँसी-हँसा और कहा, ‘‘आओ साधु महाराज आज हमारी दुकान को पवित्र करो। कहो, कैसे आए।’’
देवपाल ने दुकान का निरीक्षण किया और अनमने मन से कहा, ‘‘अरे भाई, साधु का क्या ठिकाना और क्या उसकी इच्छा। जिधर पग गए उधर चल दिया। आप सुनाओ। कैसा चल रहा है ? कैसे हो ?’’
महिपाल ने हाथ आकाश की ओर उठाते हुए कहा, ‘‘भगवान शंकर की कृपा है। मुझे तो उसी का सहारा है। उसके सिवाय मेरा और कौन है।’’
देवपाल ने कहा, ‘‘सुना है तुम आजकल भगवान की बहुत अधिक भक्ति करने लगे हो ?’’

महिपाल ने लम्बी श्वास लेते हुए कहा, ‘‘अकेला मनुष्य हूँ। न कोई अपना है और न ही बेगाना। ऐसी अवस्था में भगवान का ही सहारा प्राप्त कर लिया है। अब तो दिल चाहता है कि साधु बन जाऊँ।’’
देवपाल ने कहा, ‘‘परन्तु मेरे भाई, अच्छे मनुष्य को भगवान शीघ्र ही अपने पास बुला लेता है। मुझे लगता है कि तुम भी शीघ्र ही भगवान के पास पहुँच जाओगे।’’
वह कहने के पश्चात् हँस दिया। महिपाल साधु की हँसी का अर्थ नहीं समझ सका। वह भी हँस दिया।
उसने अनमने मन से कहा, ‘‘आओ देवपाल, बैठो।’’ वह बात को बदलना चाहता था।
साधु ने कहा, ‘‘मैं कभी एक स्थान पर टिका ही नहीं। चलते रहना मेरा काम है।’’ उसने एक बार फिर दुकान के अन्दर झाँका और तब आगे बढ़ गया।

देवपाल के जाते ही महिपाल काम में व्यस्त हो गया। वह ग्राहक को गहने दिखाने लग गया। कुछ समय के पश्चात अकस्मात् उसके मुँह से हल्की-सी चीख निकल गई। वह पेट को दबा कर बैठ गया। ग्राहक उसको देख रहा था। महिपाल पेट को दबाता हुआ दोहरा हुआ जा रहा था। लगता था कि उससे दर्द सहन नहीं हो रहा था। ग्राहक को समझ नहीं आ रहा था कि महिपाल के कहाँ और कैसा दर्द हो रहा था।।
ग्राहक ने पूछा, ‘‘क्या हुआ, महिपाल भाई ?’’
वाक्य के पूरा होने से पहले ही महिपाल छटपटाने लग गया था। उसके मुँह से ‘हाय-हाय’ निकल रहा था।
वह बड़ी कठिनाई से अथाह और असहनीय कष्ट से बोला, ‘‘मेरे पेट में बड़े जोर का दर्द होने लगा है। मुझे क्षमा करें। मैं इस अवस्था में काम नहीं कर सकता। आप कल आ जाएँ।’’
ग्राहक उठते हुए बोला, ‘‘हाँ-हाँ, कोई बात नहीं। आप विश्राम करें। मैं कल आ जाऊँगा।’’


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