हिन्दी की श्रेष्ठ बाल कहानियाँ - उषा यादव एवं राजकिशोर सिंह Hindi Ki Shreshtha Bal Kahaniyan - Hindi book by - Usha Yadav, Rajkishore Singh
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हिन्दी की श्रेष्ठ बाल कहानियाँ

उषा यादव एवं राजकिशोर सिंह

प्रकाशक : आत्माराम एण्ड सन्स प्रकाशित वर्ष : 2001
पृष्ठ :264
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 4621
आईएसबीएन :81-7043-489-0

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बच्चों के लिए प्रस्तुत हैं श्रेष्ठ कहानियाँ...

Hindi Ki Shreshth Bal Kahaniyan

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

बच्चे राष्ट्र की आत्मा हैं, क्योंकि यही हैं जिन्हें लेकर राष्ट्र पल्लवित हो सकता है, यही हैं जिनमें अतीत सोया हुआ है, वर्तमान करवटें ले रहा है और भविष्य के अदृश्य बीज बोये जा रहे हैं।
बालक प्रकृति की अनमोल देन हैं, सुन्दरतम कृति हैं एवं सबसे निर्दोष वस्तु हैं, बालक के विकास पर दुनिया का विकास निर्भर है। बालक की सेवा ही विश्व की सेवा है।

इसी बाल सेवा के लिए श्रेष्ठ साहित्य उपस्थित करना हमारा दायित्व है। किन्तु हर बड़ा लेखक बाल साहित्यकार नहीं हो सकता। बाल साहित्यकार के लिए बालक जैसी मानसिकता, सहजता, निश्छलता, भोलापन और बालमन चाहिए।
बालमन को पकड़ना और उसे बाँध लेने का कौशल प्रदर्शित करना सिद्धहस्त साहित्यकार के लिए ही सम्भव है।
ऐसे ही हिन्दी के श्रेष्ठ बाल कथाकारों की प्रतिनिधि कहानियों का यह संकलन है। बालक के मन को मोह लेने वाले भाँति-भाँति के रंग और गंधों के कथा सुमन इसमें संग्रहित हैं।

भूमिका


बच्चे राष्ट्र की धरोहर हैं और राष्टीय चिन्तन की महत्त्वपूर्ण इकाई भी। पर बच्चों के लिए साहित्य सृजन आसान काम नहीं है। जिस बचपन को समय की डगर पर चलते हुए हम बहुत पीछे छोड़ आए हैं, एक रचनाकार के रूप में उसे दुबारा जीना ‘परकाया प्रवेश’ जैसी सिद्धि की अपेक्षा रखता है। चूँकि समय के अन्तराल में बालक की रुचियाँ, स्वभाव और आदतें बदल चुकी होती हैं, इसलिए परिवर्तित बाल मन को पकड़ना और उसे बाँध लेने का कौशल प्रदर्शित करना सिद्धहस्त साहित्यकार के लिए ही संभव है। यही कारण है कि बंगला साहित्य में श्रेष्ठ लेखन की कसौटी ‘बाल-साहित्य’ को माना गया है।

‘बाल-साहित्य’ से आशय बच्चों के लिए लिखे जाने वाले साहित्य से है। पर लिखने-पढ़ने की उम्र से पहले भी लोरियों और दादी-नानी की कहानियों के रूप में एक शिशु बाल साहित्य के श्रव्य रूप में परिचय प्राप्त करता है। पशु-पक्षी, राजा-रानी, परी और देव-दानव की कहानियाँ उसे बहुत भाती हैं। अनाम रचनाकारों की लोक कथाएँ और लोरियाँ ही वह परम्परागत अलिखित बाल साहित्य है जो बाल मन को सर्वप्रथम अनुरंजित करता है। हालांकि आज परी कथाओं के औचित्य पर प्रश्न चिह्न लगाए जा रहे हैं, पर बच्चों की इनके प्रति गहरी ललक नकारी नहीं जा सकती। जब तक बच्चे इन्हें पसन्द करते हैं, तब तक परीकथाओं के दुराग्रही आलोचकों के न चाहने पर भी ये बाल साहित्य में देदीप्यमान रहेंगी।

बाल साहित्य को लेकर बहस के मुद्दे और भी हैं। जब राजा रानी गए तब बच्चों को उनकी कथाओं के माध्यम से सामन्तवादी युग की सार्थकता और कीर्तिगाथा सुनाता कहाँ तक उचित है ? यही बात धार्मिक कथाओं के लिए भी कही जा सकती है। इसका उत्तर है कि राजा रानी नए अवश्य, किन्तु परिवर्तित रूप में उसी मानसिकता को लिए नए राजा असंख्य रूप में आज सर्वज्ञ हैं। धार्मिक नीति जीवन- मूल्य-परक कथाओं की आज भी उतनी ही आवश्यकता है जितनी पहले थी। युग के युग बीत जाने पर भी मानव मन की वृत्तियाँ (परिवर्तित रूप में ही सही) मूलतः वैसी हो हैं। अतः इस सांस्कृतिक विरासत की उपयोगिता आज भी अक्षुण्य है। हमको देखना केवल यह है कि ये तत्त्व बच्चों में अंधविश्वास, धर्मान्धता, विद्वेष और घृणा जैसे भाव तो नहीं भर रहे ? अतएव वही काल्पनिक, धार्मिक कथाएँ आज उपादेय कही जाएँगी, जो देश की प्रजातांत्रिक शासन पद्धति समाजवादी सामाजिक व्यवस्था तथा राष्टीय एकता के लिए प्रेरणाप्रद हों। बच्चे आज अपने आसपास के परिवेश को जानना चाहे हैं और अपने इर्द-गिर्द हर घटना को कौतुक-भरे नजरिये से देखते-परखते हैं। चाहे वह आम चुनाव हो, ओलम्पिक खेल हों, मंगलग्रह का अभियान हो, चन्द्रमा पर पानी मिलना हो या फिर उनके किसी सहपाठी के अपहरण फिरौती का मामला ही क्यों न हो। यही आधुनिकता बोध है और आज के बच्चे की साहित्यिक भूख भी, जिसका वह बाल-साहित्य विशेषतः बाल कहानी के माध्यम से शमन करना चाहता है। इसीलिए बाल कहानी आज की सर्वाधिक लोकप्रिय विधा है।

हिन्दी बाल-कहानी पर्याप्त समद्ध है। इसे ‘पंचतंत्र’ ‘हितोपदेश’ ‘कथासरित सागर’, ‘जातक कथा’ पुरुष परीक्षा, ‘बेताल पज्जविशतिका’ ‘सिंहासन द्वात्रिशिका’ भोज प्रबन्ध ‘शुकसप्तति’ जैसे संस्कृत के कथा साहित्य का रिक्थ प्राप्त है। वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत, पुराण आदि ग्रन्थों के आख्यान, उपाख्यान, नैतिक मूल्यपरक असंख्य कथानक और अनेक महापुरुषों देवी- देवताओं के कथा प्रसंगों की अक्षय गंगोत्री से हिन्दी बाल कहानियों की मन्दाकिनी प्रवाहित हो रही है, जो मानव जीवन के नाना रुपों की व्याख्या करती है। इस समद्ध पृष्ठभूमि वाली हिन्दी बाल कहानी का आयाम अत्यन्त व्यापक है।

हिन्दी बाल-कहानियों का उदय भारतेन्दु युग से माना जाता है। इस काल की अधिकांश कहानियाँ अनूदित हैं। इसके लिए वे संस्कृत की कहानियों के लिए आभारी हैं। सर्वप्रथम शिवप्रसाद सितारे हिन्द ने कुछ मौलिक कहानियाँ लिखीं, इनमें ‘राजा भोज का सपना’ ‘बच्चों का इनाम’ तथा ‘लड़कों की कहानी’ का उल्लेख किया जा सकता है। आगे चलकर रामायण-महाभारत आदि पर आधारित अनेक कहानियाँ द्विवेदी युग में लिखी गईं। किन्तु हिन्दी बाल कहानी अपने स्वर्णिम अभ्युदय के लिए प्रेमचन्द्र जी की ऋणी है। उनकी अनेक कहानियों में बाल-मन का प्रथम निवेश हुआ और उसकी ज्वलंत झाँकी अनेक कहानियों में मिलती है। बालमन के अनुरूप उनकी बहुत सी कहानियाँ जो कि बड़ों के लिए ही थीं, बच्चों ने उल्लास के साथ हृदयंगम की।

इन कहानियों में ईदगाह उनकी उच्चकोटि की बालमन के चित्रण की कहानी है। प्रेमचन्द की अन्य अनेक कहानियाँ हैं जिनमें किशोर मन की अनेक मनोभावना का मनोवैज्ञानिक निरूपण है। इस प्रकार प्रेमचन्द्र ने बाल कहानी का मौलिक स्वरूप प्रस्तुत किया। वही परम्परा स्वतंत्र भारत में नाना रुपों में विकसित होती हुई आज अपने शिखर पर पहुँची हुई है। स्वतंत्रता पूर्ण बाल कहानियाँ, इतिहास, पुराण, उपनिषद् आदि से प्रभावित नैतिक मूल्यपरक, उपदेश प्रधान थीं, बोधकथाएँ थीं तो स्वातंत्र्योत्तर काल में अंधविश्वास विरोधी, समसामयिक जीवन की उथल-पुथल की कहानी बन गई। विज्ञान और लोकहित, राष्ट्रीय चेतना और बालमन का परिष्कार करती हुई मानवेतर जगत का भी समाहार कर इस काल में असंख्य कहानियाँ लिखी गईं। इस प्रकार आज बाल कहानी का क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत है, आधुनिकता बोध, मनोविज्ञान संस्कृति समाज और जीवन की समस्याओं से रू-ब-रू कराने वाली बालमन के अनुरूप अनेक कहानियाँ लिखी जा रही हैं। हिन्दी बाल कहानी का एक समग्र अध्ययन इसके व्यापक आयाम और समृद्धि का सूचक है। आजकल मासिक नवम्बर अंक में श्री देवेन्द्र कुमार ने लिखा था-बच्चों के लिए परिचित या प्रसिद्ध लेखक प्रायः नहीं लिख रहे हैं और यह बात बाल साहित्य के स्वास्थ्य के लिए अच्छी नहीं है।’’ तथा बड़ों के लेखक बच्चों के लिए नहीं लिखते, इस कारण बाल साहित्य में स्तरीय रचनाओं का अभाव हो गया है।’’

इस प्रकार के फतवे देकर वर्तमान बाल-साहित्य को हेय सिद्ध करना उचित नहीं है। सच तो यह है कि हर लेखक बाल-साहित्य लिख ही नहीं सकता। बच्चों के लिए लिखने में बच्चों जैसा मन प्राप्त करना पहली शर्त है और इनी-गिनी, उपहार में प्राप्त रचनाओं को पढ़कर निष्कर्ष निकालना उचित भी नहीं है। सच तो यह है कि हर लेखक बाल-साहित्य लिख ही नहीं सकता। बच्चों के लिए लिखने में बच्चों जैसा मन प्राप्त करना पहली शर्त है और इनी-गिनी, उपहार में प्राप्त रचनाओं को पढ़कर निष्कर्ष निकालना उचित भी नहीं है। समीक्षक बनने से पूर्व पाठक तथा समीक्षक के गुणों को अर्जित करना आवश्यक है।

निश्चय ही हिन्दी बाल-कहानी आज समृद्ध है, आवश्यकता है, उसे व्यवस्थित रूप से पाठकों के पास पहुँचाने की। सतर्क उसका मूल्यांकन करने की। आज हिन्दी बाल-कहानी की धारा निम्न रूपों में प्रवाहित हो रही है-(1) उद्देश्य प्रधान बाल कहानियाँ, (2) पशु-पक्षी सम्बन्धी बाल कहानियाँ- (3) ऐतिहासिक बाल कहानियाँ- (4) साहसिक बाल कहानियाँ, (5) वैज्ञानिक बाल कहानियाँ (6) मनोवैज्ञानिक बाल कहानियाँ, (7) मुहावरा कहावत विषयक बाल कहानियाँ (8) सामाजिक समसामयिक जीवन की बाल कहानियाँ, (हास्य) विनोद परक बाल कहानियाँ, (10) परीकथा लोक कथापरक कहानियाँ और गीत कथाएँ।

उपर्युक्त हिन्दी बाल कहानियों के विकास और समृद्धि में स्वातंत्र्योत्तर काल में योगदान देने वाले कुछ महत्त्वपूर्ण नाम इस प्रकार हैं-
श्री कन्हैया लाल मिश्र प्रभाकर, श्रीमती सावित्री देवी वर्मा, चौहान, मस्तराम विष्णु प्रभाकर, मनोहर वर्मा, हरिकृष्ण देवसरे, व्यथित हृदय, मनहर चौहान मस्तराम कपूर कन्हैयालाल नन्दन, श्यामसिंह शशि, जयप्रकाश भारती, कृष्णा नागर, दामोदर अग्रवाल, शकुन्तला वर्मा, शकुन्तला सिरोठिया, सावित्री परमार, अनन्त कुशवाहा, यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र, रामेश्वरलाल दुबे तथा इस सदी के अन्तिम दो दशकों में कई अन्य महत्त्वपूर्ण बाल कहानीकार क्षितिज पर उदित हुए, इन कहानीकारों ने हिन्दी बाल कहानी को परिमाण और गुणवत्ता की दृष्टि से नई ऊँचाइयाँ प्रदान कीं और हिन्दी बाल कहानी को स्वर्णयुग में पहुँचा दिया है। इन कहानीकारों में-डॉ. उषा यादव, उषा महाजन, क्षमा शर्मा, कमला चमोला, जाकिर अली रजनीश, रमाशंकर, अखिलेश श्रीवास्तव, चमन, इन्दरमन साहू, सुधीर, सक्सेना, कमलेशभट्ट कमल, भगवती प्रसाद द्विवेदी, भैंरुलाल गर्ग, विमला रस्तोगी स्नेह अग्रवाल डॉ. हूंदराज बलवाणी, फकीरचन्द्र शुक्ला, घनश्याम रंजन, परशुराम शुक्ल, नागेश पाण्डेय संजय देशबन्धु शाहजहाँ पुरी आदि।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि हिन्दी बाल कहानी विश्व की किसी भाषा के बाल कहानी साहित्य के समकक्ष रखी जा सकती है, नाना भाव एवं आस्वाद से संवलित इन कहानियों का आयाम व्यापक है। इसी समृद्ध परम्परा के अनुरूप सम्पादकों ने इस संकलन को सजाया है। इसमें सांस्कृतिक कहानियाँ हैं, परीकथा भी है, समसामयिक जीवन से सम्बद्ध उत्कृष्ट कोटि की सामाजिक, वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक कहानियाँ भी हैं। हिन्दी बाल-कहानी पर एक आरोप है कि इसमें राजारानी की, परियों की, सामन्तवाद की पोषक कहानियाँ ही अधिक हैं-कृषकों, मजदूरों, चरवाहों, धीवरों आदि की कहानियाँ नहीं हैं किन्तु इस संग्रह में इस उपेक्षित बाल कहानी के पूर्ण स्वरूप को प्रस्तुत करता है।
आशा ही नहीं, पूर्ण विश्वास है कि ‘श्रेष्ठ बाल कहानियों’ का यह संग्रह हिन्दी बाल कहानी का एक प्रतिनिधि संकलन होकर, हिन्दी बाल-कहानी के विकास में योगदान कर सकेगा।

इस संकनल की अधिकांश कहानियाँ रचयिताओं की दृष्टि में उनकी प्रतिनिधि कहानियाँ हैं। हमें खेद है कि कई नामचीन लेखकों ने हमारे आग्रह करने पर भी अपनी कहानी भेजकर हम पर अनुग्रह नहीं किया है। अतः कुछ आलोचकों को उनका इस संकलन में न होना अखर सकता है किन्तु यह हमारी विवशता है। अस्तु हम उन सभी लेखकों के हृदय से आभारी हैं जिन्होंने हमारे निवेदन पर सहर्ष अपनी कहानी भेजकर और प्रकाशन की अनुमति देकर सम्पादन में सहयोग दिया है।
हम आभारी हैं डॉ. भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय आगरा के कुलपति श्री मंजूर अहदम के जिन्होंने विश्वविद्यालय स्तर पर जनवरी 2000 में बाल-साहित्य की दो दिवसीय संगोष्ठी का सर्वप्रथम आयोजन कर बाल-साहित्य को गरिमा प्रदान की और भारत के अन्य विश्वविद्यालयों को बाल-साहित्य को गम्भीरता से लेने की प्रेरणा दी।
अन्त में हम आभारी हैं आत्माराम एंड सन्स दिल्ली के श्री शील जी के जिन्होंने इस संग्रह को साज- सज्जा के साथ सहर्ष प्रकाशित कर हमारा उत्साहवर्धन किया।

-राजकिशोर सिंह



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